<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225</id><updated>2012-02-25T18:44:13.874+05:30</updated><category term='कैम्पस का हाल-चाल'/><category term='aise hi'/><category term='खरी-खरी'/><category term='पुन: प्रकाशित (कविता)'/><category term='लघुकथा'/><category term='राज ठाकरे'/><category term='स्मृतियों में बंद कथा'/><category term='समाजवादी बिरादरी'/><category term='सवाल'/><category term='वाकया'/><category term='खोजबीन'/><category term='बचपन'/><category term='cricket'/><category term='स्मृति में बंद कविता'/><category term='Research paper'/><category term='दिल्ली से बाहर'/><category term='गाँधी परिवार'/><category term='पुन: प्रकाशित'/><category term='मेरी दिल्ली मै ही संवारूं'/><category term='कविता'/><category term='मेरे अपने'/><category term='मलयज'/><category term='डायरी के पन्नो से'/><category term='स्कूल डेज़'/><category term='साभार'/><category term='कविता जो मन भाये'/><category term='लोहिया और समाजवाद'/><category term='साहित्य-वार्ता'/><category term='बहसतलब'/><category term='बाल-कविता'/><category term='कैम्पस-बाज़ी'/><category term='अपनी दिल्ली'/><category term='फिल्म समीक्षा'/><title type='text'>ठीक-ठाक</title><subtitle type='html'>तुम्हारे बारे में क्या कहूं मै, 
मेरी तमन्नाओं का सिला है. 
नहीं मिला जो तो मुझको क्या है,
मिलेगा तुमको ये आसरा है.</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>83</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-4610966085949877959</id><published>2012-02-25T18:40:00.002+05:30</published><updated>2012-02-25T18:44:13.919+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्मृतियों में बंद कथा'/><title type='text'>स्मृतियों में प्रेम</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;१.वो वेलेंटाइन डे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूर वो दिखाई दी।.. उसने सोचा अब तो दे ही दूँ , पर फिर रुक गया। उसे आज ही उसके दोस्त ने कहा था कि ऐसे मामलो में जल्दबाजी ठीक नहीं। उसने फिर कंधे तक लटके बैग को पीछे किया और चेहरे पर आई बेचैनी को हटाने की कोशिश करने लगा। "कैसे दूँ वो बुरा तो नहीं मानेगी ना? कहीं दोस्ती भी ...नहीं-नहीं" उसने अपने अंदर एक और लड़के के होने का आभास महसूस किया। "दे ही देता हूँ अब नहीं दूँगा तो कब दूँगा।" वह उसके पास गया..फरवरी की धूप में वह ऐसी दिखती मानो कच्छ के रण मे पानी की चमक। उसने पास जाके थोड़ा हिचकिचाकर कहा.."एक्सक्यूज़ मी" .."हाँ क्या है" कुछ नहीं वह फिर रह गया।उसे लगा यह वो लड़की नहीं जिसे वह चाहता है। बैग की चेन जो उसने खोल ली थी। बंद करके बैग कंधे पर टांग लिया। ऐसा लगता है मानो कल की ही बात हो। &lt;br /&gt;पिछले नौ सालों से आज के दिन हर बार डायरी के भीतरे छुपाये गये फूल को देख कर वह अपने कॉलेज के दिनों में खो जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;२. कार्ड&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     दोपहर जिसमें सर्दियों के समापन का संकेत था। धूप पेड़ों से छनकर उस हरे लोहे के बैंच पर बैठी निशा के गालों और बालों को उम्रदराज़ बना रही थी। निशा के होंठो पर जमी पपड़ी कुछ कहना चाह रहीं थी। आंखें नीचे की ज़मीन में कुछ ढ़ंढ रही गिलहरी को घूर रहीं थी। चेहरा एक ही जगह जमा हुआ था लेकिन दिमाग में कुछ चल रहा था। मालियों की खुरपी माहौल को अशांत किये हुए थी। लंच होने ही वाला था शायद इसलिए वे अपना हाथ का काम समेट लेना चाहते थे। कौओ और गिलहरियों ने पेड़ों से उतरना शुरु कर दिया था। मिट्टी पर अभी पानी छिड़का गया था जिससे उठी खुशबू अब भी वसंत को क़ायम रखे थी।&lt;br /&gt;निशा के बराबर में काफी देर से चुप बैठे विनोद ने पूछा - "क्या हुआ, कुछ तो कहो, चुप क्यों बैठी हो?" पलकें उठी, कोरों से पानी की कुछ बूँदें नीचे ही लुढ़कने ही वाली थी कि निशा ने चेहरे पर एकाएक मुस्कराहट लाते हुए कहा - "कुछ नहीं।" "... कुछ तो, प्लीज़ कुछ तो कहो? बताओ तो।" "... कुछ नहीं - कहा ना। क्या तुम भी मुझे चैन से जीने नहीं दोगे। मैं कुछ देर चुप रहना चाहती हूँ। इतने सालों की रिलेशनशिप में भी तुम ये नहीं समझ सके।" विनोद को जैसे ऐसे किसी जवाब की उम्मीद निशा से नहीं थी, वह अवाक् निशा के चेहरे को देखने लगा। उसने देखा उसके गाल होंठों की तरह सूखे हुए थे जैसे रात भर नमकीन द्रव्य में डूबे हों।..." प्लीज़ कुछ तो कहो..आज फैरेवल पार्टी है, कॉलेज का आखिरी दिन..कुछ तो बोलो..कुछ तो कहो.". उसने एक बार फिर कोशिश की।&lt;br /&gt;निशा का शरीर जो अब तक अचेत था। एकदम हरकत में आया उसने अपने लाल पर्स से एक कार्ड निकाला और विनोद को थमाकर मालियों की मेहनत और लहराती घासों को कुचलती हुई चली गयी। &lt;br /&gt;आज इतने सालों बाद भी निशा के पैरों के निशान उस जगह मौजूद है। उस बैंच पर उसका अहसास मौजूद है। उसके जेहन में हर साल सर्दियों की समाप्ति निशा के खयाल को पैदा कर देती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-4610966085949877959?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/4610966085949877959/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=4610966085949877959' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4610966085949877959'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4610966085949877959'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='स्मृतियों में प्रेम'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2061831878656508758</id><published>2012-01-20T12:54:00.002+05:30</published><updated>2012-01-20T12:57:59.150+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Research paper'/><title type='text'>मलयज और देवीशंकर अवस्थी : जवाबों की तलाश में कुछ सवाल</title><content type='html'>मलयज और देवीशंकर अवस्थी की समीक्षा को समझने  की कोशिश, उनकी समीक्षा के समीक्षकों     की शंकाओ और सवालों का  जवाब देते हुए ही सफल हो सकती है ,  उन्हे सिर्फ उपेक्षित कह देने मात्र से नहीं l इस उपेक्षा  की चर्चा उन पर लिखे कई श्रद्धांजलि लेखों मे हमें मिल जाएगी, लेकिन  वे उपेक्षित कैसे रह  गए? यह सवाल हमें अपने आप से पूछ्ना चाहिए और केवल यही सवाल नही ऐसे कितने ही सवाल आज भी अलोचकों से जवाब की आस लगायें हैं l  हमारे भद्र साहित्यिक  समाज से ये सवाल पूछे जाने चाहिए--&lt;br /&gt;      कि... अब तक उनकी प्रतिभा का सही मूल्यांकन क्यों नहीं हो सका ?  क्यों उन पर आज भी वैचारिक लेखों का अभाव है ?&lt;br /&gt;    इन आलोचकों पर कोई  मुक़म्मल पुस्तक तो दूर अच्छे शोध-पत्रों और वैचारिक लेखों (जिनमे इनकी आलोचना-दृष्टि, सिद्धान्तों एवं मूल्यों का मूल्यांकन किया गया हो) तक का अभाव है, ऐसा क्यों ?&lt;br /&gt;     क्यों इन पर लिखे लेख हमें श्रद्धांजलि या संस्मरणमात्र  प्रतीत होते है?&lt;br /&gt;     दोनों ही आलोचकों की आलोचना समकालीन आलोचकों की गलतबयानी का शिकार हुई, जिसका विरोध साहित्यिक समाज मे कहीं क्यों नहीं दिखाई दिया ?&lt;br /&gt;     मलयज और देवीशंकर अवस्थी दोनों ही लेखकों को किसी न किसी आलोचक के बरक्स रखकर ही विचार क्यों किया गया? यदि दोनों का परस्पर तुलनात्मक अध्ययन किया जाता तो भी बात समझ में आती लेकिन मलयज को मुक्तिबोध के और देवीशंकर अवस्थी को नामवर सिंह के बरक्स खडा कर दिया गया l क्या समकालीन आलोचना के लिए किसी भी एंगल से यह शुभ माना जा सकता है?        &lt;br /&gt;      दोनों ही आलोचकों को एक तरह के सीमित पूर्वग्रह से ग्रस्त होकर देखा गया l क्या साहित्य में सिर्फ दो दृष्टियों से ही मूल्यांकन हो सकता है?&lt;br /&gt;मलयज ओर देवीशंकर अवस्थी के मरणोपरांत जिसका जो  मन आया उसने वो ठप्पा  इन पर  लगा  दिया l   रमेश उपाध्याय ने देवीशंकर अवस्थी को कलावादी घोषित किया(१) तो अरविन्द  त्रिपाठी  देवीशंकर अवस्थी पर लिखे अपने मोनोग्राफ में उन्हें वाया प्रगतिशील होते हुए  'देसी आधुनिक'  की संज्ञा देते हैं l(२) हद तो तब हो जाती है जब मैनेजर पाण्डेय देवीशंकर अवस्थी के बारे में कहते हैं  कि 'परंपरा का अस्वीकार उनके यहाँ मूल्य है l'(३).  श्याम कश्यप मलयज पर लिखे अपने लेख 'कलावाद के अधूरे साक्षात्कार' में यह घोषणा करते हैं कि मलयज न केवल कलावादी-रूपवादी हैं बल्कि विचार-विरोधी भी हैं l&lt;br /&gt;क्या मात्र परिमल से जुड़ना कलावादी होना या विचार विरोधी होना है? क्या कला ओर विचार को मिलाकर या उससे अलग कोई नयी एवं निजी दृष्टि नहीं बनायीं जा सकती?&lt;br /&gt;जब आप  मलयज व देवीशंकर अवस्थी की रचनाओं-आलोचनाओं को पढ़ते हैं  तो देखते हैं कि दोनों ही आलोचक साहित्य में प्रचलित दृष्टियों से अलग अपनी एक निजी दृष्टि बनाने की कोशिश कर रहे थे l यदि नियति उन्हें थोडा और समय देती तो संभवत: वे इस बात को साबित भी कर देते l&lt;br /&gt;ये सब ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब अब तक मिल जाना चाहिए था लेकिन अफ़सोस```यह सवाल जस के तस हमारे सामने है l यह हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि अब तक साहित्य-समाज में इन सवालों के जवाब देने की या खोजने की किसी भी तरह की कोशिश नहीं दिखाई देती l जो छुट-पुट समीक्षाएं मलयज और देवीशंकर अवस्थी पर लिखीं   भी गयीं  उसमे भी इन सवालों के जवाब खोजने की जद्दोजहद नहीं दिखाई देती बल्कि इन &lt;br /&gt; समीक्षाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि या तो ये  बहुत भावुक होकर लिखी गयी हैं या फिर खुन्नस निकालने के लिए l  इसलिए इन आलोचकों या इनकी आलोचना पर लिखी कोई भी समीक्षा तब तक अधूरी ही समझी जानी चाहिए जब तक वह इन सब सवालों का जवाब नहीं दे देती l    &lt;br /&gt;  मलयज पर 'पूर्वग्रह' ने विशेषांक निकाला जिसमे शमशेर बहादुर सिंह , रघुवीर सहाय , कुंवर नारायण , शिवकुटी लाल वर्मा , श्रीराम वर्मा आदि लेखकों ने मलयज पर आलोचनात्मक&lt;br /&gt; संस्मरण लिखे; जिसमे उन्होंने संक्षेप में मलयज की परिस्थितियों, समकालीन आलोचना में उनकी स्थिति और उनकी भाषा पर विचार किया l  'पूर्वग्रह' ने इस अंक के बाद के अंको में भी उनकी पुस्तकों पर लिखी समीक्षाओं का प्रकाशन किया l  लेकिन इन पुस्तक समीक्षाओं में कई दिक्कतें थीं l  इन पुस्तक समीक्षाओं के लेखक अपनी-अपनी मान्यताओं के आधार पर मलयज की पुस्तकों को देख रहे थे l  उन्होंने कहीं भी कृति के आन्तरिक मूल्यों और उन मूल्यों को इंगित करने वाली दिशाओं  को तलाशने की कोशिश नहीं की, लेकिन यदि तब भी इन समीक्षाओं से संतोष किया जा सकता है तो केवल इतना ही कि अपनी मान्यताओं को आधार बनाकर ही सही,कम से कम उनकी पुस्तकों का मूल्यांकन करने की  पहल तो की गयी l इस सन्दर्भ में मलयज द्वारा बताये गए पुस्तक समीक्षा के मानी महत्वपूर्ण  लगते हैं.- "समीक्षा के क्या मानी होते है? क्या तत्कथित पुस्तक समीक्षा करने वाला शुरू से ही यह मानकर चलता है कि वह एक ऊँचे आसन पर विराजमान है और प्रस्तुत पुस्तक पर verdict (निर्णय)  देने, भला बुरा कहने या अधिक हुआ तो critical appreciation करने की उसे स्वतंत्रता है? और आजकल पत्र-पत्रिकाओं में यही तो होता है l कितना गलत मतलब है समीक्षा का l&lt;br /&gt;"....मै समीक्षा को बहुत ऊँचे दर्जे की चीज़ समझता हूँ l एक समीक्षक सही मायने में कृतिकार के साथ मिलकर कृति के आंतरिक मूल्य और मूल्यों को इंगित करने वाली दिशा का अध्ययन करता है l इस तरह रचना के विकास की संभावनाओ  पर बहुत ही ठोस रूप से विचार किया जा सकता है."(४)&lt;br /&gt;इस उद्धरण से पुस्तक समीक्षा के मानी के साथ-साथ यह भी समझ में आ जाता है कि उस समय की समीक्षाओं की क्या स्थिति थी? मलयज यदि कृति के आंतरिक मूल्यों और उन मूल्यों को इंगित करने वाली दिशा पर जोर देते हैं तो देवीशंकर अवस्थी पुस्तक-समीक्षा के सन्दर्भ में समकालीनता  पर l  समकालीनता उनके यहाँ किसी पुस्तक को देखने की कसौटी है वे इसी कसौटी पर किसी पुस्तक का आकलन करते हैं l इस सम्बन्ध में 'विवेक के रंग' की भूमिका में उन्होंने विस्तार से विचार किया है l वे तो 'समकालीनता-बोध से रहित आलोचना को आलोचना मानने से ही इंकार करते हैं l'(५)&lt;br /&gt;'विवेक के रंग' जैसा एक महत्वपूर्ण समीक्षा संकलन उनकी  सोच और समझ का ही नतीजा है l जिसके संकलन में उन्होंने  न केवल रचना की महत्ता का बल्कि महत्वपूर्ण समीक्षा का भी ख्याल रखा l इसके पीछे क्या कसौटी रही इसका जवाब देते हुए वे कहते है- ''सामान्यत: कसौटी यही रही है कि समीक्षा समीक्ष्य कृति की आन्तरिक सत्ता का उदघाटन करती हो, समीक्ष्य सिद्धांत की दृष्टि से कुछ महत्वपूर्ण बात कहती हो, अथवा इसमें पद्धति का नयापन  मिलता हो l इस संकलन को जितना तटस्थ होकर मैंने बनाया चाहा  है उससे मेरा विश्वास है कि यदि कोई अन्य व्यक्ति भी इस तरह का संकलन सम्पादित करता तो चुनाव में बहुत अंतर न पड़ता- संख्या भले ही घट या बढ़ जाती l''(६)&lt;br /&gt;गौर कीजिये देवीशंकर अवस्थी ने कहा-'समीक्षा समीक्ष्य कृति की आन्तरिक सत्ता का उदघाटन करती हो' और इससे पहले दिया गया मलयज का उद्धरण देखिये -'एक समीक्षक सही मायने में कृति के आंतरिक मूल्य और मूल्यों को इंगित करने वाली दिशा का अध्ययन करता है l'&lt;br /&gt;क्या इन दोनों उद्धरणों में लगभग एक ही बात नहीं कही गयी है? क्या किसी पुस्तक की समीक्षा से पहले हमें अपनी निजी मान्यताओं को गौण रखकर कृति के आन्तरिक मूल्य और उन मूल्यों को इंगित करने वाली दिशाओं के अध्ययन को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए? यदि हम यह मानते हैं(जोकि लगभग सभी पाठक स्वीकारते हैं) कि 'विवेक के रंग' एक महत्वपूर्ण  समीक्षा-संकलन है लेकिन देवीशंकर अवस्थी और मलयज ने जो पुस्तक समीक्षा के मानी बताये है उन समीक्षाओं के लिए जो कसौटी निर्धारित की है l उस कसौटी को मानने में संकोच करते हैं, तब हमें अपने निजी अंतर्विरोधों की पुन: जाँच कर लेनी चाहिए l&lt;br /&gt;        मलयज और देवीशंकर अवस्थी की मंजिल एक ही थी ये बात और है कि इस मंजिल को तय करने के सफ़र के दौरान उनके रास्ते कभी मिले तो कभी बदल भी गए, किन्तु दोनों का ही उद्देश्य किसी कृति की समीक्षा करते समय अपने मानदंडो के साथ- साथ उस रचना की आन्तरिक सत्ता का निष्पक्ष मूल्यांकन करना था l मलयज जहां समीक्षकों को, अपनी समीक्षा द्वारा भाई-बिरादरी से बचने की सलाह देते हैं वहीं देवीशंकर अवस्थी विश्वविद्यालयी समीक्षा के पांडित्यधर्मी खतरों से पाठकों को आगाह करते हैं l आलोचना की समकालीनता और आलोचना में समकालीनता उनके लिए किसी भी अन्य दृष्टिकोण से ज्यादा ऊँचा दर्जा रखती थी l वे सही को सही और ग़लत  को ग़लत कहने वाले लोग थे जिसे मैनेजर पाण्डेय भी 'ईमानदारी का तकाज़ा' मानते हैं और कहते हैं कि "आलोचना में ईमानदारी का तकाज़ा तो यही है कि गलत को गलत और सही को सही साबित किया जाये l  आलोचना में  मास्टराना  अंदाज़ में रचनाओं और रचनाकारों को नंबर देने या पास-फेल करने की आदत को आचार्य शुक्ल ने 'असभ्यता' कहा था." (७) यह असभ्यता शुक्ल जी के समय में ही व्याप्त नहीं थी बल्कि इससे साठ-सत्तर के दशक का और उसके बाद का समय भी त्रस्त था ये असभ्य लोग या तो किसी भी लेखक या उसकी रचना को ख़ारिज कर देते या प्रशंसनीय बना देते थे l हिंदी आलोचना में एक बड़ा प्रतिशत ऐसी समीक्षाओं का है l यह समस्या मलयज के समक्ष भी थी और देवीशंकर अवस्थी के समक्ष भी l खैर, अभी हम इन बातों के विस्तार में न जाते हुए उन सवालों की ओर अपना रुख करते हैं जो हमने इस लेख के शुरू में उठाये थे l &lt;br /&gt;मुक्तिबोध की शोकसभा जो दिल्ली में हुई थी  कई मायनो में अब तक होने वाली शोकसभाओं से अलग थी l इस सभा में वक्ता की हैसियत से शामिल हुए थे देवीशंकर अवस्थी और श्रोताओं की भीड़ में शामिल थे मलयज l संभवत: यहीं  मलयज और देवीशंकर की पहली मुलाक़ात हुई हो l देवीशंकर पहले ही दिल्ली आ चुके थे जबकि मलयज सन १९६४  में दिल्ली आयेl दोनों एक ही इलाके(उस समय के साहित्यिक गढ़) मॉडल टाउन  में रहे l मलयज ने इस शोकसभा के बारे में १३सितम्बर १९६४ की डायरी में लिखा है -"उस दिन जब मुक्तिबोध की शोकसभा में डॉ.देवीशंकर अवस्थी ने मुक्तिबोध के आलोचक रूप  की निष्ठा की बानगी प्रस्तुत की तो अधिकांश लोगों ने उसे अनुपयुक्त, समय प्रतिकूल समझा क्योंकि ऐसे अवसरों पर लोग  भावुकतामय उदगारों  को सुनने की आस  लगाये रहते हैं पर मुझे देवीशंकर जी का रवैया बहुत पसंद आया....बिना अपने को भावों की दलदल में फँसाए तटस्थ दृष्टि से देवीशंकर जी ने मुक्तिबोध की प्रतिभा को सबसे बढ़िया श्रद्धांजलि दी l दरअसल ऐसी ही श्रद्धांजलियों की आवश्यकता है l प्रयाग में निराला के मरने पर जो शोकसभा हुई थी उसमे इस बात की कमी से ही तो वितृष्णा का भाव मुझमे जगा था लोग भावों की गिचपिच कर रहे थे, दिल्ली वाली यह शोकसभा अधिक बैलेंस्ड थी l"(८)&lt;br /&gt;संभवत: इस शोकसभा में दिए गए देवीशंकर अवस्थी के भाषण से ही प्रभावित हो, मलयज के मन में मुक्तिबोध की रचनाओ का अध्ययन और मूल्यांकन करने का ख्याल जगा था- "यह भी सही है कि मुझे अभी भी व्यक्ति मुक्तिबोध ही आकृष्ट करते रहे हैं और इतने से ही मै संतुष्ट भी था l कवि मुक्तिबोध को मैं उतनी एहमियत नहीं देता था इसे लिखते हुए अब भी कोई ग्लानि  का भाव मन में नहीं है l पर अब उनके काव्य का विधिवत गंभीर अध्ययन करने की  इच्छा अवश्य जाग पड़ी है! उनके भीतर पैठने की तीव्र प्रेरणा हो रही है l हो सकता है मेरा श्रम अकारथ न जाये, और मैं उनके सही रूप को आँक सकूँl"(९)&lt;br /&gt;   देवीशंकर अवस्थी ने अंग्रेजी में एक लेख 'Muktibodh:Not an outsider' शीर्षक से लिखा था जो एक पत्रिका(लिंक)में अक्टूबर१९६४ में छपा और जिसका हिंदी अनुवाद 'मुक्तिबोध: अजनबी नहीं' शीर्षक से उनकी पुस्तक 'आलोचना का द्वंद्व' में संकलित है l संभवत: यह शोकसभा में दिए गए भाषण का ही रूपांतरण(transcription) हो l इस लेख में देवीशंकर अवस्थी मुक्तिबोध को अंग्रेजी साहित्य के डब्ल्यू.बी.यीट्स(w.b.yets) के सदृश स्थान देते हुए कहते हैं -"एक आत्मनिर्वासन व्यक्तित्व जो चुपचाप समकालीन विचारों को आत्मसात कर रहा था और जिसने एक ऐसी शैली निर्मित की, जो अनूठी और उनकी अपनी थी l इसमें हम सभी श्रेणियों की रंगमयता देखते हैं मानो किसी प्रतिबिम्ब में आधुनिक  रंगमयता  के चौरस्ते अंकित हो l" (१०)&lt;br /&gt;            इसी लेख में वे मुक्तिबोध की फैंटेसी को अपनी रचना-आलोचना में केंद्रीय स्थान देने की चर्चा करते हैं और उनकी कविताओं को 'जटिल कविता' की संज्ञा देते हुए कहते हैं कि- "उनकी कविता सामान्य पाठकों के लिए है ही नहीं l उनकी कविता समझने के लिए ऐसे मस्तिष्क की ज़रुरत है जो विचारों से उलझ सकता हो और जटिल अनुभूति को आत्मसात कर सकता हो l"(११)&lt;br /&gt; देवीशंकर अवस्थी ने मुक्तिबोध की शोकसभा में जो कुछ भी कहा, वह मुक्तिबोध पर इसके बाद लिखी जाने वाली पुस्तकों,लेखों के लिए आधार स्रोत बन गया l मुक्तिबोध को दी गयी उनकी श्रद्धांजली, मुक्तिबोध पर की गयी प्रारंभिक सार्थक समीक्षा साबित हुई l उनकी इस शोकसभा में कहे गए शब्द आज भी मुक्तिबोध पर लिखी गयी(जा रही) समीक्षाओं में देखे जा सकते हैं l   मसलन  आत्मनिर्वासन को ही लीजिये, मुक्तिबोध की लम्बी कविता(अँधेरे में) को लेकर एक लम्बी बहस इसी एक शब्द को केंद्र में रखकर  चली है l मुक्तिबोध पर देवीशंकर अवस्थी के ये उद्धरण, जो अवस्थी जी ने मुक्तिबोध को श्रद्धांजलि देने के लिए कहे थे वास्तव में हमारे शुरू में उठाये गए सवालों से ही ताल्लुक रखते हैं l&lt;br /&gt;          एक श्रद्धांजलि  मुक्तिबोध को देवीशंकर अवस्थी ने दी थी जिसे मलयज ने मुक्तिबोध की प्रतिभा को दी गयी सबसे बढ़िया श्रद्धांजली कहा था, दूसरी ओर देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में कराई गयी साहित्य अकादमी की संगोष्ठी(०७ अप्रैल,१९९०) को याद कीजिये l इसी संगोष्टी में रमेश उपाध्याय ने देवीशंकर अवस्थी को 'कलावादी' घोषित किया था l अगले वक्ता के रूप में अजय तिवारी ने स्थापित किया था कि-   'समाजशास्त्रीय आलोचना का पहला परिचय  हमें अवस्थी जी में मिलता है न कि नामवर सिंह जैसे मार्क्सवादी आलोचक मेंl'(१२)   इस संगोष्टी में सबसे पहले मैनेजर पाण्डेय ने माना कि- "देवीशंकर अवस्थी दो तरह की दृष्टियों से अपना एक निजी रास्ता बनाने की कोशिश कर रहे थे l परिमलियों से बहस करते हुए वे इस दल के मुखर प्रवक्ता रामस्वरूप चतुर्वेदी के इस आरोप का खंडन करने में लगे थे कि कहानी दूसरे दर्जे की विधा है और दूसरी ओर प्रगतिशीलों से बहस करते हुए उनकी इस प्रवृत्ति का खंडन कर रहे थे की कहानी गंभीर कलात्मक विधा नहीं है."(१३)   अपनी बात आगे बढ़ाते हुए पाण्डेय जी कहते हैं-....अवस्थी जी बीच का रास्ता तय नहीं कर पा रहे थे और फिर लगभग आरोप की मुद्रा में स्थापित करते हैं कि ''परंपरा का अस्वीकार उनके यहाँ मूल्य हैl"(१४)  संगोष्टी के अंत में अध्यक्ष पद से बोलते हुए नामवर सिंह ने कहा भी  कि "पूरी बहस में सेंटिमेंटलिज़्म ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हुई है l   इस तरह की कोरी भावुकता हमेशा खतरनाक होती है l"(१५) नामवर सिंह के इस वक्तव्य से मलयज की डायरी  से पूर्व उद्धृत वह अंश याद हो आता है जहां वे कहते हैं कि 'लोग भावों की गिच-पिच कर रहे थे l'(१६) मलयज की डायरी-२, पृष्ट ३१७&lt;br /&gt;बहरहाल, एक सच्ची श्रद्धांजलि क्या होती है? देवीशंकर अवस्थी हमें सिखा गए थे हम ही उनके सिद्धांतों को आत्मसात न  कर सके l मुक्तिबोध का सौभाग्य है कि उन्हें देवीशंकर अवस्थी मिले लेकिन मलयज और देवीशंकर अवस्थी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उन्हें कोई देवीशंकर नहीं मिल सका l&lt;br /&gt;हम लोगों ने श्रद्धांजलि को मजाक बना दिया 'बड़ा भला आदमी था' कहकर हमने उसका मजाक ही तो उड़ाया l मरने के बाद तो कुछ भी कहो 'कौन पूछने वाला है'? कलावादी-रूपवादी, जनवादी, समाजवादी, या फिर मार्क्सवादी कुछ भी कहो या फिर उन्हें दो खेमों में से किसी एक खेमे में फिट कर दो l कोई विरोध नहीं करेगा? क्योंकि इस तथाकथित  साहित्य-अनुशीलन की दो दृष्टियों(खेमों) से अलग  या इनसे मिलकर तो कोई अन्य दृष्टि बन ही नहीं सकती न ? इस तरह की मोनोपोली ने राजनीति से सीधे साहित्य में छलांग लगाईं है पहली परंपरा, दूसरी परंपरा,तीसरी,..........आख़िर साहित्यानुशीलन और कितनी परम्पराओ में बांटा जाएगा?&lt;br /&gt;आज आलोचना के नाम पर परंपरा के भी खेमे बन गए हैं स्त्री,दलित, उपेक्षित इन सभी परम्पराओं की खोज आवश्यक है; पर  क्या यह आलोचना  और आलोचक की खेमेबंदी के बाद ही संभव है? यह सवाल आज भी हमारे सामने ज्यों का त्यों खड़ा है जवाब की तलाश में......&lt;br /&gt;         चलिए आपका जो मन आता है मानिए ; ये आपके निजी  पूर्वग्रह हैं लेकिन क्या यह भी हमारा दायित्व नहीं कि इन्हें कट्टरता की हद तक न जाने दें l जब पूर्वग्रह कट्टरता की हद तक पहुँच जातें हैं तो आलोचना की शक्ति(निर्णय देना) फतवे में तब्दील हो जाती है l फ़तवा आलोचना की बीमारी है जो आपको विवादित बना सकता है लेकिन पाठको से संवाद रचना के सम्बन्ध में दिए गए निर्णयों से स्थापित होता है फतवों से नहीं l&lt;br /&gt;जब मैनेजर पाण्डेय कहते है कि उनके(देवीशंकर अवस्थी) यहाँ परंपरा का अस्वीकार मूल्य है तो उपरोक्त बातें विश्वसनीय प्रतीत होतीं हैं कि कुछ भी कहिये कौन कहने-सुनने वाला है l मैनेजर पाण्डेय हिंदी आलोचना का एक स्थापित नाम है इसलिए उनसे ये आशा नहीं की जा सकती कि उन्होंने देवीशंकर अवस्थी को पढ़े बिना ये बात कही होगी लेकिन शक होता है कि यदि पढ़ा है तो ये उल्टी बात क्यों? चूँकि देवीशंकर अवस्थी के अधिकतर लेखों में परम्परान्वेक्षण, अपनी परंपरा का स्वीकार,  उसका महत्व एक सामान्य पाठक भी देख सकता है l एक आम पाठक भी बता सकता है कि देवीशंकर अवस्थी के लिए परंपरा और इतिहासबोध लगभग एक ही हैं समकालीनता को वे कोई खंडित कालखंड नहीं मानते  बल्कि  इसे परंपरा या इतिहासबोध के अंग के रूप में स्वीकारते हैं उनकी पुस्तकें इसका  प्रमाण हैं l उनकी पुस्तकों से उद्धृत कुछ अंशों से यह बात अच्छी तरह से स्पष्ट हो जाएगी :-     &lt;br /&gt;   (क) "बहुधा  समसामयिक रचनाकार अतीत में एक प्रकार के परम्पराबोध के लिए जाते हैं l परंपरा का यह रूप पैतृकानुवृत्ति होता है लेकिन यह पलायन नहीं स्थिति की दृढ़ता है और आधुनिक हिंदी साहित्य भारतेंदु के समय से ही परंपरा के इसी रूप को स्वीकारता आया  हैl" (१७)&lt;br /&gt;     (ख) "समकालीनता एक कटा हुआ टुकड़ा नहीं है वह परंपरा यानी इतिहासबोध का अंग होता है और जब हम अनुभव की प्रामाणिकता की बात उठाते हुए समकालीनता को उसकी कसौटी मानते हैं तब यह निहित होता है कि परंपरा की  प्रत्यक्ष या परोक्ष परंपरा को भी कहीं स्वीकार करते हैं l"(१८)&lt;br /&gt;      (ग) "नई आलोचना में कही कोई कमी नहीं है याकि उसने अपनी अपेक्षाओ को ठीक तरह से पूरा किया है l वस्तुत: समसामयिक साहित्य के प्रति अपने दायित्व को उसने लगभग पूरा किया है l पर उसका एक दूसरा दायित्व भी था कि तमाम नए साहित्य के अनुकूल पुराने साहित्य को भी व्यवस्था दे, उसका पुनर्मूल्यांकन करे l"(१९)&lt;br /&gt;       इसी तरह के कई उद्धरण उनकी पुस्तकों, लेखों में बिखरे आपको मिल जायेंगे, लेकिन यह सवाल अब भी जस का तस है कि पाण्डेय जी  यदि परंपरा का अस्वीकार उनके यहाँ मूल्य है तो फिर ये उद्धरण क्या है? जहां देवीशंकर अवस्थी अपनी परंपरा का मूल्यांकन करने की जद्दोजहद करते दिखाई देते हैं और समसामयिक सन्दर्भ सांचे पर उनका  मूल्यांकन- पुनर्मूल्यांकन करने पर बल  देतें हैं l  पाण्डेय जी ने ऐसा कहा अगर इसे भुला भी दिया जाए तो क्या इस बात को आलोचना का वर्तमान  विस्मृत कर सकेगा कि उनकी इस बेबुनियादी बात का जवाब पिछले दो दशकों में  नहीं दिया गया l आज भी इसकी केवल आस ही साहित्य समाज से की जा सकती है l&lt;br /&gt;क्यों उनकी चुप्पी को सहमति न समझा जाये? जिस संगोष्टी में यह बात कही गयी, उस संगोष्टी में साहित्य आलोचना के जाने माने नामो की पूरी खेप मौजूद थी लेकिन सब चुप...l&lt;br /&gt;अब तक भी पाण्डेय जी का उपरोक्त कथन स्पष्टता की मांग नहीं  मात्र आस लगाए है, क्यों?&lt;br /&gt;बहरहाल, यह सवाल  हिंदी आलोचना का ज़ख्म है जिसे आप जितना ही कुरेदेंगे टीस उतनी ही अधिक होगी l इस प्रसंग से अलग यदि  हम देवीशंकर अवस्थी और मलयज की उन  विशेषताओं पर नज़र डालें जो उनके एक ही मंजिल की ओर बढ़ने का संकेत देतीं हैं, तब हम अधिक स्पष्टता से दोनों आलोचकों की आलोचना के  मानदंडों का मूल्यांकन कर सकेंगे l&lt;br /&gt;   मलयज और देवीशंकर अवस्थी दोनों के लिए ही रचना और आलोचना समानांतर क्रियाएं हैं एक ओर मलयज है जिनके लिए कविता रचने के पश्चात् समाप्त नहीं हों जातीं बल्कि वह आलोचना के लिए प्रेरित भी करती हैं l(२०), तो दूसरी ओर देवीशंकर अवस्थी, जो  कहते हैं- 'एक बात बहुधा कह दी जाती है कि ऐतिहासिक विकास  क्रम में समीक्षा बाद को आई, समीक्ष्य(कलाकृति) पहले l परन्तु यह समस्या ठीक वैसे ही है जैसे यह पूछा जाये कि मुर्गी पहले आई या अंडा l वास्तव में ये दोनों ही सामानांतर क्रियाएं हैं l'(२१)   मलयज भी आलोचना कर्म को कविता का विरोधी या प्रतिद्वंद्वी नहीं मानते बल्कि आलोचना  को कविता का सामानांतर संसार मानते हैं उनका कहना  हैं कि ''कविता में जिसे टटोलता हूँ आलोचना में उसी को पाता हूँ l''(२२) मलयज के लिए कविता(रचना) भीतरीऔर बाहरी  'तनाव-बिन्दुओं' पर ही संभव होती है l जबकि देवीशंकर अवस्थी मलयज के तनाव-बिन्दुओं की जगह 'प्रभाव-ग्रहण' शब्द का इस्तेमाल करतें हैं ,  और कहते हैं- "समीक्षक बाहर की ओर से प्रभाव-ग्रहण करता है एवं भीतर की ओर से महत्व का आकलन  करता है पर यह होता एक ही समय और साथ-साथ है l"(२३)  यहाँ फर्क सिर्फ इतना ही है कि मलयज इसे रचना के स्तर पर संभव मानतें हैं और देवीशंकर अवस्थी आलोचना के स्तर पर l   पर चूँकि आलोचना भी रचना है और दोनों ही सामानांतर क्रियाएं हैं तो यह फर्क भी अधिक देर नहीं टिकता l&lt;br /&gt;  दरअसल 'भीतर' और 'बाहर' मलयज की आलोचना के केंद्रीय शब्द हैं उनके लिए रचना इन दोनों के तनाव से ही उत्पन्न होती है l उनकी पुस्तक 'कविता से साक्षात्कार' के लगभग सभी लेख इस 'भीतर' और 'बाहर' की शब्द-सत्ता के अर्थों तक पहुँचने की राह हैं  जिसका संकेत वे इस पुस्तक की भूमिका में ही दे देतें हैं- "मैंने जितना इस आधुनिक रचना के भीतर देखना चाहा है उतना ही उसके बाहर भी, क्योंकि मैंने देखना चाहा है कि कविता कैसे न सिर्फ अपने भीतर से बल्कि अपने बाहर भी निर्मित होती है कि कैसे भीतर का बहुत कुछ सिर्फ बाहर के आलोक में ही छुआ जा सकता है, कि कैसे बाहर भी बिना भीतर की आग  के महज एक संदिग्ध सत्य बनकर रह जाता है? मैंने देखना चाहा है कि कैसे कविता आधुनिक कविता भीतर और बाहर के एक तनाव बिंदु पर संभव होती है?"(२४) 'मलयज की डायरी' से पता चलता है कि मलयज जवाहरलाल नेहरु से बहुत अधिक प्रभावित थे और उनकी तमाम सीमाओं के बावजूद उन्हें  एक बौद्धिक नेता के रूप में देखते थे l देवीशंकर अवस्थी भी आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में उन्हें देख रहे थे l उस समय विश्व राजनीति और उसकी महत्वाकांशाएं दो गुटों में बँटी हुई थीं l नेहरु ने नासिर,टीटो के साथ मिलकर इन गुटों से निरपेक्ष तीसरी दुनिया के देशों को एक अलग राह दिखाई थी, जो काम नेहरु राजनीति के स्तर पर कर रहे थे वही मलयज और देवीशंकर अवस्थी ने साहित्यिक स्तर पर करने की कोशिश की l वे भीतर(कलावाद)  और बाहर(मार्क्सवाद) के तनाव से एक निजी सोच निर्मित करने की कोशिश में लगे थे l वे इस अनुभूति(भीतर) और विचार(बाहर) के द्वंद्व से अपनी रचना और आलोचना का विकास करना चाहते थे l थोड़े बहुत अंतर के बावजूद दोनों के ही दृष्टिकोण में इस बाहर और भीतर का मेल है l मलयज में भीतरी हिस्सा(अनुभूति) अधिक है तो देवीशंकर अवस्थी में बाहरी हिस्सा(विचार) अधिक l संभवत: इसलिए कोई इन्हें कलावादी कहना चाहता है तो कोई प्रगतिशील बनाने की जुगत में लगा रहता है लेकिन उन्हें किसी गुट या खेमे में बाँटना ठीक नहीं है l &lt;br /&gt;जो लोग सिर्फ विचारधारा के बल पर आलोचना को खड़ा करना चाहते हैं या जो सिर्फ कला को कला के लिए ही मानने के पक्षधर हैं उनके लिए दोनों आलोचकों की आलोचना एक नई कलात्मक विचारधारा  का, एक नया पक्ष रखती है l इस सन्दर्भ में शिवकुमार मिश्र ने बड़ी मार्के  की बात  कही है-   "विचारधारा ही बड़ी कला को सामने नहीं लाती उसके लिए रचनाकार को रचना की सभी शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं कलात्मक महारत के बिना सही से सही विचारधारा भी बेअसर होती है l उसी प्रकार जिस प्रकार सही विचारधारा के अभाव में कलात्मक महारत भी एक सीमा के बाद बेअसर होती है l"(लेख- समकालीन आलोचना की समस्याएं: हिंदी आलोचना के सन्दर्भ में)   वे तो मार्क्सवादी आलोचना का बुनियादी सवाल भी यही मानते हैं कि- ''विचारधारा को सही कला का रूप कैसे दिया जाये?'' (२५) लगभग इसी तरह की बात नामवर सिंह ने 'कविता के नए प्रतिमान' की द्वितीय संस्करण  की भूमिका में जेरेमी होथोर्न का हवाला देते हुए कही है जहां उन्हें लगता है कि "हिंदी के नए मार्क्सवादी आलोचक अंग्रेजी की 'नयी समीक्षा' के प्रति ज़रूरत से ज्यादा ही शंकालु  हैं l"(२६) अंतर सिर्फ इतना है कि  यहाँ  नामवर जी अपनी इस पुस्तक पर लगाये गए आरोप(रूपवादी झुकाव) पर अपनी सफाई देते हुए यह बात कह रहे हैं l बहरहाल  'कविता से साक्षात्कार' की समीक्षा करने के दौरान श्याम कश्यप ने मलयज को कोरा कलावादी-रूपवादी घोषित कर दिया l अपनी निजी मान्यताओं ओर आग्रहों के कारण उन्होंने कहा कि "मलयज तो न केवल विचार या विचारधारा को ही कविता के क्षेत्र से बाहर मानते हैं बल्कि अनुभव, भाव, अनुभूति की भी वे नितांत आत्मनिष्ठ  व्याख्या करते हैं l"(२७) यह बात उन्होंने मलयज को मुक्तिबोध के बरक्स रखकर कही है जबकि ऐसा कोई लेख मेरे देखने में नहीं आया जहां  मलयज ने विचार या विचारधारा के बारे में इस तरह की बात कही हो l  अपनी निजी मान्यताओं के आधार पर किसी कृति की आतंरिक सत्ता को नजरअंदाज करने से इसी तरह की एकतरफा(एकांगी) समीक्षा देखने को मिल सकती है l  वे इस बात से भी खफा हैं कि मलयज ने अज्ञेय को तो तवज्जो दी, पर त्रिलोचन को नहीं l  वे मलयज के शमशेर के बारे में कहे गए इस वाक्य को कि 'शमशेर की कविता अपने अपरिभाषित रूप में ही सार्थक है l' एक गुनाह मानते हैं कुल मिलाकर यह पूरी समीक्षा कट्टर मार्क्सवादी नजरिये से, मलयज को कलावादी -रूपवादी मानते हुए अपनी खुन्नस निकालती प्रतीत होती है l  वे लेखों के शीर्षकों को पकड़ कर बैठ जाते हैं उन्हें ध्यान  से पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाते l  त्रिलोचन पर लिखे लेख का शीर्षक(औसत भारतीयता का कवि) देखकर वे भभक उठते  हैं पर उसी लेख के उस वाक्य को उद्धृत नहीं करते जिसमे मलयज कहते हैं कि 'हिंदी में शायद त्रिलोचन ही एकमात्र कवि हैं जिन्होंने अपने को लोकजीवन से पूरी तरह जोड़ लिया है सौंदर्य की एक अंत:गरिमा के साथ'(२८)&lt;br /&gt;जहाँ तक शमशेर पर कही गयी मलयज की बात को वो गुनाह की श्रेणी में रखते हैं तो इस संबंध में 'मलयज स्मृति अंक'(पूर्वग्रह) में प्रकाशित शमशेर बहादुर सिंह का लेख एक नज़र कर लेना चाहिए जिसमे शमशेर स्वयं मलयज को अपनी कविताओं का मर्मी पाठक ही नहीं बल्कि निर्मम और विश्वसनीय आलोचक भी स्वीकारते हैं और कहते है कि - 'मेरी अनेक सीमाओं और दोषों को उन्होंने सही -सही लक्षित किया है सचमुच मैं आज उनका कृतज्ञ  हूँ l'(२९)&lt;br /&gt;मलयज और शमशेर कितने आत्मीय थे ये उनकी डायरियों से पता चल जाता है किन्तु आलोचना में उन्होंने सदैव निष्पक्षता बरती l  मलयज का शमशेर से कोई पार्टीबद्ध रिश्ता नहीं था बल्कि यह आत्मीयता, सद्भाव, अनुभूति और भावना का रिश्ता था l &lt;br /&gt;दरअसल  श्याम कश्यप की इस पुस्तक समीक्षा को पढ़ने के बाद उनकी  निजी समस्याएँ साफ़ तौर पर दिख जाती हैं एक , वह मलयज को कट्टर वादग्रस्त  नज़रिए से देख रहे हैं दूसरी, उन्हें कलावादी -रूपवादी मानकर चल रहे हैं साथ ही मुक्तिबोध के बरक्स रखकर उनका मूल्यांकन कर रहे हैं l संभवत: इसी कारण इस समीक्षा की परिणति एक तरह की खुन्नस में होती है l&lt;br /&gt;अब तक मलयज की भीतरी और बाहरी तनाव बिन्दुओं की संभाव्यता भी स्पष्ट हो  गयी होगी; यदि अब भी कोई गुंजाइश बाकि हो और बाहर व भीतर के इस फेर को एक बार फिर समझना हो तो मलयज की अंतिम अधूरी, किन्तु  सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक ' रामचन्द्र शुक्ल' तथा रामचंद्र  शुक्ल पर लिखे लेख 'मिथ में बदलता आदमी' पर नज़र डाल लेनी  चाहिए; जहाँ वे शुक्ल जी पर अब तक कही गयी बातों से अलग हटते हुए एक नए अंदाज़ से ,एक नई दृष्टि से शुक्ल जी को देखते हैं l  रचना को समझने के लिए रचनाकार के युग को देखना उसकी मन:स्थिति को समझना -आकलन करना ; मलयज की आलोचना का एक जरुरी और बुनियादी पहलू है l हजारीप्रसाद द्विवेदी तो कहते भी हैं कि ' कवि का जीवन उसकी कृतियों को समझने का प्रधान सहायक है l'(३०) [साहित्य सहचर ,पृ. १४]   &lt;br /&gt;     शुक्ल जी पर  बात करते वक़्त मलयज का ध्यान उस समूचे परिवेश (प्रकृति) पर था जहाँ से शुक्ल जी अपनी आलोचना का उपजीव्य ग्रहण कर रहे थे ' मिथ में बदलता आदमी' की आरंभिक पंक्तियाँ देखिये - "धूल में लस्त पस्त उस मैदान में खड़े खड़े - जिसके पीछे थी प्रकृति और आगे था पिछड़ापन मुझे रामचंद्र शुक्ल की याद आई l'' (३१)  &lt;br /&gt;       वे शुक्ल जी को किसी एक धारा या परम्परा का लेखक मानने की जगह कहते हैं कि शुक्ल जी के कई रूप हैं - "एक वह जिसने  हिंदी की विचार शक्ति को देसी साँचे में ढ़ालकर समालोचना के नए औज़ार गढ़े l एक ओर जिसने पूर्व ओर पश्चिम के द्वंद्व में अपनी ज़मीन  का विवेक नहीं खोया और उससे बड़ी बात यह है कि अपनी भाव संवेदना के कपाट सदा  खुले रखे, पर एक जिसमे शुक्ल जी के सभी रूप समाहित हैं याकि सभी रूप इस रूप से निकले हैं वह है उनका विशिष्ट और विलक्षण के विरुद्ध सामान्य और सर्वानुभूत का पक्षधर रूप l''(३२) शुक्ल जी बार-बार इस सामान्य मनुष्य को गुहारते हैं कि सदा अपने भीतर ही न धँसे रहो, बाहर  आओ और देखो; देखो और महसूस करो l(३३)&lt;br /&gt;            शुक्ल जी के बारे में कहे गए मलयज के ये शब्द 'कविता से साक्षात्कार' की भूमिका में दिए गए उसी सिद्धांत की व्यावहारिक परिणति है जिसमे वे 'अनुभव को रचने' और 'महसूस करने' की बात कहते हैंl उपरोक्त उद्धरण को हमें भावुकता और कलावादी नजरिये से न देखते हुए उनमे एक गहन विचार छिपा है यह देखना चाहिए l इसी सन्दर्भ में देवीशंकर  अवस्थी की पुस्तक 'आलोचना और आलोचना' की याद हो आती है जिसके लेखों  के द्वारा वे व्यावहारिक आलोचना की सैद्धांतिकी का निर्माण करने की कोशिश कर रहे थे l मलयज अपनी पुस्तक 'कविता से साक्षात्कार' की भूमिका में बताये गए सिद्धांतों का व्यवहार अपनी पुस्तकों के समीक्षा लेखों में आधारिक स्रोत के रूप में करते दिखते हैं l अपनी एक पुस्तक 'संवाद और एकालाप' में निर्मल वर्मा पर लिखे लेख में वे निर्मल वर्मा के गद्य को 'धुप-छाही गद्य'  की संज्ञा देते हैं और उनकी रचना को स्मृति में बंद बताते हुए कहते हैं- ''रचना निर्मल वर्मा के लिए स्मृति में ही है स्मृति में हर बार कुछ न कुछ छूट जाता है - समयबोध के जाल से छूटकर गिरे क्षणों जैसा - और वह कुछ छूटा हुआ ही हर बार उन्हें रचने को प्रेरित करता है l''(३४)&lt;br /&gt;मलयज की समीक्षा का बुनियादी सरोकार इसी तरह की भावनात्मक अभिव्यक्ति में छिपा है पर यह कोरी भावुकता नहीं है और न ही कोरा अभिव्यक्तिवाद l यह भीतरी और बाहरी बिन्दुओं का तनाव है जो उनके लगभग सभी समीक्षा लेखों का आधार है l हम कह सकते हैं कि  इन्ही  बिन्दुओ से मलयज की आलोचना की शुरुआत होती है और वे कलावाद और जनवाद के विवादित ढाँचे  से खुद को बचाते हुए, एक नए तरह के कलात्मक वैचारिक मानदंडों पर शुक्ल जी की आलोचना का मूल्यांकन करते हैं l मलयज शुक्ल जी की पुस्तक 'रस मीमांसा' के अध्ययन के दौरान पाते हैं कि यह पुस्तक शास्त्रीयता की परत को हटाकर उसे सामान्य  धरातल पर समझने-समझाने का प्रयास करती है जिसका सरोकार सामान्य मनुष्य से है l यह सामान्य मनुष्य सामान्य के लिए आदर्श है जो सच होते हुए भी मिथ है l  सगा होते हुए भी सौतेला है और पास होते हुए भी दूर का है और मलयज निष्कर्ष निकालते हैं कि- "राम में शुक्ल जी ने तुलसीदास के सच को नहीं, सामान्य आदमी के उसी मिथ को स्वीकार किया है l"(३५) यह रामचंद्र शुक्ल पर अब तक कही गयी बातों से हटकर कही गयी बात थी l शुक्ल जी सामान्य आदमी की ओर थे किसी विशिष्ट व्यक्तित्व या रचनाकार  की ओर नहीं, जिस किसी ने भी इस सामान्य आदमी को पकड़ा;शुक्ल जी के लिए वह विशिष्ट हो गया l&lt;br /&gt;प्रभात त्रिपाठी ने मलयज की पुस्तक 'रामचंद्र शुक्ल' की समीक्षा करते हुए कहा-''मलयज शुक्ल जी के रस्ते पर चलकर हिंदी समीक्षा का जो परिदृश्य देख रहे थे, वहां एक ऐसी चिंतन भाषा विकसित हो रही थी जिसने सदियों से चले आते काव्य-चिंतन में अपने वक़्त की तरफ से बहुत कुछ नया जोड़ा था l''(३६) इस लघु प्रशंसा के तुरंत बाद उन्हें रामचंद्र शुक्ल में और उन्ही के पदचिन्हों पर चल रही मलयज की आलोचना में अंतर्विरोधों की ग्रस्तता नज़र आती है और वे पूछ्तें हैं कि-'क्या शुक्ल जी की तरह मलयज भी द्वंद्वात्मकता के उसी ज़रूरी अंतर्विरोध से ग्रस्त थे जिसके कारण शुक्ल जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सामान्य मनुष्य के मिथ में बदला था l''(३७)  इस सवाल पर सवाल पूछने की ही तबियत होती है संभवत:वही इसका जवाब भी हो l क्या किसी धार्मिक या पौराणिक चरित्र को सामान्य मनुष्य के मिथ में बदलना  अंतर्विरोध का सूचक है? यदि ऐसा है तो क्या निराला से लेकर धर्मवीर भारती तक इसी फेहरिस्त में शामिल नहीं होंगे? क्या मिथकों की प्रासंगिकता ख़त्म हो चुकी है?&lt;br /&gt;प्रभात त्रिपाठी के सवाल के जवाब में इसी तरह के कई सवाल पूछे जा सकते है लेकिन कुल मिलाकर प्रभात त्रिपाठी द्वारा की गयी मलयज की पुस्तक 'रामचंद्र शुक्ल' की समीक्षा, मलयज की अन्य पुस्तकों की समीक्षाओं की तुलना में अधिक विश्वसनीय एवं निष्पक्ष समीक्षा लगती है ;जो मलयज को किसी अन्य रचनाकार  के बरक्स न देखते हुए उनकी पुस्तक का ठीक-ठीक  मूल्यांकन करती है l&lt;br /&gt;यहाँ मलयज की पुस्तकों की समीक्षा को देखने के सन्दर्भ में एक बात कहनी बड़ी ज़रूरी लगती है l जैसाकि हमने पहले भी कहा कि 'बाहर' और 'भीतर' मलयज की आलोचना के  केंद्रीय शब्द हैं जिनका मानी जाने बिना, या जिन्हें परिभाषित किये बिना मलयज की आलोचना को समझना; उन्हें बिना   जाने-बूझे कलावादी-रूपवादी घोषित करने जैसा ही है l&lt;br /&gt;यूँ तो आलोचना पूर्वग्रह रहित नहीं होती, हर आलोचक के कुछ अपने आग्रह होतें हैं जिन्हें आप आलोचक के औज़ार(tools) कहते हैं लेकिन कट्टरता तो साहित्य, धर्म, राजनीति सभी के लिए घातक है l जब आप मलयज को कट्टर वादग्रस्त नज़रिए से देखेंगे तो आपको कदम- कदम पर लगेगा कि वे कलावादी हैं,मार्क्सवादी रचनाकारों की बुराई करते हैं, अज्ञेय जैसे आधुनिकतावादियों की जुगाली करतें हैं l जैसाकि श्याम कश्यप ने कहा है लेकिन जब आप किसी भी विचारधारा से सम्बन्ध रखने पर भी एक स्वस्थ मानसिकता से मलयज की समीक्षा को देखेंगे तो मलयज की रस मीमांसा आपको 'मलयज की संघर्ष मीमांसा'(३८) लगेगी l  आपको उनकी भाषा में भावी आलोचना-भाषा के लक्षण दिखाई देंगे जिनकी ज़रुरत समकालीन आलोचना में नामवर सिंह महसूस करतें हैं l(३९)  &lt;br /&gt;एक स्वस्थ मानसिकता से इन दोनों समीक्षकों की समीक्षा महरूम रही है l अब तक वे उपेक्षित रहे हैं इसमें तो कोई शक नहीं, लेकिन जो थोडा बहुत इन पर लिखा भी गया यदि वो भी स्वस्थ नज़रिए से लिखा गया होता तो संभवत:इस उपेक्षा की इतनी कचोट हममे न होती l दोनों ही लेखकों पर ग़लतबयानी  की गयी इसका विस्तृत विवरण हम पहले ही दे चुके हैं अब इस लेख के निष्कर्ष स्वरुप नयी कहानी, जिसे नामवर सिंह ने पहचान दिलाई और जिसकी सबसे बढ़िया समीक्षा  हमें देवीशंकर अवस्थी के लेखों में देखने को मिलती है l नयी कहानी की समीक्षा में देवीशंकर अवस्थी  के मरणोपरांत अगर वो दम नहीं रहा जो पहले रहा करता था तो इसके कारणों के रूप में वही 'बरक्स' आ खड़ा होता है जिसका उल्लेख हम बार- बार इस लेख में करतें आयें हैं l बरक्स आलोचना के लिए कितना घातक है इस बात से समझ में आ जाता है कि यदि नए कहानीकारों ने देवीशंकर अवस्थी को(अपने पक्ष में करने की चाहत लिए) एंटी-नामवर सिंह होकर न देखा होता तो नयी कहानी समीक्षा की अकाल मृत्यु न हुई होती l&lt;br /&gt;नामवर सिंह के बरक्स जब मोहन राकेश ने देवीशंकर अवस्थी को नयी कहानी का सर्टिफिकेट दे दिया(४०) तब भावुकतावश कहें या किसी और वजह से नामवर सिंह ने नयी कहानी की झंडाबरदारी देवीशंकर अवस्थी को सौंप दी, नयी कहानी समीक्षा के साथ यह किस तरह का मज़ाक हो रहा था, समझ से परे है l&lt;br /&gt;सन १९६६  में अवस्थी जी की अकाल मृत्यु हो गयी उसके बाद भी नामवर सिंह ने नयी कहानी की समीक्षा नहीं की l संभवत: अवस्थी जी को दिया गया(दिल पे लिया गया) वचन उनके लिए नयी कहानी समीक्षा के विकास से ज्यादा अहमियत रखता था l कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि इस 'बरक्स' के कारण नयी कहानी समीक्षा की जिस तरह से शुरुआत हुई थी आगे चलकर वह उसी राह पर विकसित नहीं हो सकी l हमने कहा कि देवीशंकर अवस्थी नयी कहानी समीक्षा के बेहतरीन समीक्षक हैं लेकिन हम भूल गए कि नयी कहानी के विकास में नामवर सिंह का भी कुछ योगदान है जिस तरह से नवलेखन को देवीशंकर अवस्थी ने पहचान दिलाई थी उसी तरह से नयी कहानी को पहचान दिलाने में नामवर सिंह का अहम् योगदान है शायद हमारी स्मृति से यह विस्मृत  हो गया l कम से कम राजेंद्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश के लेखों से तो यही लगता है l क्या नयी कहानी के इन दोनों ही समीक्षकों को एक दूसरे के बरक्स खड़ा करने से ज्यादा अच्छा यह न होता कि हम नयी कहानी कि 'टोन' को गंभीरता से पकड़ने का प्रयास करते जो इन दोनों के समीक्षा लेखों का मूलाधार थी? हमें तो यह चाहिए था कि हम इन दोनों के द्वारा अपनाई गयी वस्तुनिष्ट और वैज्ञानिक पद्धति (जिसके आधार पर इन्होने नयी कहानी को पहचान दिलाई और इसके विकास की संभावनाएं तलाशीं) को पकड़ने की कोशिश करते ; पर हमने 'बरक्स' को पकड़ा और बाकी सब आधारों, सिद्धांतों और दृष्टियों को बिसरा दिया l आशा यही की जाती है की समकालीन आलोचना इस बरक्स से स्वयं को  बचाते हुए रचना और आलोचना का मूल्यांकन-पुनर्मूल्यांकन करने का प्रयास करेगी l&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(Published in vaaq -Editor Sudheesh pachouri)&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन्दर्भ ग्रन्थ सूची :-&lt;br /&gt;१. आलोचना का विवेक (सं)राजेंद्र कुमार लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद प्रथम संस्करण २००४ पृ ३७९&lt;br /&gt;२. देवीशंकर अवस्थी-अरविन्द त्रिपाठी साहित्य अकादमी प्र.सं.२००४ पृ ५७ &lt;br /&gt;3.  आलोचना का विवेक (सं)राजेंद्र कुमार लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद प्रथम संस्करण २००४ पृ. ३७९-३८० &lt;br /&gt;४. मलयज की डायरी-१ (सं)नामवर सिंह  वाणी प्रकाशन दिल्ली सं.२००० पृ.३६८ &lt;br /&gt;५.विवेक के रंग  (सं)देवीशंकर अवस्थी वाणी प्रकाशन दिल्ली सं.१९९५ (भूमिका से)&lt;br /&gt;६. वही पृ.२० &lt;br /&gt;७.शब्द और कर्म -मैनेजर पाण्डेय वाणी प्रकाशन दिल्ली सं.१९९७ पृ.७०-७१ &lt;br /&gt;८.  मलयज की डायरी-२  (सं)नामवर सिंह  वाणी प्रकाशन दिल्ली सं.२००० पृ.३१७&lt;br /&gt;९. वही&lt;br /&gt;१०.आलोचना का द्वंद्व -देवीशंकर अवस्थी वाणी प्रकाशन दिल्ली सं.२००४ पृ. १७  &lt;br /&gt;११. वही पृ.१६&lt;br /&gt;१२.आलोचना का विवेक (सं)राजेंद्र कुमार लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद प्र.सं.२००४       पृ,३७९-८०   &lt;br /&gt;१३. वही&lt;br /&gt;१४. वही&lt;br /&gt;१५. आलोचना का विवेक (सं)राजेंद्र कुमार लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद प्र.सं.२००४ पृ.३८०&lt;br /&gt;१६. मलयज की डायरी-२  (सं)नामवर सिंह  वाणी प्रकाशन दिल्ली सं.२००० पृ.३१७&lt;br /&gt;१७.रचना और आलोचना -देवीशंकर अवस्थी वाणी प्रकाशन दिल्ली सं.१९९५ पृ.१७  &lt;br /&gt;१८. वही, पृ.३५&lt;br /&gt;१९.  वही, पृ.२४&lt;br /&gt;२०. कविता से साक्षात्कार -मलयज, सम्भावना प्रकाशन हापुड़ संस्करण-१९७९ (भूमिका से)&lt;br /&gt;२१. आलोचना और आलोचना -देवीशंकर अवस्थी वाणी प्रकाशन दिल्ली सं.१९९५ पृ.१०&lt;br /&gt;२२.  कविता से साक्षात्कार -मलयज, सम्भावना प्रकाशन हापुड़ संस्करण-१९७९ (भूमिका से)&lt;br /&gt;२३.  आलोचना और आलोचना -देवीशंकर अवस्थी वाणी प्रकाशन दिल्ली सं.१९९५ पृ.११ &lt;br /&gt;२४.  कविता से साक्षात्कार -मलयज, सम्भावना प्रकाशन हापुड़ संस्करण-१९७९ (भूमिका से)&lt;br /&gt;२५. समकालीन आलोचना की भूमिका (सं)मंजुल उपाध्याय, साहित्यागार जयपुर पृ.५४&lt;br /&gt;२६. कविता के नए प्रतिमान -नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन दिल्ली आठवीं आवृत्ति२००९ पृ.१०&lt;br /&gt;२७. आलोचना के सौ बरस-१ (सं)अरविन्द त्रिपाठी, शिल्पायन दिल्ली-३२ सं.२००३ पृ ३०२ &lt;br /&gt;२८. कविता से साक्षात्कार -मलयज, सम्भावना प्रकाशन हापुड़ संस्करण-१९७९ पृ.६५&lt;br /&gt;२९. मलयज स्मृति अंक-पूर्वग्रह (सं)अशोक वाजपयी (जुलाई-अक्तूबर १९८२, संयुक्तांक५१-५२) मध्य प्रदेश कला परिषद् का प्रकाशन, भोपाल पृ.१०१&lt;br /&gt;३०.साहित्य-सहचर हजारीप्रसाद द्विवेदी लोकभारती प्रकाशन इलाहबाद सं.२००२ पृ.११ &lt;br /&gt;३१. समकालीन हिंदी आलोचना (सं)परमानन्द श्रीवास्तव साहित्य अकादमी सं.१९९८ पृ.२६१ &lt;br /&gt;३२. वही,२६३&lt;br /&gt;३३. वही, ३६२&lt;br /&gt;३४. संवाद और एकालाप -मलयज , राजकमल प्रकाशन दिल्ली सं.१९८४ पृ.२६५&lt;br /&gt;३५.समकालीन हिंदी आलोचना (सं)परमानन्द श्रीवास्तव साहित्य अकादमी सं.१९९८ पृ.२६५&lt;br /&gt;३६. पूर्वग्रह (सं)अशोक वाजपयी, अंक ९५-९६ पृ.४३&lt;br /&gt;३७. वही&lt;br /&gt;३८. रामचंद्र शुक्ल-मलयज (सं)नामवर सिंह राजकमल प्रकाशन दिल्ली-पटना प्र.सं.१९८७ (भूमिका का शीर्षक)&lt;br /&gt;३९. वर्तमान साहित्य[शताब्दी आलोचना पर एकाग्र-३] (सं)अरविन्द त्रिपाठी वर्ष १९, अंक-७ जुलाई-२००२ शिल्पायन शाहदरा दिल्ली ३२&lt;br /&gt;४०. बकलम खुद -मोहन राकेश, राजपाल एंड संस , दिल्ली, संस्करण१९७४ पृ.८४-८५ &lt;br /&gt;४१. हमकों लिख्यौ है कहा है (सं)कमलेश अवस्थी, भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली,सं२००१ पृ.२९२ &lt;br /&gt;४२. वही&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2061831878656508758?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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कैंटीन का संचालक अच्छा होता तो हम सब किफायती और बढ़िया खाने का लुफ्त उठाते। कॉफी हाउस की शक्ल में ये कैंटीन हमें एक नया बहसनुमा माहौल प्रदान कर सकती थी। पर ऐसा न हो सका।   - तरुण गुप्ता&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली यूनिवर्सिटी का केंद्रीय पुस्तकालय तब सैंट्रल रैफ्रैंस लाइब्रेरी के नाम से जाना जाता था। मेरे जैसे ज़ुबान के शौक़ीन लोगों के लिए जिनकी ज़ुबां को कोई ज़ायका लंबे समय तक याद रखने की लत है अब भी ये सैंट्रल कम रैफ्रेंस लाईब्रेरी ही ज़्यादा है। खैर&lt;br /&gt;रिसर्च फ्लूर की कैंटीन पर लिखना मेरे लिए मेरे पहले प्यार पर लिखने जैसा ही है। शायद आप सोचें ये बहुत ज्यांदा हो गया पर मेरे लिए वो जगह मेरी छुट-पुट प्रेम कविता, सामान्य शेरों और ग़ज़लों को लिखने की जगह थी जहाँ मैं अपने स्कूल के दिनों की प्रेमिका की याद में निदा फ़ाज़ली और बशीर बद्र को पढ़ा करता था। मेरा विषय हिंदी साहित्य था पर इसमें से मुझे बोधा जैसा कवि सर्वाधिक पसंद था उन दिनों।- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि बोधा अनी घनी नेजहू ते, &lt;br /&gt;चढ़ि तापे न चित्त डिगावनौ है। &lt;br /&gt;येह प्रेम को पंथ कराल महा &lt;br /&gt;तलवार की धार पै धावनौ है।। - बोधा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहूँ तो यही वो जगह थी जहाँ मुझे एक शायर यह कहता मिला था कि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   इश्क़ से दिल लगा नासिख़, &lt;br /&gt;   इल्म से शायरी नहीं आती। - नासिख़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और उसके बाद इसी तर्ज़ पर मैंने कितनी ही प्रेम कविताएँ रच डाली थी। वो जगह चाय की चुस्कियों में सिर्फ खुद को डुबाने की जगह नहीं थी। जेब खाली रहने पर भी वो समय मेरे दोस्तों से भरा समय था। हम कई दोस्त प्रवीण, नौशाद, मैं और भी कई वहाँ बैठकर जे.आर.एफ की तैयारी किया करते थे। जे.आर.एफ की परीक्षा संडे को होती है। हम लोग परीक्षा खत्म करके उसी जगह लौटते। ये सब प्रवीण के सौजन्य से होता। नौशाद और मैं उसे घंटों फोन पर लगे देखा करते उन दिनों। तब तक उसकी शादी नहीं हुई। यही वो जगह थी जहाँ मैंने और नौशाद ने सुबह से लेकर रात तक बात की, गप्पे हाँकी कहना उन बातों की अहमियत को कम करके आँकना होगा मेरे लिए। मेरे लिए उन लम्हों की कितनी अहमियत है यह मैं बयां नहीं कर सकता। मुफ्लिसी में भी वो समय बहुत रईस समय था मेरे लिए। बिना कहे चाय, ऑमलेट का ऑर्डर हो जाया करता था। आज उस जैसी चाय नसीब नहीं हो पाती। दोस्तों की संगत लगभग खत्म हो चुकी है। मुझे उन दिनों की याद सबसे ज्यादा आने की दो वजह हैं। जिनका मैंने हल्का सा उल्लेख ऊपर किया है। अब थोड़ी तफ्सील से इन पर बात करना चाहूँगा। &lt;br /&gt; जैसाकि मैंने कहा कि यही वो जगह है। जिसने मुझे मेरी प्रेम कविताएँ लौटायीं। यही पर बैठ कर मैंने लिखा थाः- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर कोई ना मिला करे ।&lt;br /&gt;तो फिर हम क्या ग़िला करें।। &lt;br /&gt;मिलना न मिलना उसकी मर्ज़ी है। &lt;br /&gt;मगर ये भी तो सच है &lt;br /&gt;अभी हमारी हालत फर्ज़ी है।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों मेरे कुछ ख़ास दोस्तों के अलावा मेरी ज़्यादा किसी से बात नहीं हो पाती थी। उस दौरान मैं इसका कारण कुछ अपनी हालात को माना करता। कुछ हालत, कुछ हालात और कुछ मेरा एटीट्यूड , कई लोग मुझे इगोइस्ट, एरोगैंट उपाधियों से नवाज़ा करते। अपनी फैसबुक और औरकुट की प्रोफाइल पर वो जो लाइनें मैंने लिखी हैं न, वो दरअसल इन आरोपों की सफाई के एवज में ही बाहर आई थीं। जिसमें मैंनें कहा थाः-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली नज़र मे कुछ अजीब सा इम्प्रेशन होगा मुझे देखकर, शायद आपको लगे मै बहुत गुस्से वाला हूँ या घमण्डी या फिर आप मुझे किसी और उपाधि से नवाज़े....सब सहर्ष स्वीकार है लेकिन जब ये पहली नज़र, दूसरी तीसरी चौथी...........बनती जाएगी एक अच्छी दोस्ती, एक प्यार भरा एहसास पनप्ता जाएगा. इसी प्यार भरे एहसास के पहले, बीच मे - या आखिर मे कहीं किसी जगह आप एक रिश्ता बना महसूस करेंगे ये रिश्ता होगा प्यार का, दोस्ती का, एहसास का, जज्बात का; शायद इन्ही सब के बीच मै हूँ. खुद की तलाश मे .........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही बैठकर मैंने कई लघु-कविताएँ लिखीं थीं ः-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;        (१)&lt;br /&gt;एक भी शख़्स ऐसा नहीं दिखता &lt;br /&gt;जो कहे साथ में हैं हम तुम्हारे  बोलते हैं बस यही सोच &lt;br /&gt;कोई कुछ तो बोले  बस यही उम्मीद लिए चलते हैं  कोई तो पुकारे। &lt;br /&gt;        (२)  &lt;br /&gt;मैंने जबसे तुम्हें देखा है सनम &lt;br /&gt;तुम्हारा हूँ किसी का मैं नहीं हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे दिलदार तुम्हें कैसे कहूँ &lt;br /&gt;तुम्हारा हूँ किसी का मैं नहीं हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब एम. ए में पास हो गया तब जल्दी नौकरी करने की ठान रक्खी थी। सो प्रोफेशनल कोर्सों जैसे बी.एड और लाइब्रेरी साइंस मुझे अपनी और खींच रहे थे। यही बैठकर मैंने लाइब्रेरी साइंस में एडमिशन लेने की योजना बनाई थी। एम.फिल् के एंटरैंस टेस्ट और इंटरव्यू की तैयारी की थी।&lt;br /&gt; उन दिनों मैं बहुत पढ़ता था। लाइब्ररी में उस दौर की शामें या तो ऊपर कैंटीन में बीतती या फिर नीचे कंसल्टैशन डैस्क पर। उसी दौरान मैंने शिवमूर्ति की तिरिया चरितर पढ़ी थी। सचमुच हिल गया था उसे पढ़कर। शाम को लाईब्ररी में ऊपर जितना हुड़दंग होता उसकी अपेक्षा नीचे बड़ा शांत माहौल होता पर इसे शांत कहना शांति की बेइज्जती करने जैसा है इसलिए मैं कहूँगा बड़ा दहशतज़दा माहौल होता था। उसी बाहरी दहशत में मैनें भीतर को हिला देने वाली कहानी तिरिया चरितर पढ़ी थी। बिसराम की हरक़त ने झिंझोड़ दिया था मुझे।  पढ़ने के पहले पहल बिमली(शायद यही नाम था) और ट्रक ड्राइवर के संवादों ने पेट में गुदगुदी की थी &lt;br /&gt;ट्रक ड्राइवर उसके लिए कुछ लाया था बिमली कहती है माँ देखेगी तो डाँटेगी। नहीं देखेगी ड्राइवर ने कहा। अंदर पहनने की है। &lt;br /&gt;और मेरे पेट में ऐसी गुदगुदी उठी जैसी तीसरी कसम के हीरामन के मन में उठती है कहानी की शुरुआत में। हीरामन से कई मामले में समानता रखने पर भी मैं जुदा था। समान इसलिए क्योंकि दोनों की ही गुदगुदी बाद में कसक में बदल गयी। बिमली के उसके ससुर द्वारा बलात्कार करने से मेरे मन में, और हीराबाई के चले जाने पर मीता(हीरामन) के मन में। जुदा इस हद में की हीरामन के अंदर की मोरेलिटी को हीराबाई चोट नहीं पहुँचाती जबकि बिसराम की हरक़त मुझे परेशान कर देती है। भोगलिप्सा में पागल बिसराम का किया मैं उस समय समाज पर थोप रहा था, कैसा समय था वो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल लाइब्रेरी साइंस में एडमिशन लेने और वहाँ २०-२५ दिन क्लास लेने के बावजूद मन नहीं रम  रहा था। मैं प्रोफेशन कोर्स में भी इमोशनल चीज़ो को पढ़ा करता। जावेद अख्तर की तरक़श उन्हीं दिनों पढ़ी थी। क्लास में अपने एक मित्र पवन त्रिपाठी के साथ शेरो-शायरी किया करता। कितने दिन टिकता। लेकिन तभी एम.फिल में मेरा चयन हो गया और इस इमोशनैलिटी को टूटने से बचा लिया गया। उसके बाद एक साल कैसे बीता क्या कहूँ। वो मेरे लिए सिवाय एक घनी स्याह रात के कुछ नहीं। छोटी बहन के ससुराल वालों की प्रताड़ना, जेब खाली, हमारे एक गुरुजी का प्रेशर, एक बोर्डर(सीमापुरी) से दूसरे बॉर्डर साउथ कैंपस तक का सफर मेरी हालत खराब कर देता था। पढ़ना एक दम छूट चुका &lt;br /&gt;था। उस दौरान बड़ी अजीब सी लाइने लिखीं थी मैंने - &lt;br /&gt; ये उदासी की रातें &lt;br /&gt;बदहवासी की बातें&lt;br /&gt;जज़्बात समझने से पहले और उसके बाद के बीच कुछ अजीब मुलाक़ातें &lt;br /&gt;उभरती हैं &lt;br /&gt;ज़ेहन में।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही वो जगह है जहाँ मैं निदा फाज़ली की गज़लों को दोस्तों के सामने दोहराया करता। मेरी रातें मैहंदी हसन की ग़ज़ले सुनते जागा करतीः-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कसमे खाते थे चाहतो की। &lt;br /&gt;उन्हीं की नीयत बहक रही है।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो जिनकी खातिर ग़ज़ल कही थी। &lt;br /&gt;वो जिनकी खातिर लिखे थे नग़्में।।-(गायक- मैहंदी हसन)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे साथ ये अच्छा रहा कि उस दौरान मैं आशावादी रहा। इस आशावाद को कुछ यूँ लिखा था उन दिनों-  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी मैं दुखी हूँ तो क्या &lt;br /&gt;कुछ पल तो मिलेंगे खुशी के  &lt;br /&gt;और फिर वही दुख...लंबा दुख  &lt;br /&gt;फिर सुख  &lt;br /&gt;बस इसी में बीतेंगे दर-साल ज़िन्दगी के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद इस आशावाद का परिणाम ही रहा कि एम.फिल के दौरान ही जे.आर.एफ हो गया। जे.आर.एफ होने पर भी कुछ लिखा था। ये सब कविताएँ मेरी डायरी के सौजन्य से मिल पा रहीं हैं। जो काफी लंबे अरसे से नहीं लिखी गयी है। खैर जे.आर.एफ पर लिखी एक कविता की बानगी देखिये- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन भी अक्सर ग़ुज़र ही जाता था  &lt;br /&gt;न कोई पास है न आता था।  &lt;br /&gt;जब भी आता था दिल को &lt;br /&gt;बस यही ख्याल आता था &lt;br /&gt;जो कुछ ही देर में एक सवाल बन जाता था। &lt;br /&gt;क्या मुझे बिना जे.आर.एफ के जीना होगा ?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मेहनत, मशक़्क़ात, दुआएँ, उम्मीदें  &lt;br /&gt;क्या क्या न लगाया गया था &lt;br /&gt;पर अब तक ये कमज़र्द न पाया गया था &lt;br /&gt;फिर कल अचानक ही जे.आर.एफ हुआ  &lt;br /&gt;दिल में छिपी भड़ास और अंदर का कॉंफिडेंस जगा  &lt;br /&gt;साथियों को पता नहीं क्या लगा। &lt;br /&gt;पर मुझे जो लगा या लग रहा है  &lt;br /&gt;वो मुझसे बयां नहीं हो रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रिसर्च स्कॉलर के लिए जे.आर.एफ की महत्ता इन पंक्तियों से समझी जा सकती है। ये सब यादें रिसर्च फ्लोर की कैंटीन से जुड़ी यादें हैं।जे.आर.एफ होने से जस्ट पहले मुझे ग़ज़ल टाइप लाइने लिखने का शौक़ लगा था और मैं अपने भाव इस तरह के अल्फाज़ो में पिरोकर लिखा करता- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       (१)&lt;br /&gt;एक भी बात नहीं बनती अब तो। &lt;br /&gt;क्या रही कमी अब तो।।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कुछ भी दिल से निकल नहीं पाता। &lt;br /&gt;धड़कन भी है थमी अब तो।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राहबर जान कर जिन्हें चाहा।  &lt;br /&gt;राहजन बन गये वो लोग अब तो।।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बात जिनसे नहीं छिपाई कोई।&lt;br /&gt;वो पूछते हैं कुछ कहो अब तो।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;         (२)&lt;br /&gt;नहीं नहीं, नहीं नहीं, कहीं कोई नहीं है।  &lt;br /&gt;खुशबू फूलों में नहीं, रंगे-ए-महफ़िल भी नहीं है।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या हुआ वक़्त जो ठहरा हुआ सा लगता है।  &lt;br /&gt;पास में सब है मगर, साथ में कोई नहीं है।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या करूँ इश्क़-ए-मजमूँ जो समझ में न आया।  &lt;br /&gt;क्यों न कह दूँ कि मुझे इसका तो इरफाँ नहीं है।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और बच जाऊँ अब ये कहके, मैं उनकी नज़र से।  &lt;br /&gt;कि किसी और से है प्यार पर तुमसे नहीं है।। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हीं दिनों लता मंगेशकर की आवाज़ में एक खूबसूरत गज़ल एलबम आया था। उसमें एक ग़ज़ल थी 'मुझे ख़बर थी वो मेरा नहीं पराया था' मैंने इस ग़ज़ल की भी एक पैरोडी बनाई थी वो कुछ यों थी- &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे ख़बर थी वो मेरी नहीं परायी थी।  &lt;br /&gt;न जाने फिर क्यों उसी से नज़र मिलायी थी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे अल्फ़ाज़ न समझे बेश़क़।  &lt;br /&gt;क्यों मेरे दिल को कभी, वो समझ न पायी थी।।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मुझे खबर थी वो मेरी नहीं परायी थी... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अरसा ग़ुज़र गया है मगर।&lt;br /&gt;ज़ेहन से वो निकल न पायी थी।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज जब हूँ बहुत ही आसां मैं ।  &lt;br /&gt;आज भी वो मुझे क्यों समझ ना पाई थी।।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आज बेशक़ मेरे साथी इन पंक्तियों को देखकर हँसें लेकिन सच कहूँ उन दिनों यही मेरा सहारा हुआ करतीं थीं। इस तरह लिखना मुझे बेहद अच्छा लगता उन दिनों। उन्हीं दिनों एक कविता मैंने अपनी एक दोस्त के लिए लिखी थी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तुम खुश रहो सदा,&lt;br /&gt;मैं और क्या चाहता हूँ। &lt;br /&gt;हमेशा करती रहो वफ़ा, &lt;br /&gt;मैं और क्या चाहता हूँ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तेरी हर ख्वाहिश पूरी हो, &lt;br /&gt;तेरे सोचने से पहले।  &lt;br /&gt;तुम्हारी मंज़िल मिले तुम्हें,&lt;br /&gt;तुम्हारे खोजने से पहले। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम हमसे जुड़ी रहो सदा,&lt;br /&gt;मैं और क्या चाहता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कविता का इस्तेमाल मैं आज भी अपने दोस्तों के जन्मदिन आदि पर करता रहता हूँ यह भी रिसर्च फ्लूर की कैंटीन की ही देन है। न वो शामें होती, न चाय की चुस्कियाँ, न किताबें, न दोस्त, और न ही ये कविताएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों इस तरह की बहुत सारी कविताएं मेरी डायरी में अब भी लिखी हुई है। मैं इन्हें कविताएं नहीं मानता। ये वो जज्बा है जिसने उन दिनों मुझे जिलाए रखा। उस दौरान मैं बहुत अंतर्मुखी हुआ करता था। बहुत सारे दोस्त बनाने का हुनर मुझे कभी नहीं आया लेकिन खुशकिस्मत हूँ कम ही सही लेकिन अच्छे मिले हैं। इनके रहने पर मुझे कभी दुश्मनों की कमी नहीं खलती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे ज्यादा की तमन्ना मैंने की भी कभी नहीं। एक दिन राजकुमार जैन सर से बात हो रही थी उनके जीवन की उपलब्धियों पर उनका जो कहना था वो आज के समय में बहुत कम लोगों के मुँह से सुनने को मिलता है। वे अपनी उपलब्धि अपने दोस्तों को मानते हैं। मैं अभी उम्र और कैरियर के उस पड़ाव पर नहीं पहुँचा की उन्हें अपनी उपलब्धि मान सकूँ पर हाँ ये जरूर कहना चाहूंगा चीज़े और लोग अपनी संगतता में जितने असंगत हो सकते हैं उतने ही असंगतता में संगत भी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-1952752471129128732?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/1952752471129128732/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=1952752471129128732' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1952752471129128732'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1952752471129128732'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='दिल, दोस्ती और रिसर्च फ्लोर की कैंटीन'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-9144056770194668427</id><published>2011-07-09T23:59:00.003+05:30</published><updated>2011-07-10T00:12:02.774+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म समीक्षा'/><title type='text'>संस्कारगत विवेक और डैली बैली</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-4qKpK_ccvok/Thig3Wc6uMI/AAAAAAAAAKs/LtyVg5v-410/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 237px; height: 213px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-4qKpK_ccvok/Thig3Wc6uMI/AAAAAAAAAKs/LtyVg5v-410/s400/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5627424607179552962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुवादों की उपयोगिता और महत्व को हम स्वीकारते रहें है पर डैली बैली देखने के बाद यह बात और पुख्ता हो जाती है कि कैसे अंग्रेजी संवाद या शब्द फूहड़ता(अर्थ) को ढ़क लेते हैं और हमारे विवेक को कोई झटका नहीं लगता लेकिन दूसरे ही क्षण उसका हिंदी तर्जुमा हमारे संस्कारों को जबरदस्त धक्का देता है, क्यों? क्यों अंग्रेजी का फ़क़ शब्द हमें उस तरह से नहीं झिंझोड़ता जिस तरह से इसका हिंदी रूपांतर। उर्फ प्रोफेसर में दुल्हन के द्वारा हम इस तरह का एक संवाद सुन चुके हैं बारह इंच का... खैर डैली बैली को लेके चलने वाली बहस इसी समस्या की वजह से ज्यादा उभार पा रही है मेरा मानना है कि इसे असभ्य और फूहड़ मानने वाले लोगों(या जो लोग इस फिल्म के अधिकतर संवादों से अपना तालमेल नहीं बैठा पा रहे) को इसके मूल टैक्स्ट(वॉइस) में इस फिल्म को देखना(सुनना) चाहिए। फिल्म की अपेक्षा इसका हिंदी रूपांतर हमारे विवेक को अधिक संस्कारगत धक्का पहुँचा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मैंने अमेरिकन पाई सीरीज़ की अधिकतर फिल्में डाउनलोड करके देखीं हैं और ये मेरी पसंदीदा कॉमेडी(ए़डल्ट) में शामिल हैं मैं जब भी इस सीरीज़ की फिल्मों खासकर बुक ऑफ लव, होल इन वन को देखा करता मेरे जेहन में ये खयाल(सवाल) बार बार कौंधता कि क्या हिंदी सिनेमा में कोई इस तरह की कोशिश करने की हिम्मत दिखाएगा। आप यकीन जानिये मैंने अपनी कई महिला मित्रों के साथ इस सीरीज़ पर चर्चा की हैं कहीं मेरे संस्कारगत विवेक को धक्का नहीं महसूस हुआ और यह भी सच है कि मैं उन फिल्मो को अपने परिवार के साथ देखना पसंद नहीं करुँगा(इस परिबार में गर्लफ्रैंड या पत्नी शामिल नहीं है।)आमिर ने यह हिम्मत दिखाई है। मुझे लगता है कि ये अमेरिकन पाई सीरीज़ का ही भारतीय रूपातंर है, उस दर्जे की न सही। लेकिन अब वही लोग इसका विरोध करने में लगें हैं जो इस सीरिज़ को डाउनलोड करके देखा करते हैं। सिनेमा के शुरु से ही हिंदी फिल्मों में हत्या, लूटपाट जैसे दृश्य दिखाये जाते हैं जो बहुत लोगों को आपत्तिजनक लगते हो, सनद रहे कि इन फिल्मों को कोई (ए) नहीं मिला होता और न ही इनके निर्देशक इस बिहाफ पर कोई रिस्क या हिम्मत दिखाने को तैयार हैं। &lt;br /&gt;मुझे ये बात बिल्कुल भी समझ नहीं आती कि क्या हम लोग इतने मूर्ख हैं कि हम गालिया फिल्मों में देखकर सीखेंगे। हत्या. डकैती, या बलात्कार जैसे दृश्यों को देखने के बाद क्या हम वही करते हैं। मेरा ये विश्वास रहा है कि हिंदी फिल्मों का दर्शक कम से कम इतना तो समझदार है कि उसे पता है कि उसे क्या करना है। गाली कोई इतनी भी बुरी चीज़ नहीं होती। हममे से अधिकतर इनका इस्तेमाल करते है कुछ लोग तो अपने बच्चों के सामने ही खासकर  मेरी कॉलोनी में अक्सर झगड़ो के दौरान इस तरह की गालियाँ बिल्कुल खुले में दी जाती हैं। फिर डैली बैली के पीछे क्यों पड़ा जाए जबकि वे अपने प्रोमों में ही बच्चों और फैमिली के साथ इस फिल्म को न देखने की चेतावनी दे चुके हैं। &lt;br /&gt;इसमें कोई शक नहीं कि आमिर एक टिपीकल प्रोफेशनल पर्सनैलिटी है। डैली बैली विवादित होने के, व अपनी रीलीज़ के एक हफ्ते बाद भी अपने टिकट रेट २५०-२०० से नीचे नहीं लेके जाती। उस पर सिने प्लेक्स खचाखच भरा हुआ है। बाहर निकलकर हम चाहे इस फिल्म को कितनी ही गालियों दें पर यह सच है कि आमिर अपनी कोशिश में कामयाब रहे हैं। इस फिल्म के रिलीज के बाद ये बात ज्यादा पुख्ता हो गयी है कि लोगों को अश्लील दृश्यों से उतनी समस्या नहीं है जितनी असभ्य कही जाने वाली गालियों से। चाहे अंदर से उनका मन कुछ और कहें। हम बार बार बिसरा देते हैं कि गालियों का भी अपना एक समाजशास्त्र होता है। गालियाँ लोक की प्रतिध्वनि हैं। मान  लोक की पैदाइश हैं। कोई महाशय तो यहाँ तक कह गये हैं कि जिस भाषा में जितनी अधिक गालियाँ होंगी वह भाषा उतनी लम्बी आयु तक जीवित रहेंगी। इस हिसाब से देखा जाए तो गालियाँ भाषा की प्राणवायु हैं। फिल्म में मुझे बहुत कुछ नया नहीं लगा लेकिन ये बात मैं ईमानदारी से कहना चाहूँगा कि मैं पूरी फिल्म में एक पल के लिए भी बोर नहीं हुआ। मैं तो लोट-पोट था उसे आप फूह़ड़ कहिए या असभ्य पर मुझे फिल्म अच्छी लगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अब भी इस फिल्म को एक दो बार और देखना चाहता हूं उपरोक्त बातों को समीक्षा न माना जाए ये मेरी ग़ुजारिश हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-9144056770194668427?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/9144056770194668427/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=9144056770194668427' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/9144056770194668427'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/9144056770194668427'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='संस्कारगत विवेक और डैली बैली'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-4qKpK_ccvok/Thig3Wc6uMI/AAAAAAAAAKs/LtyVg5v-410/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-4294474205951909076</id><published>2011-06-27T18:36:00.002+05:30</published><updated>2011-06-27T18:44:09.224+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='aise hi'/><title type='text'>गंगोत्री से गोमुख तक</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-NmWkk0UVFD4/TgiBtV24e7I/AAAAAAAAAKk/OSUXsO9S9ns/s1600/IMG_5606.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-NmWkk0UVFD4/TgiBtV24e7I/AAAAAAAAAKk/OSUXsO9S9ns/s400/IMG_5606.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5622886750733499314" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बार बार सोच रहा हूँ ऐसा क्या था उस जगह पर जिसने मुझे और दिनों से अलग एक आध्यात्मिक अहसास से भर दिया था मैं क्यों ईशआवास आश्रम में स्वामी राघवेंद्रानंद द्वारा गाये गये भजनों को बार बार दोहरा रहा था मन की तरंगें बाँध लो...बस हो गया भजन । ऐसा क्या था कबीर के इस भजन में जो स्वामी जी के कंठ में मधुरता भर गयी थी। क्यों मैं वापस दिल्ली में आकर जब उनके द्वारा रिकॉर्ड यह भजन अपने लैपटॉप पर सुनता हूँ तो उस आनंद से महरूम रह जाता हूँ जो माँ गंगा के किनारे स्थित ईशआवास आश्रम में मुझे मिल रहा था। ऐसा क्या था जो दिल्ली में यहाँ मेरे घर में नहीं हैं। क्या इसीलिए उत्तराखंड को देवभूमि कहते हैं लेकिन नैनिताल भी तो उत्तराखंड में ही है वहाँ मुझमें ऐसा अहसास नहीं पनपा था। फिर गंगोत्री में ऐसा क्या था कि आज २५ जून(लौटने के १०-११ दिनों बाद भी) मैं उस आ्ध्यात्मिक अहसास से मुक्त नहीं हो सका हूँ। ऐसा क्या था वहाँ ..गंगोत्री से गोमुख के ट्रैक पर जब मेरे एक दोस्त ने रास्ते में हल्का होने(लघुशंका) की इच्छा जताई तो मेरे मुँह से अक्समात निकला यार प्लीज़ यहाँ नहीं ये पवित्र क्षेत्र है। कहाँ गये मेरे सारे तर्क जो मैं अपने पिता को फूलमाला, आदि धार्मिक सामग्री को यमुना में प्रवाहित करने के विरोध में दिया करता था। क्या था उस जगह पर ऐसा जो मैंने अपने मित्र को लघुशंका जैसी अनिवार्य प्राकृतिक अवस्था को नजरंदाज करने तक के लिए कह दिया। मैंनें बार बार इस बात का वैज्ञानिक आधार जानने समझने की सोची पर दिल्ली में हम जिस आस्था को दकियानूसी कहकर टाल देते हैं गंगोत्री में जाना और भगीरथी में नहाना उस आस्था को प्रणाम करना था जो हमारे पूर्वजों और हमारी परंपरा में व हमारी रगों में लहू बनकर निरंतर प्रवाहमान हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अपने परिवार(खानदान) का पहला व्यक्ति हूँ जिसने गंगोत्री ही नहीं गोमुख को अपनी आँखों को देखने सौभाग्य दिया है। मेरे पिता की अब तक की  सारी ज़िन्दगी हमारी परवरिश अच्छे से हो जाए इसी उधेड़बुन में  बीत गयी। घूमने के नाम पर वो अपने रिहाइश स्थल से मोरी गेट तक का सफर पहले पैदल और बाद में ए-वन साईकिल पर पूरा किया करते थे। मेरी माँ घूमने के नाम पर या तो वैष्णो देवी गयीं होंगी या फिर हर बुधवार को ४० किलो वज़न का बोरा अपने सिर पे लादे २१२ रूट नंबर की बस से करोलबाग जाया करती थी उसके बाद इस लोक से किसी दूसरे लोक में चली गयीं। मेरे दादा ने गंगोत्री के गोते सतलुज में लगाये करीब ५० बरस पहले जब वे फिरोजपुर छावनी के पास एक बड़े मोहल्ले के बहुत छोटे से मकान में रहा करते थे। उन्होंने तीर्थ के नाम पर अपनी ता-ज़िन्दगी दो जून की रोटी की जुगत भिड़ाने में लगा दी। एक मैं हूँ जो उस स्थान से लौटा हूँ जहाँ पर भारत के विकासपुरुषों में अग्रणी महाराज भगीरथ ने साढ़े पाँच हजार साल तक एक पैर पर खड़े होकर गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या की। &lt;br /&gt; पूरें टूर की उन सब विसंगतियों जिनसे में त्रस्त हो चुका था और तीन दिन के भीतर ही दिल्ली भाग आना चाहता था अगर कोई चीज़ मुझे वहाँ बरकरार रखने की जद्दोजहज में लगी हुई थी तो उनमें गंगा(भगीरथी) नदी की तेज तरार आवाज़ में बहता पानी(जल), गोमुख जाने का उत्साह और राघवेंद्र जी महाराज की आवाज में गाया गया वो गीत जिसमें वे कहते हैं ..... हिम्मत ना हारिये, प्रभु ना बिसारिये... हँसते मुस्कुराते हुए जिंदगी गुज़ारिये...।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-4294474205951909076?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/4294474205951909076/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=4294474205951909076' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4294474205951909076'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4294474205951909076'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='गंगोत्री से गोमुख तक'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-NmWkk0UVFD4/TgiBtV24e7I/AAAAAAAAAKk/OSUXsO9S9ns/s72-c/IMG_5606.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-4837083527993697180</id><published>2011-05-10T16:43:00.003+05:30</published><updated>2011-05-10T16:52:44.252+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता जो मन भाये'/><title type='text'>माँ</title><content type='html'>माँ न बोलती है न सुनती है।&lt;br /&gt;दरवाज़े बंद पर भीतर नसों के जाल मे झनझनाती चुप्पी&lt;br /&gt;बाहर एक चमक में लिख जाती है&lt;br /&gt;सूखी ज़मीन माँ ऐसी नहीं।&lt;br /&gt;व्यवहार के साधारण अर्थ भी भूल चुकीं&lt;br /&gt;बुखार में कलेजे के टुकड़े तक फूँके जाते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ पूछती है क्या करने जाएँ वहाँ ?&lt;br /&gt;हर तरफ गुपचुप पगुराते ओंठ है और &lt;br /&gt;चौखट पर दूर से ही पाँवों की घिसटन सुनाई पड़ती है-&lt;br /&gt;कोई शब्द कहीं फिसल पड़ा है&lt;br /&gt;माँ उसे उठाकर शब्द के पास ही रख देती है ज्यों का त्यों&lt;br /&gt;फिर हमारे पास आकर बैठ जाती है माँ खोती भी नहीं।&lt;br /&gt;अपनी याददाश्त हमारे चेहरों की &lt;br /&gt;हाँ आँखें उनकी खो चुकी हैं वह कुछ जो सिर्फ हमारा होकर&lt;br /&gt;रह गया है माँ ने उसे नहीं सृजा&lt;br /&gt;तपिश&lt;br /&gt;और उसमें से फूटती जलती ज़मीन की साँस।&lt;br /&gt;(मलयज)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-4837083527993697180?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/4837083527993697180/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=4837083527993697180' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4837083527993697180'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4837083527993697180'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='माँ'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-1725717495535701656</id><published>2010-11-20T21:44:00.005+05:30</published><updated>2010-11-20T21:49:28.357+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोहिया और समाजवाद'/><title type='text'>लोहिया का लेखन आपको लोहियावादी नहीं, बल्कि  बुद्धिवादी बनाता है..</title><content type='html'>यह साल लोहिया का शताब्दी वर्ष है। साल के शुरु(फरवरी २०१०) मे साहित्य अकादमी ने लोहिया पर तीन दिवसीय सेमिनार का आयोजन करवाया था जिसमे समाजवादियों का एक पूरा जत्था मौजूद था देशभर से समाजवादी चिंतकों(लोहियावागदियों को इकट्ठा किया गया था। मस्तराम कपूर, कृष्णदत्त पालीवाल, रमेशचंद्र शाह, हरीश त्रिवेदी, नामवर सिंह, अनामिका, प्रेम सिंह और ना जाने कितने ही लोग थे इन लोगों में ऐसे बहुत लोग थे जो अपने विचारों से समाजवादी नहीं थे लेकिन ऐसा कोई नहीं था जो लोहिया की बौद्धिकता और उनके लेखन का क़ायल न हो। कुल मिलाकर यह एक सफल सेमिनार था जहाँ लोहिया के प्रशंसकों ने पर्चे पढे थे रमेशचंद्र शाह का पर्चा तो बहुत विश्लेषणपरक था। वह उन लोगों को ज़रूर पढ़ना चाहिये जिन्हें लोहिया में सिर्फ कमिया ही कमिया नज़र आतीं हैं। लोहिया पर वह सिर्फ शुरुआत थी उसके बाद अकार सामयिक वार्ता, ने लोहिया पर विशेषांक निकाला। अकार के सिलसिले में प्रो. आनंद कुमार ने बेजोड़ काम किया है। डॉ प्रेम सिंह के संपादन में युवा संवाद का अगला अंक लोहिया विशेषांक होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर इन बातों को यहाँ संक्षेप में रखने का मक़सद उस कोशिश से आपको परिचित करवाना था जो इन दिनों लोहिया के प्रशंसकों और गाँधी शांति प्रतिष्ठान द्वारा अंजाम दी जा रही है। आज(२० नवंबर २०१०) से २२.११.२०१० तक लोहिया के संस्कृति, कला, साहित्य व भाषा विषयक लेखन पर कार्यशाला आयोजित की जा रही है। आज इस कार्यशाला का पहला दिन था जिसमें लोगों की संख्या ने बेशक़ निराश किया लेकिन यह निराशा प्रो.आनंद कुमार के वक्तव्य के बाद आशा में बदल गयी। रही सही कसर सी.एस.डी.एस में फेलो मेधा ने लोहिया के लेखन में स्त्री विमर्श से संबंधित अपने वक्तव्य में पूरी कर दी। &lt;br /&gt;लोहिया के संस्कृति विमर्श पर बोलते हुए प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि लोहिया का लेखन हमें अपनी दिमागी खिड़कियों को खोलने की सीख देता है और वे हमें तुलसी और कबीर की ओर ले जाते हैं। मार्क्सवाद की सीमा बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रतिक्रिया के लिए मार्क्सवाद पहले प्रतिकूल परिस्थितियों के हद से गुज़रने की छूट देतें है यानि जब तक परिस्थितियाँ पक नहीं जाएगी तब तक पूँजीवादियों के साथ चलेंगें। उन्होंने यहाँ तक कहा कि लोहिया को पढने के बाद आप लोहियावादी बने या न बने लेकिन यह तय है कि उनका लेखन आपको बौद्धिक जरूर बना देगा। आप विमर्श के साथ खुद को खड़ा पाएंगे। &lt;br /&gt;मेधा ने लोहिया के स्त्री-पुरुष संबंधी लेखन पर विचार करते हुए कहा कि लोहिया के लिए स्त्री एकायामी नहीं है उसके कई डाइमेंशन हैं यही कारण है कि लोहिया स्त्री-पुरुष संबंध को अधिक आनंदपूर्ण और रचनात्मक बनाने की बात करते हैं। स्त्री-पुरुष के बीच वे एक सखा-सखी के संबंध जैस कृष्ण और कृष्णा(द्रौपदी) का था की बात करते हैं। सावित्री से ज्यादा महत्वपूर्ण वह द्रौपदी को मानते हैं जबकि हमारी आस्था में सावित्री ज्यादा श्रेष्ठ मानी गयी थी। वह इस दुर्भावना को तोड़ते हैं। साथ ही स्त्री के शोषण में धर्म की भूमिका को बेहतर ढंग से समझते है.।&lt;br /&gt;इससे पहले डॉ प्रेम सिंह ने लोहिया के लेखन पर मौलिक चिंतन की संभावनाओं की खोज पर बल दिया था। इस कार्यशाला का सबसे बेहतरीन समय वह रहा जब एक शोधार्थी(सत्यप्रकाश) ने लोहिया के लेख राम,कृष्ण और शिव पर अपना विश्लेषणपरक वक्तव्य दिया सही रूप में उसे वक्तव्य भी  नहीं कहना चाहिये वास्तव में वह उस नौजवान की जिज्ञासाएँ थीं जो लोहिया के लेखन से रूबरू होते हुए पाठक के मन स्वत ही जगह बना लेती हैं लेकिन शर्त यही है कि लोहिया मसखरी की जगह गंभीरता की मांग करते हैं। सत्यप्रकाश ने वास्तव में उस गंभीरता का परिचय दिया था। मैं अपनी स्मृति के आधार पर उसके कथनों को लिखने की अपेक्षा आपके साथ उसकी पूरी रिकॉर्डिंग शेयर करना पसंद करूँगा। &lt;br /&gt;कुल मिलाकर आज का दिन लोहिया के लेखन को समझने में ही बीता। इसने पूरे माहौल को काफी गंभीर बना दिया था लेकिन इस गंभीरता को होस्ट की तरफ से शाम को दोबारा दी गई चाय और हिरण्य हिमकर के आहंग(एक कविता कोलाज़) ने बोझिल नहीं होने दिया। कल फिर उस बहसनुमा माहौल में जाना होगा लेकिन आज कुछ ज्यादा पढकर जाऊँगा। ताकि मैं भी सक्रियता दिखा सकूँ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-1725717495535701656?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/1725717495535701656/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=1725717495535701656' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1725717495535701656'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1725717495535701656'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='लोहिया का लेखन आपको लोहियावादी नहीं, बल्कि  बुद्धिवादी बनाता है..'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-1527652318680651000</id><published>2010-10-31T20:07:00.001+05:30</published><updated>2010-10-31T20:08:40.945+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुन: प्रकाशित'/><title type='text'>वाकई वो बहुत दुखद समय था..</title><content type='html'>मेरे घर के बराबर में एक छोटी सी पार्कनुमा जगह है जहाँ अक्सर अंकल जी टाइप कुछ लोग बैठे मिलते है वो अक्सर समसामयिक मुद्दों पर बात करने के लिए लालायित रहते हैं और अगर उन्हें कोई ऐसा बन्दा मिल जाए जो थोड़ा बहुत पढ़-लिख रहा हो और उनके पास कम बैठता हो तो वो ऐसे मौके को गँवाये बिना उसे अपने पास बुला लेते है और सुबह पढ़े गए अखबारो की भड़ास उस पर निकालते हैं मैं ये बात जानता था लेकिन तब भी उनके पास बैठना मुझे अच्छा लगता था क्योंकि वो बहुत भावुक थे और उनकी भावुकता में एक ईमानदारी थी जिसका मैं हमेशा से क़ायल रहा हूँ (आप- कुछ घायल भी कह सकते हैं) खैर तो कल भी यही हुआ मैं किसी काम से निकल रहा था और उन्होंने आवाज़ दी मैंने अनसुना किया उन्होंने फिर दोहराया और फिर वही........ मैं अपने आप को नहीं रोक सका। बाते चलीं-- डी.टी.सी. की किराया वृद्धि, जयपुर में लगी आग, खजूरी वाला केस......................, और क्या चल रहा है जैसे बातों से होकर।&lt;br /&gt;यक-ब-यक मुद्दा पच्चीस साल पहले चला गया। तुम्हें पता है पच्चीस साल पहले क्या हुआ था? मुझे वल्ड कप का ख्याल आया और मेरी आँखों में कपिल देव की वल्ड कप उठाए तस्वीर घूम गयी लेकिन मैं चुप रहा क्योंकि उनके इस प्रश्न में खुशी नहीं एक दुख-सा कुछ दिख रहा था। कुछ सैकेंड एक अजब सी खामोशी पसर गयी थी जैसे वो मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहे हों और मैं उनके। आज ही के दिन इंदिरा की हत्या हुई थी उन्होंने इंदिरा ऐसे कहा जैसे वो उनके घर की कोई सदस्या हो जिससे उन्हें गहरा लगाव[Image] रहा हो। कोई माननीय जैसा संबोधन नहीं।------ क्यों? मेरे मन में ये सवाल उठ रहा था। मैं चुप रहा आज में उनसे बहस नहीं करना चाहता था। फिर एकाएक एक दूसरे अंकल जी ने कहा बेटा हमारे लिये तो भगवान थी वो। अब में चुप नहीं रह पाया मैंने कहा अंकल जी उन्होंने इमरजेंसी लगवाई, अपने बेटे को नसबंदी का निरंकुश अधिकार दे दिया ......वो सब ठीक है पर तुझे पता है जहाँ आज तू बैठा है जहाँ तू रहता हैं वो सब उसी की बदौलत हैं। मैंने ऐसा कुछ अपने पापा से पहले भी सुन रखा था। पता है हम लोग पदम नगर, जहां तेरी वो हिंदी वाली...क्या कहते हैं उसे, वो जो अंधा मुगल के पास है(हिंदी अकादमी-मैंने कहा) हां वही, तुझे पता है अशोक(मेरे पापा) अंधा मुगल में ही पढ़ता था वहीं हम सबकी झुग्गियाँ थीं सब गरीबी हटाओ के नाम पर गरीबों को हटा रहे थे लेकिन उसने हमें पच्चीस-पच्चीस ग़ज़ के मकान दिये जहाँ आज हम रहते हैं और ये जो मंगोल पुरी. जहाँगीर पुरी, सुल्तान पुरी नंद नगरी जैसी कॉलोनियाँ आज हैं ये सब उसी की देन हैं तभी तो यहाँ से कॉग्रेस ही ज्यादातर जीतती [Image]हैं। मैंने कहा- हत्या के बाद इतने लोगों को मार देना और दंगे की आड़ में अपनी हवस पूरी करना। क्या ये बहुत शाबाशी का काम था? क्या आप जैसे कई लोग उनमें शरीक़ नहीं थे .... ? नहीं नहीं, इसका मतलब तुम हक़ीक़त से वाकिफ नहीं हो तुम्हें पता है हम लोगों ने कई सिक्खों को अपने घरों में जगह दी थी उनसे हमारी आज भी मुलाक़ात होती है उन लोगों ने अपने बाल तक कटवा लिये थे उस दौरान.। बड़ा खतरनाक संमय था वो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल यहाँ से सटे बोर्डर के इलाकों में ये कांड ज़्यादा हुआ था और ये जो बोर्डर के लोग रईस बने बैठें हैं ना आज इनमें बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने सिक्खों को मारकर उनकी ज़मीनें हथिया ली थीं। जिनके वे आज मालिक हैं। वाकई बहुत डरावना समय था वो। तेरे पापा तो मरते-मरते बचे थे उस दिन। हुआ यो कि अशोक सुबह छ बजे घर से निकलता और देर रात घर लौटता था उस वक्त। जिस दिन इंदिरा मरी उस दिन इस खबर को राजीव गाँधी के बंगाल से दिल्ली लौटने तक दबाये रखा गया। देर शाम इंदिरा के मरने की खबर रेडिया पर आई तब अशोक पैरिस ब्यूटी(करोल बाग़) में था उसे ये खबर नही मिली थी उन दिनो वजीराबाद का इलाका ऐसा नहीं था जैसा आज हैं वहाँ सुनसान रहता था आबादी के नाम पर परिंदा भी नहीं। खजूरी, भजनपुरा, यमुना विहार सिंगल रोड़। रोड़ के दोनो ओर बड़े-बड़े खाईनुमा गड्ढे़। रात ग्यारह-बारह का समय। वो लौट रहा था शोर्ट कट के लिये उसने खेतों का रास्ता चुना तभी एक आदमी से खबर लगी इंदिरा को मार दिया और साथ ही दंगो की भी खबर लगी वो किस तरह से घर लौटा ये तुम उससे ही पूछना........बड़ा दुखद समय था वो।ये सब उसी ने हमें बताया था। सबके चेहरे पर वही खामोशी फिर से....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये लोग समसामयिक मुद्दों पर सरकार की बखिया उधेड़ने वाले, अभी कल ही तो डी.टी.सी के रेट बढ़ने पर कॉग्रेस को गालियाँ दे रहे थे। ये पच्चीस साल पहले कहाँ चले गए। लेकिन सच उनकी भावुकता में एक ईमानदारी थी जिसमें ये सवाल भी था कि आज कॉग्रेस के चुनावी पोस्टरों में सोनिया,राजीव तो दिख जाएंगे इंदिरा गाँधी कहाँ ग़ुम हो जाती है। चलो बेटा तुम काम करो हमने खा[Image]मखाँ तुम्हारा टाइम ले लिया जाओ पढ़ाई करो ..............बड़ा ही लायक बच्चा है.............मेरे चल देने पर किसी ने धीरे से कहा। खैर उनकी बातों ने मुझमें भी उस दौर को समझने के लिये इच्छा जगा दी थी। सो, नेट पर बी. बी.सी खोला और वहाँ सतीश जैकब और आनंद सहाय का ऑडियो सुना(सतीश जैकब वही रिपोर्टर है जिन्होंने बी.बी.सी को सबसे पहले ये खबर दी थी) , मार्क टली, शेषाद्री चारी, सुमित चक्रवर्ती के बीबीसी में और रामचन्द्र गुहा का दैनिक भास्कर में छपा लेख पढा; लगा उस दौर की सच्ची रिपोर्टिंग तो यही लोग कर रहें है जो गली-मोहल्लों में उस अनुभव की बदहवासी को अपने सीने में अब तक दफन किये हुए हैं वो बताना चाहते हैं लेकिन हमारे पास सुनने का समय ही नही हैं। सच.............&lt;br /&gt;लेबल: गाँधी परिवार&lt;br /&gt;1 टिप्पणी १-११-०९ तरुण गुप्ता के द्वारा &lt;br /&gt;हटाएँ&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-1527652318680651000?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/1527652318680651000/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=1527652318680651000' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1527652318680651000'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1527652318680651000'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/10/blog-post_31.html' title='वाकई वो बहुत दुखद समय था..'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-1755650236372459950</id><published>2010-10-23T05:30:00.000+05:30</published><updated>2010-10-23T05:32:27.771+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बचपन'/><title type='text'>वो बचपन बहुत बहादुर था</title><content type='html'>अभी मैं अपनी ज़िन्दगी के सत्ताईसवें वर्ष में हूँ पर  जीवन में बचपन रह रहके लौटता है हमारी जवानी हमारा बुढ़ापा बार बार बचपन की तरफ लौटता है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं तुम्हें अपने बचपन का एक संस्मरण सुनाता हूँ। मेरे घर के पास ही एक पीपल का पेड़ है उसी के बराबर में एक और पेड़ हुआ करता था जो हमारे बचपन ने लटक लटक कर तोड़ दिया, जिससे बाला की अम्मा ने हमारे बचपन को बाँधने की कोशिश की थी। पर बचपन कहाँ बँधने वाला है वो तो जेठ की दोपहरियों में जब सभी बच्चों की माएँ अपने अपने घरों में सो रहीं होती थीं तब हम नहर पर जाने या इस पीपल पर चढ़ने को तिलमिला रहे होते थे। &lt;br /&gt; ऐसे ना जाने कितने किस्से मुझे याद हैं। एक किस्सा वो जब मेरा भाई भैंस की पीठ पर बैठा था और एक दम से भैंस खड़ी हो गयी थी गूमड़ा निकल आया था सिर में। इस डर से कि माँ मारेगी ‘गुल्ली लग गयी है’ कह दिया था उसने। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मेरा भाई मुझसे ज़्यादा शरारती था। मेरे घर के छज्जे के बिल्कुल नीचे एक टांड हुआ करती थी जिस पर हम अपने कंचे, लट्टू और गुल्ली-डंडा जैसे साज़ो सामान रखा करते थे। हम सभी भाई-बहन पापा से बहुत डरते थे। पार्क में जाने के लिए पापा के काम पर जाने का इंतज़ार करने में ही हमारा वक़्त बीतता था। पापा के जाते ही हमारा सारा साज़ो-सामान निकल आता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुआ यों कि एक बार भाई नक्के-दुए(खड़क्कास) में कुछ ज़्यादा ही कंचे हार गया था कंचे लेने बो टांड पर चढ़ना चाहता था। शाम का वक्त था पापा के आने का वक़्त हो रहा था। उसने खाट लगाई और उसके सहारे टांड पर चढ़ गया। मैं उससे चिढ़ता था इसलिए मैंने खाट बिछा दी ताकि वो उतर ना सके। इतने में ही पापा आते दिखे। मैं खुश था कि भैया की पिटाई होगी उसका सारा ख़ज़ाना नीलाम हो जाएगा। पर हर बार की तरह भाई ने मुझे इस जुगत मे भी मात दे दी। जब उसने देखा कि उतरने का कोई और जुगाड़ नहीं है तो उसने ‘जय हनुमान जी की’ कहके छलाँग लगा दी। खाट चारो खाने चित्त हो गयी उसके चारों पाए टूट गये और उसकी बान(रस्सी) ज़मीन से आ लगी। भाई को चोटें भी आई। कोहनी और घुटनों से खून भी निकला, पर वो बचपन कुछ ऐसा था कि जैसे बहादुरी और जुनून कूट कूट कर भरा गया हो हममे। पर असल बात ये है कि घर में चोट दिखाने या उससे डॉक्टर से ठीक कराने का रिवाज़ ही नहीं था। छोटी मोटी चोटों का इलाज तो हम मिट्टी, थूक या बीड़ी के बंडल के क़ाग़ज़ को लगाकर कर लिया करते थे। वो बचपन बहुत बहादुर था ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-1755650236372459950?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/1755650236372459950/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=1755650236372459950' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1755650236372459950'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1755650236372459950'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html' title='वो बचपन बहुत बहादुर था'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-4909803945080056267</id><published>2010-10-19T01:57:00.000+05:30</published><updated>2010-10-19T01:59:45.715+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथा'/><title type='text'>"वो मेरी जवानी की पैदाइश के दिन .."</title><content type='html'>वो मेरी जवानी की पैदाइश के दिन थे जब मैंने पहली बार पीछे से उसे देखा था और मैं उसके प्यार में गिर गया था। लोग प्यार में आँखों से दिल में उतरते हैं मैं पीठ से आँखों की तरफ जा रहा था। दिल के बारे में मैंने सोचा ही नहीं। &lt;br /&gt;बस सब दोस्तों की तरह अपनी भी एक बंदी हो, यही था ‘जीवन का एक माञ लक्ष्य।‘ रात में जवानी हिचकौले मारती थी सुबह प्रमाण मिलते थे। वो वाकई मेरी जवानी की पैदाइश के दिन थे जिस दिन हमारे प्री-बोर्ड थे उस दिन पूनम की आँख मुझसे मिल गयी थी और मेरी जबानी पैदा हुई थी उस वक़्त मैं इतना ईमानदार था कि पेपर में आया निबंध ‘मेरे जीवन का लक्ष्य’ मैंने पूरे तीन घंटों तक लिखा था ऐसा पहली बार हुआ था जब मैं पूरे तीन घंटे तक पेपर करता रहा था। दोस्त परेशान थे साला कहता था ‘कुछ नहीं पढ़ा अब कैसा लिखे जा रहा है’ – बाहर मिल बच्चू। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर मुझे क्या. ‘मेरे जीवन का लक्ष्य’ उन आँखों में था जो आज मिल गयी थी मुझे। मेरी इस नयी नवेली जवानी ने अपनी आँखें अभी मूँद रखी थीं। सपनो में भी पूनम- यह क्या था. ओह पूनम , कम एंड हग मी, आई वान्ना किस यू- आई लब यू। प्यार के नाम पर यही शब्द आते थे मुझे। जो मैंने रात रात भर स्टार मूवीज़ और एच.बी.ओ को देख देखकर सीखे थे। उस दौरान मैं हिंदी फिल्मों को पसंद नहीं करता था और न ही दूरदर्शन को, ये मुझे प्यार के नाम पर दो फूलों को हिलते-मिलते दिखाते थे जबकि मैं कुछ और ज़्यादा की आस(प्यास) लगाये था जो कुछ हद तक अंग्रेज़ी चैनल पूरी करते थे। यह सब क्या था आज बड़ा अजीब सा लगता है। उन रातों में एक अजीब सी बदहवासी थी लेकिन जाने क्यों वो बहुत ईमानदार रातें थीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात की सारी कामुक थकान हम दोस्त लोग बेतकल्लुफी से एक दूसरे से बयाँ करते थे। ‘मेरे सपने में कल पूनम आई थी’ मैंने बंटी को बता दिया था और बंटी ने खुश्क़ी ली थी वाह बेटा तेरी तो निकल पड़ी...। सब हँस पड़े थे और मैं ग्लानिबोध से पीड़ित था। मन ही मन ठान लिया था कि इन सालों को अब कुछ नहीं बताना। ये मेरी नवजात जवानी की किशोरावस्था के दिन थे और साथ ही मेरी ईमानदारी के बेईमान बनने के भी। उस दिन के बाद से मैंने दोस्तों से सपने(पूनम) की बातें शेयर करना बंद कर दिया था। शायद अब मैं जवान बन रहा था। हमारे मोहल्ले में चर्चा था कि सुशील राय का बेटा अब समझदार हो गया है। समझदार क्या, कुछ ज़्यादा ही अंतर्मुखी हो गया था सारा सारा दिन कमरे में लेटा रहता, अंधेरे बंद कमरे में अपने को मज़ा आने लगा। दोस्तों की रंगीनीयत से घिन सी हो गयी थी। रात रात भर नींद नहीं आती थी। &lt;br /&gt;एक रात हमारी सामने वाली पड़ोसन रात तीन बजे पानी भरने उठी तो उसने मुझे जगा पाया। उसे लगा मैं तीन बजे तक पढ़ रहा हूँ। दरअसल वह पहली रात थी जब मैं तीन बजे तक जगा था क्योंकि सुबह बंटी को लोलिता वापिस करनी थी। खैर मेरे रात में पढ़ने की खबर पूरी गली में आग की तरह फैल चुकी थी। घरवाले खुश थे पर मैं दिन ब दिन अपने आप में सिमटता जा रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे सब याद है उस दौरान हमारी कॉलोनी में लाइट चली जाया करती थी और मैं अंधेरे कमरों में बैठा पूनम को खोजा करता था। मेरा बचपन चार्ली चैप्लिन को देखते बीता था और मेरी जवानी ने डिस्कवरी पर हिटलर को देखा था दोनों प्रेमी थे दीवानगी की हद तक। मैं भी प्रेमी था दीवानगी की हद तक। पर ना तो चैप्लिन बन सकता था और ना ही हिटलर। दोनों की मूँछे(छोटी) थीं और मुझे मूँछें बिल्कुल पसंद ना थीं मैं बिना मूँछों का रहना चाहता था जबकि मूँछें हमारे खानदान की शान हुआ करतीं थीं। दरअसल पूनम को भी मूँछों वाले लड़कों से सख्त नफरत थी। उसका बाप उसे बहुत मारता था। उसका भाई उस पर बंदिशें लगाता था। दोनों की ही मूँछें थीं। उसे मूँछों से सख्त नफरत थी। मैं उसे अपने दिल की रानी मान बैठा था, सो उसकी नफरत से मुझे प्यार कैसे हो सकता था। खैर मैंने प्रतिज्ञा ली कि अब चाहे घर छूटे या माँ रूठे पर मैं ताउम्र मूँछें नहीं रखूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वो चौदह फरवरी का दिन था जब मैंने पूनम के गालों का स्वाद चखने के लिए उसे पार्क के पीछे मेदिर के पास बुलाया था। मुझे आज भी याद है वो लाल सूट पहनकर, दो चोटी करके और बालो में खूब सारा तेल डाल कर आई थी लेकिन तब भी वो मेरे सपनों की रानी थी मेरे लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की। उसके गाल ऐसे चिकने थे कि हवा उसे छूने से पहले ही रपट जाती थी। आँखें ऐसी कोहिनूरी थीं कि जी करता काश ये दो कंचे मेरे पास होते और फिर मैं अपनी जान लड़ा देता लेकिन इन्हें किसी महारानी के ताज में नहीं सजने देता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर मंदिर के पीछे जहाँ का माहौल बिल्कुल भी रोमेंटिक ना था। मैंने उसे बुलाया। अपने गमले से तोड़ा एक फूल भी मेरे हाथ में था जिसे मैंने छिपाने के लिए अपनी जेब में डाल लिया था। दस मिनट बाद वो आई। वो दस मिनट मुझे आर. के. शर्मा के एक घंटे के पीरियड के समान लगे थे। वो आई और ‘भाई पीछे है हम कल मिलेंगे’ कहकर चली गयी। ना जाने उस दिन मुझे क्या हो गया था मैंने उसका पीछा किया और ये देखकर के पीछे कोई नहीं है उसका हाथ पकड़ लिया। ऐसा लगा जैसे कोई रूई का बंडल हो, वह काँप रही थी। डर से उसके गाल लाल हो गये थे। तब जबरन मैंने उसके गालो को चूमा(चाटा) था और वह भाग गयी थी तब उसी तरह का था मैं। जेब में रखा फूल चपटा होकर बिखर गया था। आज तक वो स्वाद मेरी ज़बान पर रखा है। उस दिन मेरी जवानी वयस्क हो गयी थी और मैंने पहली बार ‘स्मूच कैसे करते है?’ ये सवाल बंटी से पूछा था। बंटी ने मुझे ‘मोरनिंग शो’ दिखाया था। फिल्म का नाम ‘भरी जवानी’ जैसा कुछ था इस ‘मोरनिंग शो’ की बदौलत रात की बदहवासी बेचैनी में बदल गयी थी उन बेचैन रातों में भावी संतानो की हत्या हुई इस ग्लानिबोध को लेकर मेरी सुबह हुई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘मेरे जीवन लक्ष्य’ की बदौलत मैं फेल हो गया था और दोस्त मेरी खिल्ली उड़ा रहे थे ‘देख लिया गद्दारी का नतीजा।‘ उस दिन मुझे पहली बार लगा था कि दुनिया में दोस्त जैसी कोई चीज़ नहीं होती।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-4909803945080056267?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/4909803945080056267/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=4909803945080056267' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4909803945080056267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4909803945080056267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='&quot;वो मेरी जवानी की पैदाइश के दिन ..&quot;'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-5646489603379516171</id><published>2010-09-25T12:00:00.003+05:30</published><updated>2010-09-25T12:05:11.515+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बहसतलब'/><title type='text'>बहसतलब-५ (पहले दिन की लघु रिपोर्ट)</title><content type='html'>बहसतलब-५ का आयोजन इस बार सूरजकुंड स्थित जंगल फॉल कैम्प मे हुआ हालाँकि पहले इतनी दूर इस सेमिनार को आयोजित करवाने के कारण अविनाश एंड पार्टी पर थोड़ा गुस्सा आया, लगा कि इंडिया हैबिटेट सेंटर में क्या दिक्कत थी? पर मंडी हॉउस पर कैब व्यवस्था  और जंगल फॉल कैम्प के ट्रैडिशनली मेंटेन्ड तंबुओ को देख कर वो सारा मलाल अपने आप गायब हो गया। सचमुच बहुत बेहतरीन आयोजन और साथ ही बहुत बढिया आयोजन स्थल । &lt;br /&gt;दो दिनों के चार सत्रों में से पहले दिन के पहले सत्र में ‘किसके हाथ में बॉलीवुड की कंटेंट फैक्टरी की लगाम’ पर बहस हुई। सुधीर मिश्रा, अनुराग कश्यप, जयदीप वर्मा, अनुषा रिज़वी, महमूद फ़ारूक़ी, चंद्रप्रकाश द्विवेदी इस मुद्दे पर बोलने के लिए मौजूद थे। यह सत्र पूरे आयोजन का सबसे शानदार सत्र था लगभग तीन घंटे चली बहस में किसी में भी बोझिलता की स्थिति पैदा होते नहीं दिखी। सुधीर मिश्रा और अनुराग कश्यप की बातों ने प्रभावित किया ।“सिनेमा का बजट जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा,उसकी लगाम एक के हाथ में होने के बजाए कई लोगों के हाथ में होती जाएगी। निर्देशक के हाथ में होकर भी कईयों के हाथों में।“-अनुराग कश्यप &lt;br /&gt;अंत में फैसला जिसकी लाठी(पैसा) उसी की भैंस के रूप में निकलता दिखाई दिया। यही वो सत्र रहा जिसमे जयदीप वर्मा बहुत इमोशनल हो गये और सिनेमा के मामले में एक बेहतर भविष्य की चाहत रखने वाले लोगों पर अन्जाने में ही इमोशनल अत्याचार कर बैठे उनके वक्तव्य बहुत शानदार रहता अगर श्रोताओं को उससे निराशा का अनुभव न होता खैर बाद के सत्रों में उन्होंने इस पर काफी सफाई दे दी। अनुषा रिज़वी कम बोली , और जयदीप वर्मा ने इस सत्र में बोलते वक्त क्योंकि वक‍्त का ख़याल नहीं रखा था सो चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने इसकी पूर्ति करते हुए सिर्फ २ मिनट में अपनी बातो समेट डाला। दोबारा कहना चाहिए कि यह सत्र इस पूरे आयोजन की जान था। भूपेन और अतुल तिवारी जी ने हस्तक्षेप किया । अतुल तिवारी की सिनेमा की समझ ने बेहद प्रभावित किया शायद वह हस्तक्षेप इस पूरे आयोजन का सबसे बढिया हस्तक्षेप था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा सत्र- ‘न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जाने’ में भी सुधीर, अनुषा और अनुराग बने रहे साथ ही इस सत्र में नीलेश मिश्र और विनोद अनुपम ने जॉइन किया. बात स्त्री-पुरुष संबंधों के साथ हुए ट्रीटमेंट पर होनी थी लेकिन क्या होने लगा कुछ समझ नहीं आया और इसमे बहुत गहरी भूमिका उन दर्शकों की रही जो सवाल पूछने के नाम पर पूरा भाषण पिलाने पर तुल गये। मेरे जैसे कुछ नादान इस पूरे मुहावरे को समझ ही नहीं सके शायद बहस की तलब इसे ही कहते हों । विनीत ने तो कहा भी कि ऐसे आयोजनों में सवालो के लिए कूद जाना चाहिये पर मुझे ऐसी खेल-कूदों को समझने में अभी थोड़ा और वक़्त लगेगा।&lt;br /&gt; कुल मिलाकर यह सत्र मुझे एवरेज लगा लेकिन सुधीर और अनुराग ने पुन प्रभावित किया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-5646489603379516171?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/5646489603379516171/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=5646489603379516171' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5646489603379516171'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5646489603379516171'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/09/blog-post_25.html' title='बहसतलब-५ (पहले दिन की लघु रिपोर्ट)'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-3950330991076763885</id><published>2010-09-02T00:09:00.000+05:30</published><updated>2010-09-02T00:10:51.941+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरे अपने'/><title type='text'>बिलकुल माँ वाली खुशबू</title><content type='html'>अपने तमाम सार्वजनिक दायित्वों के बावजूद हम सब में एक निजत्व होता है। “माँ में से एक खुशबू आती थी बिल्कुल माँ वाली” ‘उड़ान’ फिल्म का यह संवाद इसी निजत्व की ईमानदार अभिव्याक्ति है। &lt;br /&gt;यह आज मुझे अधिक महसूस हो रहा है कल जन्माष्टमी है। एक वक्त था जब इस त्योहार के अवसर पर मेरा घर घी में खोये को भूनने की खुशबू से भर जाता था हमारे सामने वाली पड़ोसन(जिन्हें हम ताई कहते थे) और मेरी माँ मिलकर हम भाई-बहनों के लिए पंजीरी और मैथी के लड्डू बनातीं थीं और मेरे लिए स्पेशल पेड़े बनते थे क्योंकि मैं पंजीरी और मैथी के लड्डू दोनों ही पसंद नहीं करता था। पंजीरी में कसा हुआ गोला डलता था जो मेरे दाँतों मे अटकता था और लड्‍डू मुझे कड़वे लगते थे उस वक्त। क्या कुछ है जो आज उस स्मृति बनी याद को फिर से सच में तबदील कर सके। &lt;br /&gt;मेरे घर में पापा हैं, भैया है-भाभी है मगर आज मेरा घर उस खुशबू से महरूम है जो कुछ समय पहले तक मेरे घर में आती थी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-3950330991076763885?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/3950330991076763885/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=3950330991076763885' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3950330991076763885'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3950330991076763885'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='बिलकुल माँ वाली खुशबू'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-8072573988408128330</id><published>2010-08-30T02:05:00.006+05:30</published><updated>2010-08-30T02:21:31.890+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म समीक्षा'/><title type='text'>पीपली लाइव - अनुभव की तंज़िया नज़र</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/THrGHqiUCJI/AAAAAAAAAJc/RSTjWWiKgoo/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 97px; height: 140px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/THrGHqiUCJI/AAAAAAAAAJc/RSTjWWiKgoo/s400/images.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5510934929020815506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जैसा मैंने अपनी १४ अगस्त२०१० की डायरी में लिखा है-&lt;br /&gt;पीपली लाइव देखने के दौरान जितना मेरे साथ बैठे सहदर्शक हँस रहे थे मुझमे उतनी ही  एक टीस रह-रहके उभर आती थी अब जब मैं पूरी फिल्म देख चुका हूँ और राजौरी गार्डेन के 'वेस्ट गेट माल' में मुस्कुराते जोड़ो को देख रहा हूँ तो भी मेरे जेहन में  राकेश  के लटके हुए/जले हुए  हाथ की वो इमेज बार-बार उभर रही है और मुझे यकीन है कि फिल्म का दर्शक इस इमेज  को इतनी जल्दी बिसराने वाला नहीं। चाहे मुन्नी कितनी ही बदनाम क्यों न हो । खैर  मै जल्द से जल्द स्वतंत्रता दिवस पर सजाये गए उस माल से निकलना चाहता हूँ हालांकि मै अपने दोस्तों के साथ हँस-बोल रहा हूँ उनकी मस्ती में उनका साथ दे रहा हूँ शायद इसलिए की मेरे जन्मदिन पर उनकी ट्रीट में कोई कमी न रह जाये. पर मै परेशान हूँ कुछ उथल-पुथल सी मची है । महमूद और अनुषा रिज़्वी का  निर्देशन कुछ इस तरह का है कि  वो आपको आईना नहीं दिखाते बल्कि आपकी शक्लो- सूरत(बदसूरत) ही आपके सामने रख देते हैं अब आप हँसिये या तालियाँ बजाइये।  सच से रूबरू कराना ही शायद उनके लेखन-निर्देशन की एक शैली है शायद व्यंग्य(satire) इसे ही कहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुषा और महमूद फारूकी ने उस तंज़ नज़र को फिर से पैदा करने की कोशिश की है जिसे  रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं खासकर 'हँसो हँसो जल्दी हँसो' में बयाँ किया है ।  मैं घर आकर रघुवीर सहाय संचयिता खोलता हूँ "...निर्धन जनता का शोषण है / कहकर आप हंसें । लोकतंत्र का अंतिम क्षण है / कहकर आप हंसें । ...कितने आप सुरक्षित होंगे / मै सोचने लगा ।  सहसा मुझे अकेला पाकर / फिर से आप हंसें। "(आपकी हँसी) और मूवीटाइम  के हॉल न0-01 में बैठे दर्शकों के खिले चेहरे मेरे सामने हो लेते हैं.  &lt;br /&gt;"हँसो पर चुटकुलों से बचो / उनमे शब्द हैं / कही उनमे अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों । ********और ऐसे मौको पर हँसो / जो कि अनिवार्य हों / जैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मार / जहां कोई कुछ कर नहीं सकता / उस गरीब के सिवाय / और वह भी अक्सर हँसता है।"(हँसो हँसो जल्दी हँसो)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निश्चित ही सिर्फ नत्था इस फिल्म का mukhyaनायक नहीं है, राकेश एक दमदार किरदार है जो मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है,जिस तरह प्रेमचंद की एक कहानी 'ईदगाह' मे एकाएक 'चिमटा' नायक बन जाता है यहाँ नायक के सिलसिले में मुझे ऐसी ही गुंज़ाइश दिखती है.. खैर  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल यह एक नाट्यनुमा फिल्म है मुझे शुरु से लेकर अंत तक लगता रहा कि यह एक नाटक है &lt;br /&gt;और मैं अपने दिल को समझाता रहा कि नहीं यह तो फिल्म है फिर लगा ...(एक गहरी आह के साथ)नाटक ही तो है लोकतंत्र और उसके स्तंभों का, जो अपनी सारी कमज़ोरियों के बावजूद सबसे ताकतवर है यही कहते है ना हमलोग बहुधा...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-8072573988408128330?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/8072573988408128330/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=8072573988408128330' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8072573988408128330'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8072573988408128330'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/08/blog-post_30.html' title='पीपली लाइव - अनुभव की तंज़िया नज़र'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/THrGHqiUCJI/AAAAAAAAAJc/RSTjWWiKgoo/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6079997215625316965</id><published>2010-08-23T19:19:00.002+05:30</published><updated>2010-08-23T19:22:23.621+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-6079997215625316965?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/6079997215625316965/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=6079997215625316965' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6079997215625316965'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6079997215625316965'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title=''/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-1454384174693383579</id><published>2010-08-23T19:19:00.001+05:30</published><updated>2010-08-23T19:20:40.163+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>खाआआअ ...........प</title><content type='html'>"मैं तुम्हे चाहता हूँ"&lt;br /&gt;यही कहा था उसने&lt;br /&gt;कि आसमान सिर पे आ गिरा था उसके &lt;br /&gt;मुझे याद है अब भी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो मेरी गली का सबसे होशियार लड़का था &lt;br /&gt;कोलेज  में अव्वल आया था &lt;br /&gt;लडकियां मरती थी उस पर &lt;br /&gt;पर उसका दिल सिर्फ एक पर आया था &lt;br /&gt;लोग कहते हैं कि वो उसकी बहन थी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बहन' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहन कैसे?&lt;br /&gt;मैं तो इकलौता लड़का हूँ &lt;br /&gt;वह बार रिरियाता था &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे !&lt;br /&gt;दूर के रिश्ते  की&lt;br /&gt;वो बहुत खूबसूरत थी &lt;br /&gt;नाम मुझे याद नहीं आ रहा &lt;br /&gt;बहुत ही प्यारा नाम था उसका...&lt;br /&gt;दोनों एक-दूसरे को बहुत चाहते थे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर एक दिन &lt;br /&gt;उसकी लाश &lt;br /&gt;यमुना पुश्ते पर मिली &lt;br /&gt;यही बताया था मोहल्ले के एक बुज़ुर्ग ने मुझे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समझ न आया &lt;br /&gt;अजब सी गंध थी मोहल्ले में उस दिन &lt;br /&gt;फिजा में दो शब्द ताल ठोंक रहे थे &lt;br /&gt;खाआआअ ...........प&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-1454384174693383579?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/1454384174693383579/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=1454384174693383579' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1454384174693383579'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1454384174693383579'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/08/blog-post_23.html' title='खाआआअ ...........प'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-8968395012046893609</id><published>2010-07-23T15:13:00.000+05:30</published><updated>2010-07-23T15:13:20.090+05:30</updated><title type='text'>Yashpal Part I</title><content type='html'>&lt;object width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/AL6CaEqEA-w&amp;amp;hl=en_US&amp;amp;fs=1"&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/AL6CaEqEA-w&amp;amp;hl=en_US&amp;amp;fs=1" width="425" height="344" allowScriptAccess="never" allowFullScreen="true" wmode="transparent" type="application/x-shockwave-flash"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-8968395012046893609?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/8968395012046893609/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=8968395012046893609' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8968395012046893609'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8968395012046893609'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/07/yashpal-part-i.html' title='Yashpal Part I'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-5722419986457786</id><published>2010-07-23T15:11:00.000+05:30</published><updated>2010-07-23T15:11:56.120+05:30</updated><title type='text'>Yashpal Part II</title><content type='html'>&lt;object style="background-image:url(http://i4.ytimg.com/vi/_jPWQSyRT0U/hqdefault.jpg)"  width="425" height="344"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/_jPWQSyRT0U&amp;amp;hl=en_US&amp;amp;fs=1"&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/_jPWQSyRT0U&amp;amp;hl=en_US&amp;amp;fs=1" width="425" height="344" allowScriptAccess="never" allowFullScreen="true" wmode="transparent" type="application/x-shockwave-flash"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-5722419986457786?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/5722419986457786/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=5722419986457786' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5722419986457786'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5722419986457786'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/07/yashpal-part-ii.html' title='Yashpal Part II'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' 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class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-5968049886567593802?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/5968049886567593802/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=5968049886567593802' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5968049886567593802'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5968049886567593802'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/07/yashpal-part-iii.html' title='Yashpal Part III'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-5536302602662574203</id><published>2010-07-22T21:01:00.002+05:30</published><updated>2010-07-22T21:05:36.015+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>ज्यादा दिन नहीं बीते हैं..</title><content type='html'>जब दो युगल बैठे थे &lt;br /&gt;पेड़ की आड़ लिए &lt;br /&gt;तुमने फुसफुसाया था कानो में &lt;br /&gt;पेड़ कट गया था अगले ही पल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिमारपुर के केस को बीते &lt;br /&gt;ज्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है अभी&lt;br /&gt;पाले बदलते रहते हैं बस &lt;br /&gt;प्यार पर बंदिशें लगती रहती हैं बस &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमियों को डरना पड़ता है &lt;br /&gt;'डर  के आगे जीत है' जैसे वाक्य  तो अब सुनने को मिलने लगें हैं   &lt;br /&gt;वर्ना तो दुनिया '...प्यार किया तो डरना क्या' जैसे एक गीत के सहारे ही &lt;br /&gt;दीवारों में चुन जाने के लिए तैयार रहती थी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्यादा दिन नहीं बीते हैं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे मोहल्ले में कई कुत्ते पीछे लग गए थे &lt;br /&gt;रीना के,  याद होगा तुम्हे &lt;br /&gt;तुम भी तो उनके साथ थे &lt;br /&gt;रीना ने जींस क्या पहन ली थी &lt;br /&gt;तुम्हे तो सूंघने का मौका मिल गया था &lt;br /&gt;तुम सबने मिलकर गोश्त चूसा था &lt;br /&gt;चटखारे लिए थे इस समाज ने &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीना ने पहल की थी &lt;br /&gt;तुमने दबा दी थी &lt;br /&gt;''मोडर्न हुआ चाहती थी साली''&lt;br /&gt;कानो में अब भी गुंजायमान है मोहल्ले के &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम और तुम्हारे साथी &lt;br /&gt;फिकरे कसते हों युगलों पर &lt;br /&gt;छेड़ते हो लड़कियों को &lt;br /&gt;बंदिशें लगाते हो प्रेम पर &lt;br /&gt;तमाचे मारते हो लोकतंत्र पर &lt;br /&gt;लानत देते हो सरकार की कारगुजारियों पर   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी पूछा है अपने घर की औरतों से &lt;br /&gt;तुमने,  &lt;br /&gt;वो क्या चाहती हैं ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-5536302602662574203?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/5536302602662574203/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=5536302602662574203' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5536302602662574203'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5536302602662574203'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/07/blog-post_22.html' title='ज्यादा दिन नहीं बीते हैं..'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-8914389768816846359</id><published>2010-07-12T19:29:00.000+05:30</published><updated>2010-07-12T19:30:54.406+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुन: प्रकाशित (कविता)'/><title type='text'>बरसात की एक शाम...</title><content type='html'>इस मौसम की सबसे जोरदार बरसात&lt;br /&gt;अबके नहीं आई मुझे तुम्हारी याद ......क्यों?&lt;br /&gt;क्या इसलिए&lt;br /&gt;कि मै&lt;br /&gt;अब तक&lt;br /&gt;अपने घर के निचले तल से&lt;br /&gt;पानी निकालने में व्यस्त था&lt;br /&gt;या फिर अब तक&lt;br /&gt;घर न लौटे भाई की&lt;br /&gt;चिंता सता रही थी मुझे&lt;br /&gt;या फिर इन सबसे अलग&lt;br /&gt;मैंने पहली बार सोचा&lt;br /&gt;कि मै तुम्हे क्यों याद करता हूँ.........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-8914389768816846359?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/8914389768816846359/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=8914389768816846359' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8914389768816846359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8914389768816846359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='बरसात की एक शाम...'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-4821663275915957231</id><published>2010-05-29T11:25:00.006+05:30</published><updated>2010-05-29T11:32:44.223+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्ली से बाहर'/><title type='text'>तालों में 'नैनीताल' बाकि सब तलैया..</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/TACtxz2P05I/AAAAAAAAAIU/aIufL1ttHNM/s1600/Image1587.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/TACtxz2P05I/AAAAAAAAAIU/aIufL1ttHNM/s320/Image1587.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5476568218125456274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/TACtkwyDe4I/AAAAAAAAAIM/jmNPnlS4ThA/s1600/Image1527.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/TACtkwyDe4I/AAAAAAAAAIM/jmNPnlS4ThA/s320/Image1527.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5476567993964264322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;'तालों में नैनीताल बाकी सब तलैया'  ये गीत उस वक़्त  हमारे ज़हन में बार-बार गूँज रहा था जब मै और मेरे दोस्त नैनीताल के पास ही 'भीम-ताल' और 'नौकुचिया-ताल'  देखने गए . भीम ताल के बारे में कहा जाता है की इसकी उत्पत्ति भीम ने अपने गदा-प्रहार से की थी  और नौकुचिया-ताल इसलिए प्रसिद्द है की इसके नौ कोने है साथ ही यह भी कहा जाता है कि जो  भी व्यक्ति इसके नौ कोनों को एक साथ देखले उसके प्राण-पखेरू उड़ जाते है. हम गए तो इसलिए थे कि नैनी-ताल की तरह ही वहाँ हमें नए  सुखद-अनुभव मिलेंगे, थोड़ी और मौज-मस्ती होगी लेकिन वहां अनुभव तो मिला पर वो सुखद नहीं बन सका. काफी सूनापन था वहां.   कारण तो यही लगता  है कि वहाँ की सरकार ने उसे एक टूरिस्ट स्पोट के रूप में विकसित करने की कभी कोशिश ही नहीं की होगी . . नैनीताल अगर आज ज्यादा प्रसिद्द हो सका है तो उसका एक बड़ा कारण , उस पर सरकार की तवज्जो और इसके पास मालरोड का होना भी है. &lt;br /&gt;खैर जब तक नैनीताल में था वहाँ की हवाए बहुत सुहाती थी खासकर नैनी-झील के किनारे-किनारे माल रोड पर चलते हुए आइस-क्रीम खाना . वाह! क्या खूबसूरत एहसास था वो . अब इस वक़्त दिल्ली में यहाँ धुल भरी आँधियों ने मेरे सुखद सर्द-एहसासों पर ज़ोरदार प्रहार किया है दिल्ली और नैनीताल के बीच कही अपने को पाता हूँ .&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-4821663275915957231?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/4821663275915957231/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=4821663275915957231' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4821663275915957231'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4821663275915957231'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/05/blog-post_29.html' title='तालों में &apos;नैनीताल&apos; बाकि सब तलैया..'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/TACtxz2P05I/AAAAAAAAAIU/aIufL1ttHNM/s72-c/Image1587.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-97373358314639575</id><published>2010-05-21T01:28:00.002+05:30</published><updated>2010-05-21T01:32:08.719+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता जो मन भाये'/><title type='text'>बद्री नारायण की कविता</title><content type='html'>नया ज्ञानोदय के मई अंक में बद्री नारायण की कविता 'पेड़ की शोकसभा' वर्तमान हालातों को देखते हुए बहुत जानदार जान पड़ती है जिन लोगों ने  बद्री नारायण की कविता 'प्रेम-पत्र' पढ़ी होगी वो उनके पहले ही मुरीद होंगे . उनका एक अलग ही अंदाज़ है कविता कहने का, वे कविता में माम्लातों को बातों की शक्ल में बयाँ करते है एक बानगी देखिये-&lt;br /&gt;एक पेड़ की शोकसभा में आमंत्रित है आप &lt;br /&gt;आइये पेड़ की शोकसभा में &lt;br /&gt;आइये &lt;br /&gt;कल जनतंत्र और राजसत्ता ने &lt;br /&gt;उतार कर मानवीय चेहरा &lt;br /&gt;तोप, बम, हेलिकॉप्टर &lt;br /&gt;कर दिया था तैनात &lt;br /&gt;रात भर के चले अर्धसैनिक बलों के अभियान में &lt;br /&gt;यह पेड़ अंतत: मारा गया &lt;br /&gt;देखिये खबर लहरिया  अख़बार के पांचवे पेज के चौथे कॉलम&lt;br /&gt;की न्यूज़ है यह..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरी कविता पढने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें www.jnanpith.net&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-97373358314639575?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/97373358314639575/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=97373358314639575' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/97373358314639575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/97373358314639575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/05/blog-post_21.html' title='बद्री नारायण की कविता'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-8557899441291511108</id><published>2010-05-13T02:14:00.006+05:30</published><updated>2010-05-13T02:26:30.031+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='cricket'/><title type='text'>हमें याद रखना होगा की विश्व-कप में भारत का प्रतिनिधित्व अभी बरक़रार है...</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S-sV7RkE9nI/AAAAAAAAAIE/9irwf3f50Cs/s1600/hocky.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 226px; height: 170px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S-sV7RkE9nI/AAAAAAAAAIE/9irwf3f50Cs/s320/hocky.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5470490280442787442" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S-sVlFlrMPI/AAAAAAAAAH8/htM7chh3eBQ/s1600/w+cricket.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 226px; height: 170px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S-sVlFlrMPI/AAAAAAAAAH8/htM7chh3eBQ/s320/w+cricket.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5470489899271139570" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S-sVCdgHVGI/AAAAAAAAAH0/WLqLaiDYKmY/s1600/good.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S-sVCdgHVGI/AAAAAAAAAH0/WLqLaiDYKmY/s200/good.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5470489304394847330" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भारत में क्रिकेट और होकी का न जाने क्यों छत्तीस का आंकड़ा ही बना रहता है. अभी ज्यादा समय नहीं बीता है होकी विश्व कप को बीते जिसमे होकी खिलाडियों ने अपने लचर प्रदर्शन के कारण न्यूज़ चेनल्स की आलोचना झेली थी अगर आपको याद हो तो उस दौरान धोनी ब्रिगेड शानदार प्रदर्शन कर रही थी तब उनकी उपलब्धियों के पुल बंधे जा रहे थे.पर अब जब होकी दक्षिण कोरिया को हराने के बाद ऑस्ट्रेलिया को भी हरा चुकी है और अपना बेहतरीन प्रदर्शन कर रही है तब क्रिकेट की बुलंदियों अपना सिर (शर्म से या किसी और वजह से...) झुकाने को बेताब दिखाई दे रही हैंl &lt;br /&gt;सुबह जब दैनिक भास्कर की खबर 'भारत ने लंका को हराया' पढ़ी तो रात २बजे तक देखे मैच की सारी खुमारी उतर गयी पहले तो लगा अख़बार में गलती से उल्टा लिख गया होगा पर जब डिटेल पढ़ी तो पता चला की जब धोनी और युसूफ पठान जैसे बम फूस हो गए थे तब मिताली राज और सुलक्षणा नाइक  श्री लंका पर कहर बरबा रही थी .चलो पुरुष क्रिकेट टीम ने न सही महिलाओ की ब्रिगेड ने तो विश्व कप की अहमियत समझी. कल जिस तरह से भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने सेमीफ़ाइनल में जगह बनाई है  उससे नई उम्मीदें जगी है यह टीम बधाई की हक़दार है हमें याद रखना होगा की विश्व-कप में भारत का प्रतिनिधित्व अभी बरक़रार है.  &lt;br /&gt;मेरा बधाईनुमा सलाम स्वीकारो ...!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-8557899441291511108?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/8557899441291511108/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=8557899441291511108' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8557899441291511108'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8557899441291511108'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/05/blog-post_13.html' title='हमें याद रखना होगा की विश्व-कप में भारत का प्रतिनिधित्व अभी बरक़रार है...'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S-sV7RkE9nI/AAAAAAAAAIE/9irwf3f50Cs/s72-c/hocky.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-322603006760483681</id><published>2010-05-09T14:33:00.000+05:30</published><updated>2010-05-09T14:35:04.598+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='aise hi'/><title type='text'>अस्तित्व</title><content type='html'>धूल उडती है घर में , बाहर ; हर चीज़ जो उसके दायरे में है या नहीं है चढ़ जाती है और अगर कोई उस धूल को उस चीज़ पर से न हटाये या उस पर ध्यान न दे तो वो धूल उस चीज़ पर एक मोटी-सी परत या कहें अपना एक पूरा लबादा छोड़ जाती है वो लबादा या कि परत उस धूल का अस्तित्व है और उसे हटाने के बाद भी दोबारा वहीं  पर उसी जगह पर उभरना उसका संघर्षl&lt;br /&gt;यह संघर्ष दोनों तरफ जारी धूल अपना काम कर रही है और सफाई करने वाले अपना. फिर क्यों हम अपना कम नहीं करते, क्या हम उस धूल से भी ... अजी छोड़िये आप कहेंगे  क्या फ़िज़ूल कि बातें लेकर बैठ गया पर फ़िज़ूल की ही सही(आप की नज़र में) लेकर तो बैठा हूँ न, कम से कम बातों को तो फ़िज़ूल नहीं बना रहा हूँ l &lt;br /&gt;खैर, बात धूल की हो रही थी नहीं शायद अस्तित्व की ... पर अंत में आना तो अस्तित्व पर ही था न? हाँ तो अस्तित्व; क्या है ये अस्तित्व . मुझे लगता है अपनी पहचान को खुद्दारी और जिंदादिली के साथ जिंदा रखने की सक्रिय कोशिश है अस्तिव l &lt;br /&gt;जो कम धूल बखूबी कर रही है पर हम शायद कतरा रहे है इससे l धूल हटाई जाने पर फिर अपनी जगह आ जाती है पर गिरने के बाद पहले तो चलने के बारे में सोचते ही नहीं. और अगर सोचते है तो पहले जैसा विश्वास ख़त्म हो जाता है हमारा l&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-322603006760483681?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/322603006760483681/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=322603006760483681' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/322603006760483681'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/322603006760483681'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='अस्तित्व'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2210497940744034640</id><published>2010-03-24T00:29:00.005+05:30</published><updated>2010-07-07T20:38:15.389+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फिल्म समीक्षा'/><title type='text'>LSDक्या करें कुछ समझ नहीं आता, कोई मंज़र नज़र नहीं आता</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S6kRfYyUTUI/AAAAAAAAAHs/vE8S9OgODvw/s1600-h/love-sex-aur-dhokha-01-12x9.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S6kRfYyUTUI/AAAAAAAAAHs/vE8S9OgODvw/s200/love-sex-aur-dhokha-01-12x9.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5451908054835809602" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;महीने, दो महीने पहले सुनील शानबाग द्वारा निर्देशित नाटक 'सैक्स, मोरेलिटी और सेंसरशिप' देखा था l  इसमें गालियों की भरमार थी और मै बार-बार ये सोच रहा था कि शुक्र है हमारे बुज़ुर्ग लोग यहाँ नहीं आये वर्ना उनकी थोथी नैतिकता के पैरों तले हम बेवजह कुचले जाते l इस नाटक में सुनील शानबाग ने 'सखाराम बाइनडर' को उपजीव्य  बनाकर इस अनैतिक दौर में 'सैक्स' और 'मोरेलिटी' को डिफाइन करने की सफल कोशिश की है l यह कोशिश सफल इसलिए है कि न सिर्फ यह सैंसरशिप के वास्तविक पैमानों को खोलती है बल्कि इस  तथाकथित नैतिकता  और मूल्यों के युग में आज के वक़्त की असलियत को सैंसर करने के षड्यंत्र को भी दिखाती है l &lt;br /&gt;'लव,सैक्स और धोखा' में भी मुझे कुछ ऐसा ही अनुभव होता है फर्क सिर्फ इतना है कि वहां असलियत को सैंसर करने के षड्यंत्र को दिखाया गया था और यहाँ असल जिंदगी को, जिससे बहुधा हमें मुँह फेरने की आदत है l LSD को देखने के क्रम में ek दर्शक कई वर्गों में हमें दिखता है एक वर्ग वह है जो इस फिल्म में 'सेक्स' की आस लिए गया था हालाँकि इसकी उम्मीद कम है क्योंकि सेक्स दर्शन अब दुर्लभ नहीं रहा उससे वैबसाईट भरी पड़ी है&lt;br /&gt; एक वर्ग और है इसे हम बौद्धिक वर्ग कह सकते है इसने दिबाकर बैनर्जी की पहली दोनों फिल्में 'खोंसला का घोंसला' और 'ओये लक्की, लक्की ओये' देखीं हैं जो दिबाकर के प्रयोगों की प्रगतिशील समझ से वाकिफ है  जो वस्तुत: दिबाकर बैनर्जी के इस नए प्रयोग को देखने गया था दिबाकर ऐसे दर्शक को निराश नहीं करते बिलकुल सुनील शानबाग की तरह l&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इस फिल्म की रिलीज़ के दिन(१९ मार्च)   शाम को जब घर लौटा तो एक मीडिया चैनल पर एक समीक्षक(कुछ अजनबी से) को इस फिल्म को कोसते हुए सुना, यूँ तो वो भी उनकी पिछली दोनों फिल्मों के प्रशंसक थे लेकिन इस फिल्म(लव,सेक्स और धोखा) के शीर्षक में 'सैक्स' शब्द को देखकर ही वे भभक उठे, उन्हें शिकायत थी कि दिबाकर इस फिल्म से समाज में अश्लीलता फ़ैलाने की कोशिश कर रहे हैंl शायद इससे उनकी नैतिकता प्रभावित हुई थीl&lt;br /&gt; तब तक मैंने फिल्म नहीं देखी थी लेकिन जब देखी तो किसी एंगल से भी वो अश्लील या फूहड़ नहीं लगी  बल्कि इससे कही ज्यादा सेक्सुअल सीन तो हमें महेश भट्ट की फिल्मों में देखने को मिल जाते हैं l यदि आप उसे अश्लीलता माने तो? हालांकि मै इसे अश्लीलता नहीं मानता यह तो सच्चाई के सारनाथ का छिपा हुआ शेर मात्र है&lt;br /&gt;हालांकि यह फिल्म उन लोगों को निराश कर सकती  है जो सिनेमा को एक मनोरंजन और आनंद प्रदान करने वाली विधा मानते हैं, यह उन लोगों में भी खीज पैदा कर सकती है जो इसमें 'लव,सेक्स और धोखा' की जगह 'प्यार,इश्क और मोहब्बत' पर सेक्स कैसे हावी होता है? यह देखने गए हों l साथ ही यह उन लोगों के लिए भी निराशा और गुस्से का सबब साबित हो सकती है जो समाज में व्याप्त अनैतिकता और विद्रूप स्थितियों से मुँह फेरने को ही मूल्य और नैतिकता मानते हों इस तरह के लोग दरअसल एक तरह के यूटोपिया में रहने के आदि हैं लेकिन जो लोग दिबाकर बैनर्जी के काम  से परिचित हैं वो इन सब ढकोंसलों को दरकिनार करते हुए एक बौद्धिक दर्शक की हैसियत से इस फिल्म को देखने के खूबसूरत पर खतरनाक एहसास से वाकिफ ज़रूर  होंगे l. &lt;br /&gt;दिबाकर का यह नजरिया वाकई काबिलेतारीफ है कि बिना किसी शूटिंग लोकेशन के, बिना किसी बड़े नामी  हीरो-हिरोइन के, और फिजूलखर्ची किये बिना वह हमें हमारे समाज-तंत्र की विद्रूप स्थितियों की खबर  दे देते है वे दरअसल व्यावसायिक सिनेमा के दौर में जोखिम लेते हुए एक बौद्धिक नज़रिए को कायम रखने का प्रयोग कर रहे है l ये हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम इसे एक पोसिटिव नज़रिए से देखें ना कि इसे एक 'सेक्स को बढ़ावा देने वाली फिल्म' कहकर नकार दें l&lt;br /&gt;सच तो ये है कि इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है  जिसे आप अनैतिक या सेक्सुअल कहेंगे, यह तीन छोटी डोक्युमेंटरी को मिलाकर बनी एक फिल्म है क्या आज भी प्रेमियों को मौत की सजा नहीं सुनाई जाती? क्या आज भी भारत में ज़्यादातर सेक्स स्कैंडल हिडन कैमरों की मदद से नहीं बनते? क्या मीडिया में 'पैड न्यूज़' या 'ब्लैकमैलिंग' नहीं होती ? अगर दिबाकर इन्हें हमारे सामने रख़ रहे है तो हमें इन्हें एक्सेप्ट करने में हिचक  क्यों हो रही है ? क्या फिल्म के शीर्षक में 'सैक्स' शब्द के होने के कारण ही ये बखेड़ा खड़ा हो रहा है यदि ऐसा है तो हमें इससे उबरने की ज़रुरत है l&lt;br /&gt;दिबाकर अपनी इस फिल्म में शायद यह दिखाना चाहते हैं कि छोटा-बड़ा हर कैमरा अपने आप में एक निर्देशक है इन मायनो में निर्देशक, निर्देशक कम एडिटर की भूमिका ज्यादा निभाता जान  पड़ता है l क्योंकि कैमरा तो सिर्फ शूट करता है लेकिन निर्देशक उस शूटिंग को (LSD के सन्दर्भ में) सही मायने में एडिट करता चलता है इस फिल्म की तीन कहानियों को एक ही कलात्मक विचार में पिरोने की सफल कोशिश के दौरान दिबाकर डायरेक्टर-कम-एडिटर बन गए हैं ज़रुरत है इस तरह के नए  प्रयोगों को तवज्जो देने की ताकि हर गली हर नुक्कड़ पर एक निर्देशक-एक एडिटर का ख्वाब जन्म ले सके l साहित्य में यह कहा जाता है कि ऐसी कोई वस्तु नहीं जिस पर कविता न लिखी जा सके l इस फिल्म के सन्दर्भ में दिबाकर हमें यही बताने की कोशिश करते हैं l&lt;br /&gt;यह फिल्म हमें रश्मि(एक कैरेक्टर) जैसी उन तमाम लड़कियों के बारे में सोचने के लिए विवश करती है जो ना चाहते हुए भी उस स्कैंडल का हिस्सा हैं जिसका दायरा  घर से लेकर मीडिया की चहल-पहल और यू-ट्यूब तक फैला है यह फिल्म शायद सबसे दर्दनाक तरीके से एक सांवली, भावुक(ईमानदार) लड़की की बदकिस्मती को ही नहीं दिखाती बल्कि इस ठरकी समाज के उस नंगेपन को भी दिखाती है जो कहता है कि 'कपडे उतारने के बाद काली-गोरी सब अच्छी लगती हैं l'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2210497940744034640?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/2210497940744034640/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=2210497940744034640' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2210497940744034640'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2210497940744034640'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='LSDक्या करें कुछ समझ नहीं आता, कोई मंज़र नज़र नहीं आता'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S6kRfYyUTUI/AAAAAAAAAHs/vE8S9OgODvw/s72-c/love-sex-aur-dhokha-01-12x9.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-5480552554952590528</id><published>2010-01-28T00:48:00.003+05:30</published><updated>2010-01-28T09:44:10.986+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता जो मन भाये'/><title type='text'>बतूता का जूता - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना</title><content type='html'>इब्नबतूता पहन के जूता&lt;br /&gt;निकल पड़े तूफान में&lt;br /&gt;थोड़ी हवा नाक में घुस गई&lt;br /&gt;घुस गई थोड़ी कान में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी नाक को, कभी कान को&lt;br /&gt;मलते इब्नबतूता&lt;br /&gt;इसी बीच में निकल पड़ा&lt;br /&gt;उनके पैरों का जूता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उड़ते उड़ते जूता उनका&lt;br /&gt;जा पहुँचा जापान में&lt;br /&gt;इब्नबतूता खड़े रह गये&lt;br /&gt;मोची की दुकान में।&lt;br /&gt;सन्दर्भ:- कविता-कोश  (www.kavitakosh.org)&lt;br /&gt;गुलज़ार का लिखा 'इश्किया' का गीत 'इब्न-बतूता...जूता...' सर्वेश्वर की कविता का समकालीन संस्करण जान पड़ता है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-5480552554952590528?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/5480552554952590528/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=5480552554952590528' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5480552554952590528'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5480552554952590528'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/01/blog-post_28.html' title='बतूता का जूता - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-3935368269153149326</id><published>2010-01-24T22:41:00.006+05:30</published><updated>2010-01-24T23:18:52.444+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैम्पस-बाज़ी'/><title type='text'>चुप्पी एक विचार है ओर विचारों की हत्या नहीं होती....</title><content type='html'>ये तस्वीरें गवाह हैं उस गुनाह की दास्ताँ की जो आजकल कैम्पस(आर्ट फैकल्टी, दिल्ली विश्वविद्यालय) में विद्यार्थी परिषद् द्वारा लिखी जा रही है, वाकई वो डरते हैं हमारे चुप रहने से भी; क्योंकि चुप्पी एक विचार है और विचारों की हत्या नहीं होती..., ज्यादा लिखना ज्यादा बोलना है और जब  चुप्पी एक कारगर हथियार हो तो बोलना उनलोगों के साथ कन्धा मिलाना होगा  जो जन-विरोधी कारनामों को अंजाम दे रहे हैं. ये चुप्पी एक लम्बे वाक-संघर्ष  से उपजी है जो ज्यादा खतरनाक साबित होगी इन संस्कृति के ठेकेदारों के खिलाफ  . इसलिए साथियों तस्वीरें गवाह हैं...हमारी एकजुटता की, ये गवाह है हमारे साहस की, हमारे मनोबल की, ये गवाह है उनकी कमजोरियों की, उनकी बौख्लाहटों  की .... &lt;br /&gt;(बीते दिनों, विद्यार्थी परिषद् के लोगों ने आर्ट फैकल्टी में जनचेतना की पुस्तक प्रदर्शनी पर हमला बोल दिया था, और उनकी गाड़ी को खासा नुक्सान पहुंचाया था, इतना ही नहीं चोरी पर सीनाजोरी यह क़ि अगले दिन पुलिस के सामने जनचेतना के कार्यकर्ताओं के साथ   'देश के गद्दारों को गोली मारों सालो को' जैसी भाषा का प्रयोग कर अपने मंसूबे साफ़ कर दिए  थे, इसके बाद वहाँ से एहतियात के तौर पर या किसी और वजह से जनचेतना की गाडी को हटा दिया गया क्योंकि इतनी कुव्वत तो पुलिस-प्रशासन में थी  नहीं की ए.बी.वी.पी. के खिलाफ कोई  एक्शन वह लेती, सो जनचेतना क़ी गाडी को हटाना ही उसने बेहतर समझा.)  वाकई समाज बेहतरी की और बढ़ रहा है... &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S1x_-7sOpKI/AAAAAAAAAHk/Ew_Bk5f9VTA/s1600-h/Image0113.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S1x_-7sOpKI/AAAAAAAAAHk/Ew_Bk5f9VTA/s320/Image0113.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5430355969853793442" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S1x_6FyHWTI/AAAAAAAAAHc/VzAbPL1vOIc/s1600-h/Image0112.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S1x_6FyHWTI/AAAAAAAAAHc/VzAbPL1vOIc/s320/Image0112.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5430355886663489842" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S1x_0hew_sI/AAAAAAAAAHU/Lc8sXwQRJgQ/s1600-h/Image0111.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S1x_0hew_sI/AAAAAAAAAHU/Lc8sXwQRJgQ/s320/Image0111.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5430355791019310786" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S1x_vYL26pI/AAAAAAAAAHM/WtFePn3PkWs/s1600-h/Image0110.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S1x_vYL26pI/AAAAAAAAAHM/WtFePn3PkWs/s320/Image0110.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5430355702624742034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-3935368269153149326?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/3935368269153149326/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=3935368269153149326' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3935368269153149326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3935368269153149326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='चुप्पी एक विचार है ओर विचारों की हत्या नहीं होती....'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/S1x_-7sOpKI/AAAAAAAAAHk/Ew_Bk5f9VTA/s72-c/Image0113.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-4967626205734519498</id><published>2009-12-06T17:51:00.003+05:30</published><updated>2009-12-06T17:59:26.496+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाल-कविता'/><title type='text'>मेरे घोचूँ मेरे भैया</title><content type='html'>मेरे घोचूँ मेरे भैया&lt;br /&gt;क्या क्या लाऊँ &lt;br /&gt;ता-था थैया&lt;br /&gt;पोलीथीन पे बैन लगा है&lt;br /&gt;जूट का बैग भी नहीं मिला है&lt;br /&gt;मेरे घोचूँ मेरे भैया ।&lt;br /&gt;कैसे लाऊँ ता-था थैया।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाज़ारों में भीड़ बड़ी है&lt;br /&gt;सब्ज़ी लेकिन सड़ी पड़ी है&lt;br /&gt;मेरे घोचूँ मेरे भैया।&lt;br /&gt;कैसे खाऊँ ता-था थैया।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;त्योहारों में महँगाई है&lt;br /&gt;या महँगाई में त्योहार &lt;br /&gt;सीलींग के भी क्या कहने है&lt;br /&gt;ठप्प पड़ गया अब व्यापार&lt;br /&gt;भावनाओं की कद्र नहीं अब&lt;br /&gt;अब प्रोफेशन है व्यवहार &lt;br /&gt;मेरे घोचूँ मेरे भैया।&lt;br /&gt;किसे सुनाऊँ ता-था थैया।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन अब भी कुछ तो बचा है&lt;br /&gt;जो अब तक बेचा नहीं गया है &lt;br /&gt;ऐसा सब कहते है भैया &lt;br /&gt;लेकिन मुझको नहीं पता है &lt;br /&gt;कैसे इसका पता लगाऊँ&lt;br /&gt;मेरे घोचूँ मेरे भैया &lt;br /&gt;सब हैं मस्त &lt;br /&gt;तो काहे का ता-था।&lt;br /&gt;औ काहे की थैया।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(यह बाल-कविता कुछ समय पहले लिखी गई थी आज जब काफी दिनों बाद अपनी डायरी खोली तो दिख गई सोचा आपके सामने रख दूँ , सो रख दी। ......... )&lt;br /&gt; आपकी टिप्पणियों के इंतज़ार में..........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-4967626205734519498?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/4967626205734519498/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=4967626205734519498' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4967626205734519498'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4967626205734519498'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='मेरे घोचूँ मेरे भैया'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-35307596712207276</id><published>2009-11-24T05:48:00.004+05:30</published><updated>2009-11-24T06:22:34.216+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मलयज'/><title type='text'>पर चूंकि प्रेम को मैं...(का अन्तिम अंश)</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SwssbCDS_GI/AAAAAAAAAHA/bgzKXGfFzoQ/s1600/Image0321.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SwssbCDS_GI/AAAAAAAAAHA/bgzKXGfFzoQ/s320/Image0321.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5407464620507200610" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;strong&gt;बाईं ओर मलयज की &lt;/strong&gt;तस्वीर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बहुत दिनों तक नहीं आई। और चूँकि संभावना के अर्थ में मैं तब भी प्रेम कर सकता था अतः मैं उदास रहने लगा। मेरी उदासी एक धूल थी जो उस दरवाज़े की मूठ पर जमती जाती थी। उस मूठ पर मेरी उँगलियों की छाप बनी हुई थी और धूल उस छाप के चारों ओर जमती जाती थी जिससे उँगलियो के निशान दिन-दिन और भी उभरते आते थे उँगलियो की वह छाप मुझमे यह याद ताज़ा करती कि कभी मैंने प्रेम को संभावना समझा था और वह बीच का दरवाज़ा हमेशा के लिये खोल देना चाहा था। जैसे-जैसे दिन बीतते जाते उस संभावना का अंधेरा छाता जाता........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी किताबों पर और क़लम पर और बढ़िया सादे क़ागज़ के कटे हुए दस्तों पर और नोटबुकों पर भी वह अंधेरा जमने लगा। जिस संभावना के आरंभ और पुष्टि के लिये ये सब चीज़े थी वही झूठी पड़ती जाती थी। वह वातावरण ही झूठा पड़ता जा रहा था जिसमें फिसलती हुई चीज़े रुक जाती हैं। पास सरक आती हैं और मोती की तरह एक क्षण में  हथेली पर चमचमा उठती हैं।&lt;br /&gt;इसी आलम में एक दिन मैंने पाया कि मेरी स्टडी में वह टेबल लैम्प रखा था। मेरी स्टडी ऊपर छत पर है,....छत के ही एक भाग को ईंट की दीवार खड़ी करके स्टडी के कमरे का रूप दे दिया गया है। उसमें एक खिड़की है...........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने खिड़की खोल दी। उससे आकाश का सिर्फ़ एक छोटा सा टुकड़ा दिखाई पड़ता था। मैंने टुकड़े के मुँह में तारे भरे थे। मैंने हाथ बढ़ाकर स्विच ऑन कर दिया --टेबल लैम्प के हरे टोपे के नीचे रखी हुई किताबें और सादे क़ाग़ज़ प्रकाश की एक गोल परिधी में घिर गए। कमरे की दीवारों पर टोपे से छनता प्रकाश बिखर गया।.........&lt;br /&gt;(समाप्त)&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मलयज की डायरी, भाग-२ से साभार&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-35307596712207276?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/35307596712207276/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=35307596712207276' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/35307596712207276'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/35307596712207276'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/11/blog-post_24.html' title='पर चूंकि प्रेम को मैं...(का अन्तिम अंश)'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SwssbCDS_GI/AAAAAAAAAHA/bgzKXGfFzoQ/s72-c/Image0321.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2698718580841648748</id><published>2009-11-22T18:34:00.004+05:30</published><updated>2009-11-23T12:15:59.159+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मलयज'/><title type='text'>पर चूँकि प्रेम को मै एक सम्भावना मानता हूँ,....</title><content type='html'>मैंने प्रेम के बारे में बहुत कुछ सुना है। कि वह दो आत्माओं को मिलाता है। कि वह व्यक्ति को ऊँचा उठाता है। उसके जीवन के अँधेरे को दूर कर उसे जीने का सम्बल देता है। मैंने प्रेम से केवल इतना ही चाहा था कि वह मुझे निठल्ला न रहने दे। कि वह मेरे इस दूसरे ीवन वाले मैदान में आए और मैं निठल्ला न रहूँ। अपने नाखून न चबाता रहूँ, उससे झगडूँ, उसे ललकारूं कि वह अपनी ज्वाला प्रगट करे और मुझे जलाए। मैं उससे सिर फुट्टोवल करूं और मेरे शरीर से रक्त की बूँद गिरे। मैं कुछ भी करूँ, अपने सामने, अपनी इन जिग्यासाओं  और प्रश्नों के सामने निठल्ला न रहूँ, अकेला न रहूँ.....कोई तो दूजा हो।&lt;br /&gt;किन्तु जब मैंने उस दरवाज़े की मूठ पर हाथ रखा जो इस दूसरे जीवन और पहले जीवन के बीच स्थित है और उस दूसरे जीवन की एक झलक अपनी प्रेमिका को देनी चाही तो वह इस पहले वाले जीवन से भी दूर भागने लगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद मैंने इस काम के लिए गलत क्षण का चुनाव किया था।........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं, मैं ये मानने को तैयार नहीं कि मेरे जैसा आदमी प्रेम के योग्य नहीं। मैंने प्रेम को एक संभावना के रूप में लिया था बल्कि एक संभावना को मन में पालकर ही मैं प्रेम की ओर बढ़ा था- क्या यह बात यह नहीं सिद्ध करती कि मेरे जैसा व्यक्ति भी प्रेम कर सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कम से कम उस वक़्त मैंने ऐसा ही समझा था उस वक़्त जब मेरी प्रेमिका मुझसे रूठ कर चली गयी थी। खफा मैं इसलिये कह रहा हूँ कि हालाँकि मैं नहीं जानता था कि अब उसके मन में मेरे लिये क्या है पर चूँकि प्रेम को मैं एक संभावना के रूप में ही लेता रहा था अतः ‍मैं जानता था कि वह मेरे पास फिर आएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह बहुत दिनों तक नहीं आई ..........&lt;br /&gt;(to be continue)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मलयज की डायरी-२ से उद्धृत&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2698718580841648748?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/2698718580841648748/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=2698718580841648748' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2698718580841648748'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2698718580841648748'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/11/blog-post_8195.html' title='पर चूँकि प्रेम को मै एक सम्भावना मानता हूँ,....'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-5437264254668974571</id><published>2009-11-22T11:56:00.001+05:30</published><updated>2009-11-22T12:06:58.516+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>यहाँ मकानों की बुलंदी आदमी की.....</title><content type='html'>सर्दी शुरू हो रही है &lt;br /&gt;लोगों की बाहें बंधने लगीं है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहें घर जाकर खुल जाती है &lt;br /&gt;वहां गर्मी है या कहूं &lt;br /&gt;उसका एहसास है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन वहां घर नहीं है &lt;br /&gt;बल्कि उसकी आस है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहों के खुलने से रिश्ते टूट जाते है &lt;br /&gt;घरवाले घर के बाहर खुश है &lt;br /&gt;घर आकर रूठ जाते है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब वो घर नहीं &lt;br /&gt;जहां सर्दी जगह बना ले &lt;br /&gt;यहाँ मकानों की बुलंदी &lt;br /&gt;आदमी की तरह &lt;br /&gt;गर्मी को भी पैदा करती है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए लोगों की बंधी बाहें &lt;br /&gt;घर जाके खुल जाती है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-5437264254668974571?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/5437264254668974571/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=5437264254668974571' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5437264254668974571'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5437264254668974571'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/11/blog-post_22.html' title='यहाँ मकानों की बुलंदी आदमी की.....'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2672801640422610319</id><published>2009-11-10T15:51:00.004+05:30</published><updated>2009-11-10T16:10:44.093+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राज ठाकरे'/><title type='text'>भाषा थोपी नही जाती, अपनाई जाती है क्या ये बताना पड़ेगा?</title><content type='html'>महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ उसे सबसे ज्यादा शर्मनाक कहना तो बेवकूफी ही होगी क्योंकि हम इससे पहले भी देश की संसद में इस तरह की रिहर्सल देख चुके हैं। और फिर मनसे तो इन कामों के लिये कुख्यात रहा है&lt;br /&gt;जिस भाषा के सवाल की आड़ लेकर ये सब झमेला किया गया है क्या मनसे को इतना भी नहीं पता की भाषा थोपने की नहीं अपनाने की तहज़ीब है। हमारा मानना है उसे ये नहीं पता क्योंकि राजनीति के झीने पर्दे में भाषा थोपने की चीज़ ही मालूम होती है। आज के जनसत्ता में कार्टूनिस्ट इरफान ने बड़ा ही सार्थक कार्टून इन मनसे कार्यकर्ताओ की गतिविधियों और भारतमाता(हिन्दी को मदरटंग कहे जाने को लेकर)  की स्थिति पर बनाया है। जिसमें उन्होंने लिखा है कि 'माँ को तो छोड़ देते'।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान परिस्थितियों ने जहाँ इतनी सारी चीज़ों में फेरबदल किया है वहीं कहावतो के संदर्भ और अर्थो में भी बदलाव कर दिया है। पहले कहा जाता था प्यार और जंग में सब जायज़ है। पर अब क्योंकि प्यार और जंग राजनीति के पहलू हो गए है सो दर्शाया ये जाता है कि राजनीति में सब जायज़ है फिर क्या भाषा और क्या माता, सबके चिथड़े उधेड़ने से इन्हें कोई गुरेज नहीं हैं। जिन साहब ने आज़मी साहब के मुँह पर भरी विधानसभा में तमाचा जड़ा उनकी शख्सियत उनका व्यक्तित्व कहीं से भी विधायक का नहीं लगता साहब साउथ इंडियन फिल्म के विलेन से कम नहीं लगते। मनसे विधायक राम कदम ने तो सिर्फ आज़मी साहब के मुँह पर तमाचा मारा, मनसे के ही विधायक शिशिर शिंदे तो अपनी विधानसभा से बर्खास्तगी पर यहाँ तक कह गए कि..  'मेर सामने  इंदिरा गाँधी का उदाहरण है। उन्हें भी बहुमत ने संसद से निलंबित कर दिया था लेकिन उन्होंने भारतीयों के दिलों पर राज किया।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझ नहीं आता ये लोग चाहत भारतीयों पर राज की रखते है लेकिन बात 'मराठी मानुष' की करते हैं ये सब क्या है कुछ समझ नहीं आता। ये राजनीति के ढ़कोसले अब बर्दाश्त नहीं होते लेकिन इनका किया भी क्या जाए ये आतंकवादी नहीं है लेकिन आतंक से भी बड़े वाद के जन्मदाता है महाराष्ट्र की जनता ने इन्हें जिताया है जब देश की जनता ऐसा फैसला लेगी तो हम किसका मुँह ताकेंगे .....क्योंकि कम से कम आज की स्थिति तो यही है.। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुना है विधायको के निलंबन के खिलाफ राज ठाकरे विरोध प्रदर्शन की योजना बना रहे है ...... देखिये-देखिये अभी और ड्रामा देखिये.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2672801640422610319?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/2672801640422610319/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=2672801640422610319' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2672801640422610319'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2672801640422610319'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/11/blog-post_10.html' title='भाषा थोपी नही जाती, अपनाई जाती है क्या ये बताना पड़ेगा?'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2983082623577169629</id><published>2009-11-07T22:13:00.003+05:30</published><updated>2009-11-07T22:22:36.780+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मलयज'/><title type='text'>दुनिया है एक बुढ़िया का यहाँ से वहाँ जाना.....</title><content type='html'>&lt;p&gt;१७सितंबर,१९६३&lt;/p&gt;&lt;p&gt;दुनिया है एक बुढ़िया का यहाँ से वहाँ जाना.....&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नाखून काटना और ठिठककर खड़े रहना कि पॉकेट से रूमाल पर रूमाल निकलने लगेंगे, मुँह से चूज़े निकल-निकलकर फुर्र उड़ने लगेंगे।....&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समय जब चुपके से तुम्हारे पास आकर कहे, 'लो, मैं तुम्हारा हूँ', तब समझ लो कि तुम अकेले हो गए।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;उम्र का आना महीन बर्फ का गिरना। हरियाली कब छुप गई पता ही न चला।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मलयज की डायरी-२, (संपा-नामवर सिंह) से उद्धृत&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2983082623577169629?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/2983082623577169629/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=2983082623577169629' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2983082623577169629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2983082623577169629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/11/blog-post_7335.html' title='दुनिया है एक बुढ़िया का यहाँ से वहाँ जाना.....'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-1026816123982049400</id><published>2009-11-07T11:17:00.010+05:30</published><updated>2009-11-07T12:27:07.978+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाजवादी बिरादरी'/><title type='text'>समाजवादी बिरादरी की चिंता और बढ़ गई है..</title><content type='html'>सचिन के पौने दो सौ रन बनाने के बाद भी जीतती हुई इंडिया हार जाएगी, सोचा न था। और इस दुखद खबर &lt;span class=""&gt;के&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SvUNFAh8D-I/AAAAAAAAAFo/jbEX6be5JQ8/s1600-h/prabhsh+joshi+jpg.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; बाद रविवार को जनसत्ता के कॉलम से सुकून मिलने की जो उम्मीद थी वो भी यूँ चली जाएगी &lt;span class=""&gt;ये &lt;/span&gt;तो बिल्कुल ना सोचा था। &lt;span class=""&gt;यूँ&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SvUOSzvCgGI/AAAAAAAAAFw/Nu_N6uH_Nvc/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5401239044388716642" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SvUOSzvCgGI/AAAAAAAAAFw/Nu_N6uH_Nvc/s200/untitled.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; तो सचिन अपना मिथ खुद गढ़ते है और खुद ही कुछ समय बाद उसे तोड़ &lt;span class=""&gt;देते&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SvUTHN-sD1I/AAAAAAAAAGA/1L1EXZwfKKY/s1600-h/prabhsh+joshi+jpg.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5401244342833385298" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 95px; CURSOR: hand; HEIGHT: 111px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SvUTHN-sD1I/AAAAAAAAAGA/1L1EXZwfKKY/s400/prabhsh%2Bjoshi%2Bjpg.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; है लेकिन इस मिथ को गढ़ने में जिन लोगों ने भूमिका निभाई उसमें सबसे अहम रोल प्रभाष जोशी ने अदा किया संभवत् इसलिये हमें हार की चोट पर जोशी जी के रविवार को जनसत्ता में आने वाले लेख की उम्मीद थी वो हमारे लिये इस चोट से उबरने का मरहम था क्योंकि वो अक्सर सचिन की ऐसी पारियों पर लेख लिखा करते थे खुद सचिन को भी उनके आकस्मिक देहांत से गहरा दुख हुआ है चूंकि उनकी टिप्पणियाँ सचिन की हौसला अफज़ाई करतीं थीं। जोशी जी के जाने से न केवल सचिन की अपितु उस पूरी समाजवादी बिरादरी की चिंता और बढ़ गई है जिसकी कप्तानी में उसने अपने आप को अब तक जिलाये रखा था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;समाजवादी राजनीति का जो हश्र हुआ वो हमसे छिपा नहीं है और चिंतन तो लोहिया के बाद लगभग &lt;span class=""&gt;समाप्तप्रा&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SvUMjqh18cI/AAAAAAAAAFg/Xt04i5fu8RM/s1600-h/image003.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5401237134951969218" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 185px; CURSOR: hand; HEIGHT: 282px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SvUMjqh18cI/AAAAAAAAAFg/Xt04i5fu8RM/s320/image003.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;य&lt;/span&gt; हैं। पञकारिता में प्रभाष जोशी, राजकिशोर, कुलदीप नैयर सरीखे लोगों ने इसे अब तक क़ायम रखा है, इस तिगड़ी में से एक हमें छोड़ चली हैं समाजवादियों में ये स्तब्धता हमें लोहिया के जाने के बाद अब देखने को मिली है उन्हें चिंता हो चली हैं अपनी...........अपने चिंतन की, अपनी विचारधारा की। जो होनी भी चाहिये। लेकिन हमें लगता है कि चिंता से ज़्यादा हमें इस बात की फिक्र करने की &lt;span class=""&gt;ज़रूरत&lt;/span&gt; है कि जो लीक हंमें गणेशशंकर विद्यार्थी, राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी ने दी है, हमें उस पर सिर्फ़ चलना हैं या उनकी लीक पर एक नींव बना उस पर पञकारिता की एक ऐसी मिसाल क़ायम करनी हैं जो उन चैनलों की तथाकथित घोषणाओं से अलग हो जो सबसे तेज, सबसे पहले, सच की तह तक, जैसी बातें करते हैं और जिनकी सोच न्यूज़ चैनलों की टी.आर.पी के खेल तक टिकी होती है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;खैर ये इन बातों का वक़्त नहीं है। वक़्त हैं कि हमारी पञकार बिरादरी (प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक) प्रभाष जोशी की सांप्रदायिकता विरोधी पञकारिता के सपने को आगे ले जाए ताकि सांप्रदायिक ताक़तें- सांप्रदायिक राजनीति और उसके ठेकेदार इस पेशे में अपनी पैठ न बना पाए हमारी सारी कोशिश इसीके लिए होनी चाहिये यही उन्हें हमारी ओर से दी गई सच्ची श्रद्धांजली होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-1026816123982049400?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/1026816123982049400/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=1026816123982049400' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1026816123982049400'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1026816123982049400'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/11/blog-post_07.html' title='समाजवादी बिरादरी की चिंता और बढ़ गई है..'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SvUOSzvCgGI/AAAAAAAAAFw/Nu_N6uH_Nvc/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2258356427375683362</id><published>2009-11-02T22:27:00.003+05:30</published><updated>2009-11-02T22:57:05.355+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मलयज'/><title type='text'>तुम दुनिया हो, जिसके कोई चेहरा नहीं होता...</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;01-01-196१&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम दुनिया हो। जिसके कोई चेहरा नहीं होता, धुँधली, चटख और मद्धिम पृष्टभूमि के बीच से झाँकता हुआ, अपने 'होने' के अहसास से चमकता हुआ चेहरा....&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम में वह व्यक्तित्व बोध नहीं है, जो तुम्हें इस घर की आत्मा से जोड़े.......तुम इस घर को कभी महसूस नहीं कर सकतीं, तुम दुनिया हो जिसके कोई चेहरा नहीं होता.......&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम इसे कभी महसूस नहीं कर पाओगी। क्योंकि तुम दुनिया हो और दुनिया चेहरे नहीं देखती, केवल शोर सुनती है, जितना ही चटख शोर होगा उतना ही वह आकर्षक होगी.......और वह शोर में ही डूब जाती है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम मेरे लिए डूब गयी हो.....&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;यह कैसा नया वर्ष है जो आज पहले ही दिन अवसाद बनकर मन पर छाता जा रहा है, भीतर तक गड़ता जा रहा है और एक निरर्थकता की भावना मुझे दबोचती जा रही है।......&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक नाम है जो रह-रहकर हवा में उछाल दिया जाता है और नेज़े की तरह मन में चुभ जाता है।जब मैं बहुत-बहुत दुखी होता हूँ तब कितने अपने लगते हो, मेरे शहर। इस छोटे से दिल में बहुत पीड़ा होती है और बहुत से थमे हुए ठिठुरे हुए आँसू, अब तुम कितने अच्छे लगते हो, मेरे शहर।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपने और तुम्हारे बीच एक लकीर सी खींच दी है। एक गहरी लकीर। कभी-कभी लगता है संसार की जितनी सुंदर वस्तुएँ हैं सबके बीच वह लकीर उभर आई है-- सो दृश्य और सारे चिञों को वह लकीर काट रही है..... मन कैसा-कैसा होने लगता है। वह लकीर पसीजने लगती है, पर मिटती नही, कभी नहीं मिटती.....&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;strong&gt;सन्दर्भ:-&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;em&gt;मलयज की डायरी-२(संपा, नामवर सिंह )संस्करण २०००;वाणी प्रकाशन;दिल्ली-०२&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2258356427375683362?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/2258356427375683362/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=2258356427375683362' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2258356427375683362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2258356427375683362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/11/blog-post_02.html' title='तुम दुनिया हो, जिसके कोई चेहरा नहीं होता...'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-5033062252766698564</id><published>2009-11-01T12:43:00.009+05:30</published><updated>2009-11-01T18:57:31.841+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गाँधी परिवार'/><title type='text'>वाकई वो बहुत दुखद समय था...</title><content type='html'>मेरे घर के बराबर में एक छोटी सी पार्कनुमा जगह है जहाँ अक्सर अंकल जी टाइप कुछ लोग बैठे मिलते है वो अक्सर समसामयिक मुद्दों पर बात करने के लिए लालायित रहते हैं और अगर उन्हें कोई ऐसा बन्दा मिल जाए जो थोड़ा बहुत पढ़-लिख रहा हो और उनके पास कम बैठता हो तो वो ऐसे मौके को गँवाये बिना उसे अपने पास बुला लेते है और सुबह पढ़े गए अखबारो की भड़ास उस पर निकालते हैं मैं ये बात जानता था लेकिन तब भी उनके पास बैठना मुझे अच्छा लगता था क्योंकि वो बहुत भावुक थे और उनकी भावुकता में एक ईमानदारी थी जिसका मैं हमेशा से क़ायल रहा हूँ (आप- कुछ घायल भी कह सकते हैं) खैर तो कल भी यही हुआ मैं किसी काम से निकल रहा था और उन्होंने आवाज़ दी मैंने अनसुना किया उन्होंने फिर दोहराया और फिर वही........ मैं अपने आप को नहीं रोक सका। बाते चलीं-- डी.टी.सी. की किराया वृद्धि, जयपुर में लगी आग, खजूरी वाला केस......................, और क्या चल रहा है जैसे बातों से होकर।&lt;br /&gt;यक-ब-यक मुद्दा पच्चीस साल पहले चला गया। तुम्हें पता है पच्चीस साल पहले क्या हुआ था? मुझे वल्ड कप का ख्याल आया और मेरी आँखों में कपिल देव की वल्ड कप उठाए तस्वीर घूम गयी लेकिन मैं चुप रहा क्योंकि उनके इस प्रश्न में खुशी नहीं एक दुख-सा कुछ दिख रहा था। कुछ सैकेंड एक अजब सी खामोशी पसर गयी थी जैसे वो मेरे जवाब &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/Su01tJxG-fI/AAAAAAAAAFI/vvWoYCBxs54/s1600-h/indiraghanditime.jpg"&gt;&lt;/a&gt;का इंतज़ार कर रहे हों और मैं उनके। आज ही के दिन इंदिरा की हत्या हुई थी उन्होंने इंदिरा ऐसे कहा जैसे वो उनके घर की कोई सदस्या हो जिससे उन्हें गहरा &lt;span class=""&gt;लगाव&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/Su05TZa6ZFI/AAAAAAAAAFQ/iBWVVlJEqok/s1600-h/indiraghanditime.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5399034533691155538" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 152px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/Su05TZa6ZFI/AAAAAAAAAFQ/iBWVVlJEqok/s200/indiraghanditime.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; रहा हो। कोई माननीय जैसा संबोधन नहीं।------ क्यों? मेरे मन में ये सवाल उठ रहा था। मैं चुप रहा आज में उनसे बहस नहीं करना चाहता था। फिर एकाएक एक दूसरे अंकल जी ने कहा बेटा हमारे लिये तो भगवान थी वो। अब में चुप नहीं रह पाया मैंने कहा अंकल जी उन्होंने इमरजेंसी लगवाई, अपने बेटे को नसबंदी का निरंकुश अधिकार दे दिया ......वो सब ठीक है पर तुझे पता है जहाँ आज तू बैठा है जहाँ तू रहता हैं वो सब उसी की बदौलत हैं। मैंने ऐसा कुछ अपने पापा से पहले भी सुन रखा था। पता है हम लोग पदम नगर, जहां तेरी वो हिंदी वाली...क्या कहते हैं &lt;span class=""&gt;उसे&lt;/span&gt;, वो जो अंधा मुगल के पास है(हिंदी अकादमी-मैंने कहा) हां वही, तुझे पता है अशोक(मेरे पापा) अंधा मुगल में ही पढ़ता था वहीं हम सबकी झुग्गियाँ थीं सब गरीबी हटाओ के नाम पर गरीबों को हटा रहे थे लेकिन उसने हमें पच्चीस-पच्चीस ग़ज़ के मकान दिये जहाँ आज हम रहते हैं और ये जो मंगोल पुरी. जहाँगीर पुरी, सुल्तान पुरी नंद नगरी जैसी कॉलोनियाँ आज हैं ये सब उसी की देन हैं तभी तो यहाँ से कॉग्रेस ही ज्यादातर जीतती &lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/Su0-T2UB_oI/AAAAAAAAAFY/4JEsj0HAR90/s1600-h/pun.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5399040039005060738" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 270px; CURSOR: hand; HEIGHT: 195px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/Su0-T2UB_oI/AAAAAAAAAFY/4JEsj0HAR90/s320/pun.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;हैं।&lt;/span&gt; मैंने कहा- हत्या के बाद इतने लोगों को मार देना और दंगे की आड़ में अपनी हवस पूरी करना। क्या ये बहुत शाबाशी का काम था? क्या आप जैसे कई लोग उनमें शरीक़ नहीं थे .... ? नहीं नहीं, इसका मतलब तुम हक़ीक़त से वाकिफ नहीं हो तुम्हें पता है हम लोगों ने कई सिक्खों को अपने घरों में जगह दी थी उनसे हमारी आज भी मुलाक़ात होती है उन लोगों ने अपने बाल तक कटवा लिये थे उस दौरान.। बड़ा खतरनाक संमय था वो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;दरअसल&lt;/span&gt; यहाँ से सटे बोर्डर के इलाकों में ये कांड ज़्यादा हुआ था और ये जो बोर्डर के लोग रईस बने बैठें हैं ना आज इनमें बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने सिक्खों को मारकर उनकी ज़मीनें हथिया ली थीं। जिनके वे आज मालिक हैं। वाकई बहुत डरावना समय था वो। तेरे पापा तो मरते-मरते बचे थे उस दिन। हुआ यो कि अशोक सुबह छ बजे घर से निकलता और देर रात घर लौटता था उस वक्त। जिस दिन इंदिरा मरी उस दिन इस खबर को राजीव गाँधी के बंगाल से दिल्ली लौटने तक दबाये रखा गया। देर शाम इंदिरा के मरने की खबर रेडिया पर आई तब अशोक पैरिस ब्यूटी(करोल बाग़) में था उसे ये खबर नही मिली थी उन दिनो वजीराबाद का इलाका ऐसा नहीं था जैसा आज हैं वहाँ सुनसान रहता था आबादी के नाम पर परिंदा भी नहीं। खजूरी, भजनपुरा, यमुना विहार सिंगल रोड़। रोड़ के दोनो ओर बड़े-बड़े खाईनुमा गड्ढे़। रात ग्यारह-बारह का समय। वो लौट रहा था शोर्ट कट के लिये उसने खेतों का रास्ता चुना तभी एक आदमी से खबर लगी इंदिरा को मार दिया और साथ ही दंगो की भी खबर लगी वो किस तरह से घर लौटा ये तुम उससे ही पूछना........बड़ा दुखद समय था वो।ये सब उसी ने हमें बताया था। सबके चेहरे पर वही खामोशी फिर से....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ये लोग समसामयिक मुद्दों पर सरकार की बखिया उधेड़ने वाले, अभी कल ही तो डी.टी.सी के रेट बढ़ने पर कॉग्रेस को गालियाँ दे रहे थे। ये पच्चीस साल पहले कहाँ चले गए। लेकिन सच उनकी भावुकता में एक ईमानदारी थी जिसमें ये सवाल भी था कि आज कॉग्रेस के चुनावी पोस्टरों में सोनिया,राजीव तो दिख जाएंगे इंदिरा गाँधी कहाँ ग़ुम हो जाती है। चलो बेटा तुम काम करो हमने &lt;span class=""&gt;खा&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/Su01OigqOUI/AAAAAAAAAFA/JPfS80YR5ps/s1600-h/Mark+Tully.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5399030052185323842" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 198px; CURSOR: hand; HEIGHT: 179px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_D45homK4304/Su01OigqOUI/AAAAAAAAAFA/JPfS80YR5ps/s320/Mark+Tully.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;मखाँ&lt;/span&gt; तुम्हारा टाइम ले लिया जाओ पढ़ाई करो ..............बड़ा ही लायक बच्चा है.............मेरे चल देने पर किसी ने धीरे से कहा। खैर &lt;span class=""&gt;उनकी&lt;/span&gt; बातों ने मुझमें भी उस दौर को समझने के लिये इच्छा जगा दी थी। सो, नेट पर बी. बी.सी खोला और वहाँ सतीश जैकब और आनंद सहाय का ऑडियो सुना(सतीश जैकब वही रिपोर्टर है जिन्होंने बी.बी.सी को सबसे पहले ये खबर दी थी) , मार्क टली, शेषाद्री चारी, सुमित चक्रवर्ती के बीबीसी में और रामचन्द्र गुहा का दैनिक भास्कर में छपा लेख पढा; लगा उस दौर की सच्ची रिपोर्टिंग तो यही लोग कर रहें है जो गली-मोहल्लों में उस अनुभव की बदहवासी को अपने सीने में अब तक दफन किये हुए हैं वो बताना चाहते हैं लेकिन हमारे पास सुनने का समय ही नही हैं। सच.............&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-5033062252766698564?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/5033062252766698564/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=5033062252766698564' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5033062252766698564'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5033062252766698564'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='वाकई वो बहुत दुखद समय था...'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/Su05TZa6ZFI/AAAAAAAAAFQ/iBWVVlJEqok/s72-c/indiraghanditime.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-7408105437030871912</id><published>2009-10-27T23:11:00.005+05:30</published><updated>2009-10-28T09:52:58.757+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी दिल्ली मै ही संवारूं'/><title type='text'>शीला सरकार के लिए .................</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;यूं&lt;/span&gt; तो डी.टी.सी के किराये में वृद्धि के मामले में मै कुछ लिखना नहीं चाह रहा था क्योंकि कल रात से यही सब तो पङतासुनता आ रहा हूँ सुबह जब अखबार खोला तो उसमे भी............वही सब &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;खैर जब &lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SufBjPdUMCI/AAAAAAAAAEI/jrStK0R-54o/s1600-h/1208360909752_DTC-bus-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5397495489615900706" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 135px; CURSOR: hand; HEIGHT: 107px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SufBjPdUMCI/AAAAAAAAAEI/jrStK0R-54o/s320/1208360909752_DTC-bus-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;फैकल्टी&lt;/span&gt; पहुंचा तो देखा कुछ स्टुडेंट शीला दीक्षित का पुतला बना रहे थे और शायद कैम्पस में जलाने की रिहर्सल कर रहे थे मन में कई सवाल उठे ये मुक्तिबोधी क्रांति आज कहाँ तक सही है या ये भी बिना किसी पूछताछ के आधी जिंदगी गफलत में और आधी शैया पर खांसते दम तोड़ते बिताएगी. ये सब क्या है? &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कैम्पस में पहुँचने से पहले बस में भी इसी तरह की क्रांतिधर्मिता की बातें चल रही थी ये वही लोग थे जिन्हें अक्सर मैंने बिना टिकट के यात्रा करते देखा है खैर मै वही सब बातें दोहरा रहा हूँ जो आप भी कल से पढ़ते-देखते बोर हो गए होंगे( &lt;span class=""&gt;हलाँकि &lt;/span&gt;क्रांतिधर्मिता वाली बात पर आपका ऑब्जेक्ट करना स्वाभाविक है) &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दरअसल मुद्दा-ए-बहस ये &lt;span class=""&gt;है &lt;/span&gt;कि दिल्ली सरकार ने परिवहन में सालों से होते आ रहे आपने घाटों की एवेज में दिल्ली के यात्रीगणों पर कुछ किराया ठोका है इतना ही नहीं हम स्टूडेंट्स के बस पास को भी साढ़े बारह रूपए से बढा कर १०० रूपए कर दिया गया है पहले ५ महीने के हम ७५ रूपए देते थे अब हमें ५०० रूपए देने होंगे हालांकि अगर मै सरकार की नज़र से और दिन ब दिन बढती महगाई की नज़र से देखू और अन्य राज्यों के किराये से तुलना करू तो मुझे शायद कोई दिक्कत न हो लेकिन जब मै ७५ से सीधा ५०० और ७ का १० और १० का १५ होते देखता हूँ या फिर उन लोगो के बारे में सोचता हूँ जो हमेशा किराया लेकर ही सफ़र करते है तो थोडा दुखी हो जाता हूँ लेकिन तब भी कहूँगा कि बाकी काम करने &lt;span class=""&gt;की &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;जगह &lt;/span&gt;अगर हम ये सोचे की ऐसी नोबत आई क्यों?..................जब हम ये सोचते है तो हमें ९५ फीसदी गलतीसरकार की दिखती है.......... &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;क्यों?............... का जवाब तो यही है कि हम सब जानते है कि स्टुडेंट के पास का ये चार्ज जो हम अब तक अदा करते आ रहे थे ४० से भी ज्यादा साल पुराना है क्या सरकार कि यह नीति नहीं होनी चाहिए थी कि वो थोडा थोडा करके साल दर साल इसे बढाती ताकि हम भी खुश होते और सरकार तो ज़ाहिर है खुश...........खैर सरकार ने ऐसा नहीं किया और किराया बढाने का ये फैसला भी ३-४ राज्यों में चुनाव हो जाने के बाद लिया गया ज़ाहिर है पॉलिटिक्स की भूमिका और अगले साल होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की हड़बड़ी में ये सब फैसले लिए गए है इससे हमें कोई एतराज़ नहीं होना चाहिए ये तो होना ही था खैर ये तो रही स्टुडेंट के पास की बात अब हम किराये पर आते है मैंने पहले भी कहा जो लोग बिना टिकट के सफ़र करते है उनके लिए आप चाहे किराया १० ले १५ ले या फिर ५० कर दें उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी दिक्कत उन्हें ही होगी जो ईमानदारी से सफ़र करने में विश्वास रखते है और वही लोग किराया वृद्धि का विरोध भी कर रहे है इसमें हमारी आइसा के कुछ भाई लोग भी है ज़ाहिर है इनमे निम्न-मध्य वर्ग के लोग सबसे ज्यादा है तो क्या ये समझा जाये की दिल्ली सरकार नहीं चाहती की वे ईमानदार बने रहे सरकार को ये पता होना चाहिए कि यही वे लोग है जो पर्सनल की जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफ़र करते है अगर सरकार ने अपने इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया तो बड़े दुःख की बात है की उन्हें अपने अपने पर्सनल वेहिकल सडको पर उतारने पड़ेंगे जिसकी एवेज में सरकार को न जाने कितने बी.आर.टी. और फ्लाई ओवर बनवाने पड़ सकते है जिसमे वो पहले ही करोडो रूपए लगा चुकी है उसे इस बारे में दोबारा सोचना चाहिए अगर वो अपने फैसले पर अटल रही तो मुझे लगता है की वो उन लोगो के साथ ही खिलवाड़ करेगी जो इस सरकार के साथ ईमानदार है टैक्स देते है और शीला दीक्षित सरकार में अपना विश्वास दिखाते है उसे हैट्रिक बनाने में मदद करते है उसे अपने इन नागरिको के बारे में ज़रूर सोचना होगा और हाँ कम से कम अपने घाटों का ठीकरा तो उनके सर पे फोड़ना सरकार को बिलकुल भी शोभा नहीं देता अगर उसे तब भी लगता है की घाटों को पूरा करने के लिए किराया बढ़ाना ही पड़ेगा तो एकदम न बढाकर साल-दर-साल कुछ-कुछ बढा देना चाहिए जैसे पहले २ रूपए वाली टिकट को बढा कर ३ रूपए कर दिया गया था जिसे लोगों ने कोई &lt;span class=""&gt;खा&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SufEUV2SYsI/AAAAAAAAAEQ/CQJg56OgAoM/s1600-h/2007071158700301.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5397498532168098498" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 126px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SufEUV2SYsI/AAAAAAAAAEQ/CQJg56OgAoM/s200/2007071158700301.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;स&lt;/span&gt; तवज्जो नहीं दी थी बहरहाल ............बात सिर्फ इतनी है कि सरकार को अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए और एकदम से किराया बढाने की अपनी नीति को छोड़ देना चाहिए नहीं तो अभी ज्यादा दिन नहीं बीते प्याज ने एक सरकार को इस हद तक बर्बाद कर दिया कि आज तक भी दिल्ली में वो अपनी जड़े दोबारा ज़माने में संघर्ष करती दीखती है उम्मीद है शीला सरकार इस मामले में सचेत होगी .वर्ना हम स्टूडेंट्स का क्या है वैसे भी यूनिवर्सिटी में डूसू- दूसा की हड़ताल से पढाई ठप्प ही रहती है हम समझ लेंगे की कुछ दिन दिल्ली सरकार के लिए सही ............ पर सच कहें हम स्टूडेंट्स अपना ध्यान पोस्टर-बाज़ी और पुतले बनाने या फूँकने में नहीं लगाना चाहते हम पढना चाहते है इसलिए मेरी दुबारा गुजारिश है कि सरकार इस बारे में सोचे .......... आशा है वो ज़रूर सोचेगी और सोचना ये नहीं कि ५ बढा कर एक कम कर दिया ..........हम सरकार से इस ओर सकारात्मक रुख कि उम्मीद लगाये हुए है &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-7408105437030871912?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/7408105437030871912/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=7408105437030871912' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7408105437030871912'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7408105437030871912'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/10/blog-post_27.html' title='शीला सरकार के लिए .................'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SufBjPdUMCI/AAAAAAAAAEI/jrStK0R-54o/s72-c/1208360909752_DTC-bus-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-7758326748653291318</id><published>2009-10-15T22:06:00.005+05:30</published><updated>2009-10-15T22:15:32.151+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>'दिवाली मुबारक हो'</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/StdQIteLcoI/AAAAAAAAADc/uYiy83Ebpmk/s1600-h/DiwaliLight.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5392867189374808706" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 275px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/StdQIteLcoI/AAAAAAAAADc/uYiy83Ebpmk/s320/DiwaliLight.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;कल दीपावली है&lt;br /&gt;कुछ लोग&lt;br /&gt;पटाखे जलाएंगे&lt;br /&gt;कुछ लोग&lt;br /&gt;दिल ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक तबका वो होगा&lt;br /&gt;जिसके बंग्लो और कोठियो पर&lt;br /&gt;लड़ियों की जगमगाहट होगी&lt;br /&gt;कीमती मोमबत्तियाँ और दिये जलेंगे&lt;br /&gt;और एक वो&lt;br /&gt;जहाँ शायद चूल्हा भी ना जले। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;शराब की&lt;br /&gt;सप्लाई के साथ डिमांड भी बढ़ जाएगी&lt;br /&gt;जुआरियों के लिए&lt;br /&gt;जश्न का दिन होगा कल&lt;br /&gt;ना जाने कितनो की दिवाली होगी&lt;br /&gt;और कितनो का दिवाला निकलेगा । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;घरों में&lt;br /&gt;लक्ष्मी की पूजा होगी&lt;br /&gt;लेकिन बाहर लक्ष्मी,&lt;br /&gt;लक्ष्मी की आस में&lt;br /&gt;लक्ष्मणरेखा पार कर रही होगी । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;ऐसे ही दिवाली मनेगी&lt;br /&gt;हर साल मनती है&lt;br /&gt;मैं पिछले कई सालों से&lt;br /&gt;यही देखता आया हूँ &lt;/p&gt;&lt;p&gt;'दिवाली मुबारक हो' के पोस्टर&lt;br /&gt;चौराहों पर चिपके मिलेंगे&lt;br /&gt;जिसमें बेगै़रत नेता&lt;br /&gt;बदसूरत छवि लिए&lt;br /&gt;हाथ जो़ड़े दिखेंगे ।&lt;br /&gt;जो इन्हीं पोस्टरों के पीछे से कहेंगे&lt;br /&gt;कि&lt;br /&gt;चाहे किसी के पास कुछ हो&lt;br /&gt;या ना हो&lt;br /&gt;भले ही किसी के घर में&lt;br /&gt;आग लगे-चोरी हो&lt;br /&gt;चाहे दिल्ली में कोई&lt;br /&gt;सुरक्षित हो या ना हो&lt;br /&gt;चाहे कहीं पर भी लोग मरें,   ब्लास्ट हो&lt;br /&gt;पर सभी को&lt;br /&gt;हमारी तरफ़ से&lt;br /&gt;'दिवाली मुबारक हो ।' &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;(पुन: प्रकाशित ) &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-7758326748653291318?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/7758326748653291318/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=7758326748653291318' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7758326748653291318'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7758326748653291318'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/10/blog-post_15.html' title='&apos;दिवाली मुबारक हो&apos;'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_D45homK4304/StdQIteLcoI/AAAAAAAAADc/uYiy83Ebpmk/s72-c/DiwaliLight.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-302808195518420592</id><published>2009-10-08T10:14:00.006+05:30</published><updated>2009-10-08T11:40:25.207+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>करण जौहर के लिए.......बधाई संदेश</title><content type='html'>&lt;p&gt;अब तो बहुत खुश होगे तुम &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बहुत अच्छा लग रहा होगा न तुम्हे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;राज ठाकरे के आगे नतमस्तक होके , &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हंसल मेहता की तरह अपमानित नहीं होना पड़ा न तुम्हे?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कालिख नहीं पुतवानी पड़ी न अपने मुँह पर?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बधाई हो। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;तुम्हे डर सता रहा होगा न?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;डर होगा &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कहीं जो हंसल मेहता के साथ हुआ &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वही तुम्हारे साथ भी न हो जाए। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;'दिल पे मत ले यार' की&lt;/span&gt; सीख देने वाले &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हंसल मेहता तो पागल थे या कहें बेवकूफ थे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;माफ़ी मांगने में आनाकानी जो कर रहे थे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;भूल गए थे की................'मुंबई किसकी है?'&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर बधाई हो तुमने याद रखा। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;सचमुच कितने बेवकूफ थे हंसल मेहता &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुँह पर कालिख पुतवा कर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सार्वजनिक रूप से अपमानित होकर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पिट-कर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अस्तित्व(जीवन) संकट होने पर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;उन्होंने माफ़ी मांगी। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सचमुच आज के समय में कितने बेवकूफ लगते है वो। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;लेकिन तुम कितने समझदार,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कितने प्रोफेशनल हो न ?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सीधे माफ़ी ही मांग ली ..........और &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;'सिड' को जगाने के &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लिए खुद आँखे 'मूंद' ली &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बधाई हो। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-302808195518420592?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/302808195518420592/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=302808195518420592' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/302808195518420592'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/302808195518420592'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/10/blog-post_08.html' title='करण जौहर के लिए.......बधाई संदेश'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6520309520224898370</id><published>2009-10-07T00:10:00.003+05:30</published><updated>2009-10-07T00:27:24.447+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी दिल्ली मै ही संवारूं'/><title type='text'>बी.आर.टी से बेहतर तो यही होगा की आप लोगों को सहूलियत दें ताकि लोग ख़ुद अपना निजी वाहन छोड़कर पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर करें  ...जैसी मेट्रो ने दी है.</title><content type='html'>खबर आई है कि शास्त्री पार्क से करावल नगर के बीच बी।आर।टी कोरिडोर का निर्माण किया जायेगा। बी.आर.टी कोरिडोर के सिलसिले में पहले ही अपनी फजीहत करवा चुकी शीला सरकार और बी.आर।टी के पहले और दूसरे चरण से भी सीख न लेते हुए सरकार का यह फैसला हमारी समझ से बाहर है. समझ नहीं आता कि कॉमन वेल्थ गेम्स कि हड़बड़ी में ये फैसले लिए जा रहे है या किसी खास तबके को इसका लाभ देने के लिए या फिर सिर्फ अपनी झोली भरने के लिए चूँकि हमें अभी तक भी इसका कोई फायदा नज़र आता नहीं दिख रहा है ये अच्छी बात है कि सरकार वाहनों को लेन में चलाना चाहती है पर ये बात समझ में नहीं आती कि ६०-७० फीट कि सड़क में वो कितनी लेन बना पायेगी क्या ये बात किसी भी लिहाज़ से ठीक मानी जा सकती है कि एक लेन पर तो जाम लगा हो और दूसरी लेने खाली हों? हम अभी भी ये नहीं कह रहे है कि सरकार कि सोच गलत है या बेमानी है लेकिन हाँ इतना कहने में भी संकोच नहीं किया जा सकता कि सरकार ये सभी फैसले हड़बड़ी में ले रही है वरना यदि वो वाकई इस 'ट्रेफिक जेम' कि समस्या से निजात पाना चाहती है तो इसके और भी कई सस्ते और टिकाऊ उपाय है कम से कम जितना पैसा कोरिडोर बनाने में सरकार खर्च करेगी उससे कम में इस समस्या से निजात पाई जा सकती है पिछले सालो में अपने काफी गलत फैसलों के बावजूद भी अगर ये सरकार दोबारा जनता का विश्वास जीतने में सफल रही तो इसमें उसके गलत फैसलों के साथ साथ कई सही फैसले भी शामिल थे इनमे से एक तो यही कि इस सरकार ने दिल्ली को सस्ते में ए।सी बसों कि सेवा मुहैया करवाई मुझे लगता है कि दिल्ली सरकार का जोर कोरिडोर बनाने कि जगह यदि ट्रेफिक को कम करने पर, दिल्ली में आये दिन बढ़ रहे निजी वाहनों कि संख्या में कमी करने पर यदि ज़्यादा हो तो इस तरह के विवादित कोरिडोर कि ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी संभवत इसी के लिए सरकार ने पहले कारपूल काम्पेग्न चलाया था जो पूरी तरह असफल रहा ज़ाहिरन तौर पर हर आदमी निजी वाहन चाहता है हालांकि उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि इससे क्या समस्या पैदा होती है या उसे क्या नुक्सान होता है।&lt;br /&gt;जबसे मेट्रो शुरू हुई है तबसे एक बात और साफ़ हुई है कि यहाँ ऐसे लोगो कि कमी भी नहीं है जिनका मानना है कि यदि उन्हें पब्लिक ट्रासपोर्ट में सहूलियत मिले तो वो अपनी कारें पार्किंग में खड़ी करने में बिलकुल भी नहीं सकुचाएंगे। इससे तो इस समस्या का एक ही हल हमारी नज़रों में दीखता है कि जितना पैसा सरकार बी.आर.टी पर लगाने को तैयार है उसमे से कुछ हिस्सा सिर्फ मेट्रो जैसे प्रोजेक्ट या फ़िर ए.सी बसिज़ पर अगर लगाये और दिल्ली वासियों को सुविधा दे तो वो खुद ही अपनी-अपनी कारें अपने घर पर छोड़ कर आये लेकिन शर्त यही कि सहूलियत पूरी तरह मिले जिस तरह से मेट्रो ने अमीर और गरीब को कार और बसों से निकाल एक लाइन में खडा कर दिया है. लड़कियों को बाहर निकलने कि आज़ादी या सुविधा दी है ट्रेफिक पर बोझ कम किया है उसके बरक्स बी.आर.टी तो इसका हल किसी भी हिसाब से हमें नहीं लगता और शास्त्री पार्क और करावल नगर के बीच तो बिलकुल नहीं जिन्हें २ या ३ पुस्ते जोड़ते है वहाँ आप किस हिसाब से कोरिडोर बनवायेंगे। समझ से परे है ......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-6520309520224898370?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/6520309520224898370/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=6520309520224898370' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6520309520224898370'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6520309520224898370'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/10/blog-post_07.html' title='बी.आर.टी से बेहतर तो यही होगा की आप लोगों को सहूलियत दें ताकि लोग ख़ुद अपना निजी वाहन छोड़कर पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर करें  ...जैसी मेट्रो ने दी है.'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-7159509418699495267</id><published>2009-10-01T12:56:00.005+05:30</published><updated>2009-10-01T20:32:28.256+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता जो मन भाये'/><title type='text'>वर्तिका नंदा की कविता</title><content type='html'>&lt;p&gt;आंखों के छोर से &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पता भी नहीं चलता &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कब आंसू टपक आता है और तुम कहते हो &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं सपने देखूं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम देख आए तारे ज़मी पे&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तो तुम्हें लगा कि सपने&lt;/p&gt;&lt;p&gt;यूं ही संगीत की थिरकनों के साथ उग आते हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नहीं, ऐसे नहीं उगते सपने।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं औरत हूँ। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अकेली हूं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पत्रकार हूं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं दुनिया भर के सामने फौलादी हो सकती हूं&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर अपने कमरे के शीशे के सामने&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरा जो सच है,वह सिर्फ मुझे ही दिखता है&lt;/p&gt;&lt;p&gt;और उसी सच में, सच कहूं,सपने कहीं नहीं होते।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुमसे बरसों मैनें यही मांगा था&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मुझे औरत बनाना, आंसू नहीं &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तब मैं कहां जानती थी दोनों एक ही हैं।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बस, अब मुझे मत कहो कि मैं देखूं सपने &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं अकेली ही ठीक हूं &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अधूरी, हवा सी भटकती। &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर तुम यह सब नहीं समझोगे&lt;/p&gt;&lt;p&gt;समझ भी नहीं सकते&lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्योंकि तुम औरत नहीं हो&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुमने औरत के गर्म &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आंसू की छलक&lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी हथेली पर रखी ही कहां? &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;अब रहने दो &lt;/p&gt;&lt;p&gt;रहने दो कुछ भी कहना &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बस मुझे खुद में छलकने दो और अधूरा ही रहने दो। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;(वर्तिका नंदा की अनुमति से प्रकाशित....) &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-7159509418699495267?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/7159509418699495267/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=7159509418699495267' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7159509418699495267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7159509418699495267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/10/blog-post_01.html' title='वर्तिका नंदा की कविता'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-3147207997407256546</id><published>2009-10-01T12:29:00.011+05:30</published><updated>2009-10-01T12:54:09.557+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-3147207997407256546?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/3147207997407256546/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=3147207997407256546' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3147207997407256546'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3147207997407256546'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title=''/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-5851802440240434306</id><published>2009-09-29T20:40:00.005+05:30</published><updated>2009-09-29T20:50:19.238+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता जो मन भाये'/><title type='text'>अहमद फ़राज़ की बेहतरीन ग़ज़ल</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला&lt;br /&gt;तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;आँख &lt;/span&gt;से दूर न हो दिल से उतर जायेगा &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा &lt;/p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जायेगा &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जायेगा &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;डूबते डूबते कश्ती तो ओछाला दे दूँ &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जायेगा &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का "फ़राज़"&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जायेगा&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-5851802440240434306?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/5851802440240434306/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=5851802440240434306' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5851802440240434306'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5851802440240434306'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/09/blog-post_29.html' title='अहमद फ़राज़ की बेहतरीन ग़ज़ल'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-3270634240256263165</id><published>2009-09-22T22:54:00.004+05:30</published><updated>2009-09-23T15:11:38.216+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य-वार्ता'/><title type='text'>'जब कुछ नही है तो सत्य केवल मानवीय सम्बन्ध है' - विश्वनाथ त्रिपाठी</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;विश्वनाथ&lt;/span&gt; ञिपाठी को सुनना मुझे इसलिए भी अच्छा लगता है क्योंकि वो अभी भी हिन्दी के उन आलोचकों में शामिल हैं जो बात-बात पर फतवा देते नहीं चलते और जो उस गुरु-शिष्य परंपरा का हिस्सा है जो मानती है कि गंगाजल से अधिक पविञ अगर कुछ है तो वो है श्रमजल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;             आख़िर &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;मैं ये बातें क्यों कर रहा हूँ दरअसल हिंदी अकादमी (जो पिछले दिनों .........क्यों चर्चा में थी क्या ये बताने की ज़रूरत है) ने कबीर पर विश्वनाथ ञिपाठी का एक व्याख्यान आयोजित किया था जहाँ ञिपाठी जी ने कबीर और उनकी कविता के बारे में बहुत कुछ कहा हालाँकि मुझे बार-बार लगा कि वे उतना कुछ नहीं कह सके जितना हम लोग सुनने और वो बोलने आए थे इसकी क्या वजह रही मुझे नहीं मालूम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;               बहरहाल&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; जितना भी कहा वो काफी कुछ हटके था जैसाकि मैंने पहले भी कहा कि मुझे उन्हें सुनना इसलिये पसंद है कि वो बात-बात पर फतवे नहीं दिया करते जो इन दिनों का चलन बन गया है जिस तरह राजनीति ने साहित्य में अपनी पैठ बनायी है(व्यक्तिगत रूप से मैं इसे बुरा नहीं मानता) उसी तरह राजनीति के ही एक बहुत अहम फार्मूले(संभवत फतवों की प्रथा वहीं से चली मालूम होती है) ने साहित्य में अपनी जगह पा ली है। व्याख्याता इससे जल्दी पॉपुलर हो जाता है ना?&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;खैर&lt;/span&gt; मै उनके व्याख्यान पर आता हूँ ञिपाठी जी ने कबीर पर बात करते हुए कहा कि हर बड़े रचनाकार का द्वन्द्व होता है जिस प्रकार तुलसीदास के यहाँ रामराज्य और कलयुग के मध्य द्वन्द्व दिखता है उसी तरह कबीर के यहाँ भी काल और अकाल के बीच यह द्वन्द्व दिखता है। क्या कारण है कि कबीर की अधिकांश कविताएँ मृत्यु याकि काल पर लिखी गई है? उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि मुझे जितना कबीर में मृत्युबोध(शायद यही शब्द इस्तेमाल किया था) दिखाई देता है हिन्दी के किसी और कवि में उतना नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;             अब&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; तक के अधिकतर विचारक भक्ति-आंदोलन को नवजागरण या लोकजागरण से जोड़ते आए थे लेकिन ञिपाठी जी उसे स्वतंञता आंदोलन से जोड़ते है वे गाँधी-जुलाहा-कबीर का सहसंबंध बनाते है जो काफी हद तक मुझे एक नई बात लगी उनका कहना है याकि मानना है कि गाँधी यूँ तो तुलसी का अनुसरण करते है और उनके रामराज्य को भारत मे स्थापित करना चाहते है लेकिन स्वतंञता की लड़ाई लड़ते है कबीर के चरखे से , जो उस दौरान सम्पूर्ण स्वदेशी और असहयोग का ताक़तवर हथियार था। इसी संदर्भ में वे आगे कहते है कि लोकजागरण निसंतान नहीं होते उनकी संताने होतीं हैं ज़ाहिर है लोकजागरण अपनी मशाल आने वाली पीढ़ी को सौंपते चलते है अब ये काम उस पीढ़ी का है कि वह उसे कहाँ तक ले जाती है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;            कबीर&lt;/span&gt; में हमें प्रश्नवाचकता ज़्यादा दिखती है उनके यहाँ उत्तर बहुत कम हैं। ज़ाहिर है प्रश्न वहीं होंगे जहाँ कौतूहल होगा, जानने की इच्छा होगी, अपने सवालों के जवाब ना मिलने की बैचेनी होगी । कबीर के यहाँ ये सब है इसलिये वो सवाल अधिक करते है और जवाब जानने के लिए लोक की तरफ देखते हैं। कबीर अपने दोहो, सबद,रमैनी में सत्य पर बल देते है मानवीय संबंधों पर बल देते हैं इसलिये उनका कहना है कि 'जब कुछ नही है तो सत्य केवल मानवीय सम्बन्ध है'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;             हालाँकि&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; उनकी एक बात से मैं अब तक सहमत नहीं हो पाया हूँ एक जगह उन्होंने कहा कि जहाँ प्रेम होगा वहाँ डर नहीं होगा । जबकि मुझे लगता है कि डर तो वही होता है जहां प्यार होता है लगाव होता है। हमारे घरवालों को हमारी चिंता लगी रहती है। समय से घर ना पहुँचो तो फोन पर फोन मिलाने लग जाते है इसिलिये ना कि वो हमसे प्रेम करते है नहीं तो उन्हें क्या? खैर हो सकता है उनका संदर्भ कुछ और रहा हो पर प्रेम हममे चिंता, शक़-शुबहा, और डर सभी कुछ अपने आप ले आता है ये किसी प्लानिंग के तहत नहीं होता। यह अपने आप होता है जैसे प्रेम अपने आप होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-3270634240256263165?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/3270634240256263165/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=3270634240256263165' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3270634240256263165'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3270634240256263165'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/09/blog-post_22.html' title='&apos;जब कुछ नही है तो सत्य केवल मानवीय सम्बन्ध है&apos; - विश्वनाथ त्रिपाठी'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6993714435735907864</id><published>2009-09-20T02:59:00.000+05:30</published><updated>2009-09-20T03:16:51.890+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता जो मन भाये'/><title type='text'>बद्रीनारायण की कविता</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;प्रेमपत्र &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्रेत आएगा&lt;br /&gt;किताब से निकाल ले जायेगा प्रेमपत्र&lt;br /&gt;गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खायेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चोर आयेगा तो प्रेमपत्र ही चुराएगा&lt;br /&gt;जुआरी प्रेमपत्र ही दांव लगाएगा&lt;br /&gt;ऋषि आयेंगे तो दान में मांगेंगे प्रेमपत्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारिश आयेगी तो प्रेमपत्र ही गलाएगी&lt;br /&gt;आग आयेगी तो जलाएगी प्रेमपत्र&lt;br /&gt;बंदिशें प्रेमपत्र ही लगाई जाएँगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांप आएगा तो डसेगा प्रेमपत्र&lt;br /&gt;झींगुर आयेंगे तो चाटेंगे प्रेमपत्र&lt;br /&gt;कीड़े प्रेमपत्र ही काटेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रलय के दिनों में सप्तर्षि  मछली और मनु&lt;br /&gt;सब वेद बचायेंगे&lt;br /&gt;कोई नहीं बचायेगा प्रेमपत्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई रोम बचायेगा कोई मदीना&lt;br /&gt;कोई चांदी बचायेगा कोई सोना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै निपट अकेला कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेमपत्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-6993714435735907864?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/6993714435735907864/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=6993714435735907864' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6993714435735907864'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6993714435735907864'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/09/blog-post_19.html' title='बद्रीनारायण की कविता'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-9116587313867590239</id><published>2009-09-15T23:03:00.000+05:30</published><updated>2009-09-15T23:25:24.100+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता जो मन भाये'/><title type='text'>सर्वेश्वर दयाल सक्सेना</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;यह उसकी आवाज़ थी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर में घुसते ही&lt;br /&gt;मैंने अपने कपड़े उतारे&lt;br /&gt;जिसे वह बुद्धिजीवी का&lt;br /&gt;चोगा कहती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाने की मेज़ पर&lt;br /&gt;केवल कुछ किताबें खुली हुई पड़ी थीं&lt;br /&gt;जिन्हें मै पढ़ने से डरता था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वह चारो तरफ&lt;br /&gt;कहीं नहीं थी&lt;br /&gt;उसके कमरे का दरवाज़ा&lt;br /&gt;भीतर से बंद था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;रसोईघर में जाने की&lt;br /&gt;मेरी हिम्मत नहीं हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै सोफे पर&lt;br /&gt;टांगें फैला  पसर गया&lt;br /&gt;और छत पर&lt;br /&gt;रुका हुआ पंखा देखने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक मेरी दृष्टि&lt;br /&gt;सोफे के पास मेज़ पर रखे&lt;br /&gt;केसैट टेप रेकार्डर पर पड़ी&lt;br /&gt;जिस पर एक चिट लगी थी&lt;br /&gt;'इसे सुनो।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने 'की'  दबा दी&lt;br /&gt;तरह-तरह की चीखें आने लगीं।&lt;br /&gt;कुछ देर उन्हें सुनते-सुनते&lt;br /&gt;जब मै घबरा गया&lt;br /&gt;तब एक साफ आवाज़&lt;br /&gt;सुनाई दी--&lt;br /&gt;यह उसकी आवाज़ थी :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यदि तुम कायरो की&lt;br /&gt;ज़िन्दगी जियोगे&lt;br /&gt;तो मै यह घर छोड़कर&lt;br /&gt;चली जाऊँगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-9116587313867590239?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/9116587313867590239/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=9116587313867590239' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/9116587313867590239'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/9116587313867590239'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/09/blog-post_15.html' title='सर्वेश्वर दयाल सक्सेना'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6111429557627320983</id><published>2009-09-09T15:13:00.000+05:30</published><updated>2009-09-09T15:22:40.254+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता जो मन भाये'/><title type='text'>साही की कविता</title><content type='html'>&lt;strong&gt;प्रार्थना : गुरु कबीरदास के लिए&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परम गुरु&lt;br /&gt;दो तो ऐसी विनम्रता दो&lt;br /&gt;कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ&lt;br /&gt;और यह अंतहीन सहानुभूति&lt;br /&gt;पाखंड न लगे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो तो ऐसा कलेजा दो&lt;br /&gt;कि अपमान, महत्वाकांक्षा और&lt;br /&gt;भूख की गांठों में मरोड़े हुए&lt;br /&gt;उन लोगों का माथा सहला सकूं&lt;br /&gt;और इसका डर न लगे&lt;br /&gt;कि कोई हाथ ही काट खायेगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो तो&lt;br /&gt;ऐसी निरीहता दो&lt;br /&gt;कि इस दहाड़ते आतंक के बीच&lt;br /&gt;फटकार कर सच बोल सकूँ&lt;br /&gt;और इसकी चिन्ता न हो&lt;br /&gt;कि इस बहुमुखी युद्ध में&lt;br /&gt;मेरे सच का इस्तेमाल&lt;br /&gt;कौन अपने पक्ष में करेगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी न दो&lt;br /&gt;तो इतना ही दो&lt;br /&gt;कि बिना मरे चुप रह सकूँ ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-6111429557627320983?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/6111429557627320983/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=6111429557627320983' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6111429557627320983'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6111429557627320983'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/09/blog-post_09.html' title='साही की कविता'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-4266710579722421192</id><published>2009-09-04T00:13:00.000+05:30</published><updated>2009-09-04T00:28:38.234+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>जो अब तक लिखा नही गया था</title><content type='html'>&lt;p&gt;आज भी मै वहीं बैठा हूँ &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;जहाँ उस दिन बैठा हुआ था । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;तुम्हारे पास लेकिन तुमसे दूर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;वहीं &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहाँ आज भी तुम्हारी देह या उसी  जैसा कुछ &lt;/p&gt;&lt;p&gt;रखा हुआ है इसी खाली कुर्सी पर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसकी आत्मा पर लोगो ने नोवेल लिख डाले &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और मै कुछ न लिख सका । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्योंकि तुम मेरे दिल में थी दिमाग में नही, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जबकि लेखन तो दिमाग की उपज बन चुका है न आज । &lt;/p&gt;&lt;p&gt;उसी कुर्सी पर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आज मै  एक अजीब सी बदहवासी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक अजीब सी खामशी देख रहा हूँ &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मेरे दोस्त कहते है मेरा दिमाग चल गया है &lt;/p&gt;&lt;p&gt;क्या अजीब अजीब चीजे (न दिखने वाली) देखता है?&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;हाँ,&lt;/span&gt; उनके लिए ये फीलिंग चीजे  ही तो है ,&lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन मेरे लिए ये न ख़त्म होने वाला इंतज़ार है । &lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-4266710579722421192?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/4266710579722421192/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=4266710579722421192' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4266710579722421192'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4266710579722421192'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/09/blog-post_03.html' title='जो अब तक लिखा नही गया था'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-860419376766600216</id><published>2009-09-02T00:06:00.000+05:30</published><updated>2009-09-02T00:11:03.254+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मलयज'/><title type='text'>कुछ उद्धरण और, मलयज की डायरी(भाग-१)से</title><content type='html'>०४जनवरी,५८&lt;br /&gt;किसी पुस्तक की समीक्षा के क्या मानी होते हैं? क्या पुस्तक-समीक्षक शुरु से ही यह मानकर चलता है कि वह एक ऐसे स्तर पर है जहाँ से वह अपनी मान्यताओं द्वारा संचालित पुस्तक पर निर्णय दे या उस पर विचार करे ?.....मुझे लगता है कि आजकल पुस्तक-समीक्षा के नाम पर प्राय यही होता है यानी समीक्षक अपने को एक उच्च दर्जे पर समझता है। लेकिन मेरे विचार से यह गलत दृष्टिकोण है। पुस्तक-समीक्षा के यह मानी होने चाहिए कि समीक्षक कृतिकार के साथ मिलकर कृति के आंतरिक मूल्य और उन मूल्यों की ओर इंगित करने वाली दिशा का अध्ययन करे। इस तरह से रचना के विकास की संभावनाओं पे ठोस रूप से विचार किया जा सकता है।.......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;०२मार्च,५७&lt;br /&gt;काव्य व्यक्तित्व तीन प्रकार के होते हैं।    &lt;br /&gt;पहला वह जो बदलते युग के मानव-मूल्यों से अपने विकास की संगति बिठा लेता है। उसमे सतत जागरूकता की एक सहज शक्ति होती है जो उसे रूढ़ होने नहीं देती, उसमे आगे और आगे विकसित होने के लिए विस्फोट होते हैं।     दूसरे वह जो सम्पूर्ण रूप में अपने को आगे ले चलने में अशक्य होते हैं। वो उन विकसित मूल्यों, संदर्भो के प्रति जागरूक होते हुए भी,उसे अस्वीकार न करते हुए भी, उसे अपना निजीपन-अपना अतीत-दान नहीं कर पाते।      तीसरे वे होते हैं जो अपने समय के आगे कभी नहीं बढ़ते, रुद्ध होते हैं और आजीवन उसे ही गौरवांवित करते रहते हैं।(किसी भी काल में एकाध ही में तीनों प्रकार के व्यक्तित्व मिलते हैं।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१८मई,५७&lt;br /&gt;मुझे लगता है कि आज के ईमानदार लेखक का लेखन-कार्य बहुत कुछ एक परवशता , एक कम्पलसन की स्थिति में हो रहा है। प्राचीन काल के लेखकों कि तरह लेखन के प्रति पूर्ण रूप से आत्यांतिक वह नहीं बन सकता। उसकी रचना प्रक्रिया में ही जैसे अन्तर्विरोध, प्रेशर और लाचारी के तत्व सम्मिलित हैं जो सिर्फ उसे बीती पीढ़ी के लेखकों से अलग करते हैं। वरन् उसके सामने कला की अभिव्यक्ति का एक विराट प्रदेश भी खोलते हैं।.........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१८अक्टूबर,५९&lt;br /&gt;कविता पढ़ो तो कवि की हैसियत से नहीं, एक साधारण पाठक की तरह, यानी न आलोचक की तरह न कवि की तरह।कविता लिखो,  लेकिन कवि की तरह नहीं। कविता बस आदमी की भाषा हो और कुछ नहीं। इससे ज्यादा की कोशिश कविता में आदमी को कवि बना देती है और कविता को जीवनहीन।......&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१९अगस्त,६०&lt;br /&gt;कल नामवर जी से बात करते-करते हफ्तों पहले कही उनकी एक बात याद आती है(शमशेर जी से)        मैं कवि को केवल अपना हृदय दे सकता हूँ, अपनी सहानुभूति नहीं।    नोट, बाद में विचार करने पर --यह दृष्टिकोण एक इन्टेग्रेटेड पर्सनेलेटी वाला व्यक्ति ही रख सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-860419376766600216?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/860419376766600216/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=860419376766600216' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/860419376766600216'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/860419376766600216'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='कुछ उद्धरण और, मलयज की डायरी(भाग-१)से'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2877037091887322113</id><published>2009-08-28T17:57:00.000+05:30</published><updated>2009-08-28T18:15:45.263+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मलयज'/><title type='text'>एक डायरी जो सही मायनो में आलोचना या समीक्षा है ।</title><content type='html'>मलयज को शायद उन गिने-चुने  लोगों में शुमार होने का गौरव प्राप्त होना चाहिए ,  जिन्होंने अपनी डायरी को अपनी निजी समस्याएँ ना बताकर उसे सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारो से जोड़ा ।&lt;br /&gt;जिसे  आज एक उपलब्धि माना जाना चाहिए  । मलयज ने अपने डायरी लेखन की शुरुआत सोलह वर्ष(१९५७ ई.)  की उम्र में की और इस सिलसिले को सन् १९८२ की अप्रैल तक(जब तक उनकी साँस चलती रही) जारी रखा। यह डायरी भी अधिकतर डायरियों की तरह नियमित नहीं है क्योंकि हम पहले ही कह चुके हैं कि यह निजी ना होकर सामाजिक और सांस्कृतिक अधिक है । जो काम मुक्तिबोध की , 'एक साहित्यिक की डायरी करती है'( यानि अपना पक्ष और विपक्ष रखने का और अपने समय के लेखकों से ये कहने का कि 'तय करो किस ओर हो तुम') बिलकुल वही काम तो मलयज की डायरी नहीं करती लेकिन हाँ कुछ-कुछ वैसा ही  काम  यह करती दिखती  है यदि  हम १९५७-१९८२ तक की डायरी को पढ़ जाए तो हम देखेंगे कि जिस आवाज़ को मुक्तिबोध एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण पुस्तक में बुलंद करते हैं लगभग उसी के समानांतर मलयज उसी आवाज़ को अपने समय की गोष्टियों( खासकर परिमल  की) मे ज़ाहिर  करते, उन पर अपना पक्ष-विपक्ष और अपने समकालीन अग्रजों से सहमति-असहमति को व्यक्त करतें दिखते हैं । मुक्तिबोध को अपने काम का पूरा हक़ मिला है(मरणोपरांत ही सही) , मिलना भी चाहिये । किन्तु क्या मलयज को ...............।खैर ,&lt;br /&gt;साठ-सत्तर का दौर, ऐसा दौर था जब अधिकतर लेखक डायरियाँ लिखा करते थे। आज कितने लेखक लिखते है नही पता संभवत् उनके सामने ऑनलाइन मैगज़ीन और ब्ल़ॉग जैसे विकल्प है शायद इसलिये । खैर हमारा मक़सद किसी लेखक की उपेक्षितता पर स्यापा करना नहीं । हमारा सिर्फ ये कहना है कि कम से कम एक बार, सरसरी नजर से ही सही इस डायरी को पढ़ा जाए । आपको इसमें परिमल के ज़माने की बहस के मूल बिन्दुओं जैसे लघुमानव , लेखक और राज्य आदि पर एक अलग सोच मिलेगी जो हमारे समकालीनों में हमें कम दिखाई देती है । प्रस्तुत हैं मलयज की डायरी, भाग-१ से कुछ उद्धरण-----                                 (१६ दिसंबर,१९५७)  'रचना की प्रक्रिया में यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि हम उस अनुभूति को उसकी तीख़ी सच्चाई के साथ उसे जीते हुए , उससे जूझते हुए , उससे आँखें मिलाते हुए उसे अभिव्यक्ति देते हैं या नहीं या उसकी स्वीकृति देते है या नहीं क्योंकि तब इसमे मन के और जीवन के तथा प्रकारांतर से समाज में अनेक गुह्य अग्यात स्तरों का उद्घाटन होता चलता है और निश्चय ही उसमें हमारा भी एक अंश होता   है । उस अंश की श्रेष्टता और व्यापकता रचनाकार की भी श्रेष्टता और व्यापकता है ।'          &lt;br /&gt;                                                            (धर्मवीर) भारती ने कहा- 'कविता करते समय टी .एस.इलियट ,भामह ,आई.ए.रिचर्ड आदि हमारे काम नहीं आते -हम जो उन्हें पढ़ें , उनसे प्रभावित भी हों किन्तु कविता मुझे करनी है और इसमे यानि काव्य सृजन के स्तर पर-ये सब हमारे काम नही आते ।' मैं इससे सहमत नहीं हूँ - 'भारती का आशय मोटे तौर पर यह था कि काव्य सृजन के क्षण में बाह्य प्रभावों का कोई उपयोग नहीं ।' लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता । बाह्य या इलियट, भामह ,आई.ए.रिचर्डस आदि काव्य सृजन के क्षण में न सिर्फ सहायक होते है वरन् काव्यसृजन की धारा को मो़ड़ते भी हैं । (मलयज की डायरी भाग-१ पृष्ठ-३४८, संपा.नामवर सिंह )&lt;br /&gt;  (जारी)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2877037091887322113?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/2877037091887322113/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=2877037091887322113' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2877037091887322113'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2877037091887322113'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/08/blog-post_2385.html' title='एक डायरी जो सही मायनो में आलोचना या समीक्षा है ।'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-1275951071794661131</id><published>2009-08-28T13:10:00.000+05:30</published><updated>2009-08-28T13:16:20.088+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>भ्रूण की आवाज़</title><content type='html'>मैंने कब कहा&lt;br /&gt;मुझे तुम प्यार करो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कब कहा&lt;br /&gt;मेरा ध्यान रखो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे पेट में न मारा करो ।&lt;br /&gt;(पुन:प्रकाशित )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-1275951071794661131?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/1275951071794661131/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=1275951071794661131' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1275951071794661131'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/1275951071794661131'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/08/blog-post_28.html' title='भ्रूण की आवाज़'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-9072242174270936134</id><published>2009-08-28T02:12:00.000+05:30</published><updated>2009-08-28T02:19:08.843+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>बहुत देर कर दी सनम कहते-कहते</title><content type='html'>जब मैंने कहा&lt;br /&gt;मुझे तुमसे प्यार है&lt;br /&gt;तुमने कुछ नही कहा&lt;br /&gt;बस&lt;br /&gt;तुम हँस दीं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैंने कहा&lt;br /&gt;मैं तुम्हें चाहता हूँ बेपनाह&lt;br /&gt;तुमने कुछ नही कहा&lt;br /&gt;बस,अपनी उँगलियाँ मेरे होंठो पे रख दीं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैंने कहा&lt;br /&gt;चलो आज फिल्म देखने चलते हैं&lt;br /&gt;तुमने कुछ नही कहा&lt;br /&gt;तुम मुस्कुराईं और क्लास लेने चलीं गईं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैंने कहा &lt;br /&gt;शाम मस्तानी है पार्क में चलें क्या ?&lt;br /&gt;तुमने तब भी कुछ नही कहा&lt;br /&gt;मेरा हाथ थामा और चल दीं ।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जब मैंने कहा&lt;br /&gt;शादी करोगी मुझसे&lt;br /&gt;तुमने कहा- पागल हो गए हो क्या ?&lt;br /&gt;आज के बाद हम कभी नही मिलेंगे ।&lt;br /&gt;(पुन:प्रकाशित )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-9072242174270936134?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/9072242174270936134/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=9072242174270936134' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/9072242174270936134'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/9072242174270936134'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/08/blog-post_27.html' title='बहुत देर कर दी सनम कहते-कहते'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-8014819330751962637</id><published>2009-08-26T15:48:00.000+05:30</published><updated>2009-08-26T15:57:41.609+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>बरसात की एक शाम</title><content type='html'>इस मौसम की सबसे जोरदार बरसात&lt;br /&gt;अबके नहीं आई मुझे तुम्हारी याद ......क्यों?&lt;br /&gt;क्या इसलिए&lt;br /&gt;कि मै&lt;br /&gt;अब तक&lt;br /&gt;अपने घर के निचले तल से&lt;br /&gt;पानी निकालने में व्यस्त था&lt;br /&gt;या फिर अब तक&lt;br /&gt;घर न लौटे भाई की&lt;br /&gt;चिंता सता रही थी मुझे&lt;br /&gt;या फिर इन सबसे अलग&lt;br /&gt;मैंने पहली बार सोचा&lt;br /&gt;कि मै तुम्हे क्यों याद करता हूँ&lt;br /&gt;जबकि&lt;br /&gt;प्यार की ग़लतफहमी भर है मुझे&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-8014819330751962637?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/8014819330751962637/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=8014819330751962637' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8014819330751962637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/8014819330751962637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/08/blog-post_26.html' title='बरसात की एक शाम'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-3539886962801917444</id><published>2009-08-20T16:53:00.000+05:30</published><updated>2009-08-20T17:01:22.679+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>उसके मरते ही,,,,,</title><content type='html'>उसके मरते ही &lt;br /&gt;अचानक ही &lt;br /&gt;सब कुछ पीला हो गया &lt;br /&gt;चेहरे का रंग....... &lt;br /&gt;फैक्ट्री में रखा माल &lt;br /&gt;घर में बनी दाल &lt;br /&gt;घरवालों का हाल &lt;br /&gt;और जो कुछ पीला ना हो सका &lt;br /&gt;वह था &lt;br /&gt;उसकी आँखों का रंग &lt;br /&gt;जिनमें अब तक भी &lt;br /&gt;इस दकियानूसी समाज के लिए क्रोध था &lt;br /&gt;जिसका विरोध करने के कारण ही उसकी जान ली गई ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-3539886962801917444?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/3539886962801917444/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=3539886962801917444' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3539886962801917444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3539886962801917444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/08/blog-post_20.html' title='उसके मरते ही,,,,,'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6243179341111643581</id><published>2009-08-13T13:36:00.000+05:30</published><updated>2009-08-13T14:04:44.275+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साभार'/><title type='text'>हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है</title><content type='html'>&lt;strong&gt;'ग़ुलज़ार' की कविता&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है&lt;br /&gt;बदलने वाला है मौसम ...................&lt;br /&gt;नय आवाज़े कानों में लटकते देखकर कोयल ख़बर देती है&lt;br /&gt;बारी आम की आई......... । &lt;br /&gt;कि बस अब मौसम-ऐ-गर्मा शुरु होगा&lt;br /&gt;सभी पत्ते गिरा के ग़ुल मोहर जब नंगा हो जाता है गर्मी में&lt;br /&gt;तो ज़र्द-ओ-सुर्ख़, सबज़े पर छपी , पोशाक की तैयारी करता है&lt;br /&gt;पता चलता है कि बादल की आमद है।&lt;br /&gt;पहाड़ों से पिघलती बर्फ बहती है धुलाने पैर 'पाईन' के &lt;br /&gt;हवाएँ छाड़ के पत्ते उन्हें चमकाने लगती है&lt;br /&gt;मगर जब रेंगने लगती है इंसानों की बस्ती&lt;br /&gt;हरी पगडंडियों के पाँव जब बाहर निकलते हैं&lt;br /&gt;समझ जाते हैं सारे पेड़ , अब कटने की बारी आ रही है&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; यही बस आख़िरी मौसम है जीने का इसे जी लो  ।                         &lt;br /&gt;                                                      (  वागर्थ , अगस्त०९ , अंक १६९ से उद्धृत   )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे ये कविता बहुत अच्छी लगी । (क्यों लगी इसका ज़िक्र आगे की पोस्ट में करुँगा ) आप भी इसे पढ़ें और कैसी लगी अपनी प्रतिक्रिया दें ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-6243179341111643581?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/6243179341111643581/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=6243179341111643581' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6243179341111643581'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6243179341111643581'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/08/blog-post_13.html' title='हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-7223596826189942847</id><published>2009-08-12T16:45:00.000+05:30</published><updated>2009-08-12T16:49:53.023+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>'प्यार' का मतलब</title><content type='html'>'प्यार' जैसे शब्द&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;'प्यार' जैसा शब्द&lt;br /&gt;'प्यार'    याकि शब्द&lt;br /&gt;क्या प्यार सिर्फ़ शब्द भर है ?&lt;br /&gt;शायद&lt;br /&gt;आप कहें&lt;br /&gt;नही&lt;br /&gt;यकीनन____आप कहेंगे नही ।&lt;br /&gt;लेकिन&lt;br /&gt;प्यार एक शब्द ही तो है&lt;br /&gt;क्योंकि शब्द ब्रह्म है ।&lt;br /&gt;शब्द 'नाद' है&lt;br /&gt;'नाद' बिन्दु वाला नहीं&lt;br /&gt;आवाज़ वाला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ !&lt;br /&gt;प्यार शब्द है ---आवाज़ है ।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अब्राहम लिंकन की टोन में कहूं तो  ---&lt;br /&gt;दिल की , दिल द्वारा , दिल के लिए&lt;br /&gt;विश्वास की ,विश्वास के लिए ,विश्वास के साथ&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पुकार है ये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए ---&lt;br /&gt;'प्यार' शब्द  है मेरे लिए ।&lt;br /&gt;(पुन: प्रकाशित )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-7223596826189942847?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/7223596826189942847/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=7223596826189942847' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7223596826189942847'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7223596826189942847'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/08/blog-post_12.html' title='&apos;प्यार&apos; का मतलब'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6684248056524037367</id><published>2009-08-07T13:03:00.000+05:30</published><updated>2009-08-07T13:13:19.442+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी के पन्नो से'/><title type='text'>कुछ छूट गया ..........</title><content type='html'>आज फिर तुम कैंटीन में दिखीं&lt;br /&gt;मगर आज तुम्हारे चेहरे पर&lt;br /&gt;वो लब्बोलुबाब न था&lt;br /&gt;जो कभी रहा करता था&lt;br /&gt;मैं भी वहीं था&lt;br /&gt;उस वक़्त&lt;br /&gt;किसी कोने से तुम्हें तक़ता&lt;br /&gt;मेरी आँखें&lt;br /&gt;तुम्हारी हथेली पर रखे&lt;br /&gt;तुम्हारे चेहरे को देख रही थी&lt;br /&gt;और तुम&lt;br /&gt;अपने सामने की खाली कुर्सी को&lt;br /&gt;मानो&lt;br /&gt;तुम्हें किसी का इंतज़ार हो ..........&lt;br /&gt;कोई आने वाला हो&lt;br /&gt;तुम्हारा बेहद क़रीबी&lt;br /&gt;पर&lt;br /&gt;तुम इतनी ख़ामोश क्यों हो ?&lt;br /&gt;तुम तो ऐसी ना थी&lt;br /&gt;मैं तुम्हारे साथ बैठना चाहता हूँ&lt;br /&gt;मुझसे कुछ बात करो ना .........प्लीज़&lt;br /&gt;ना जाने कितने प्रश्न&lt;br /&gt;कितनी इच्छाएँ&lt;br /&gt;यक-ब-यक&lt;br /&gt;कर डाली मैंने&lt;br /&gt;मगर तुम&lt;br /&gt;चुप बिल्कुल चुप&lt;br /&gt;ख़ामोश&lt;br /&gt;सामने की खाली कुर्सी को देखती&lt;br /&gt;मन में ख़याल आया&lt;br /&gt;याकि इच्छा हुई&lt;br /&gt;या इस एक पल के लिए&lt;br /&gt;मेरे जीवन का लक्ष्य&lt;br /&gt;काश मैं वो कुर्सी होता ........................&lt;br /&gt;.......................&lt;br /&gt;.......................अरे&lt;br /&gt;क्या हुआ&lt;br /&gt;तुम जाने क्यों लगीं&lt;br /&gt;और तुम्हारी आँखों में ये गीलापन&lt;br /&gt;मैं  खिड़की के काँच से&lt;br /&gt;तुम्हारे बालों और दुपट्टे को लहरते देखता रहा देर तक&lt;br /&gt; मानो वो भी&lt;br /&gt;.........अनमने से&lt;br /&gt;लहरने को मजबूर हों&lt;br /&gt;मैं अभी भी वहीं बैठा हूँ&lt;br /&gt;अकेला&lt;br /&gt;तुम बिन&lt;br /&gt;उस खाली कुर्सी को निहारता&lt;br /&gt;जहाँ अभी भी तुम्हारी खामोशी&lt;br /&gt;तुम्हारा इंतज़ार&lt;br /&gt;ऊँघ रहा है&lt;br /&gt;टेबल पर&lt;br /&gt;अपनी कोहनी टिकाए&lt;br /&gt;हथेली को ठोड़ी से लगाए ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-6684248056524037367?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/6684248056524037367/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=6684248056524037367' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6684248056524037367'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6684248056524037367'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='कुछ छूट गया ..........'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2106200555702140765</id><published>2009-07-30T16:08:00.000+05:30</published><updated>2009-07-30T16:14:08.114+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी के पन्नो से'/><title type='text'>तुम्हें क्या लगा...</title><content type='html'>तुम्हे क्चा लगा&lt;br /&gt;मैं तुम्हे भूल जाउँगा&lt;br /&gt;नहीं&lt;br /&gt;ये मेरे बस में नहीं&lt;br /&gt;होता&lt;br /&gt;तो कोशिश ज़रूर करता&lt;br /&gt;लेकिन&lt;br /&gt;तुम मुझे याद हो&lt;br /&gt;मेरी सबसे फेवरेट किताब के&lt;br /&gt;उस पन्ने की तरह&lt;br /&gt;जिसे मैंने ही&lt;br /&gt;याद रखने के लिये&lt;br /&gt;किनारे से&lt;br /&gt;थोड़ा सा&lt;br /&gt;मोड़ा था&lt;br /&gt;और मोड़ा भी ऐसा पुख्ता&lt;br /&gt;कि&lt;br /&gt;मैं&lt;br /&gt;खुद भी&lt;br /&gt;इसे दोबारा खोल नहीं पाया हूँ&lt;br /&gt;अब तक&lt;br /&gt;सच कहूँ&lt;br /&gt;तो मैं ...............&lt;br /&gt;तो मैं ...............&lt;br /&gt;चलो छोड़ो&lt;br /&gt;फिर कभी............ । ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2106200555702140765?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/2106200555702140765/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=2106200555702140765' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2106200555702140765'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2106200555702140765'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='तुम्हें क्या लगा...'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2458666634189533644</id><published>2009-02-20T15:37:00.000+05:30</published><updated>2009-02-20T15:52:25.010+05:30</updated><title type='text'>रंग दे बसंती से आगे ....</title><content type='html'>प्रसून जोशी के लिखे गीत खून चला.....खून चला ( रंग दे बसंती ) ने हमारे दिल में उस जज़्बे को दोबारा जगाया था जो शायद 'जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी' के बाद कहीं खो सा गया था 'रंग दे बसंती' देखने के बाद हम ( मै ओर मेरे दोस्त ) काफी देर तक कुछ नही बोल पाए थे नौशाद तो जैसे ख़ामोश ही हो गया था उस दिन मुझे यक़ीन हुआ कि हम वाकई बहुत इमोशनल है । जिसे आज एक घटिया टर्म के रूप में यूज़ किया जा रहा है । रात को सोते वक़्त सपने में भी फ्लाइट लेफ्टिनेंट अजय राठौर की माँ और उसके दोस्त इंडिया गेट के सामने सत्ता के ठेकेदारो के हाथों दबाये जा रहे थे खून से लथपत लोगो का जुलूस दिखाई दिया था उस दिन सपने में । और कानो में 'बदन से लिपटकर  ....खून चला खून चला ...' उनका यह गीत तब भी गूँज रहा था यह क्या था । क्या यह मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में की कसक थी जिसे वास्तविकता के बहुत करीब होने पर भी फैंटेसी कहा गया ? क्या हम इस गीत को  किसी खेमे में बांधने की जुर्रत कर सकते हैं । उस वक़्त लगा कि प्रसून ही इस तरह के गीत लिख सकते है जिनमे उन्मुक्तता की उड़ान हो .। कुछ कर गुज़रने की चाहत हो । लेकिन जिस टोन में मस्सकली...मटककली लिखा गया है वह वाकई काबिलेगौर है । बेशक यह गाना किसी कबूतर पर बेस्ड हो पर इसमे उसी आज़ादी का संकेत हमें मिलता है । जो खून चला.... में हमें मिला था । दोनों गानों के गीतकार-संगीतकार सेम है । अंतर है तो सिर्फ इस बात का कि 'रंग दे बसंती' वाले गाने में जहाँ सुनने वाला अपने दिल में एक हूक का अनुभव करता है और तसल्ली से फिल्म के कंटेंट को समझते हुए गाने के बोलो पर और उसके पिक्चराइज़ेशन पर ध्यान देता है । वही मसकली...मटकली में झूमने का दिल करता है । उड़ियो ना डरियो ..कर मनमानी मनमा..नी म......नी । जी करता है डीजे पर यही गाना बजे और हम  इस गाने के स्टैप्स को अपने पर आज़माये ।   इसी फिल्म में रेखा भारद्वाज का गाया एक विवादस्पद  गीत भी  है । जो बेसीकली एक फॉकसोंग है जिसे रहमान ने वैसा ही संगीत भी दिया है । चर्चा है कि यह रायपुर की जोशी बहनो ने लोकगीत के रूप में पहले-पहल गाया था । प्रसून जी ने  इस गाने को इतनी महत्ता दिलाई और इसे पूरे देश में पॉपुलर बनाया इसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। पर क्या इस लोकगीत के रियल राइटर का नाम देने में कोई दिक्कत थी?  क्या आपको या मेहरा जी को कोई डर सता रहा था । मै तो रंग दे बसंती देखने के बाद से ही आप दोनो का फैन हो गया हूँ इसलिये यह बर्दाश्त नहीं कर पाता कि आप लोगो पर कोई दूसरो का हक़ मारने का आरोप मढे़। या फ़िर आप पर अन्नू  मलिक टाइप ठप्पा लगाए ।  और फिर जोशी बहनो ने कोई रॉयल्टी थोड़े ही मांगी है वे तो सिर्फ इतना चाहती हैं कि इस गीत के वास्तविक लेखकों का नाम भी आप लोग दे । क्या यह कोई नाजायज़ मांग है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2458666634189533644?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/2458666634189533644/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=2458666634189533644' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2458666634189533644'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2458666634189533644'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='रंग दे बसंती से आगे ....'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-5219288900428845136</id><published>2008-11-23T13:13:00.000+05:30</published><updated>2008-11-25T10:33:14.486+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैम्पस का हाल-चाल'/><title type='text'>ड़ी.यू (सार्थक अभिव्यक्ति की तलाश)</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SSkNLTw0QpI/AAAAAAAAACM/5rrlt5o-wg8/s1600-h/Delhi-ABVP.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5271759326748623506" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 171px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SSkNLTw0QpI/AAAAAAAAACM/5rrlt5o-wg8/s400/Delhi-ABVP.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कुछ दिन पूर्व आर्ट फैकल्टी में गिलानी के भाषण के अवसर पर ए.बी.वी.पी के कार्यकर्ताओं ने अपना विरोध उनके मुँह पर थूक कर जताया । ऐसा करने पर वे बेहद खुश थे उन्हें लगा होगा कि उन्होंने विरोध का क्या नायाब तरीक़ा इख्तियार किया है । जिस पर थूका वो बेचारा तो शर्म से ही मर जाएगा ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसा किसी लड़की के द्वारा प्रप्रोज़ल ठुकराने पर उसके मुँह पर अपनी भड़ास के रूप में तेजाब डालना जिसका प्रचलन आजकल बहुतायत है । वास्तव में उन्होंने (ए.बी.वी.पी ) गिलानी के मुँह पर नहीं थूका । उन्होंने थूका है विश्वविद्यालय प्रशासन के ऊपर , जो अपने आपको धृतराष्ट्र की तरह लाचार दिखाने की कोशिश करता है । चाहे अपने आपको विद्यार्थी हितों के समर्थक कहने वाले विचार शून्य ए.बी.वी.पी कार्यकर्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में तोड़फोड़ करें या इतिहास विभाग के फर्नीचर पर अपना गुस्सा उतारें लेकिन प्रशासन तो जैसे मूक दर्शक की भाँति सारी डॉक्यूमैंट्री को देखने के लिए बाध्य है । उन्होंने थूका है भारतीय लोकतंञ के ऊपर जहाँ हर किसी को (दिखावे के लिए ही सही )अभिव्यक्ति की स्वतंञता प्राप्त है । दरअसल दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रचलित पार्टियों की मुख्य दिक्कत यही है कि इनमें ग्लैमर और पैसे या पॉवर की तो भरमार है लेकिन जहाँ बहस करने का मसला आता है ये लोग ना-नुकुर करने लगते है । चूँकि इनके पास कोई विचार नहीं होता इसलिये ये थूकने या हाथापाई जैसे निकृष्ट काम करने से भी नहीं हिचकिचाते २ वर्ष पूर्व इसी ए.बी.वी.पी ने विश्वविद्यालय के प्रो. सभरवाल से भी हाथापाई की थी । ये लोग क्यों भूल जाते हैं कि ये स्कूलों से निकल चुकें हैं जहाँ कंडेक्टर के स्टाफ न चलाने पर ये उनकी बसों के शीशे तोड़ दिया करते थे । ये दिल्ली विश्वविद्यालय है जिसकी अपनी साख है उनकी ऐसी हरक़तें सारे विश्व में दिल्ली यूनिवर्सिटी की छवि को धुँधला कर देती हैं ।ये क्यों भूल जाते है कि अगर ये किसी व्यक्ति या विचार से सहमत नहीं तो विरोध करना कोई बुरी बात नहीं लेकिन विरोध जताने का एक सलीका होता है क्या इन्होंने ये नहीं सीखा या गुंडागर्दी से ही विद्यार्थियों में अपनी पैठ बनाने की उन्होंने ठान रक्खी है । इन लोगों को कम से कम इतना तो पता ही होना चाहिये कि थूकने या हाथापाई करने से सामने वाला आपके डर से बोलना नही छोड़ देगा बल्कि वो आपकी ज्यादती के ख़िलाफ और मुखर होगा । आपको विरोध करने का इतना ही शौक है तो खुली बहस कीजिए । हम भी देखें हमारे ये तथाकथित नेता सिर्फ हाथों से ही नही बल्कि बातों से भी अपने विरोधियों को चित करने मे सक्षम हैं । लेकिन उसके लिये चेहरा चमकाने या डोले-शोले बनाने से ज़्यादा पढ़ना ज़रूरी है जिसका इन लोगों मे माद्दा नहीं है इनको तो नेरूलाज़ में मुफ्त की रोटी तोड़ने से ही फुरसत नहीं मिलती । इसलिये इन्हें मुद्दों के नाम पर बांग्लादेशी घुसपैठ दिखाई देती है या फिर राष्ट्रगान व वंदेमातरम को ये अपना मुद्दा बनाते हैं जिनका छाञों के हितो से कोई वास्ता नहीं । इस तरह के मुद्दों के लिए हमारे राष्ट्रीय दल हैं ना । पर गलती इन लोगों की नहीं , गलती है हम विद्यार्थियों की , कि ये सब जानने के बावजूद इन लोगों को जिता देते हैं लानत है हम लोगों पर जो सिर्फ चेहरे पर फिदा होकर या ढोल-नगाड़ों और दारू के लालच मे अपना कीमती वोट ऐसे लोगों को दे देते हैं । यही लोग आगे चलकर राष्ट्रीय दलों के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं और विधानसभा या संसद में कुर्सियाँ , चप्पल , लात , घूँसे चलातें हैं । हमें इन्हें जवाब देना होगा लेकिन इनके तरीकों से नहीं अपने तरीकों से । हमें यूनिवर्सिटी में शोर-शराबे से अलग एक बहसनुमा माहौल तैयार करना होगा । जे.एन.यू इसका एक अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-5219288900428845136?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/5219288900428845136/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=5219288900428845136' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5219288900428845136'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/5219288900428845136'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2008/11/blog-post_22.html' title='ड़ी.यू (सार्थक अभिव्यक्ति की तलाश)'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SSkNLTw0QpI/AAAAAAAAACM/5rrlt5o-wg8/s72-c/Delhi-ABVP.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-3585518855345891493</id><published>2008-11-21T11:11:00.000+05:30</published><updated>2008-11-21T12:44:47.115+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खोजबीन'/><title type='text'>नई दुनिया की दुनिया</title><content type='html'>अखबार की दुनिया में नई दुनिया ने २ अक्टूबर को क़दम रखा शुरुआत जितनी शिद्दत से हुई ख़बरों में भी वही शिद्दत अब तक बरकरार है , इसकी खुशी है । पिछले दिनों बाल दिवस के मौके पर नेहरू पर जो रिपोर्ट पेश की गई वो इतनी ज़बरदस्त थी कि इसने कांग्रेस शासन के कार्यकाल में ही नेहरू की उपेक्षा होने के बारे में ना केवल बताया बल्कि इस बात का भी मलाल किया कि जिस अध्ययनशील प्रवृत्ति के नेहरू थे और जिसके लिये सैंक़ड़ों संस्थानों की  स्थापना की गई थी वो आज अधर में फँसें हुए हैं । दिल्ली स्थित तीन-मूर्ती भवन की हालत ये है कि यहाँ पिछले ६ महीने से नई किताबें नहीं खरीदी गईं हैं । ये हाल तब है जब सरकार नेहरू विरोधी या कि विपक्ष की नहीं बल्कि कांग्रेस की है । १४ नवंबर नेहरु का जन्मदिन भी है और बाल-दिवस भी । उसी दिन नेहरु की समकालीनता का सवाल उठाया गया जो बिल्कुल वाजिब था । नेहरु ने एक आधुनिक भारत का सपना देखा था और उसे साकार करने की भरसक कोशिश की थी इस बात को मानने में , मुझे नहीं लगता कि किसी को किसी तरह की कोई दिक्कत होगी । हाँ , बाँधों के मामले में और उन्हें आधुनिक भारत के मंदिर कहने के बारे में ज़रुर विवाद उठा लेकिन उस पर भी एक सकारात्मक और सामूहिक  बहस की आवश्कता है जोकि अब तक नहीं हो सकी हैं । जिसका एक बड़ा कारण नेहरू पर बहस करने वालों का नेहरू को ना पढ़ना मालूम होता है जिन लोगों ने ( चाहे वो किसी भी विचारधारा में विश्वास रखतें हों ) नेहरू को पढ़ा है वो निश्चित ही उनके और उनके लेखन के क़ायल हए होंगे ऐसा मेरा विश्वास है । एक आदमी जिस पर देश की , परिवार की , भारत की विश्व में साख बनाने की , अपने आप को अमेरीकी पूँजीवाद और रूसी मार्क्सवाद से बचाते हुए एक तीसरी दुनिया बनाने की ज़िम्मेदारी हो । ताज्जुब होता है ये जानकर की वह इतना अधिक पढ़ने-लिखने के लिए समय कैसे निकालता होगा । लेकिन वर्तमान सरकार जिस पर माञ अपने आप को संभालने भर की जिम्मेदारी भी पूरी तरह नहीं है क्या वो नेहरू द्वारा लिखित पुस्तकों का संकलन तक तैयार नहीं करा सकती । क्या  वह इतनी बिज़ी है ? क्या उसका इतना लंबा-चौड़ा बिज़निस चल रहा है कि उसे अपने ही विचारों को संभालने का वक़्त नहीं मिल पा रहा ? नई दुनिया ने नेहरू के नाम पर चल रहे इन संस्थानों की (जिनकी वेल्यू आज भी अध्येयताओँ के लिए बनी हुई है जो आज भी अनुसंधान के लिए इसे ख़ासी तवज्जो देते हैं ) अच्छी ख़बर ली है। १९ नवंबर को इंदिरा गाँधी के जन्मदिन वाले दिन भी अखबार ने एकबार फिर अपना दायित्व संभाला।इंदिरा गाँधी के बारे भारत में बहुत अच्छी सोच नहीं है मसलन उन्होंने १८ महीने की इमरजेंसी लगाई , लोकतंञ का गला घोंट दिया । उनका शासनकाल अंधेरे का समय (टाइम ऑफ़ डार्कनेस  )था । ऐसी सोच अधिकतर बुद्धिजीवियों की रही है । लेकिन भारत का आम आदमी जो उस समय शायद बुद्दिजीवियों के दायरे से बाहर था इस सोच से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता था । मेरी कॉलोनी के अधिकतर लोग इंदिरा का समर्थन करतें हैं । वे कहते हैं ....उस औरत में गजब की सक्रियता थी , फैसले लेने की ग़जब की शक्ति ,जो आज बहुत कम लोगों में (शायद नहीं) बची है । मैंने एक बार इसकी पड़ताल करने की कोशिश की थी जिसके लिए मैं अपने पापा के पास पहुँचा था । जब मैंने जानने की कोशिश की थी कि १८ महीने इमरजेंसी और लोकतंञ का गला घोटने वाली इस महिला को कॉलोनी वाले इतना क्यों पसंद करते  हैं । इस बारे में बताने के क्रम में ........पापा जैसे ८० के दौर में ही चले गए थे जब वे दंगे  मे मरते-मरते बचे थे । तुमने बर्फखाना देखा है ना ,वहाँ कभी सब्जीमंडी हुआ करती थी । यतायात में बहुत दिक्कत आती थी । जब भी उस मंडी को हटाने का फरमान आता , वहाँ के आढ़ती पैसों का बंडल पहुँचा  आते सरकारी कर्मचारियों के यहाँ और फर्मान क़ाग़ज़ के टुकड़े में तबदील हो जाता । लेकिन इंदिरा ने ( वो ऐसे बात कर रहे थे जैसे इंदिरा उनके घर की ही किसी महिला का नाम हो ) एक ही रात में वहाँ से सब साफ कर दिया । आज वह जगह आज़ाद मार्किट के पास पुरानी सब्ज़ीमंडी के नाम से जानी जाती है .। लेकिन इससे अपनी कॉलोनी वालों का क्या लेना देना ..मैंने पूछा । सन् ७६ की बात है हम लोग अम्बा बाग़ मे एक झुग्गी में रहते थे । जहाँ आज हिन्दी अकादमी है (पदम नगर )उसके पास ही हमारी झुग्गी हुआ करती थी । उसे तोड़ने का भी फरमान जारी हुआ था लेकिन इंदिरा की आवास योजना ने हमें बेघर नही होने दिया । उन्होंने पुनर्वास कॉलोनी के नाम से नंद-नगरी , मंगोलपुरी , सीमापुरी, जहाँगीर पुरी जैसी न जाने कितनी ही रिसेटेलमेंट कॉलोनियों के ऱूप में लोगों को बसाया । आज हम जिस घर में है ये सब उसी की बदौलत है । मैं अख़बार पढ़ता जा  रहा था और मेरे सामने वो सब फ्लैश-बैक की तरह खुलता जा रहा था । नई दुनिया ने यादे ताज़ा की इसके लिए उसका शुक्रिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-3585518855345891493?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/3585518855345891493/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=3585518855345891493' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3585518855345891493'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/3585518855345891493'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2008/11/blog-post_20.html' title='नई दुनिया की दुनिया'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6039696514026325382</id><published>2008-11-16T12:10:00.000+05:30</published><updated>2008-11-16T14:09:56.852+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खरी-खरी'/><title type='text'>राज तुम सभ्य  तो हुए नही ............</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SR_bPqeaunI/AAAAAAAAACE/-sjAnQ17JVQ/s1600-h/images.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5269171151193160306" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 262px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SR_bPqeaunI/AAAAAAAAACE/-sjAnQ17JVQ/s400/images.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;राज बाबू पिछले दिनों जो हंगामा तुमने बरपाया वो किसी से छिपा नहीं है । इस पर तुम कितना ही राष्ट्रवाद का झंडा ऊँचा करने की कोशिश करो , पर यह कैसी राष्ट्रीयता है जो अन्य. क्षेञ की भावनाओं को नकार कर पनपी है । क्या तुम जिनकी दुहाई देते हो उन महापुऱुषों ( शिवाजी , तिलक , संत नामदेव , ग्यानेश्वर आदि ) की भी इज़्ज़त करना भूल गए हो । भूल गए उनका संदेश । भूल गए किस तरह शिवाजी ने ओरंगजेब( जो कि अन्य लोगो कि सिर्फ मराठियो की नहीं भावनाओं को आहत कर रहा था ) के खिलाफ मोर्चो खोला था जिसमें एक उत्तरभारतीय (हाँ ये नाम तुम्हींने गढ़ा है वरना अब तक तो सभी के लिए भारतीय ही प्रचलित है ) छञसाल बुंदेला ने उनका साथ दिया था । जिससे शिवाजी और छञसाल की वीरता को पूरे भारतवर्ष ने सराहा था । क्या तुम्हे कवि भूषण याद हैं जिन्होने इनकी वीरता के किस्सों को जन-जन तक पहुँचाया था क्या उन पर भी तुम मराठी होने का ठप्पा लगा सकते हो। क्या तुम इतिहास को लात मार देना चाहते हो । तुम तो शक़्ल से पढ़े-लिखे जान पड़ते हो क्या तुम्हे इतिहास की वो घटना याद है जब तिलक ने सभी भारतीयो से अंग्रेजो के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया था तब सभी भारतीयो ने उनके सुर मे सुर मिलाते हुए एकजुटता दिखाई थी । किसी ने बंगाली , बिहारी या किसी अन्य प्रदेश का स्वयं को नहीं समझा था सभी जानते थे कि सबकी पीड़ा एक है इसलिए समाधान भी एक ही होगा । उन्हे लोकमान्य का की पदवी सिर्फ मराठियो ने ही नही दी । क्या तुम यह भी भूल गए कि मराठी संतो की वाणी सब के साथ रहने का संदेश देती है । अगर तुम सब कुछ भूल गए तो तुम्हे ये याद रखने की भी कोई ज़रूरत नही कि तुमने एक इंसान के रूप में जन्म लिया है क्योंकि तुम इस फेहरिस्त में अकेले नही हो तु्म्हारा साथ देने के लिए हिटलर और मुसोलिनी खड़े हैं । उनका जन्म भी मनुष्य के ऱूप मे हुआ था लेकिन अपने कामो से और अंधी राष्ट्रीयता की भावना ने उन्हें भी मनुष्येतर बना दिया । क्या तुम ये चाहते हो कि इतिहास तुम्हें इसी तरह याद करे क्योंकि तुम तो हिटलर और मुसोलिनी भी नहीं हो उन्होंने तो फिर भी एक पूरे राष्ट्र के बारे में सोचा था और वर्साय की तरह की न जाने कितनी अपमानजनक संधियों का बदला लिया था अपने राष्ट्र के लिए उन्होंने स्वयं की भी बली दे दी थी। वे मारना जानते थे तो मरना भी जानते थे लेकिन तुम्हें तो एक क्षेञ के अलावा कुछ और दिखाई ही नही देता , क्या तुम मरना जानते हो ? तुम ये शायद स्वीकार नही करोगे कि तुम्हारी पार्टी (मनसे) शिवसेना की तर्ज पर अपने अस्तित्व को गढ़ने की आकांशा रखती है । मत करो लेकिन क्या तुम उत्तरभारतीयों के गुस्से का दंश झेल सकते हो जोकि अपना गुस्सा तुम्हारी तरह कुछ करके नहीं बल्कि कुछ ना करके ज़ाहिर करते हैं । तुमने कभी सोचा है कि अगर इन्होंने कुछ करना बंद कर दिया तो तुम्हारी (जिसे तुम सिर्फ अपना मानते हो ) औद्योगिक नगरी-मायानगरी का क्या होगा । जानता हूँ तुम्हें इससे कोई मतलब नहीं क्योंकि तुम भी अपने पिता के ही नक्शे-क़दम पर चल कर महाराष्ट्र में अपना राजनीतिक मुक़ाम हासिल करना चाहते हो । ऐसे मुकाम को हासिल करने की इच्छा रखना कोई ग़लत बात नहीं है लेकिन जो तरीका तुम इस्तेमाल मे ला रहे हो वो बेहद शर्मनाक है । बाहर के मुल्क इन्हीं चीज़ो का फायदा उठाकर मुम्बई मे बम ब्लास्ट करवाते हैं । क्या तुम भूल गए मुम्बई की लोकल ट्रेन में हुए ब्लास्ट को जिसमे उत्तर भारतीयो के मरने की तादात किसी से कम नही थी , कम से कम ऐसी आशा तो मुझे तुमसे नही है । लेकिन तव भी अगर तुम ये सब भूल गए तो सिर्फ इतना याद रखो कि जब कोई अपना घर-परिवार ( बी.वी बच्चे , माँ-बाप ) सब कुछ छोड़कर अपनी जान हथेली पे लिए मुम्बई में चला आता है तो वो तुम्हें कुछ ना कुछ देकर ही जाएगा । ग्लोबल वार्मिंग के बारे में तो सुना होगा या सुनामी का क़हर तो तुम्हारी आँखों देखा है , कभी सोचा है मुम्बई जिसके समंदर पर तुम्हें इतना गर्व है अगर डूब गया तो शरण के लिए कहाँ भटकोगे ? मेरे स्कूल में एक मास्टरजी थे जब भी मेरी क्लास में दंगल होता या आपस मे लड़ाई हो जाती जोकि रोज़-ब-रोज़ होता ही रहता था तो वे कहा करते थे कि लड़ाई इस तरह करो कि दुआ-सलाम में कोई फर्क ना आने पाए , कल जब तुम मिलो एक दूजे से आँख मिला सको । खैर मै जानता हूँ करोगे तो तुम वही जो तुम्हारी मनसे के लिये फायदेमंद होगा लेकिन तबभी मेरी सलाह पर गौर करना ।भगवान तुम्हे सद् बुद्धि दे ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-6039696514026325382?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/6039696514026325382/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=6039696514026325382' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6039696514026325382'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6039696514026325382'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2008/11/blog-post_15.html' title='राज तुम सभ्य  तो हुए नही ............'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SR_bPqeaunI/AAAAAAAAACE/-sjAnQ17JVQ/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-4563444160901475788</id><published>2008-11-07T01:29:00.000+05:30</published><updated>2008-11-06T12:02:44.334+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वाकया'/><title type='text'>ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा ..........</title><content type='html'>रोज़ की तरह आज भी डी.टी.सी देर से मिली , वो भी नई वाली । जी हाँ , वही बस जिस पर विपक्ष ने दिल्ली सरकार को बार-बार घेरा है । हरी वाली बस । इसमे तकनीकी ख़ामियों की चर्चा पहले भी होती रही है लेकिन हर बार कुसूर मशीनरी का ही नही होता , आदमी नाम की मशीन में वास्तविक मशीन से ज़्यादा गड़बड़झाला है । वह क़दम-क़दम पर प्रयोग करता चलता है जैसे चलते-चलते सड़क पर पड़ी खाली बोतल , डब्बो पर लात मारना । सोते हुए कुत्तों पर पत्थर फैंकना या फिर पत्थर की असुविधा होने पर , लात से ही काम लेना । वह यह देखता चलता है कि ऐसा करने से क्या होगा । वैसा करने पर क्या होगा । &lt;br /&gt;प्रयोग करना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन इसे करते वक़्त दूसरों की सुविधा-असुविधा का ख़याल न रखता ज़रूर ग़लत है । आज बस में भी ऐसा ही कुछ हुआ । बस काफी स्मूथ चल रही थी लेकिन एक सज्जन को अगले गेट पर लगा लाल बटन परेशान कर रहा था । उसने तुरंत ही इस परेशानी को प्रयोग में बदलने के लिए बटन को पुश कर दिया , स्मूथ  चल रही बस में ख़ामी आनी लाज़मी थी । ड्राइवर ने जब उससे पूछा कि तूने ये बटन क्यों दबाया तो उसका वही आन्सर था जो अधिकतर लोगो का ग़लती करने पर होता है । उसने कहा मैंने तो ऐसे ही दबा दिया .। देख रहा था क्या होगा । बस रुक गयी थी वो सज्जन उतर गए लेकिन उन साहब की वजह से हमें २० मिनट तक रुकना पड़ा । ड्राइवर ने सब सवारियों को एक ही सुर में कोसना शुरू , खैर इंजन की ख़ामी दूर हुई हम चल पड़े । तभी मेरे बराबर में बैठे लड़के के मोबाइल पर एक गाना बजा । बोल थे    ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा । मेरा ग़म कब तलक मेरा दिल तोड़ेगा ...............। ये गाना हमारी सिचुएशन पर कितना फिट बैठ रहा था । रंग की जगह बटन लगा दो तो भी कोई दिक्कत नही होगी ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-4563444160901475788?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/4563444160901475788/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=4563444160901475788' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4563444160901475788'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/4563444160901475788'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2008/11/blog-post_1357.html' title='ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा ..........'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6232633067591101547</id><published>2008-11-05T13:39:00.000+05:30</published><updated>2008-11-05T13:44:22.572+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>लत</title><content type='html'>एक युग था राम का&lt;br /&gt;एक युग था कृष्ण का&lt;br /&gt;एक रावण-कंस का&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;एक युग है हमारा&lt;br /&gt;यहाँ सब है सबके पास&lt;br /&gt;पर&lt;br /&gt;नहीं है कोई&lt;br /&gt;किसी के साथ&lt;br /&gt;इसलिए&lt;br /&gt;ये युग तो सबका है&lt;br /&gt;पर&lt;br /&gt;इस युग का कोई नहीं&lt;br /&gt;यहाँ&lt;br /&gt;ये कहना , कि वो मेरे साथ है&lt;br /&gt;स्वयं को धोखा देना है&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;हम अब भी सबको अपने साथ मानते हैं&lt;br /&gt;हमें शराब की,&lt;br /&gt;सिगरेट की,&lt;br /&gt;लड़की की लत नहीं&lt;br /&gt;क्योंकि&lt;br /&gt;हमें धोखा खाने की लत लग गई है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-6232633067591101547?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/6232633067591101547/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=6232633067591101547' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6232633067591101547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6232633067591101547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2008/11/blog-post_05.html' title='लत'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6268142619697228084</id><published>2008-11-03T12:18:00.000+05:30</published><updated>2008-11-03T12:38:54.857+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरे अपने'/><title type='text'>जज़्बात</title><content type='html'>नहीं नहीं , नहीं-नहीं यहाँ कोई नहीं है&lt;br /&gt;खुशबू फूलों में नहीं , रंगे-मेहफ़िल भी नहीं है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या हुआ वक़्त जो ठहरा हुआ-सा लगता है&lt;br /&gt;पास में सब हैं मगर, साथ में कोई नहीं है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या करे &lt;strong&gt;इश्क़-ए-मजमूँ&lt;/strong&gt; जो समझ में ना आया (प्यार का मतलब)&lt;br /&gt;क्यों ना कह दूँ कि मुझे इसका तो &lt;strong&gt;इरफ़ा&lt;/strong&gt; नहीं है । (जानकारी)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और बच जाऊँ अब ये कहके मैं उनकी नज़र से&lt;br /&gt;कि किसी और से है प्यार, पर तुमसे...........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-6268142619697228084?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/6268142619697228084/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=6268142619697228084' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6268142619697228084'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/6268142619697228084'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='जज़्बात'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-7084165898440883227</id><published>2008-10-27T13:32:00.002+05:30</published><updated>2009-10-15T22:01:39.717+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>दिवाली मुबारक हो</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/StdMoADwdmI/AAAAAAAAADU/Gobmkeb0xjM/s1600-h/DiwaliLight.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5392863328893695586" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 344px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/StdMoADwdmI/AAAAAAAAADU/Gobmkeb0xjM/s400/DiwaliLight.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;कल दीपावली है &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ लोग&lt;/p&gt;&lt;p&gt;पटाखे जलाएंगे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कुछ लोग &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिल ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;एक तबका वो होगा &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसके बंग्लो और कोठियो पर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लड़ियों की जगमगाहट होगी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कीमती मोमबत्तियाँ और दिये जलेंगे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और एक वो &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जहाँ शायद चूल्हा भी ना जले । &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;शराब की &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सप्लाई के साथ डिमांड भी बढ़ जाएगी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जुआरियों के लिए &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जश्न का दिन होगा कल&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ना जाने कितनो की दिवाली होगी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;और कितनो का दिवाला निकलेगा । &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;राजधानी में पुलिस &lt;/p&gt;&lt;p&gt;अपनी जेब गरम करेगी ।&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;घरों में &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लक्ष्मी की पूजा होगी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लेकिन बाहर लक्ष्मी, &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लक्ष्मी की आस में &lt;/p&gt;&lt;p&gt;लक्ष्मणरेखा पार कर रही होगी । &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;ऐसे ही दिवाली मनेगी &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हर साल मनती है &lt;/p&gt;&lt;p&gt;मैं पिछले कई सालों से &lt;/p&gt;&lt;p&gt;यही देखता आया हूँ &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;'दिवाली&lt;/span&gt; मुबारक हो ' के पोस्टर &lt;/p&gt;&lt;p&gt;चौराहों पर चिपके मिलेंगे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जिसमें बेगै़रत नेता &lt;/p&gt;&lt;p&gt;बदसूरत छवि लिए &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हाथ जो़ड़े दिखेंगे ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जो इन्हीं पोस्टरों के पीछे से कहेंगे &lt;/p&gt;&lt;p&gt;कि &lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाहे किसी के पास कुछ हो &lt;/p&gt;&lt;p&gt;या ना हो &lt;/p&gt;&lt;p&gt;भले ही किसी के घर में &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आग लगे-चोरी हो&lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाहे दिल्ली में कोई &lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुरक्षित हो या ना हो &lt;/p&gt;&lt;p&gt;चाहे कहीं पर भी लोग मरें-ब्लास्ट हो &lt;/p&gt;&lt;p&gt;पर सभी को &lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमारी तरफ़ से &lt;/p&gt;&lt;p&gt;"दिवाली मुबारक हो ।" &lt;/p&gt;&lt;p&gt;(पुन: प्रकाशित )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-7084165898440883227?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/7084165898440883227/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=7084165898440883227' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7084165898440883227'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7084165898440883227'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2008/10/blog-post_27.html' title='दिवाली मुबारक हो'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/StdMoADwdmI/AAAAAAAAADU/Gobmkeb0xjM/s72-c/DiwaliLight.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-2423189202314389462</id><published>2008-10-20T11:38:00.000+05:30</published><updated>2008-10-20T15:45:55.394+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सवाल'/><title type='text'>जातीय स्मृति पर  संकट</title><content type='html'>&lt;div&gt;कुछ दिन बाद दिवाली की धूम होगी , ये बात और है कि ये धूम दिवाली पर ही नज़र आएगी । अब त्यौहारों के प्रति कोई क्रेज़ नही रह गया , लगता है । मुझे याद है १५ अगस्त की पतंगबाज़ी मार्च में ही शुरु हो जाया करती थी । होली की &lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SPxZo2CUHxI/AAAAAAAAAAc/Ff5RpjvdpeA/s1600-h/ac.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5259177023096758034" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 143px; CURSOR: hand; HEIGHT: 174px" height="220" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SPxZo2CUHxI/AAAAAAAAAAc/Ff5RpjvdpeA/s200/ac.bmp" width="143" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;शरुआत&lt;/span&gt; फाल्गुन में नहीं , बसंत में ही बच्चों के हाथों हो जाया करती थी । हम आठ आने का ढेर सारा रंग लाते थे क्योंकि मम्मी ढ़ाई रुपये की बैंगन वाली पिचकारी नहीं दिलवातीं थीं । दिवाली एक महीने पहले ही परचून की दुकानों पर मामा-चॉकलेट और फूँकवाले बम मिलने शुरु हो जाते थे । हम बच्चे एक रुपये के दस बम लेते और क्लास में धमाचौकड़ी मचाते , पढ़ने का तो जैसे मन ही नही करता था उन दिनों । एक त्यौहार जाता और अगले त्यौहार की तैयारियाँ शुरु हो जातीं । मेरी कॉलोनी के वो बच्चे अब छिछोरों की फेहरिस्त में शामिल हैं खूब धमाल मचाते थे । मुझे याद है जब कॉलोनी की बत्ती चली जाती तो सब बच्चे दुलारी (७० साल की एक बुढिया ) के घर के सामने पहुँच जाते और खूब ज़ोर से हल्ला करते , जानबूझ कर बम उसी के दरवाजे के आगे फोड़ते , क्योंकि वो हमें खेलने नहीं देती थी । ये सीजन हमारे बदला लेने का सीजन हुआ करता था । वो हमारे पीछे छड़ी लेकर दौड़ती और हम उसके पोपले मुँह का मज़ाक़ उड़ाते । लेकिन अब ये सब सोचकर अजीब लगता है । अब ये आलम है कि दिवाली कब है ये भी मुझे पूछना पड़ता है । वो हर त्यौहार का बेसब्री से इंतज़ार करना , वो क़ाग़ज़ का रावण बनाना , कुत्ते की पूँछ में बिजली बम लगाना , अब बड़ा याद आता है । वो सब शरारते , बहुत याद आती हैं । बचपन में जाने को जी चाहता है ।ये मेरी मजबूरी है लेकिन मैं जा नहीं पाता लेकिन जब आज के बच्चों को देखता हूँ तो और दुखी होता हूँ उनमें भी अब वो क्रेज़ नही रह गया है जो पहले हुआ करता था ।दिवाली आएगी और चली जाएगी । जैसे संडे आता है और चला जाता है । त्यौहार हमारी जातीय स्मृति होते हैं और जातीय स्मृति का मरना किसी भी समाज के लिए किसी भी सूरत में सही नही माना जा सकता । ऐसा मेरा मानना है ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-2423189202314389462?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/2423189202314389462/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=2423189202314389462' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2423189202314389462'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/2423189202314389462'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2008/10/blog-post_19.html' title='जातीय स्मृति पर  संकट'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SPxZo2CUHxI/AAAAAAAAAAc/Ff5RpjvdpeA/s72-c/ac.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-7259889421214427156</id><published>2008-10-18T16:04:00.000+05:30</published><updated>2008-10-24T15:06:13.172+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>आवाज़</title><content type='html'>मैंने कब कहा&lt;br /&gt;मुझे तुम प्यार करो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कब कहा&lt;br /&gt;मेरा ध्यान रखो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कब कहा&lt;br /&gt;मुझे दुलारा करो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे पेट में न मारा करो ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/173029304905057225-7259889421214427156?l=kesirahi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kesirahi.blogspot.com/feeds/7259889421214427156/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=173029304905057225&amp;postID=7259889421214427156' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7259889421214427156'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/173029304905057225/posts/default/7259889421214427156'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kesirahi.blogspot.com/2008/10/blog-post_4169.html' title='आवाज़'/><author><name>तरुण गुप्ता</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11509702207023720743</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://1.bp.blogspot.com/-KhCgZCXzVmQ/Tckgowdiq8I/AAAAAAAAAKA/TQFzCJGzkQQ/s220/Image2130.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-173029304905057225.post-6863182772078550329</id><published>2008-10-18T12:00:00.000+05:30</published><updated>2008-10-20T16:12:30.562+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कोई होता जिसको अपना.......</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SPxf7KzW1gI/AAAAAAAAAAs/u7vtmMEov-s/s1600-h/ser.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5259183934978577922" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_D45homK4304/SPxf7KzW1gI/AAAAAAAAAAs/u7vtmMEov-s/s320/ser.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जिन लोगों के घर नही होते&lt;br /&gt;वो बाहर जाकर&lt;br /&gt;फुटपाथ पर चलते&lt;br /&gt;निठल्ले घूमते&lt;br /&gt;दिखते.....&lt;br /&gt;उन्हें घर की बदहवासी का&lt;br /&gt;लोगों की नज़रंदाज़ी का&lt;br /&gt;सड़कों की बदइंतज़ामी का&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;पूरा ख़याल &lt;/span&gt;होता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन लोगों के घर होते हैं&lt;br /&gt;वो घर के भीतर&lt;br /&gt;डरे-सहमे खिड़कियों से झांकते&lt;br /&gt;दिखते....&lt;br /&gt;उन्हें घर की दीवारों के सूनेपन का&lt;br /&gt;बाहर की&lt;br /&gt;भागती&lt;br /&gt;ज़िन्दगी की घुटन का&lt;br /&gt;पूरा ख़याल होता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन लोगों के घर&lt;br /&gt;होकर भी नहीं होते &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;वो घर में रहकर भी&lt;br /&gt;बाहरी&lt;br /&gt;बाहर जाकर भी&lt;br /&gt;बाहरी&lt;br /&gt;बनकर&lt;br /&gt;दोस्तों के साथ बातें करते&lt;br /&gt;अपनी रातों को दिन बनाते&lt;br /&gt;ब्लॉग लिखते&lt;br /&gt;सोती आँखों को जगाते&lt;br /&gt;बिना खाए सोते&lt;br /&gt;दिखते....&lt;br /&gt;चूँकि वो&lt;br /&gt;ना तो घर पर&lt;br /&gt;और ना ही बाहर,&lt;br /&gt;किसी को मिलते,&lt;br /&gt;उनका ना तो घर को ,&lt;br /&gt;ना बाहर को&lt;br /&gt;ख़याल होता है&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बस&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उनके आगे तो&lt;br /&gt;एक यही सवाल होता है&lt;br /&gt;क्या आज भी घर जाकर ,&lt;br /&gt;भूखे&lt;br /&gt;सोना होगा&lt;br /&gt;क्योंकि&lt;br /&gt;अब तक तो&lt;br /&gt;रसोई का दरवाज़ा बंद हो चुका होगा&l
