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मंगलवार, 19 जनवरी 2016

प्रतिमा के बारे में


प्रतिमा के बारे में आज जब मैं सोचता हूँ तो मुझे वही एम.ए वाली चुलबुली प्रतिमा अपने जेहन में दिखती है। एक लड़की जो मेरी खामियों को उपलब्धि और सीमाओं को मेरी सफलता मानती है। एक लड़की जिसे मेरे कपड़ों और चेहरे से ज्यादा मेरे विचार पसंद है। एक लड़की जिसे मुझमें वो सब पसंद है, जो खुद मुझे भी पसंद नहीं है।
हमें मिले अब 9 साल बीत चुके हैं। मैं शादी के बाद भी प्रतिमा से वही सवाल करता हूँ कि आखिर उसने मुझमें क्या देखा। और जवाब के लिये उसकी आँखों में झाँकने की कोशिश करता हूँ। वो पलकें झपका देती है मैं किसी और दिन के लिये यह सवाल बचा कर रख लेता हूँ।
मैं चाहता हूँ कि मैं सिर्फ प्यार की बात करुँ लेकिन इस भयावह जातिगत समय में आप अंतर्जातीय विवाह करने के बाद केवल प्यार की बात नहीं कर सकते। मसलन आपके सामने वो चुनौतियाँ खड़ी होंगी जिन्हें चुनौती के रूप में स्वीकार करने के लिये आपका दिल कभी नहीं चाहेगा। आपके घरवाले, दोस्त, पड़ौसी, बिरादरी वाले, आपके सामने गतिरोधक बन खड़े होंगे। उनके अजीब से तर्कों से आप झल्ला जाएंगे। आपको बात-बात पर इमोशनली ब्लैकमेल किया जाएगा। आप नहीं डिगेंगे, खूब आँसू बहेंगे। “समाज क्या कहेगा। तेरे ताऊजी तो जिंदा गाड़ देंगे तुझे जैसे धमकी भरे वाक्य धौंस के साथ सुनाए जाएंगे। आप सहते रहेंगे और कहते रहेंगे या तो उससे शादी करुँगा या किसी से नहीं।“ पर मैंने ऐसा कुछ नहीं किया मैंने अपने पिता के सामने प्रतिमा के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखा। पहला सवाल जिसकी मैं उम्मीद कर रहा था अपनी कास्ट की है न ?” पापा ने सवाल किया। नहीं, मैंने कहा। अग्रवालों में है?” नहीं, मैंने जवाब दिया। फिर क्या कोई पंजाबन या पहाड़ी तो नहीं, नहीं मैंने फिर से जवाब दिया और कहा कि मेरे साथ पढ़ती है यूनिवर्सिटी रैंक होल्डर है, यूटीए में भी मेरे साथ थी, मुझसे कहीं ज्यादा खूबसूरत है। परिवार पढा लिखा है। बहुत मेहनती है। बिल्कुल जैसी लड़की आप मेरे लिये ढ़ूँढ़ना चाहते हैं।
मैं उन्हें जाति के सवाल से हटाकर बाकी सारी बातों पर लाने की कोशिश करता रहा। पर उनकी सुईं वहीं अटकी रही। वो सब ठीक है बेटा पर एस. सी तो नहीं है न?” हाँ, पर इससे क्या फर्क पड़ता है, मैंने कहा. तुझे नहीं पड़ता पर तेरी बहनों की शादी पर इसका फर्क पड़ेगा। तेरे ताऊ क्या कहेंगे। बिरादरी तेरे साथ मेरा भी बायकाट कर देगी।
पापा मुझे आपने पाला, आपने पढाया। जब दर्द हुआ आपने मेरी आह सुनी। कोई ताऊ या बिरादरी वाला मेरा हाल जानने नहीं आया इसलिये मुझे आपकी राय जाननी है बाकी की राय से मुझे वाकई कोई फर्क नहीं पड़ता।
लेकिन मुझे स्वीकार करना चाहिए कि एक लड़का होने के नाते मेरा अपने पापा का सामना करते हुए ऐसे तर्क देना तब भी आसान था। और मुझे नहीं लगता की मैंने कोई बहुत बड़ी लड़ाई या संघर्ष अपने घर में किया हो। जितना हुआ उतने की उम्मीद मैं पहले ही करके चल रहा था। बहनें रूठीं, फिर मान गईँ, ताऊ रूठे, वो आज भी रूठे हुए हैं मैं भी उन्हें मनाना नहीं चाहता। ऐसे लोग रूठें ही रहें तो समाज की ज्यादा भलाई होगी।
मुझे लगता है कि हमारे समाज में जब एक दलित लड़की किसी गैर दलित लड़के से शादी करने के बारे में सोचती है या फैसला लेती है तब उसके शादी करने के बारे में सोचने से पहले एक दंभित समाज उसके सामने खड़ा होता है। जब प्रतिमा ने मेरे सामने अपने प्यार का इज़हार किया था उससे पहले एक और इज़हार एस. एम. एस के माध्यम से किया था वो मैसेज था तरुण मैं एस. सी हूँ। उस वक्त मुझे यह बहुत अजीब लगा था पर आज मैं प्रतिमा के उस संदेह को समझने की कोशिश करता हूँ। यह एक भयावहता है जिसे हमारे शहर ऊपरी तौर छिपाने की कोशिश करते हैं। गाँवों में यह भयावहता ज्यादा साफ तौर पर दिखती है। मैं जिस भयावहता की बात कर रहा हूँ वह प्रतिमा के सांदेशिक प्रश्न में मौजूद है। मेरी पहली और शायद अंतिम चुनौती भी प्रतिमा के सामने खुद को साबित करने की थी जिसे प्रतिमा के प्यार और विश्वास ने स्वतः खत्म कर दिया। आज मुझे समाज से कोई गिला नहीं, हालाँकि हम दोनों शादी के बाद उन अंतरालों को नहीं भर सके जो एक अंतर्जातीय विवाह के पश्चात पैदा होते हैं लेकिन कम से कम मुझे उन अंतरालों को भरने की कोशिश या चाह नहीं होती है।
मुझे आज भी इस बात का अफसोस है कि मैंने प्रतिमा को पहले पसंद क्यों नहीं किया। मैंने उसे प्रपोज़ क्यों नहीं किया। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ तुम मेरी साँसें हो, मैं फिर वहीं पंक्तियाँ कहूँगा jo शादी से पहले कही थी..
तुम्हारे पास रहता हूँ।
तो मैं कुछ खास रहता हूँ।।
नहीं तो बिन तुम्हारे मैं
बहुत उदास रहता हूँ।।
सुना है रोज़ रहता है
जमाने भर का डर तुमको
तुम्हारे साथ रहता हूँ,
तो मैं आज़ाद रहता हूँ।।



रविवार, 17 जून 2012

ताई


पिता जब भी हमारा संडे मनाते माँ की हिम्मत नहीं होती कि वो बीच में आ हमें बचा लें। हिम्मत न होने पर भी वो निरुपा राव की तरह बीच में आती और पिता उन पर भी दो चार रसीद कर देते। हमारे समाज में पत्नी पर और बच्चों पर हाथ न उठाने वाला मर्द दरअसल मर्द ही नहीं समझा जाता। पिता के भीतर यह सोच बुआ और दूर के रिश्ते की दादीनुमा बूढ़ी औरत ने भरी। पिता में यह बात वह बार-बार भरती कि कहीं पिता जोरु के गुलाम न बन जाए। हमारे समाज में पत्नी से प्यार करने वाला और उसकी बातों में सहमति रखने वाले मर्द को जोरु का गुलाम या औरत के पेटिकोट में घुसने वाला मर्द समझा जाता है। खैर हम जब पिटते तो माँ हमें बचाने आती और खुद भी उस प्रतिभाग को पाती। ऐसे में हमारी सामने वाली पड़ोसन जिसे हम सब ताई कहते थे वहीं एक थी जिसकी शरण में हम सारे भाई बहन खुद को महफूज़ पाते। पिता ताई के सामने नहीं बोल पाते थे उनका कहना था कि वे उनका बहुत आदर करते है इसलिए उनके सामने उनका हाथ नहीं उठता था मैं आज तक ऐसी सोच को नहीं समझ सका हूँ।
ताई की डैथ मेरी माँ के मरने के एक महीने के भीतर ही हो गयी थी। वो बाथरूम में नहाते वक्त मृत पायी गयी थी मेरी ताई की लड़की ने मुझे आवाज़ दी थी मैं ही अपनी गोद में उनके निरवस्त्र शरीर को बाथरूम से उठाकर कमरे में लाया था सविता पास खड़ी रो रही थी और मैं ताई की आँखों के नीचे एक लंबी धार के दाग को देख रहा 
था उनकी आँखे पूरी तरह बंद नहीं थीं थोड़ी खुली हुई थी जिसकी वजह से मुझे उनके शरीर में जान होने का भ्रम बार बार हो रहा था। मैं पहला शख्स था जो बाथरूम में उनके दीवार से पीठ टिकाए बैठे शरीर को उठा कर लाया था वह इमेज काफी लंबे समय तक मेरे जहन में ताई के मरने के बाद भी जिंदा रही। ताई ने एक मग पानी भी अपने शरीर पर नहीं ड़ाला था। उनका शरीर बिल्कुल सूखा था सविता का कहना था कि ताई आधे घंटे से बाथरूम में ही थीं। कहते हैं उन्हें हर्ट अटैक आया था। सविता ने मुझे बताया था कि कोई बात तो थी नहीं बस पापा(ताऊ) से कहा-सुनी हुई थी और उन्होंने ने थोड़ा पीटा था बस उसके बाद (मम्मी)ताई नहाने चली गई पर सविता का कहना था कि ऐसा पहली बार था कि पापा के मारने पर भी मम्मी रोई नहीं थी और सीधा बाथरूम में नहाने चली गई थी। लोगो का कहना है कि ताई हमारे यहाँ की सबसे भली महिला थी अभी पच्चीस दिन पहले मेरी माँ की डैथ पर लोगों ने ऐसा ही कहा था। लेकिन मुझे लगा कि मरने और कहने के बीच में बहुत कुछ अनकहा रह गया।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

बिलकुल माँ वाली खुशबू

अपने तमाम सार्वजनिक दायित्वों के बावजूद हम सब में एक निजत्व होता है। “माँ में से एक खुशबू आती थी बिल्कुल माँ वाली” ‘उड़ान’ फिल्म का यह संवाद इसी निजत्व की ईमानदार अभिव्याक्ति है।
यह आज मुझे अधिक महसूस हो रहा है कल जन्माष्टमी है। एक वक्त था जब इस त्योहार के अवसर पर मेरा घर घी में खोये को भूनने की खुशबू से भर जाता था हमारे सामने वाली पड़ोसन(जिन्हें हम ताई कहते थे) और मेरी माँ मिलकर हम भाई-बहनों के लिए पंजीरी और मैथी के लड्डू बनातीं थीं और मेरे लिए स्पेशल पेड़े बनते थे क्योंकि मैं पंजीरी और मैथी के लड्डू दोनों ही पसंद नहीं करता था। पंजीरी में कसा हुआ गोला डलता था जो मेरे दाँतों मे अटकता था और लड्‍डू मुझे कड़वे लगते थे उस वक्त। क्या कुछ है जो आज उस स्मृति बनी याद को फिर से सच में तबदील कर सके।
मेरे घर में पापा हैं, भैया है-भाभी है मगर आज मेरा घर उस खुशबू से महरूम है जो कुछ समय पहले तक मेरे घर में आती थी।

सोमवार, 3 नवंबर 2008

जज़्बात

नहीं नहीं , नहीं-नहीं यहाँ कोई नहीं है
खुशबू फूलों में नहीं , रंगे-मेहफ़िल भी नहीं है ।

क्या हुआ वक़्त जो ठहरा हुआ-सा लगता है
पास में सब हैं मगर, साथ में कोई नहीं है ।

क्या करे इश्क़-ए-मजमूँ जो समझ में ना आया (प्यार का मतलब)
क्यों ना कह दूँ कि मुझे इसका तो इरफ़ा नहीं है । (जानकारी)

और बच जाऊँ अब ये कहके मैं उनकी नज़र से
कि किसी और से है प्यार, पर तुमसे...........

मंगलवार, 30 सितंबर 2008

कभी-कभी

एक भी बात नही बनती अब तो ।
क्या रही कमी अब तो ।।

कुछ भी दिल से निकल नही पाता ।
धड़कन भी है थमी अब तो ।।

राहबर जान कर जिन्हें चाहा ।(दोस्त )
राहजन बन गए वो लोग अब तो।।(लुटेरे)

बात जिनसे नहीं छिपाई कोई ।
वो पूछते है कुछ कहो अब तो ।।