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शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

कलयुग का असली चेहरा



१९८०-८१ में आई श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म कलयुग महाभारत के प्लॉट का इस्तेमाल करते हुए भी इससे स्वयं को अलगा लेती है। इसके चरित्र असल में महाभारत के चरित्र न होने पर उन चरित्रों सरीखे दीखते हैं। इस फिल्म का निर्माण शशि कपूर ने किया था जिसमे महाभारत की कथा का सहारा लेते हुए समकालीन संदर्भों में एक ही वंश के दो औद्योगिक घरानों के बीच की प्रतिस्पर्धा को दिखाने का प्रयास किया गया था यह प्रतिस्पर्धा कब एक युद्ध में परिणत हो जाती है इसका पता नहीं चलता। संभवत् निर्देशक को भी नहीं, यह फिल्म का एक असंतुलित पक्ष है। कैसे एक औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में शामिल लोग आँख के बदले आँख की मांग करने लगते हैं फिल्म में इसका प्रदर्शन है। गाँधी जी ने कहा था कि अगर आँख के बदले आँख की मांग की गई तो सारी दुनिया अंधी हो जाएगी। गाँधी इस बात को कहते हुए अपने युग के महायुद्धों-विश्वयुद्धों को ध्यान में रखे थे। कलयुग के चरित्र इसे अपनी स्मृति से विस्मृत  करने में ही संलग्न दिखते हैं।

हालाँकि कलयुग श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित एक ऐसी फिल्म है जिसमे महाभारत की कथा को अपनी पटकथा का आधार बनाया है लेकिन यह तब भी महाभारत की कथा न होकर उस कथा की कलयुगीन(समकालीन) दशा का चलचित्रांकन है एक अन्य संदर्भ में कलयुग महाभारत नामक महाकाव्य का संदर्भ बिंदु है। हाँ केवल संदर्भ-बिंदु , समकालीन संदर्भ-सापेक्षता में उसका मूल्याँकन नहीं। यही मेरे लिए इस फिल्म को ख़ास बनाता है। श्याम बेनेगल इस फिल्म में महाभारत की कथा का केवल आधुनिक संदर्भ-बिंदु खोजने की कोशिश करते हैं और उसे बखूबी रूप में अभिव्यक्त भी करते हैं लेकिन उसका मूल्याँकन वह दर्शक पर छोड़ते हैं। श्याम बेनेगल ने उस रिस्क को उठाते हैं जिसे बहुत सारे निर्देशक छूना नहीं चाहते। एक एपिक पर उसकी कथा को उठाकर भी न उठाना श्याम बेनेगल ने संभव किया है। रचनाकार के समक्ष इस तरह का जोखिम हमेशा रहता है। ऐसा जोख़िम स्वयं धर्मवीर भारती को अंधा-युग लिखते वक्त भी था

श्याम बेनेगल की कलयुग के संदर्भ में मुझे धर्मवीर भारती का अंधा-युग यदि याद आता है तो उसका कारण भी यही है। जैसा अंधा युग की भूमिका में धर्मवीर भारती लिखते हैं -  पर एक नशा होता है - अंधकार के गरजते महासागर को चुनौती को स्वीकार करने का, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे खतरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ कणों को बटोरकर, बचाकर, धरातल तक ले जाने का - इस नशे में इतनी गहरी वेदना और इतना तीखा सुख घुला मिला रहता है कि उसके आस्वादन के लिए मन बेबस हो उठता है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत और उससे पहले और स्वतंत्रता या विभाजन के दौरान का भारत बार-बार इस कलयुग को देखता रहा है। निश्चित ही यह युग आस्था की मृत्यु के पश्चात जन्मा था जिसके बीज द्वापर युग में ही डल गये थे। जब महाभारत संभव हुआ। बेनेगल धर्मवीर भारती की भाँति महाभारत की कथा की समकालीन संदर्भ-सापेक्षता का मूल्याँकन नहीं करते। इससे कई समीक्षकों के लिए यह फिल्म बेनेगल जैसे बड़े निर्देशक की एक कमज़ोर फिल्म मानी जा सकती है लेकिन कहीं न कहीं यह कमज़ोरी ही फिल्म की सबसे बड़ी खूबी मानी जानी चाहिए। महाभारत और अंधायुग कृष्ण केंद्रित कथा कहता है जबकि कलयुग की कथा करन (कर्ण) की केंद्रीयता की कथा है। कलयुग की आंतरिक अर्थसत्ता का मूल्याँकन तभी संभव है जब करन (कर्ण) की आधुनिक संदर्भवत्ता का मूल्याँकन दर्शक कर सके। संभवत् यहीं से श्याम बेनेगल दर्शक के लिए समीक्षा की राह बनाते हैं। मुझे ये उनके बहुत बाद की फिल्म ग़ुलाल (अनुराग कश्यप) की फिल्म में गाये पीयूष मिश्रा के गीतों में मिलती है इस फिल्म के एक दृश्य में रामधारी सिंह दिनकर की कविता का समकालीन संदर्भ मे गायन करते हैं। कहीं कहीं इस गीत में कलयुग का केद्रीय विचार छिपा है -
ये देख गगन मुझमे में लय है, ये देख पवन मुझमें लय है।
मुझमें लय है संसार सकल, मुझमे धरती आकाश सकल
ये देख महाभारत का रण, मुर्दों से भरी हुई भू है।
पहचान कहाँ इसमे तू है।
कलयुग महाभारत के चरित्रों को आज के संदर्भ में और समय की इस वर्तमानता में खोजने की कोशिश करती है। कुछ लोग कहेंगे कि यह महाभारतयुगीन चरित्रों का कलयुगीन रूपांतरण है पर ऐसा कहकर कहीं न कहीं हम इस फ़िल्म से हट जाते हैं। मैं कहूँगा यह फ़िल्म महाभारत के चरित्रों का कलयुगीन रूपांतरण ही नहीं बल्कि महाभारत की वर्तमान संदर्भसापेक्ष पैरोडी है और निश्चित ही जिसमें समकालीन समयबोध शामिल है।
मुझे फिर पीयूष मिश्रा याद आते हैं -
इस देश में जिस शख़्स को जो काम था सौंपा।
उस शख़्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी।।

कलयुग में जितने भी किरदार (शख़्स) हैं कहीं न कहीं वो अपने काम की कार्यविधियों का विरोध करते हैं कलयुग का मूल संकट और अंधा-युग का मूल संकट यहां आकर एक समान हो जाता है। अनास्था यहाँ भी हावी है विश्वास की डोर यहाँ भी टूटती है। महाभारत में जहाँ कर्ण और दुर्योधन का मैत्री विश्वास अंत तक कायम था कलयुग में धनराज के मन में करन के प्रति अविश्वास बढ़ता है। वह उसे दग़ाबाज़ मानता है और करन की मौत के बाद आत्महंता बनता है।

शनिवार, 9 जुलाई 2011

संस्कारगत विवेक और डैली बैली




अनुवादों की उपयोगिता और महत्व को हम स्वीकारते रहें है पर डैली बैली देखने के बाद यह बात और पुख्ता हो जाती है कि कैसे अंग्रेजी संवाद या शब्द फूहड़ता(अर्थ) को ढ़क लेते हैं और हमारे विवेक को कोई झटका नहीं लगता लेकिन दूसरे ही क्षण उसका हिंदी तर्जुमा हमारे संस्कारों को जबरदस्त धक्का देता है, क्यों? क्यों अंग्रेजी का फ़क़ शब्द हमें उस तरह से नहीं झिंझोड़ता जिस तरह से इसका हिंदी रूपांतर। उर्फ प्रोफेसर में दुल्हन के द्वारा हम इस तरह का एक संवाद सुन चुके हैं बारह इंच का... खैर डैली बैली को लेके चलने वाली बहस इसी समस्या की वजह से ज्यादा उभार पा रही है मेरा मानना है कि इसे असभ्य और फूहड़ मानने वाले लोगों(या जो लोग इस फिल्म के अधिकतर संवादों से अपना तालमेल नहीं बैठा पा रहे) को इसके मूल टैक्स्ट(वॉइस) में इस फिल्म को देखना(सुनना) चाहिए। फिल्म की अपेक्षा इसका हिंदी रूपांतर हमारे विवेक को अधिक संस्कारगत धक्का पहुँचा रहा है।



मैंने अमेरिकन पाई सीरीज़ की अधिकतर फिल्में डाउनलोड करके देखीं हैं और ये मेरी पसंदीदा कॉमेडी(ए़डल्ट) में शामिल हैं मैं जब भी इस सीरीज़ की फिल्मों खासकर बुक ऑफ लव, होल इन वन को देखा करता मेरे जेहन में ये खयाल(सवाल) बार बार कौंधता कि क्या हिंदी सिनेमा में कोई इस तरह की कोशिश करने की हिम्मत दिखाएगा। आप यकीन जानिये मैंने अपनी कई महिला मित्रों के साथ इस सीरीज़ पर चर्चा की हैं कहीं मेरे संस्कारगत विवेक को धक्का नहीं महसूस हुआ और यह भी सच है कि मैं उन फिल्मो को अपने परिवार के साथ देखना पसंद नहीं करुँगा(इस परिबार में गर्लफ्रैंड या पत्नी शामिल नहीं है।)आमिर ने यह हिम्मत दिखाई है। मुझे लगता है कि ये अमेरिकन पाई सीरीज़ का ही भारतीय रूपातंर है, उस दर्जे की न सही। लेकिन अब वही लोग इसका विरोध करने में लगें हैं जो इस सीरिज़ को डाउनलोड करके देखा करते हैं। सिनेमा के शुरु से ही हिंदी फिल्मों में हत्या, लूटपाट जैसे दृश्य दिखाये जाते हैं जो बहुत लोगों को आपत्तिजनक लगते हो, सनद रहे कि इन फिल्मों को कोई (ए) नहीं मिला होता और न ही इनके निर्देशक इस बिहाफ पर कोई रिस्क या हिम्मत दिखाने को तैयार हैं।
मुझे ये बात बिल्कुल भी समझ नहीं आती कि क्या हम लोग इतने मूर्ख हैं कि हम गालिया फिल्मों में देखकर सीखेंगे। हत्या. डकैती, या बलात्कार जैसे दृश्यों को देखने के बाद क्या हम वही करते हैं। मेरा ये विश्वास रहा है कि हिंदी फिल्मों का दर्शक कम से कम इतना तो समझदार है कि उसे पता है कि उसे क्या करना है। गाली कोई इतनी भी बुरी चीज़ नहीं होती। हममे से अधिकतर इनका इस्तेमाल करते है कुछ लोग तो अपने बच्चों के सामने ही खासकर मेरी कॉलोनी में अक्सर झगड़ो के दौरान इस तरह की गालियाँ बिल्कुल खुले में दी जाती हैं। फिर डैली बैली के पीछे क्यों पड़ा जाए जबकि वे अपने प्रोमों में ही बच्चों और फैमिली के साथ इस फिल्म को न देखने की चेतावनी दे चुके हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि आमिर एक टिपीकल प्रोफेशनल पर्सनैलिटी है। डैली बैली विवादित होने के, व अपनी रीलीज़ के एक हफ्ते बाद भी अपने टिकट रेट २५०-२०० से नीचे नहीं लेके जाती। उस पर सिने प्लेक्स खचाखच भरा हुआ है। बाहर निकलकर हम चाहे इस फिल्म को कितनी ही गालियों दें पर यह सच है कि आमिर अपनी कोशिश में कामयाब रहे हैं। इस फिल्म के रिलीज के बाद ये बात ज्यादा पुख्ता हो गयी है कि लोगों को अश्लील दृश्यों से उतनी समस्या नहीं है जितनी असभ्य कही जाने वाली गालियों से। चाहे अंदर से उनका मन कुछ और कहें। हम बार बार बिसरा देते हैं कि गालियों का भी अपना एक समाजशास्त्र होता है। गालियाँ लोक की प्रतिध्वनि हैं। मान लोक की पैदाइश हैं। कोई महाशय तो यहाँ तक कह गये हैं कि जिस भाषा में जितनी अधिक गालियाँ होंगी वह भाषा उतनी लम्बी आयु तक जीवित रहेंगी। इस हिसाब से देखा जाए तो गालियाँ भाषा की प्राणवायु हैं। फिल्म में मुझे बहुत कुछ नया नहीं लगा लेकिन ये बात मैं ईमानदारी से कहना चाहूँगा कि मैं पूरी फिल्म में एक पल के लिए भी बोर नहीं हुआ। मैं तो लोट-पोट था उसे आप फूह़ड़ कहिए या असभ्य पर मुझे फिल्म अच्छी लगी।





मैं अब भी इस फिल्म को एक दो बार और देखना चाहता हूं उपरोक्त बातों को समीक्षा न माना जाए ये मेरी ग़ुजारिश हैं।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

पीपली लाइव - अनुभव की तंज़िया नज़र


जैसा मैंने अपनी १४ अगस्त२०१० की डायरी में लिखा है-
पीपली लाइव देखने के दौरान जितना मेरे साथ बैठे सहदर्शक हँस रहे थे मुझमे उतनी ही एक टीस रह-रहके उभर आती थी अब जब मैं पूरी फिल्म देख चुका हूँ और राजौरी गार्डेन के 'वेस्ट गेट माल' में मुस्कुराते जोड़ो को देख रहा हूँ तो भी मेरे जेहन में राकेश के लटके हुए/जले हुए हाथ की वो इमेज बार-बार उभर रही है और मुझे यकीन है कि फिल्म का दर्शक इस इमेज को इतनी जल्दी बिसराने वाला नहीं। चाहे मुन्नी कितनी ही बदनाम क्यों न हो । खैर मै जल्द से जल्द स्वतंत्रता दिवस पर सजाये गए उस माल से निकलना चाहता हूँ हालांकि मै अपने दोस्तों के साथ हँस-बोल रहा हूँ उनकी मस्ती में उनका साथ दे रहा हूँ शायद इसलिए की मेरे जन्मदिन पर उनकी ट्रीट में कोई कमी न रह जाये. पर मै परेशान हूँ कुछ उथल-पुथल सी मची है । महमूद और अनुषा रिज़्वी का निर्देशन कुछ इस तरह का है कि वो आपको आईना नहीं दिखाते बल्कि आपकी शक्लो- सूरत(बदसूरत) ही आपके सामने रख देते हैं अब आप हँसिये या तालियाँ बजाइये। सच से रूबरू कराना ही शायद उनके लेखन-निर्देशन की एक शैली है शायद व्यंग्य(satire) इसे ही कहते हैं।

अनुषा और महमूद फारूकी ने उस तंज़ नज़र को फिर से पैदा करने की कोशिश की है जिसे रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं खासकर 'हँसो हँसो जल्दी हँसो' में बयाँ किया है । मैं घर आकर रघुवीर सहाय संचयिता खोलता हूँ "...निर्धन जनता का शोषण है / कहकर आप हंसें । लोकतंत्र का अंतिम क्षण है / कहकर आप हंसें । ...कितने आप सुरक्षित होंगे / मै सोचने लगा । सहसा मुझे अकेला पाकर / फिर से आप हंसें। "(आपकी हँसी) और मूवीटाइम के हॉल न0-01 में बैठे दर्शकों के खिले चेहरे मेरे सामने हो लेते हैं.
"हँसो पर चुटकुलों से बचो / उनमे शब्द हैं / कही उनमे अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों । ********और ऐसे मौको पर हँसो / जो कि अनिवार्य हों / जैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मार / जहां कोई कुछ कर नहीं सकता / उस गरीब के सिवाय / और वह भी अक्सर हँसता है।"(हँसो हँसो जल्दी हँसो)


निश्चित ही सिर्फ नत्था इस फिल्म का mukhyaनायक नहीं है, राकेश एक दमदार किरदार है जो मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है,जिस तरह प्रेमचंद की एक कहानी 'ईदगाह' मे एकाएक 'चिमटा' नायक बन जाता है यहाँ नायक के सिलसिले में मुझे ऐसी ही गुंज़ाइश दिखती है.. खैर

दरअसल यह एक नाट्यनुमा फिल्म है मुझे शुरु से लेकर अंत तक लगता रहा कि यह एक नाटक है
और मैं अपने दिल को समझाता रहा कि नहीं यह तो फिल्म है फिर लगा ...(एक गहरी आह के साथ)नाटक ही तो है लोकतंत्र और उसके स्तंभों का, जो अपनी सारी कमज़ोरियों के बावजूद सबसे ताकतवर है यही कहते है ना हमलोग बहुधा...

बुधवार, 24 मार्च 2010

LSDक्या करें कुछ समझ नहीं आता, कोई मंज़र नज़र नहीं आता


महीने, दो महीने पहले सुनील शानबाग द्वारा निर्देशित नाटक 'सैक्स, मोरेलिटी और सेंसरशिप' देखा था l इसमें गालियों की भरमार थी और मै बार-बार ये सोच रहा था कि शुक्र है हमारे बुज़ुर्ग लोग यहाँ नहीं आये वर्ना उनकी थोथी नैतिकता के पैरों तले हम बेवजह कुचले जाते l इस नाटक में सुनील शानबाग ने 'सखाराम बाइनडर' को उपजीव्य बनाकर इस अनैतिक दौर में 'सैक्स' और 'मोरेलिटी' को डिफाइन करने की सफल कोशिश की है l यह कोशिश सफल इसलिए है कि न सिर्फ यह सैंसरशिप के वास्तविक पैमानों को खोलती है बल्कि इस तथाकथित नैतिकता और मूल्यों के युग में आज के वक़्त की असलियत को सैंसर करने के षड्यंत्र को भी दिखाती है l
'लव,सैक्स और धोखा' में भी मुझे कुछ ऐसा ही अनुभव होता है फर्क सिर्फ इतना है कि वहां असलियत को सैंसर करने के षड्यंत्र को दिखाया गया था और यहाँ असल जिंदगी को, जिससे बहुधा हमें मुँह फेरने की आदत है l LSD को देखने के क्रम में ek दर्शक कई वर्गों में हमें दिखता है एक वर्ग वह है जो इस फिल्म में 'सेक्स' की आस लिए गया था हालाँकि इसकी उम्मीद कम है क्योंकि सेक्स दर्शन अब दुर्लभ नहीं रहा उससे वैबसाईट भरी पड़ी है
एक वर्ग और है इसे हम बौद्धिक वर्ग कह सकते है इसने दिबाकर बैनर्जी की पहली दोनों फिल्में 'खोंसला का घोंसला' और 'ओये लक्की, लक्की ओये' देखीं हैं जो दिबाकर के प्रयोगों की प्रगतिशील समझ से वाकिफ है जो वस्तुत: दिबाकर बैनर्जी के इस नए प्रयोग को देखने गया था दिबाकर ऐसे दर्शक को निराश नहीं करते बिलकुल सुनील शानबाग की तरह l

इस फिल्म की रिलीज़ के दिन(१९ मार्च) शाम को जब घर लौटा तो एक मीडिया चैनल पर एक समीक्षक(कुछ अजनबी से) को इस फिल्म को कोसते हुए सुना, यूँ तो वो भी उनकी पिछली दोनों फिल्मों के प्रशंसक थे लेकिन इस फिल्म(लव,सेक्स और धोखा) के शीर्षक में 'सैक्स' शब्द को देखकर ही वे भभक उठे, उन्हें शिकायत थी कि दिबाकर इस फिल्म से समाज में अश्लीलता फ़ैलाने की कोशिश कर रहे हैंl शायद इससे उनकी नैतिकता प्रभावित हुई थीl
तब तक मैंने फिल्म नहीं देखी थी लेकिन जब देखी तो किसी एंगल से भी वो अश्लील या फूहड़ नहीं लगी बल्कि इससे कही ज्यादा सेक्सुअल सीन तो हमें महेश भट्ट की फिल्मों में देखने को मिल जाते हैं l यदि आप उसे अश्लीलता माने तो? हालांकि मै इसे अश्लीलता नहीं मानता यह तो सच्चाई के सारनाथ का छिपा हुआ शेर मात्र है
हालांकि यह फिल्म उन लोगों को निराश कर सकती है जो सिनेमा को एक मनोरंजन और आनंद प्रदान करने वाली विधा मानते हैं, यह उन लोगों में भी खीज पैदा कर सकती है जो इसमें 'लव,सेक्स और धोखा' की जगह 'प्यार,इश्क और मोहब्बत' पर सेक्स कैसे हावी होता है? यह देखने गए हों l साथ ही यह उन लोगों के लिए भी निराशा और गुस्से का सबब साबित हो सकती है जो समाज में व्याप्त अनैतिकता और विद्रूप स्थितियों से मुँह फेरने को ही मूल्य और नैतिकता मानते हों इस तरह के लोग दरअसल एक तरह के यूटोपिया में रहने के आदि हैं लेकिन जो लोग दिबाकर बैनर्जी के काम से परिचित हैं वो इन सब ढकोंसलों को दरकिनार करते हुए एक बौद्धिक दर्शक की हैसियत से इस फिल्म को देखने के खूबसूरत पर खतरनाक एहसास से वाकिफ ज़रूर होंगे l.
दिबाकर का यह नजरिया वाकई काबिलेतारीफ है कि बिना किसी शूटिंग लोकेशन के, बिना किसी बड़े नामी हीरो-हिरोइन के, और फिजूलखर्ची किये बिना वह हमें हमारे समाज-तंत्र की विद्रूप स्थितियों की खबर दे देते है वे दरअसल व्यावसायिक सिनेमा के दौर में जोखिम लेते हुए एक बौद्धिक नज़रिए को कायम रखने का प्रयोग कर रहे है l ये हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम इसे एक पोसिटिव नज़रिए से देखें ना कि इसे एक 'सेक्स को बढ़ावा देने वाली फिल्म' कहकर नकार दें l
सच तो ये है कि इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे आप अनैतिक या सेक्सुअल कहेंगे, यह तीन छोटी डोक्युमेंटरी को मिलाकर बनी एक फिल्म है क्या आज भी प्रेमियों को मौत की सजा नहीं सुनाई जाती? क्या आज भी भारत में ज़्यादातर सेक्स स्कैंडल हिडन कैमरों की मदद से नहीं बनते? क्या मीडिया में 'पैड न्यूज़' या 'ब्लैकमैलिंग' नहीं होती ? अगर दिबाकर इन्हें हमारे सामने रख़ रहे है तो हमें इन्हें एक्सेप्ट करने में हिचक क्यों हो रही है ? क्या फिल्म के शीर्षक में 'सैक्स' शब्द के होने के कारण ही ये बखेड़ा खड़ा हो रहा है यदि ऐसा है तो हमें इससे उबरने की ज़रुरत है l
दिबाकर अपनी इस फिल्म में शायद यह दिखाना चाहते हैं कि छोटा-बड़ा हर कैमरा अपने आप में एक निर्देशक है इन मायनो में निर्देशक, निर्देशक कम एडिटर की भूमिका ज्यादा निभाता जान पड़ता है l क्योंकि कैमरा तो सिर्फ शूट करता है लेकिन निर्देशक उस शूटिंग को (LSD के सन्दर्भ में) सही मायने में एडिट करता चलता है इस फिल्म की तीन कहानियों को एक ही कलात्मक विचार में पिरोने की सफल कोशिश के दौरान दिबाकर डायरेक्टर-कम-एडिटर बन गए हैं ज़रुरत है इस तरह के नए प्रयोगों को तवज्जो देने की ताकि हर गली हर नुक्कड़ पर एक निर्देशक-एक एडिटर का ख्वाब जन्म ले सके l साहित्य में यह कहा जाता है कि ऐसी कोई वस्तु नहीं जिस पर कविता न लिखी जा सके l इस फिल्म के सन्दर्भ में दिबाकर हमें यही बताने की कोशिश करते हैं l
यह फिल्म हमें रश्मि(एक कैरेक्टर) जैसी उन तमाम लड़कियों के बारे में सोचने के लिए विवश करती है जो ना चाहते हुए भी उस स्कैंडल का हिस्सा हैं जिसका दायरा घर से लेकर मीडिया की चहल-पहल और यू-ट्यूब तक फैला है यह फिल्म शायद सबसे दर्दनाक तरीके से एक सांवली, भावुक(ईमानदार) लड़की की बदकिस्मती को ही नहीं दिखाती बल्कि इस ठरकी समाज के उस नंगेपन को भी दिखाती है जो कहता है कि 'कपडे उतारने के बाद काली-गोरी सब अच्छी लगती हैं l'