जब मैंने कहा /मुझे तुमसे प्यार है /तुमने कुछ नही कहा/
बस / तुम हँस दीं ।
जब मैंने कहा / मैं तुम्हें चाहता हूँ बेपनाह/
तुमने कुछ नही कहा बस अपनी उँगलियाँ मेरे होंठो पे रख दीं ।
जब मैंने कहा /चलो आज फिल्म देखने चलते हैं / तुमने कुछ नही कहा /
तुम मुस्कुराईं और क्लास लेने चलीं गईं ।
जब मैंने कहा / शाम मस्तानी है पार्क में चलें क्या ?तुमने कुछ नही कहा /
मेरा हाथ थामा और चल दीं ।
जब मैंने कहा / शादी करोगी मुझसे /
तुमने कहा- पागल हो गए हो क्या ?
आज के बाद हम कभी नही मिलेंगे ।
तुम्हारे बारे में क्या कहूं मै, मेरी तमन्नाओं का सिला है. नहीं मिला जो तो मुझको क्या है, मिलेगा तुमको ये आसरा है.
शनिवार, 13 सितंबर 2008
गुरुवार, 4 सितंबर 2008
कोसी का कहर और ........................
पिछले दिनों यमुना उफान पर थी अभी भी है पर उतनी नही , जितनी कोसी । कोसी ने तो उफान की भी हदें तोड़ दी हैं , न सिर्फ उफान की बल्कि किसान की , मज़दूर की , आवाम के विश्वास की हदों के साथ-साथ जडे़ तक उखाड़ दी हैं जिसकी खबर न सिर्फ प्रिंट मीडिया बल्कि और तरह के तथाकथित मीडिया भी दे रहे हैं जिनमें से एक तरह के मीडिया हैं हमारे ब्लॉगर्स । पिछले दिनों मनोज वाजपेयी ने शक्तिहीन अभिनेता और बाढ़ का दर्द शीर्षक से अपने ब्लॉग पर एक अभिनेता होने पर भी अपनी कोसी के बाढ़ पीड़ितो के लिए अब तक कुछ ना कर पाने के कारण अपनी शक्तिहीनता दिखाई थी । इस पोस्ट में उन्होंने कहा - बिहार में बाढ़ है लेकिन वो एक अभिनेता होने के बावजूद कुछ कर नही पा रहे । लेकिन साथ ही अपनी पोस्ट की एन्डिंग में उन्होंने करने का संकेत देते हुए लिखा कि वे इस सिलसिले में शेखर सुमन और प्रकाश झा से मिलने जा रहें हैं। इस वाक्य के साथ उनकी पोस्ट समाप्त हुई और शुरु हुई टिप्पणियाँ आनी ........ इन टिप्पणियों ने मेरा ध्यान खींचा कुछ को छोड़कर लगभग सब में बाढ़ का दर्द ग़ायब था जो चीज़ उपस्थित थी वो थी मनोज जी के अभिनेता होने के बावजूद अपनी जड़ो को याद रखने के लिए की गई उनकी प्रशंसा ।उन अधिकतर टिप्पणीकारों में शायद यह पूर्वाग्रह था कि अभिनय हमें अपनी जड़ो से काट देता है । क्या सचमुच जड़ो से कटकर हम अभिनय कर पाएंगे ? यह एक सवाल था जो मनोज जी की पोस्ट को पढ़कर नही , उसपर आई टिप्पणियों को पढ़कर मेरे दिमाग़ में आया ।आज सुबह जब विनीत जी का गाहे-बगाहे खोला तो वहाँ भी कोसी का क़हर बरपा हुआ था , सोच तो मैं भी रहा था कि यूनिवर्सीटी हॉस्टल और आपस की छोटी-छोटी बातों को अपने ब्लॉग का रॉ-मैटेरियल बनाने वाले विनीत जी ने अभी तक अपने ब्लॉग पर देश की इतनी बड़ी आपदा पर क्यों नही लिखा ? समझ नहीं आ रहा था कि वह अब तक जनसत्ता की छोटी-छोटी खामियाँ निकालने में ही क्यों व्यस्त हैं जबकि कोसी के क़हर के संदर्भ में वह ज़ी-न्यूज़ , आई.बी.एन.७ ,स्टार न्यूज़ की लंबी-चौड़ी खाइयाँ खोज सकते हैं । खैर जो भी है आज उनका ब्लॉग देखकर सुकून मिला , लगा उनकी पारखी नज़र देर से ही सही दुरुस्ती के साथ मीडिया के खिलाफ हल्ला बोल रही है ।
गुरुवार, 28 अगस्त 2008
मेरी दिल्ली मै ही सवारूँ
अब तक हम सुनते आए थे कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों की हालत बहुत बदतर है लेकिन ये खबर शायद आपके चेहरे पर कुछ देर के लिए खुशी ला पाए कि इन स्कूलों को अब हाइटैक करने की तर्ज़ पर इनमें कैमरे लगने शुरू हो गए है सरकार को लगता है कि स्कूलो में कैमरे लगाने ,ए. सी. ,और कम्प्यूटर प्रोवाइड कराने मा़ञ से वह स्कूलों को हाइ़टैक बना सकती है । चाहे वहाँ बुनियादी सुविधाओ का अभाव हो। खेलने के लिए समतल मैदान न हो , टॉयलेट की सफाई का उचित प्रबंध न हो,यहाँ तक की पीने के पानी की भी समूचित व्यवस्था न हो लेकिन कैमरे ज़रूरी हैं उनके बिना स्कूल में अनुशासन क़ायम करने में काफी मशक्कत जो करनी होगी । क्या दिल्ली के सरकारी स्कूलो में जहाँ स्कूल की बिल्डिंग तक काफी जर्जर हालत में हो ,ऐसे में कैमरो की व्यवस्था की ज़रूरत क्यों आन पड़ी होगी इसका जवाब सरकारी तंञ अच्छे से जानता है । क्या वह इसका खुलासा लोगों के सामने कर सकता है ?क्या इन स्कूलो को हाइटैक बनाने से पहले हमें एक स्कूल की बुनियादी सुविधाओ का ख्याल नही रखना चाहिए ?क्या इस तरह की चीज़ों पर पैसा खर्च करने से बेहतर ये न होगा कि हम पहले इन स्कूलो की वास्तविक स्थिति को जाने - समझे और फिर कोई फैसला लें ताकि बाद में हमें अपने ही फैसले पर पछताना न पड़े ?जिन स्कूलो के प्ले ग्राउंड में पैसे की किल्लत का हवाला देते हुए घास तक नही लगाई जा सकी है ,जहाँ के टॉयलेट गंदगी की मार झेल रहे है वहाँ कैमरे लगवाना बेमानी क्या जान पड़ता है ?मैं जहाँ रहता हूँ(नन्द नगरी) वो एरिया दिल्ली में कोई खास इज़्ज़त से नही देखा जाता । अब ये बताने की ज़रूरत तो बिल्कुल नहीं, कि यह जमना पार में पड़ता है । हमारे यहाँ पढाई की हालत बेहद खस्ता है ।यहाँ पढने वाले बच्चों में से अधिकतर स्कूल के पास ही के सिनेमा हॉल (गगन सिनेमा)में तफरी करते हुए देखे जा सकते हैं । यहाँ तक कि इस स्कूल की पहचान भी गगन वाले स्कूल के नाम से की जाती है ।यहाँ पढने वाले किसी बच्चे से पूछकर देखिए कि वह कहाँ पढता है उसका जवाब सर्वोदय बाल विद्यालय,नन्द नगरी नही होगा बल्कि वह कहेगा गगन वाले स्कूल में । क्या यह आपका ध्यान आइडेंटिटि पोलिटिक्स की ओर नही खीचता जिसे बुद्घिजीवी आइडेंटिटि पॉलिटिक्स का नाम देते हैं । खैर क्लास रूम्स की हालत ये है कि दीवारों में गड्ढे हो चुके हैं,पंखो की मौजूदगी प्रिंसीपल के ऑफिस ,साइंस लैब,और लाइब्रेरी तक ही सीमित है क्लास रूम्स इनसे अब तक मेहरूम है ,बिजली का आलम ये है कि शाम ढलते-ढलते पूरी बिल्डिंग को अंधेरा अपने आगो़श में ले लेता है । लेकिन वहाँ कैमरे लग गए है जो बच्चों के लिए खेल की और आस-पास के पियक्कड़ो व स्मैकियों के लिए चुराने का और चोर बाज़ार में बिकने का ताज़ा माल साबित होंगे ऐसी मेरी आशंका है ।
रविवार, 10 अगस्त 2008
किस्सागोई के किंग
पिछले सन्डे को जे.एन .यू जाना हुआ । मैच जो था जे.एन.यू और डी.यू के बीच। मैच का रिजल्ट जो रहा हो लेकिन मज़ा खूब आया। ये और बात है कि फील्डिंग ने कुछ दिनों से पूरा शरीर तोड़ के रख दिया है। मांसपेशियों में अभी भी दर्द है । तब भी इन सबसे से अलग जो बात रही , वो थी किस्सागोई की ।
हम सब लोग मैच के तुंरत बाद एक ढाबे पर आए और उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ उसने हमें शाम ७ बजे तक बांधे रखा । साऊथ कैम्पस के लड़के अरविन्द ने जिससे मेरी मुलाक़ात शायद पहली बार ही हुई थी ने ऐसा समां बाँधा कि कम से कम उस समय तो मैच की सारी थकान उतर गई ।
उस बन्दे के वो किस्से (जिसमे कुछ नॉन- वेज भी थे) जिसकी सबसे दिलचस्प बात थी उसकी दास्तानगोई यानि उसके बयां करने का स्टाइल । जो इतना उम्दा था कि उन किस्स्सो को सुनने के दौरान मुझे यक-ब-यक सूरज का सातवाँ घोड़ा के माणिक मुल्ला की याद हो आई । हालांकि माणिक मुल्ला के किस्से और इन जनाब की मजाकिया किस्सागोई में भारी विषयांतर था लेकिन दोनों में एक कॉमन बात थी । दोनों में ज़बरदस्त कौतुहल था ,रोचकता थी और थी अपने सुनने वालो को बांधे रखने की क्षमता । यह इतनी ज़बरदस्त थी कि सब लड़को का ग्रुप उस बन्दे की बाते सुनता जाता और हँस-हँस कर लोट-पोट होता जाता ।
रोमेंटिक कविता के बारे में ये बात कही जा सकती है कि ----
" कविता यों ही बन जाती है बिना बताये
क्योंकि ह्रदय में तड़प रही है याद तुम्हारी । "
लेकिन जब किस्सों की बात आती है तो किस्सा यों ही नही बनता वह तो गढा जाता है वह एक माहौल चाहता है और एक माहौल बनाता है। यह बात कहते वक़्त नई कहानी का ख्याल हो आता है उसकी सबसे बड़ी खासियत भी यही थी कि वह एक माहौल की डिमांड करती थी । अरविन्द बाबू की किस्सागोई (जिसका मै कोई उद्धरण नही दे रहा हूँ ) माहौल बनाने के इन्ही संदर्भो में याद आती है । जो अपने सुनने वालो का सिर्फ़ मनोरंजन ही नही कर रही थी बल्कि इस बात का भी एहसास करा रही थी कि किस्से किस तरह से कथाओ से निकल कर चुटकुलों में आ गए है । इन साहब में बन्दों को बाँधने की ही क्षमता मात्र नही थी बल्कि ये झूट भी इस ढंग से कहने की कला रखते थे कि वह भी सच जान पड़ता था गाइड के नाम पर मेरा जो मजाक बनाया गया था वह अब लगभग सच सा हो गया है । खैर जो भी है उस बन्दे की इस किस्सागोई ने समय की बर्बादी की चिंता से हमें कोसो दूर रखा । मै तो उसका मुरीद बन गया हूँ ऐसे बन्दे अपने आस पास रहे तो रिश्तो की चुभन का और जिंदगी की घुटन का एहसास कम से कम कुछ पल के लिए तो हमसे दूर रहता है ।
हम सब लोग मैच के तुंरत बाद एक ढाबे पर आए और उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ उसने हमें शाम ७ बजे तक बांधे रखा । साऊथ कैम्पस के लड़के अरविन्द ने जिससे मेरी मुलाक़ात शायद पहली बार ही हुई थी ने ऐसा समां बाँधा कि कम से कम उस समय तो मैच की सारी थकान उतर गई ।
उस बन्दे के वो किस्से (जिसमे कुछ नॉन- वेज भी थे) जिसकी सबसे दिलचस्प बात थी उसकी दास्तानगोई यानि उसके बयां करने का स्टाइल । जो इतना उम्दा था कि उन किस्स्सो को सुनने के दौरान मुझे यक-ब-यक सूरज का सातवाँ घोड़ा के माणिक मुल्ला की याद हो आई । हालांकि माणिक मुल्ला के किस्से और इन जनाब की मजाकिया किस्सागोई में भारी विषयांतर था लेकिन दोनों में एक कॉमन बात थी । दोनों में ज़बरदस्त कौतुहल था ,रोचकता थी और थी अपने सुनने वालो को बांधे रखने की क्षमता । यह इतनी ज़बरदस्त थी कि सब लड़को का ग्रुप उस बन्दे की बाते सुनता जाता और हँस-हँस कर लोट-पोट होता जाता ।
रोमेंटिक कविता के बारे में ये बात कही जा सकती है कि ----
" कविता यों ही बन जाती है बिना बताये
क्योंकि ह्रदय में तड़प रही है याद तुम्हारी । "
लेकिन जब किस्सों की बात आती है तो किस्सा यों ही नही बनता वह तो गढा जाता है वह एक माहौल चाहता है और एक माहौल बनाता है। यह बात कहते वक़्त नई कहानी का ख्याल हो आता है उसकी सबसे बड़ी खासियत भी यही थी कि वह एक माहौल की डिमांड करती थी । अरविन्द बाबू की किस्सागोई (जिसका मै कोई उद्धरण नही दे रहा हूँ ) माहौल बनाने के इन्ही संदर्भो में याद आती है । जो अपने सुनने वालो का सिर्फ़ मनोरंजन ही नही कर रही थी बल्कि इस बात का भी एहसास करा रही थी कि किस्से किस तरह से कथाओ से निकल कर चुटकुलों में आ गए है । इन साहब में बन्दों को बाँधने की ही क्षमता मात्र नही थी बल्कि ये झूट भी इस ढंग से कहने की कला रखते थे कि वह भी सच जान पड़ता था गाइड के नाम पर मेरा जो मजाक बनाया गया था वह अब लगभग सच सा हो गया है । खैर जो भी है उस बन्दे की इस किस्सागोई ने समय की बर्बादी की चिंता से हमें कोसो दूर रखा । मै तो उसका मुरीद बन गया हूँ ऐसे बन्दे अपने आस पास रहे तो रिश्तो की चुभन का और जिंदगी की घुटन का एहसास कम से कम कुछ पल के लिए तो हमसे दूर रहता है ।
शुक्रवार, 18 जुलाई 2008
इस वर्ष सातवी कक्षा तक के वे छात्र जो फेल हो गए थे दिल्ली सरकार के फरमान अनुसार पास कर दिए गए ज़ाहिर है बच्चो के चेहरे खिल उठे ,उनकी खुशी का ठिकाना न रहा , वे बेहद खुश थे । क्योकि उन्हें अपने आज से मतलब है कल से नही। वे आज में जीना चाहते है । लेकिन उनके अभिभावक ,अध्यापक और दिल्ली सरकार को सिर्फ़ आज से ही नही बल्कि इन बच्चो के भविष्य यानी कल से भी मतलब होना चाहिए । बच्चो को पास करने का फ़ैसला किनके परामर्श से किया गया या क्यो किया गया इसका तो मुझे इल्म नही लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि इससे छात्रो के भविष्य को किसी तरह कि नई दिशा नही मिल सकेगी ।
बच्चो को प्रोमोट करना अलग बात है और उन्हें सीधे पास कर देना अलग । ऐसा फ़ैसला देते वक्त हमें इस बात का ख़याल रखना होगा कि पहले ही बच्चो को छठी और सातवी कक्षा में प्रमोट के तौर पर २० से ३० नंबर की छूट दी जाती है इसके बाद भी अगर बच्चा फेल हो जाता है तो इसकी ज़िम्मेदारी उसके माता-पिता , अध्यापक , और ख़ुद उसकी बनती है । लेकिन इसका हल बिना कोई नीति तय किए बच्चो पर दया-दृष्टि कर उन्हें पास कर देना नही है बल्कि इसकी जगह यदि दिल्ली सरकार अपने विद्यालयों की , शिक्षा प्रणाली की दशा पर ध्यान देती तो हमें ज़्यादा खुशी मिलती । सरकार के वर्तमान फैसले का परिणाम यह हुआ है कि वे छात्र जिन्हें अपना पढ़ना , लिखना,यहाँ तक कि जोड़ - घटा के सवाल तक नही आते उनका सामना अब अगली कक्षा में वर्गमूल,घनमूल, से कराया जा रहा है। ये वे छात्र है जो एक - दो विषयो में ४-६ अंको से फेल नही हुए थे कि इन्हे प्रोमोटेड पास कर दिया जाता बल्कि ये वे बच्चे है जो पाँच-पाँच विषयो में १५-२० अंक भी नही ला सके । हमारा सवाल ये है कि क्या इन्हे अगली कक्षा में भेजने से बेहतर ये न होता कि इन्हे उसी कक्षा में रख कर अच्छी सिक्षा दी जाए ताकि ये अपने साथियो कि तरह सफल होने के लिए मेहनत करे इन्हे सरकार कि दया का मोहताज न होना पड़े ।
फेल करना कोई सज़ा नही है बल्कि बच्चे में यह एहसास जगाना है कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए मेहनत करनी होगी पास मेंहनत का ही फल है जो बच्चे को प्रोत्साहित करता है अधिक मेहनत करने के लिए ,एक्साम में मिलने वाले अंक उस उत्साह को बनाये रखते है जो बच्चो में सांस्कृतिक प्रतियोगिता को बनाये रखता है । सरकार का इस सम्बन्ध में कहना है कि इससे बच्चे प्रोत्साहित होंगे ----लेकिन क्या इनसे उन बच्चो का उत्साह नही गिरेगा जो परीक्षा में सफल होने के लिए जी तोड़ मेहनत करते है । क्या बच्चो में ये भावना नही जागेगी कि मेहनत करने कि क्या ज़रूरत है पास तो कर ही दिए जायेंगे ?इस तरह की भावना बच्चो में प्रोत्साहन नही बल्कि पतानोंमुखता पैदा करेगी और सरकार का बच्चो कि भलाई के लिए उठाया गया क़दम उनके लिए सबसे बड़ा रोड़ा साबित होगा ।
इन सब बातो का आधार मात्र मेरी सोच नही है बल्कि वो अनुभव है जो मैंने छोटे बच्चो को पढाते वक्त महसूस किया है । फेल होने की तीस क्या होती है और उसकी प्रतिक्रिया कैसी होती है इसे भी मैंने महसूस किया है ।
इस मुद्दे को उठाना बेहद ज़रूरी इसलिए लगा क्योकि दिल्ली में शिक्षा के लिए काफी फंड और आर्थिक सहायता आदि दी जा रही है और दिल्ली की सरकारी और सस्ती शिक्षा निरंतर विकासोन्मुख है ऐसे में सरकार का एक भी ग़लत क़दम हेमू कि आँख में तीर साबित हो सकता है इस तरह के फैसले लेने से पहले शिक्षाविदों ,बाल मनोचिकित्सकों ,अध्यापको,अभिभावकों आदि के साथ विचार विमर्श ज़रूर कर लेना चाहिए और हो सके तो इनमे छोटे बच्चो कि भी राये ली जानी चाहिए। अन्यथा ये सारी दया बेमानी होगी जबकि हम सभी चाहते है कि ये बच्चे आने वाले भारत की नई तस्वीर पेश करे ।
बच्चो को प्रोमोट करना अलग बात है और उन्हें सीधे पास कर देना अलग । ऐसा फ़ैसला देते वक्त हमें इस बात का ख़याल रखना होगा कि पहले ही बच्चो को छठी और सातवी कक्षा में प्रमोट के तौर पर २० से ३० नंबर की छूट दी जाती है इसके बाद भी अगर बच्चा फेल हो जाता है तो इसकी ज़िम्मेदारी उसके माता-पिता , अध्यापक , और ख़ुद उसकी बनती है । लेकिन इसका हल बिना कोई नीति तय किए बच्चो पर दया-दृष्टि कर उन्हें पास कर देना नही है बल्कि इसकी जगह यदि दिल्ली सरकार अपने विद्यालयों की , शिक्षा प्रणाली की दशा पर ध्यान देती तो हमें ज़्यादा खुशी मिलती । सरकार के वर्तमान फैसले का परिणाम यह हुआ है कि वे छात्र जिन्हें अपना पढ़ना , लिखना,यहाँ तक कि जोड़ - घटा के सवाल तक नही आते उनका सामना अब अगली कक्षा में वर्गमूल,घनमूल, से कराया जा रहा है। ये वे छात्र है जो एक - दो विषयो में ४-६ अंको से फेल नही हुए थे कि इन्हे प्रोमोटेड पास कर दिया जाता बल्कि ये वे बच्चे है जो पाँच-पाँच विषयो में १५-२० अंक भी नही ला सके । हमारा सवाल ये है कि क्या इन्हे अगली कक्षा में भेजने से बेहतर ये न होता कि इन्हे उसी कक्षा में रख कर अच्छी सिक्षा दी जाए ताकि ये अपने साथियो कि तरह सफल होने के लिए मेहनत करे इन्हे सरकार कि दया का मोहताज न होना पड़े ।
फेल करना कोई सज़ा नही है बल्कि बच्चे में यह एहसास जगाना है कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए मेहनत करनी होगी पास मेंहनत का ही फल है जो बच्चे को प्रोत्साहित करता है अधिक मेहनत करने के लिए ,एक्साम में मिलने वाले अंक उस उत्साह को बनाये रखते है जो बच्चो में सांस्कृतिक प्रतियोगिता को बनाये रखता है । सरकार का इस सम्बन्ध में कहना है कि इससे बच्चे प्रोत्साहित होंगे ----लेकिन क्या इनसे उन बच्चो का उत्साह नही गिरेगा जो परीक्षा में सफल होने के लिए जी तोड़ मेहनत करते है । क्या बच्चो में ये भावना नही जागेगी कि मेहनत करने कि क्या ज़रूरत है पास तो कर ही दिए जायेंगे ?इस तरह की भावना बच्चो में प्रोत्साहन नही बल्कि पतानोंमुखता पैदा करेगी और सरकार का बच्चो कि भलाई के लिए उठाया गया क़दम उनके लिए सबसे बड़ा रोड़ा साबित होगा ।
इन सब बातो का आधार मात्र मेरी सोच नही है बल्कि वो अनुभव है जो मैंने छोटे बच्चो को पढाते वक्त महसूस किया है । फेल होने की तीस क्या होती है और उसकी प्रतिक्रिया कैसी होती है इसे भी मैंने महसूस किया है ।
इस मुद्दे को उठाना बेहद ज़रूरी इसलिए लगा क्योकि दिल्ली में शिक्षा के लिए काफी फंड और आर्थिक सहायता आदि दी जा रही है और दिल्ली की सरकारी और सस्ती शिक्षा निरंतर विकासोन्मुख है ऐसे में सरकार का एक भी ग़लत क़दम हेमू कि आँख में तीर साबित हो सकता है इस तरह के फैसले लेने से पहले शिक्षाविदों ,बाल मनोचिकित्सकों ,अध्यापको,अभिभावकों आदि के साथ विचार विमर्श ज़रूर कर लेना चाहिए और हो सके तो इनमे छोटे बच्चो कि भी राये ली जानी चाहिए। अन्यथा ये सारी दया बेमानी होगी जबकि हम सभी चाहते है कि ये बच्चे आने वाले भारत की नई तस्वीर पेश करे ।
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