रोज़ की तरह आज भी डी.टी.सी देर से मिली , वो भी नई वाली । जी हाँ , वही बस जिस पर विपक्ष ने दिल्ली सरकार को बार-बार घेरा है । हरी वाली बस । इसमे तकनीकी ख़ामियों की चर्चा पहले भी होती रही है लेकिन हर बार कुसूर मशीनरी का ही नही होता , आदमी नाम की मशीन में वास्तविक मशीन से ज़्यादा गड़बड़झाला है । वह क़दम-क़दम पर प्रयोग करता चलता है जैसे चलते-चलते सड़क पर पड़ी खाली बोतल , डब्बो पर लात मारना । सोते हुए कुत्तों पर पत्थर फैंकना या फिर पत्थर की असुविधा होने पर , लात से ही काम लेना । वह यह देखता चलता है कि ऐसा करने से क्या होगा । वैसा करने पर क्या होगा ।
प्रयोग करना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन इसे करते वक़्त दूसरों की सुविधा-असुविधा का ख़याल न रखता ज़रूर ग़लत है । आज बस में भी ऐसा ही कुछ हुआ । बस काफी स्मूथ चल रही थी लेकिन एक सज्जन को अगले गेट पर लगा लाल बटन परेशान कर रहा था । उसने तुरंत ही इस परेशानी को प्रयोग में बदलने के लिए बटन को पुश कर दिया , स्मूथ चल रही बस में ख़ामी आनी लाज़मी थी । ड्राइवर ने जब उससे पूछा कि तूने ये बटन क्यों दबाया तो उसका वही आन्सर था जो अधिकतर लोगो का ग़लती करने पर होता है । उसने कहा मैंने तो ऐसे ही दबा दिया .। देख रहा था क्या होगा । बस रुक गयी थी वो सज्जन उतर गए लेकिन उन साहब की वजह से हमें २० मिनट तक रुकना पड़ा । ड्राइवर ने सब सवारियों को एक ही सुर में कोसना शुरू , खैर इंजन की ख़ामी दूर हुई हम चल पड़े । तभी मेरे बराबर में बैठे लड़के के मोबाइल पर एक गाना बजा । बोल थे ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा । मेरा ग़म कब तलक मेरा दिल तोड़ेगा ...............। ये गाना हमारी सिचुएशन पर कितना फिट बैठ रहा था । रंग की जगह बटन लगा दो तो भी कोई दिक्कत नही होगी ।
तुम्हारे बारे में क्या कहूं मै, मेरी तमन्नाओं का सिला है. नहीं मिला जो तो मुझको क्या है, मिलेगा तुमको ये आसरा है.
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शुक्रवार, 7 नवंबर 2008
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