शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

कलयुग का असली चेहरा



१९८०-८१ में आई श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म कलयुग महाभारत के प्लॉट का इस्तेमाल करते हुए भी इससे स्वयं को अलगा लेती है। इसके चरित्र असल में महाभारत के चरित्र न होने पर उन चरित्रों सरीखे दीखते हैं। इस फिल्म का निर्माण शशि कपूर ने किया था जिसमे महाभारत की कथा का सहारा लेते हुए समकालीन संदर्भों में एक ही वंश के दो औद्योगिक घरानों के बीच की प्रतिस्पर्धा को दिखाने का प्रयास किया गया था यह प्रतिस्पर्धा कब एक युद्ध में परिणत हो जाती है इसका पता नहीं चलता। संभवत् निर्देशक को भी नहीं, यह फिल्म का एक असंतुलित पक्ष है। कैसे एक औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में शामिल लोग आँख के बदले आँख की मांग करने लगते हैं फिल्म में इसका प्रदर्शन है। गाँधी जी ने कहा था कि अगर आँख के बदले आँख की मांग की गई तो सारी दुनिया अंधी हो जाएगी। गाँधी इस बात को कहते हुए अपने युग के महायुद्धों-विश्वयुद्धों को ध्यान में रखे थे। कलयुग के चरित्र इसे अपनी स्मृति से विस्मृत  करने में ही संलग्न दिखते हैं।

हालाँकि कलयुग श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित एक ऐसी फिल्म है जिसमे महाभारत की कथा को अपनी पटकथा का आधार बनाया है लेकिन यह तब भी महाभारत की कथा न होकर उस कथा की कलयुगीन(समकालीन) दशा का चलचित्रांकन है एक अन्य संदर्भ में कलयुग महाभारत नामक महाकाव्य का संदर्भ बिंदु है। हाँ केवल संदर्भ-बिंदु , समकालीन संदर्भ-सापेक्षता में उसका मूल्याँकन नहीं। यही मेरे लिए इस फिल्म को ख़ास बनाता है। श्याम बेनेगल इस फिल्म में महाभारत की कथा का केवल आधुनिक संदर्भ-बिंदु खोजने की कोशिश करते हैं और उसे बखूबी रूप में अभिव्यक्त भी करते हैं लेकिन उसका मूल्याँकन वह दर्शक पर छोड़ते हैं। श्याम बेनेगल ने उस रिस्क को उठाते हैं जिसे बहुत सारे निर्देशक छूना नहीं चाहते। एक एपिक पर उसकी कथा को उठाकर भी न उठाना श्याम बेनेगल ने संभव किया है। रचनाकार के समक्ष इस तरह का जोखिम हमेशा रहता है। ऐसा जोख़िम स्वयं धर्मवीर भारती को अंधा-युग लिखते वक्त भी था

श्याम बेनेगल की कलयुग के संदर्भ में मुझे धर्मवीर भारती का अंधा-युग यदि याद आता है तो उसका कारण भी यही है। जैसा अंधा युग की भूमिका में धर्मवीर भारती लिखते हैं -  पर एक नशा होता है - अंधकार के गरजते महासागर को चुनौती को स्वीकार करने का, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे खतरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ कणों को बटोरकर, बचाकर, धरातल तक ले जाने का - इस नशे में इतनी गहरी वेदना और इतना तीखा सुख घुला मिला रहता है कि उसके आस्वादन के लिए मन बेबस हो उठता है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत और उससे पहले और स्वतंत्रता या विभाजन के दौरान का भारत बार-बार इस कलयुग को देखता रहा है। निश्चित ही यह युग आस्था की मृत्यु के पश्चात जन्मा था जिसके बीज द्वापर युग में ही डल गये थे। जब महाभारत संभव हुआ। बेनेगल धर्मवीर भारती की भाँति महाभारत की कथा की समकालीन संदर्भ-सापेक्षता का मूल्याँकन नहीं करते। इससे कई समीक्षकों के लिए यह फिल्म बेनेगल जैसे बड़े निर्देशक की एक कमज़ोर फिल्म मानी जा सकती है लेकिन कहीं न कहीं यह कमज़ोरी ही फिल्म की सबसे बड़ी खूबी मानी जानी चाहिए। महाभारत और अंधायुग कृष्ण केंद्रित कथा कहता है जबकि कलयुग की कथा करन (कर्ण) की केंद्रीयता की कथा है। कलयुग की आंतरिक अर्थसत्ता का मूल्याँकन तभी संभव है जब करन (कर्ण) की आधुनिक संदर्भवत्ता का मूल्याँकन दर्शक कर सके। संभवत् यहीं से श्याम बेनेगल दर्शक के लिए समीक्षा की राह बनाते हैं। मुझे ये उनके बहुत बाद की फिल्म ग़ुलाल (अनुराग कश्यप) की फिल्म में गाये पीयूष मिश्रा के गीतों में मिलती है इस फिल्म के एक दृश्य में रामधारी सिंह दिनकर की कविता का समकालीन संदर्भ मे गायन करते हैं। कहीं कहीं इस गीत में कलयुग का केद्रीय विचार छिपा है -
ये देख गगन मुझमे में लय है, ये देख पवन मुझमें लय है।
मुझमें लय है संसार सकल, मुझमे धरती आकाश सकल
ये देख महाभारत का रण, मुर्दों से भरी हुई भू है।
पहचान कहाँ इसमे तू है।
कलयुग महाभारत के चरित्रों को आज के संदर्भ में और समय की इस वर्तमानता में खोजने की कोशिश करती है। कुछ लोग कहेंगे कि यह महाभारतयुगीन चरित्रों का कलयुगीन रूपांतरण है पर ऐसा कहकर कहीं न कहीं हम इस फ़िल्म से हट जाते हैं। मैं कहूँगा यह फ़िल्म महाभारत के चरित्रों का कलयुगीन रूपांतरण ही नहीं बल्कि महाभारत की वर्तमान संदर्भसापेक्ष पैरोडी है और निश्चित ही जिसमें समकालीन समयबोध शामिल है।
मुझे फिर पीयूष मिश्रा याद आते हैं -
इस देश में जिस शख़्स को जो काम था सौंपा।
उस शख़्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी।।

कलयुग में जितने भी किरदार (शख़्स) हैं कहीं न कहीं वो अपने काम की कार्यविधियों का विरोध करते हैं कलयुग का मूल संकट और अंधा-युग का मूल संकट यहां आकर एक समान हो जाता है। अनास्था यहाँ भी हावी है विश्वास की डोर यहाँ भी टूटती है। महाभारत में जहाँ कर्ण और दुर्योधन का मैत्री विश्वास अंत तक कायम था कलयुग में धनराज के मन में करन के प्रति अविश्वास बढ़ता है। वह उसे दग़ाबाज़ मानता है और करन की मौत के बाद आत्महंता बनता है।

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