तुम्हारे बारे में क्या कहूं मै, मेरी तमन्नाओं का सिला है. नहीं मिला जो तो मुझको क्या है, मिलेगा तुमको ये आसरा है.
मंगलवार, 10 मई 2011
माँ
दरवाज़े बंद पर भीतर नसों के जाल मे झनझनाती चुप्पी
बाहर एक चमक में लिख जाती है
सूखी ज़मीन माँ ऐसी नहीं।
व्यवहार के साधारण अर्थ भी भूल चुकीं
बुखार में कलेजे के टुकड़े तक फूँके जाते हैं
माँ पूछती है क्या करने जाएँ वहाँ ?
हर तरफ गुपचुप पगुराते ओंठ है और
चौखट पर दूर से ही पाँवों की घिसटन सुनाई पड़ती है-
कोई शब्द कहीं फिसल पड़ा है
माँ उसे उठाकर शब्द के पास ही रख देती है ज्यों का त्यों
फिर हमारे पास आकर बैठ जाती है माँ खोती भी नहीं।
अपनी याददाश्त हमारे चेहरों की
हाँ आँखें उनकी खो चुकी हैं वह कुछ जो सिर्फ हमारा होकर
रह गया है माँ ने उसे नहीं सृजा
तपिश
और उसमें से फूटती जलती ज़मीन की साँस।
(मलयज)
शुक्रवार, 21 मई 2010
बद्री नारायण की कविता
एक पेड़ की शोकसभा में आमंत्रित है आप
आइये पेड़ की शोकसभा में
आइये
कल जनतंत्र और राजसत्ता ने
उतार कर मानवीय चेहरा
तोप, बम, हेलिकॉप्टर
कर दिया था तैनात
रात भर के चले अर्धसैनिक बलों के अभियान में
यह पेड़ अंतत: मारा गया
देखिये खबर लहरिया अख़बार के पांचवे पेज के चौथे कॉलम
की न्यूज़ है यह..
पूरी कविता पढने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें www.jnanpith.net
गुरुवार, 28 जनवरी 2010
बतूता का जूता - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में
कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दुकान में।
सन्दर्भ:- कविता-कोश (www.kavitakosh.org)
गुलज़ार का लिखा 'इश्किया' का गीत 'इब्न-बतूता...जूता...' सर्वेश्वर की कविता का समकालीन संस्करण जान पड़ता है...
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009
वर्तिका नंदा की कविता
आंखों के छोर से
पता भी नहीं चलता
कब आंसू टपक आता है और तुम कहते हो
मैं सपने देखूं।
तुम देख आए तारे ज़मी पे
तो तुम्हें लगा कि सपने
यूं ही संगीत की थिरकनों के साथ उग आते हैं।
नहीं, ऐसे नहीं उगते सपने।
मैं औरत हूँ।
अकेली हूं।
पत्रकार हूं।
मैं दुनिया भर के सामने फौलादी हो सकती हूं
पर अपने कमरे के शीशे के सामने
मेरा जो सच है,वह सिर्फ मुझे ही दिखता है
और उसी सच में, सच कहूं,सपने कहीं नहीं होते।
तुमसे बरसों मैनें यही मांगा था
मुझे औरत बनाना, आंसू नहीं
तब मैं कहां जानती थी दोनों एक ही हैं।
बस, अब मुझे मत कहो कि मैं देखूं सपने
मैं अकेली ही ठीक हूं
अधूरी, हवा सी भटकती।
पर तुम यह सब नहीं समझोगे
समझ भी नहीं सकते
क्योंकि तुम औरत नहीं हो
तुमने औरत के गर्म
आंसू की छलक
अपनी हथेली पर रखी ही कहां?
अब रहने दो
रहने दो कुछ भी कहना
बस मुझे खुद में छलकने दो और अधूरा ही रहने दो।
(वर्तिका नंदा की अनुमति से प्रकाशित....)
मंगलवार, 29 सितंबर 2009
अहमद फ़राज़ की बेहतरीन ग़ज़ल
ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा
आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा
इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जायेगा
तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जायेगा
ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जायेगा
डूबते डूबते कश्ती तो ओछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जायेगा
ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का "फ़राज़"
ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जायेगा
रविवार, 20 सितंबर 2009
बद्रीनारायण की कविता
प्रेत आएगा
किताब से निकाल ले जायेगा प्रेमपत्र
गिद्ध उसे पहाड़ पर नोच-नोच खायेगा
चोर आयेगा तो प्रेमपत्र ही चुराएगा
जुआरी प्रेमपत्र ही दांव लगाएगा
ऋषि आयेंगे तो दान में मांगेंगे प्रेमपत्र
बारिश आयेगी तो प्रेमपत्र ही गलाएगी
आग आयेगी तो जलाएगी प्रेमपत्र
बंदिशें प्रेमपत्र ही लगाई जाएँगी
सांप आएगा तो डसेगा प्रेमपत्र
झींगुर आयेंगे तो चाटेंगे प्रेमपत्र
कीड़े प्रेमपत्र ही काटेंगे
प्रलय के दिनों में सप्तर्षि मछली और मनु
सब वेद बचायेंगे
कोई नहीं बचायेगा प्रेमपत्र
कोई रोम बचायेगा कोई मदीना
कोई चांदी बचायेगा कोई सोना
मै निपट अकेला कैसे बचाऊंगा तुम्हारा प्रेमपत्र
मंगलवार, 15 सितंबर 2009
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
घर में घुसते ही
मैंने अपने कपड़े उतारे
जिसे वह बुद्धिजीवी का
चोगा कहती है।
खाने की मेज़ पर
केवल कुछ किताबें खुली हुई पड़ी थीं
जिन्हें मै पढ़ने से डरता था।
वह चारो तरफ
कहीं नहीं थी
उसके कमरे का दरवाज़ा
भीतर से बंद था।
रसोईघर में जाने की
मेरी हिम्मत नहीं हुई।
मै सोफे पर
टांगें फैला पसर गया
और छत पर
रुका हुआ पंखा देखने लगा।
अचानक मेरी दृष्टि
सोफे के पास मेज़ पर रखे
केसैट टेप रेकार्डर पर पड़ी
जिस पर एक चिट लगी थी
'इसे सुनो।'
मैंने 'की' दबा दी
तरह-तरह की चीखें आने लगीं।
कुछ देर उन्हें सुनते-सुनते
जब मै घबरा गया
तब एक साफ आवाज़
सुनाई दी--
यह उसकी आवाज़ थी :
'यदि तुम कायरो की
ज़िन्दगी जियोगे
तो मै यह घर छोड़कर
चली जाऊँगी।
बुधवार, 9 सितंबर 2009
साही की कविता
परम गुरु
दो तो ऐसी विनम्रता दो
कि अंतहीन सहानुभूति की वाणी बोल सकूँ
और यह अंतहीन सहानुभूति
पाखंड न लगे ।
दो तो ऐसा कलेजा दो
कि अपमान, महत्वाकांक्षा और
भूख की गांठों में मरोड़े हुए
उन लोगों का माथा सहला सकूं
और इसका डर न लगे
कि कोई हाथ ही काट खायेगा ।
दो तो
ऐसी निरीहता दो
कि इस दहाड़ते आतंक के बीच
फटकार कर सच बोल सकूँ
और इसकी चिन्ता न हो
कि इस बहुमुखी युद्ध में
मेरे सच का इस्तेमाल
कौन अपने पक्ष में करेगा ।
यह भी न दो
तो इतना ही दो
कि बिना मरे चुप रह सकूँ ।