बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

वर्चुअल स्पेस और मुद्रण माध्यम




मुद्रित माध्यम इंटरनेट से पहले भी कारगर रहे हैं और आज भी हैं। पुस्तकें पहले भी छपती और बिकती थीं और आज भी छपती और बिकती हैं बल्कि कहीं ज्यादा छपती और बिकती हैं। जिन पाठकों को पुस्तकें पढ़ने का शौक है वे इंटरनेट पर भी पढ़ते हैं और खरीदकर भी। फिर सवाल है कि आज के युग में खासकर इंटरनेट के युग में मुद्रित माध्यम के समक्ष चुनौती कौन सी है या हम कहें वे कौन से खतरें हैं जो मुद्रित माध्यमों के लिये इंटरनेट के आने के बाद पैदा हुए। मुझे लगता है यह थोड़ा समझ का फेर है लेकिन उसे समझने से पहले वर्तमान स्थिति पर थोड़ा ध्यान देना चाहिये।
वर्तमान समय में (जिसे हम इंटरनेट का दौर कह रहे हैं) किताबों की बिक्री और प्रकाशन बढ़ा ही है। इसके लिये वे खबरें आधार स्वरूप ली जा सकती हैं जो पुस्तक मेला लगने के दौरान अखबारों में आती हैं। हालांकि प्रकाशकों का मर्ज कुछ और ही होता है।
बहरहाल एक समय था जब आपको अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिये पुस्तक और उसके प्रकाशन का सहारा लेना पड़ता था। एक समय था जब आपके पास खबरों को हासिल करने का जोखिम उठाने का साहस होने के बावजूद किसी प्रैस का मुँह ताकना पड़ता था। एक समय था जब एक कवि या शायर को अपने अशआर लोगों तक पहुँचाने के लिये प्रकाशक की चिरौरी करनी पड़ती थी। एक समय था जब लेखक अपनी पुस्तक की भूमिका में प्रकाशक का धन्यवाद देने के लिये बाध्य था। उसे भय था कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो प्रकाशक रूठ जाएगा संभवत् अगली पुस्तक के प्रकाशन के वक्त परेशान करे। एक समय था जब लेखक कुछ लिखता और छपवा न सकने के ग़म में स्वांतसुखाय हो उस रचना को एक डायरी की शक्ल दे दिया करता। यानि लेखक को अपनी बात पाठक तक पहुँचाने के लिये प्रकाशक की सहमति-असहमति से होकर गुजरना पड़ता था। लेखक की क्या मजाल जो वह प्रकाशक की सहमति के बिना पुस्तक में कोई विरोधी बात कर सके। हम यहाँ प्रकाशकों का सामान्यीकरण नहीं कर रहे लेकिन उस समय अधिकतर लेखक एक तरह के प्रकाशक वर्चस्व की परिधि से स्वयं को आजाद नहीं कर पाते थे। यानि इंटरनेट से पहले लेखक के विचारों की आजादी प्रकाशक की गुलामी के बिना संभव नहीं थी। कम से कम हिंदी जगत में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो जीवनभर अपनी कृतियों को प्रकाशित करवाने के लिये प्रकाशकों के चक्कर काटते रहे, पर अपना लिखा न छपवा सके। यह एक तरह का विरोधाभासी जगत है जहाँ हमें एक तरफ किताबों की शक्ल में छपीं दोयम दर्जे की पुस्तकों की भरमार मिलेगी साथ ही दूसरी तरफ अच्छी और पठनीय पुस्तकों के आउट ऑफ प्रिंट होने की कसक भी मिलेगी, जिनके पाठक सालों से उनके प्रकाशन के इंतज़ार में है। हम कहेंगे विरोधाभासी होने के बावजूद यह मुद्रित माध्यमों का समानांतर संसार है। दोनों साथ-साथ चलते हैं। लेकिन जैसा मैंने कहा, यह एक समय था।
आज प्रकाशक के व्यवहार में अगर परिवर्तन न भी आया हो तो लेखक के पास इंटरनेट के रूप में एक प्लेटफॉर्म है जहाँ वह अपनी बात बेझिझक रख सकता है। जहाँ उसके शब्दों और विचारों पर सेंसर की तलवार नहीं लटकी होती। जहाँ वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सार्थक प्रयोग कर सकता है। जहाँ वह पॉपुलर हो सकता है इतना कि प्रकाशक खुद उसे छापने के लिये लालायित दिखें। पत्रिकाएं उससे कॉलम लिखवाने के लिये संपर्क साधे। वह एक वक्ता के रूप में व्याख्यान दे। यानि खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है। आप कवि हैं कविता लिखते हैं, आपकी डायरी आपकी कविताओं से भरी पड़ी है। आप कथाकार हैं कहानियाँ लिखना आपको पसंद है। आप दुनिया जहान की खबर रखते हैं। आप एक पत्रकार बनना चाहते हैं। इंटरनेट से पहले आपको अपनी इच्छाओं को दूसरे के हिसाब से ढालना पड़ सकता था। लेकिन इंटरनेट के आने के बाद आप स्वयं सक्षम है कि आप अपना मनचाहा लिखें और उन पर आई टिप्पणियों का जवाब दें। मुद्रित माध्यमों में लेखक और पाठक के मध्य एक तरह का गैप विद्यमान था। वर्चुअल स्पेस ने यह गैप बिल्कुल खत्म कर दिया है। यहाँ लेखक पाठक से सीधे मुखातिब है। वर्तमान समय की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे हम सिर्फ मुद्रित माध्यमों की स्थिति और चुनौतियों के स्तर पर ही नहीं बल्कि इंटरनेट के संदर्भ में अभिव्यक्ति के नये उभरते प्लेटफॉर्म और खोज के नए उपक्रम के रूप में भी देख और समझ सकते हैं।  
इंटरनेट के दौर में, आज ऐसे लेखकों की कमी नहीं है जिन्होंने अपने लेखन की शुरुआत ब्लॉग लिखने से की और लोगों द्वारा सराहे गये। ऐसे पत्रकार, कवि, आलोचकों, अध्यापकों की कमी नहीं जो मुद्रित माध्यम की अपेक्षा वर्चुअल स्पेस पर अपनी बात रखने को ज्यादा तरजीह देते हैं।
मोहल्लालाइव, मीडियाखबर.कॉम, हुंकार.कॉम, नईसड़क.कॉम, दीवान, द हूट, चुरमुरी.कॉम, भड़ास.कॉम, जानकीपुल.कॉम आदि ऐसे अनगिनत ब्लॉंग हैं जो निरंतर सक्रिय हैं लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं समझना चाहिये कि इनका उभार मुद्रित माध्यम के पतन के रूप में हमारे सामने आया है। हमें लगता है कि किताबों की खरीद की अपनी दुनिया है। हमें मुद्रित माध्यम को इंटरनेट के बरक्स रखकर अपनी बात नहीं करनी चाहिए। इंटरनेट अपने उपयोगकर्ता को खरीद से पहले की प्रक्रिया की बानगी व्यवहारगत रूप में समझाता है और उसके सामने खोज का एक अपार संसार खोल देता है ताकि पाठक यह तय कर सके कि उसे क्या खरीदना है और क्या नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि इंटरनेट इस तरह का विकल्प अपने उपयोगकर्ता को मुहैया कराता है।
मेरे कई मित्र हैं जिन्होंने ब्लॉगिंग को अपनी अभिव्यक्ति का औज़ार बनाया। उन्हीं में से एक हैं विनीत कुमार जो मंडी में मीडिया जैसी पुस्तक के लेखक हैं। आज मैं सन् 2015 में खड़ा होकर 2007-08 के विनीत को देखता हूँ जो रवि रतलामी के नुस्खों और तकनीकों से सीख ब्लॉग लिख रहे थे। तब महत्वपूर्ण यह नहीं था कि वे क्या लिख रहे थे। बल्कि महत्वपूर्ण यह था कि वे निरंतर लिख रहे थे। पहले गाहे-बगाहे और अब हुंकार.कॉम के द्वारा वो हमारे सामने एक मीडिया क्रिटिक के रूप में जाने जाते हैं। उनके जैसे उदाहरणों से वर्चुअल स्पेस की शक्ति का अहसास होता है ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर हमें ऐसा प्लेटफॉर्म देते हैं जहाँ हम खुलकर अपनी बात को अभिव्यक्त कर सकते हैं। अपने आपको स्थापित कर सकते हैं। वर्चुअल स्पेस आपसे वह शब्दावली छीन लेता है जिसमें आप कहें कि मैं लिखता तो बहुत हूँ पर मुझे कोई छापता नहीं इसलिए मुझे कोई पढ़ता नहीं। मुद्रण माध्यमों और इंटरनेट के मध्य की स्थिति ने अगर आज एक चुनौती का रूप धारण कर लिया है तो उसके कारणों के रूप में निम्नलिखित उदाहरण को लिया जा सकता है।
नीरा राडिया के केस पर लिखे सेवंती नैनन के एक लेख (बिग ब्रदर्स टू द रेस्क्यू) को जब द हिंदू ने छापने से मना कर दिया। तब उन्होंने वह लेख द हूट पर डाल दिया। अगर इंटरनेट न होता तो संभवत् इसकी प्रतिक्रिया एक खीझ, एक कसक के रूप में होती। द हिंदू जैसा सम्मानित अखबार जब अपने ही कॉलम(मीडिया मैटर्स) लेखक को किसी लेख को छापने से मना कर सकता है। तब ऐसी स्थिति में आम लेखक और अन्य अखबारों के बारे में क्या कहा जाए। 
इस तरह के कई उदाहरण सामने रखे जा सकते हैं जो मुद्रण माध्यम की तानाशाही और वर्चुअल स्पेस के जनतंत्र का समर्थन करते हैं।    
वर्चुअल स्पेस की अन्य उपलब्धि यह भी है कि यह जहाँ एक ओर अभिव्यक्ति के लिये प्लेटफॉर्म प्रदान करता है वहीं ज्ञान का अपार संसार अपने उपयोगकर्ता के लिये खोल देता है। मुद्रित माध्यम इस तरह की सहूलियत अपने पाठकों को नहीं दे पाता। देता है तो कठिन परिश्रम और समय लेने के पश्चात। लेकिन वर्चुअल स्पेस पर यह सिर्फ कुछ शब्दों को टाइप करने और एक क्लिक पर आपके सामने उपलब्ध है। मान लीजिये आपको किसी लेखक या राजनेता के बारे में जिस किताब में भी लिखा गया हो, वह देखना है। ऐसे में मुद्रित माध्यम आपको कुछ दे पाये या न दे पाये वर्चुअल स्पेस पर आप गूगल बुक्स में जाकर उस लेखक या राजनेता का नाम टाइप कर दीजिये आपके सामने सैंकड़ों किताबें खुल जाएगी। और गूगल आपको सीधे किताब के उस पन्ने पर ले जाएगा। जहाँ उस लेखक या राजनेता का नाम आया है।
वर्चुअल स्पेस की इसी तरह की खूबी मुद्रित माध्यमों के लिये चुनौती बन गई है। लेकिन अब भी मुद्रित माध्यमों के पास अपार संभावनाएँ है। अभी भारत की अधिकतर आबादी इंटरनेट से महरूम है। आज इंटरनेट का उपयोगकर्ता पाँच सात पेज तो नेट पर पढ लेता है पर जहाँ पूरी किताब, ऩ़ॉवेल या कहानी पढने की बात आती है। वह प्रकाशित किताबों के पास जाता है। क्यों न वर्चुअल स्पेस को मुद्रित माध्यमों के विकास और प्रसार का माध्यम बनाया जाए। क्यों न हम उन उपायो को खोजे जिनसे किताबों को इंटरनेट के माध्यम से ज्यादा हाथों तक पहुँचाया जा सके। ऐसा क्यों होता कि जवाहरलाल नेहरू की किताब डिस्कवरी ऑफ इंडिया फ्लिपकार्ट.कॉम पर चालीस फीसदी की छूट के साथ घर तक पहुँच जाती है जबकि उसका अपना प्रकाशक पैंग्विन उस पर दस फीसदी से ज्यादा की छूट नहीं दे पाता। बिल्कुल संभव है कि हमारे तर्क कमजोर हों क्योंकि इंटरनेट और वर्चुअल स्पेस की जमकर पैरवी करने के बावजूद भी हम कहीं न कहीं मुद्रित माध्यमों के साथ खुद को खड़ा पाते हैं।






  
संदर्भ सूची
1.      नैनन, सैवंती; बिग ब्रदर्स टू द रेस्क्यू द हूट, 5 जनवरी 2012
2.      कुमार, विनीत; ‘मंडी में मीडिया वाणी प्रकाशन, दिल्ली
ISBN: 978-93-5072-216-9

    

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

वे मुसलमान थे - (देवी प्रसाद मिश्र)

वे मुसलमान थे...
कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे
ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे
वे मुसलमान थे
उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!
बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया
वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे
वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे
उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की
प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे
उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे
न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे
वे मुसलमान थे
वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए
वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू
वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं
वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे
वे मुसलमान थे
यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए
कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे
वे मुसलमान थे
वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता
मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती
वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता
मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता
वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे
वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे
इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे
वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे
वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे
वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे
वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे
वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं
वे शहर के बाहर रहते थे
वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं
उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे
वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे
वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है
अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे
वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे
वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे
कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए
वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे
सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे
वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसलमान थे अफ़वाह नहीं थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे .....
(देवी प्रसाद मिश्र)

शुक्रवार, 17 मई 2013

17वाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह


17वाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह

अभय कुमार दुबे का वक्तव्य :- 
मित्रों मैं आदरणीय स्व. देवीशंकर अवस्थी की स्मृति को नमन करते हुए अपनी बात कहूँगा और इस आस्था के साथ कहूँगा कि एक ऐसे व्यक्ति की बात को आप शायद गंभीरता से लेंगे  और उसकी धृष्टता को क्षमा करेंगे जो साहित्य की दुनिया से नहीं आता है जिसको राजेंद्र यादव ने 'साहित्य में अनामंत्रित' नाम स्थाई रूप से दे रखा है।
मित्रों जब मैं बजरंग बिहारी तिवारी का भाषण सुन रहा था तो लग रहा था कि मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ जो बच गया वरना हिंदी की दुनिया में रीतिकाल के महाकवि देव को अगर उद्धृत करके कोई अपनी बात को साबित करना चाहे तो समझ लीजिये उसकी आफत गई
अभी कल डाक से मेरे घर एक पत्रिका आई जो उत्तर प्रदेश के दूर-दराज के राज्य से निकलती है लेकिन बड़ी स्थापित पत्रिका है। मैं उसका नाम नहीं लूँगा जब मैंने उसका पला पन्ना पलटा तो सामने जो लेख था उसका शीर्षक था 'आधुनिक रीतिकाल..' तो रामचंद्र शुक्ल के रीतिकाल की जो आलोचना स्थापित की थी वो आलोचना रामविलास शर्मा के रास्ते से होती हूई हिंदी की दुनिया में इतनी जम चुकी है उसने एक बहुत ही गहरे पूर्वाग्रह का दर्जा प्राप्त कर लिया है और मित्रों, जिस व्यक्ति ने इस पूर्वाग्रह को तोड़ना चाहा - भंग करना चाहा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और जब उन्होंने ये कहा रीतिकाल की कविता एक सक्रिय कविता है तो हमें पता है रामविलास जी उन पर बहुत कुपित हो गये और उन्होंने उनको लगातार इस तरह के कुछ दोषों की बजह से
सारा जीवन वे हजारी प्रसाद द्विवेदी जी को बुलडोज़ करते रहे सब लोग जानते है और संजीव भी बात को अच्छी तरह जानते हैं कि मैं रामविलास शर्मा का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ और मैं जिस दुनिया में काम करता हूँ वहाँ मेरे लिये वो बहुत बड़े रक्षक हैं मेरे कवच-कुंडल हैं रामविलास शर्मा। मैं उनके जरिये ययूरोप के समाज विज्ञान की पश्चिम केंद्रित दुनिया है उसमे रामविलास शर्मा को प्रतिपक्ष की तरह प्रस्तुत करता रहता हूँ
उन्ही को लिखता रहता हूँ बोलता रहता हूँ लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि रामविलास शर्मा जी के जो पूर्वाग्रह हैं उनकी चर्चा न की जाए। मित्रो रामविलास जी को बात को इस बात को लेकर बहुत दुख था कि रीतिकाल में नायिका-भेद होता है और वो निरंतर नायिका-भेद के खिलाफ वक्तव्य देते रहते थे जिस तरह वे साम्राज्यवाद के खिलाफ वक्तव्य देते थे उसी तरह नायिका-भेद के खिलाफ वक्तव्य देते रहते थे। और रामविलास जी को पढ़ते हुए मैंने पिछला एक साल गुज़ारा। उन्होंने लगभग सौ किताबें लिखीं हैं और भी समय लगेगा मुझे उन्हें पूरी तरह पढ़ने और समझने के लिए। मैंने उन्हें पढ़ते हुए पाया कि उन्हें नायिका-भेद से तो दिक्कत है पर नायक भेद से दिक्कत नहीं है।
आप निराला की साहित्य साधना देखेंगे तो पाएंगे कि वहाँ दो नायक हैं एक है सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और दूसरे हैं सुमित्रानंदन पंत। एक नायक की देह का जब वे वर्णन करते हैं तो उनका भाव दूसरा होता है और दूसरे नायक की देह का  जब वे वर्णन करते हैं तो उनके अंदर उन्हें राधा दिखाई पड़ती है। जबकि एक में उन्हें कृष्ण दिखाई पड़ते हैं।
रामविलास जी का  संस्मरण भी मुझे पढ़ने को मिला जिसमें एक जगह वे खड़े हुए हैं और दूर से देखते हैं कि बहुत ही सुंदर और भव्य पुरुष रहा है और उसके साथ एक सुंदर स्त्री है तब वे अपने मित्र से कहते हैं कितना सुंदर जोड़ा है। तब उनका मित्र उन्हें बताता है कि नहीं ये स्त्री पुरुष का जोड़ा नहीं है बल्कि ये तो निराला और पंत जी हैं। तो आप देखिए इसी तरह जब वे वृंदावनलाल वर्मा का वर्णन करते हैं उनकी सुंदर देह पतली कमर, चौड़े सीने, तनी हुई रज्जु उन सबका वर्णन करते हैं। इससे साबित होता है कि उनके नायकों में भी भेद है।
एक नायक है जो पौरुष का प्रतीक है और एक नायक कविता का जो उतनी ही महान कविता लिखता है पर उसके अंदर उन्हें राधा दिखाई देती है। पर नायिका भेद से उन्हें आपत्ति है नायिका भेद को लेकर वे पूरे जीवन ही कुठाराघात करते रहे। यह एक बहुत गहरा पूर्वाग्रह है। और इस पूर्वाग्रह का असर यह हुआ कि हिंदी की दुनिया में स्त्री-विमर्श के खिलाफ़ लगातार शुरु के दौर में खुला हुआ और बाद के दौर में छिपा हुआ पूर्वाग्रह काम करता रहा।
देह विमर्श नाम का एक डंडा बना लिया गया है जिससे हिंदी के नारीवादियों को पीटा जाता है। 
हम जानते हैं कि पूर्वाग्रह की थियरी हमें बताती है कि पूर्वाग्रह दो तरह के संसार में रहते हैं। एक संसार वो होता है जहाँ उनकी हुकुमत चलती है चारों तरफ उनका डेका पीटा जाता है। और उसमें तुम्हें कोई चुनौती देने वाला नहीं होता और दूसरा संसार वो होता है जहाँ अपनी ही विफलताओं के दबाब में और दूसरे तरह के दबाबों में वो अपने आप को बड़ी कुशलता और होशियारी के साथ अंडरग्राउंड कर लेते हैं उसके बाद में वो पूर्वाग्रह लगातार बिना घोषित किये हुए उन्ही बातों का विरोध करते हैं तरह से अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करते हे जैसा वे अपने पिछले वाले वर्चस्व को जमाने में जिस तरह के प्रभावों का विरोध कर रहे थे और जिस तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव डालना चाहते थे। मित्रों जब मैं ये कह रहा हूँ इसका मतलब यह नहीं है कि मैं पूर्वाग्रहों को लेकर बहुत अधिक चिंतित हूँ या मुझे लगता है कि पूर्वाग्रहों से दुनिया नष्ट हो जाएगी या मैं प्रलय की भविष्यवाणी करना चाहता हूँ ऐसा नही है मेरा मानना है कि पूर्वाग्रह अतीत और भविष्य के बीच में एक पुल का काम करते हैं उनके जरिये हम लोग अपने वर्तमान को अतीत में प्रोजेक्ट करते हैं जब मुझे मौका मिलता है तो उन्ही पूर्वाग्रहों की सवारी करते हुए अतीत को अपने वर्तमान में प्रोजेक्ट करते हुए यहाँ तक कि पूर्वाग्रहों के जरिये कुछ-कुछ भविष्योद्गार कुछ-कुछ सुराग भी हम लेते हैं। जैसे पिछले दिनो जब रामविलास जी के सवाल पर बहुत सारी चर्चाएँ हुई विवाद हुए, संघर्ष हुए उनकी जन्मशताब्दियों के जमाने में कई बार मुझे लगा कि इन पूर्वाग्रहों के चलते ही हम लोग अपने आज के जमाने को सोलहवीं सदी में प्रोजेक्ट करते हैं हम लोग १६वी-१७वीं शताव्दी को इस तरह देखते हैं जैसे तुलसीदास वहाँ पर हिंदू महासभा के सैक्रेटरी हो और कबीरदास सी.पी.आई.एम के जनरल सैक्रेटरी हों तो तरह का ये प्रक्रिया चलती रहती है लेकिन इससे हमें उन बातों को जानने में मदद मिलती है, जोकि हमारे जमाने में चल रही हो।  मित्रों रामविलास जी हजारी प्रसाद द्विवेदी से इसलिये कुपित थे कि उन्होंने रीतिकाल को सेकुलर काव्य कहा था। उन्होंने कामसूत्र की परंपरा को प्राचीन भारत के कला विनोद के बारे में चर्चा की उन्होंने और जब हजारी प्रसाद जी के विख्यात मार्क्सवादी शिष्यों ने ये देखा कि उनके गुरूजी के ऊपर बहुत जबरदस्त मार पड़ रही है और गुरूजी पर अपनी तरह से कुछ बोलते नहीं। आपको पता ही होगा कि रामविलास जी ने उन पर हमला किया पर हजारी प्रसाद जी ने कभी उनको कोई उत्तर नहीं दिया तो उनके मार्क्सवादी शिष्यों ने सोचा की हिसाब हम करेंगे हमे निपटेंगे इनसे और वो लगातार २५-३०-४० साल तक उन्होंने रामविलास जी से वो हिसाब चुकता किया लेकिन दिलचस्पी की बात इसमें क्या है ये पूरा हिसाब किताब चुकता करने का एक अंतरपाठ भी है तो अंतरपाठ ये है कि मार्क्सवादी शिष्यों ने कभी भी हजारी प्रसाद जी की रीतिकाल संबंधी धारणाओं का जमकर समर्थन नहीं किया उन्होंने कभी भी रीतिकाल को सेकुलर काव्य कहने की। हजारी प्रसाद जी की जो अनोखी थ्योरी थी जो लीक से हटकर थी उस थ्योरी के समर्थन में कभी मुखर रूप से बात नहीं कहीं वो रामविलास जी से बदला तो लेते रहे कि उनके गुरू जी पर हमला तो हुआ है लेकिन कभी भी उन्होंने रीतिकाल की उस तरह की व्याख्याएँ करने की कोशिश नहीं की जिसकी थोड़ी सा बानगी - अभी बजरंग बिहारी ने आपके सामने रखी। उस कविता के अंदर भी कुछ समाज होगा उस कविता के अंदर भी कुछ समाज होगा उस कविता के अंदर भी वो लोक होगा जिस लोक मंगल के ढाँचे में रामचंद्र शुक्ल ने कभी भी रीतिकाल को फिर करके नहीं देखा अब जब लोक हम कहते हैं तो हमें उस लोक का विन्यास बताने की जरूरत नहीं रहती लोक कहते ही हम उस कर्तव्य से मुक्त हो जाते है उस लोक के भीतर का विन्यास क्या है? उस लोक की क्या हायरार्की है? कौन सी जाति ऊपर है? कौन सा वर्ग ऊपर है? उसके अंदर क्या वर्ग-विभेद है? उसके अंदर सब खत्म हो जाता है?
तो मेरा कहना है कि ये जो पूर्वाग्रह है रीतिकाल का उसे एक गैर-मार्क्सवादी विद्वानों ने उसे आगे बढ़ाया  और एक मार्क्सवादी विद्वान ने जब उसको ठीक करने की कोशिश की तो और उसके अन्य मार्क्सवादी शिष्यों ने और मजबूती के साथ स्थापित कर दिया।
मित्रों मैं इस बात को इसलिये कह रहा हूँ ये मौका मुझे बजरंग बिहारी तिवारी ने दिया है हालाँकि मैं इसे अपनी स्लैप बुक में नोट करके नहीं लाया ये इसलिए जरूरी है कि ये हमें सुराग देता है कि आखिरकार हिंदी का जो स्त्री-विमर्श है हिंदी का जो नारीवाद है उस नारीवाद के प्रति इतना रोष क्यों है? इतना द्वेष कहाँ से आया? तो सेक्सुअलिटी का सवाल है जो देह का सवाल है उसको लेकर बेचैनी हिंदी की दुनिया में क्यों है? इन बेचैनियों का स्रोत कहाँ है? मुजे लगता है इन बेचैनियों का स्रोत रीतिकाल के उस दंश में है जोकि रामचंद्र शुक्लसे रामविलास शर्मा तक और जो पत्रिका मैंने पलटी थी उस पत्रिका के पहले लेख में ..
दोस्तों अब मैं एक दूसरे पूर्वाग्रह पर आउँगा जो शायद थोड़ा सा आप कहेंगे अब मैं विषयांतर कर रहा हूँ।  यह आलोचना का पूर्वाग्रह उतना नहीं है जितना रीतिकाल वाल सवाल था अब हिंदी में मार्क्सवाद का बड़ा भारी साम्राज्य है हिंदी क्षेत्र में मार्क्सवादी राजनीति इतनी नाकाम है। मार्क्सवाद का एक सांस्कृतिक रूप हिंदी क्षेत्र में उतना ही कामयाब है। और ये विरोधाभास लगातार हमारी आँखों में झाँक कर पूछता रहता है कि कई इसका कारण बताओ इसका कारण किसी ने आजतक साफ-साफ बताया नहीं। ऊपर इस विरोधाभास को ठीक-ठीक इंगित करते हुए इसको रेखांकित करते हुए कोई शोध कम से कम मैंने आज तक नहीं देखा है ना समाजविज्ञान की दुनिया में और न ही साहित्य की दुनिया में स्थिति ये है कि लोगों को खाना हजम नहीं होता जब तक कि वो मार्क्सवाद की चर्चा न कर ले, विचारधारा की चर्चा न कर लें। प्रतिबद्धता की एक गोली मार्क्सवाद की सुबह एक गोली शाम को नियमित रूप से खाई जाती है। जरूर खाइये लेकिन पहले उस पैकेट को देख लीजिये जिस पैकेट में से गोली निकालकर खा रहे है उस पैकेट में एक्सपायरी डेट क्यों लिखी है। मार्क्सवाद के जिस पैकेट से आप प्रतिबद्धता की गोली निकालकर खा रहे हैं उसकी एक एक्सपायरी डेट भी है यह मार्क्सवाद की एक्सपायरी डेट ही नहीं है। यह मार्क्सवाद के विशेष संस्करण की एक्सपायरी डेट है जिसका हिंदी की दुनिया में आज तक इस्तेमाल होता रहा है। परम श्रद्धा के साथ में मार्क्सवाद की दुनिया में जो विचारों के क्षेत्र में नए काम हुए है उन कामों से हमें कोई लेना-देना नहीं है। हम उन कामों को नहीं पढ़ेंगे। हम अपने आप को बिल्कुल अपडेट नहीं करेंगे। साठ-सत्तर के दशक में जो मार्क्सवाद लोकप्रिय था तो मार्क्सवाद प्रचलित था हिंदी की दुनिया अभई उसी मुकाम पर खड़ी हुई है उससे बिल्कुल हटना नहीं चाहती। मुझे अच्छी तरह याद है मैं सी.पी.आई. एम.एल के एक संगठन में काम किया करता था तो जो मेरा आखिर दौर था पार्टी में हमारे नेता कामरेड विनोद मिश्र उस वक्त तक कहने लगे थे कि अब एक नई दास कैपिटल लिखने की जरूरत है क्योंकि पूँजी का चक्र बदल रहा है।
एक दास कैपिटल एक युक्ति, पूंजी नाम की जो चीज़ है वो पैदा हो चुकी थी वो बिजली और आंधी की  रफ्तार से राष्ट्रों के आर-पार बे रोक-टोक यात्रा करती थी। रात-दिन जागती थी  और आज भी वो क्रम लगातार जारी है उस पूंजी को और उस पूंजी के प्रभाव में तेजी के साथ बदलते हुए समय को हमारे समाज को हमारी अपनी जिंदगियों को हमारे ड्राइंग रूम की जो लाइफ है इस लाइफ को - जो हम लोगों की आँखों के समाने बदल रही है समझने के लेय ये पुरानी किस्म का मार्क्सवाद हमें किसी भी किस्म का औजार मुहैया नही कराता जब हमें वो औजार मुहैया नहीं कराता तो हम क्या करते हैं तो हम साम्राज्यवाद शब्द के आगे नव लगा देते हैं और बीच में हाइफन लगा देते हैं और कहते हैं कि हम नव साम्राज्यवाद का विरोध कर रहे हैं अब क्या कहे नव शब्द का ऐसा दुरुपयोग मैंने नहीं देखा।

मित्रों इस पर भी जरा ध्यान देने की जरूरत है जब हमारे पास विमर्श नहीं है  वो बौद्धिक विमर्श नहीं है जो हम मौजूदा दुनिया को समझ सकें तो हमें कुछ ए बौद्धिक हथियार हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए स्वयं साठ और सत्तर के दशक की उन धाराओं की तरफ निगाह डालनी चाहिए तो धाराएँ  उस समय तत्कालीन लेनिनवाद के प्रभाव में और स्टालिन के प्रभाव में थोड़ी पृष्ठभूमि में चली गई हमें लेनिन के ज़माने की उन धाराओं को जो रोज़ालक्ज़म बर्ग की धाराएँ थी और दूसरी इस तरह की धाराएँ। उन पर निगाह डालनी चाहिए जो सोवियत क्रांति की चमकदार सफलता के कारण इस पर उन्होंने विचार करना बंद कर दिया था। हम लोगों को आस्ट्रो-जर्मन मार्क्सवाद की उन प्रगतियों की तरफ ध्यान देना चाहिए जिन प्रवृत्तियों का सहारा लेकर रामविलास शर्मा ने हिंदी जाति की संकल्पना विकसित थी मित्रों रामविलास शर्मा की मैं रीतिकाल संबंधी आलोचना कर चुका हूँ लेकिन उनका एक दूसरा पक्ष भी है। वे भारत में हिंदी के ऐसे अकेले विद्वान  हैं जिन्होंने सारे जीवन ये मुहीम चलाई कि किस तरह मार्क्सवाद का भारतीय परिस्थितियों में बढ़िया तरीके से अनुवाद किया जाए और उस चक्कर में मार्क्सवाद देखने में मार्क्साद भी लगे तो उसकी भी उन्हें परवाह नहीं उसके पूरे शास्त्र का जो केंद्रीय मर्म था मेरे खयाल से उस वाक्य में निहित था कि भारत को समझने के लिए भारत की भी जरूरत है ये रामविलास जी का वाक्य था मैं अपने आप से भी पूछता हूँ और अपने तमाम मित्रों से भी जो समाजविज्ञान की दुनिया, साहित्य की दुनिया में, आलोचना की दुनिया में है उन सब मित्रों से भी पूछता हूँ कि जब हमारे बीच मे ऐसा शलाका पुरुष है जिसने साठ-सत्तर साल तक लगातार ये मुहीम चलाई उसके बावजूद भी हमारे मार्क्सवाद का नवीनीकरण क्यों न हो सका। 
हमारा हिंदी का जो रेडीकलिज़्म है उस रेडीकलिज़्म का नवीनीकरण क्यों नहीं हो पाया। यह मार्क्सवाद का एक पुराना पुर्वाग्रह है। सीधे-सीधे भले ही हिंदी की आलोचना से ताल्लुक न हो लेकिन ये हमें रोकता है कि हम बाज़ार की निष्पत्तियों को ठीक से समझें भूमण्डलीकरण के कारण जो बारीक खेल समाज में और संस्कृति में स्त्री-पुरुष  संबंधों की दुनिया में, सैक्सुअलिटी की दुनिया शुरु हुआ...उन बारीक खेलो की ओर निगाह डालें उनके मर्म को समझें वो पुराना मार्क्सवाद हमें इन सब बातों को नही समझने देता और चूँकि वो हमें इन सब बातों को नहीं समझने देता इसलिए वो एक तीसरे किस्म का पूर्वाग्रह स्थापित करता है। जो किसी भी पूर्वाग्रह से अधिक भीषण और हाहाकारी है।
मित्रों वह पूर्वाग्रह वह है जिसकी तरफ बजरंग नें अपने वक्त्वय के आखिरी हिस्से में इशारा किया है। मैं उन्ही की बात में अपनी बात को जोड़ते हुए कहूँगा फिर अपनी बात खत्म करुँगा। मित्रों इन्होंने बताया कि ब्रजभाषा के खिलाफ क्या असहिष्णुता थी कि अन्य जनपदीय भाषाओं तरफ असहिष्णुता क्या है हिंदी की दुनिया में वो तो ठीक है वो उस दौर की बात कर रहे थे जब हिंदी और नागरी लिपि अपने आप को जमाने के लिए अपनी दावेदारियाँ कर रही थी दूसरी जनपदीय भाषाओं की तरफ से खासतौर से ब्रजभाषा की तरफ से और भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों की तरफ से ये आता था कि हिंदी में वो शख्स नहीं जिसके अंदर कविता लिखी जा सके हिंदी तो है मुख्यतः गद्य की भाष के रूप में विमर्श की भाषा के रूप में विकसित हुई। खड़ीबोली में भी कविता लिखी जा सकती है ये बाद में हुआ इसलिये निराला को भी अपनी कविता लिखते समय बार-बार ये कहना पड़ा कि देखो मैं कैसी सुंदर भाषा में कविता लिख रहा हूँ। ऐसा कहने के पीछे उनका एक इरादा था कि वो बताना चाहते थे  कि खड़ीबोली हिंदी में कितनी सुंदर कविता लिखी जा सकती है
मित्रों चूँकि हम बाजार को नहीं समझ पात और बाजार की जरूरतों को नहीं समझ पाते और उन जरुरतो के प्रभाव में किस तरह हिंदी विविध रूपों में विकसित हो रही है हम इसकों भी साथ में समझने से इंकार करते जाते हैं और इस प्रक्रिया में होता क्या है कि हिंदी की दुनिया में भाषाई लोकतंत्र के खिलाफ हम एक संभावित भाषाई लोकतंत्र के खिलाफ हम एक डाइग्लोसिया का निर्माण करते हैं। और आप जानते हैं कि ये डाइग्लोसिया क्या है?    डाइग्लोसिया उसे कहते हैं जब एक भाषा का किसी एक रूप को श्रेष्ठ माना  जाता है। और उसके दूसरे रूप को निकृष्ठ माना जाता है। हिंदी की दुनिया में ये पूर्वाग्रह इतना व्याप्त है कि हिंदी का जो साहित्यिक रूप है वही श्रेष्ठ है बाकि सभी रुपों को व्यंग्य से, तिरस्कार से और घृणा की निगाह से देखा जाता है। ये वर्ण व्यवस्था जो है हिंदी की केवल एक ब्राह्मण वर्ण है और बाकि सारे दलित। ये विकट वर्ण व्यवस्था जो है हिंदी की दुनिया में मौजूद है  मैं न जाने कब से जब मैं पत्रकार था तब भी मैं ये रुदन सुनता था और अब मैं समाजविज्ञान की दुनिया में काम करता हूँ अब भी मैं ये रुदन सुनता हूँ कि भाषा की बहुत बुरी हालत हो रही है। भाषा गिरती जा रही है। पत्रकारों को भाषा नहीं आती, रेडियो पर कितनी बुरी भाषा बोली जाती है। देखिये टी.वी. चैनलों पर कितनी बुरी भाषा बोली जाती है।

देखिये उसने अंग्रेजी के कितने शब्दों का इस्तेमाल कर दिया। ऐसा लगता है कि ऐसा कहने वाले लोग चाहते कि हर व्यक्ति को निर्मल जी, नामवर जी और अशोक जी जिस भाषा में अपना प्रवचन करते हैं वही भाषा हर व्यक्ति को निरंतर बोलती रहनी चाहिये। उसी भाषा में आपसी बातचीत करनी चाहिए। उसी भाषा में सारे समाज की सारी कार्यवाहियाँ चलनी चाहिए। ये जो लिखित पाठीय संस्कृति का आतंक है जिसके अंदर बोली को नीची निगाह से देखा जाता है। और यही बात है जोकि जनपदीय भाषाओं के संदर्भ में बजरंग बिहारी तिवारी ने रेखांकित की। ये वही कुटेर है मैं इसको कुटेर का नाम देता हूँ। एक तरह की मानसिक बीमारी के तौर पर ये पूरी हिंदी में पूरे तौर से छा गया है। इसलिए साहित्यिक भाषआ का एक आतंक है जिसमें हर भाषआ को ये कहा जाता है कि ये बहुत ही घटिया किस्म की है बिन ये समझे कि हर भाषा के विकास का अपना एक संदर्भ होता है। टी.वी. की भाषा का अपना संदर्भ है उसके अंदर दृश्य बहुत हैं। इतनी तमाम बातें जो हमें लिखने दी जाती हैं बहुत सी बातें दृश्यों में की जाती हैं। लिख के की जाती हैं सारे के सारे ये अनुशासन, सारे के सारे ये दृश्य विधान पश्चिम से आए हैं उनके शास्त्र भी अंग्रेजी में हैं। उनकी बुनियादी धारणाएँ भी अंग्रेजी में हैं मैं हिंदी के पत्रकारों से पूछता हूँ कि जो अब टी.वी की दुनिया में चले गये हैं भई आपकी अपनी दुनिया में जो अंग्रेजी का इस्तेमाल होता है तब आपको बड़ी नाराज़गी होती है। लेकिन आप बताइये आप हमारे साथ दैनिक अखबार में काम करते थे तब तो आपने कभी भी मुख्य समाचार नहीं कहा तब तो आप हमेशा ..लीड ही कहते थे कभी भी आपने नहीं कहा ये आधार समाचार है। हमेशा आपने कहा कि ये बॉटम लीड है। न्यूज़ एनालिसिस कहते थे स्पेशल कॉरेस्पोंडेंट कहते थे तब आपको कभी नही लगता था कि आप अंग्रेजी का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी के तमाम शब्दों का इस्तेमाल आप ऐसे करते जैसे वो हिंदी के शब्द हैं। तब यह बोलते हुए आपको अहसास नहीं होता कि आप अंग्रेजी बोल रहे हैं। आप टैक्सी में जाते हैं - आप ड्राइवर से बात करते हैं ड्राइवर को आप चालक तो नहीं कहते ड्राइवर से आप बात करत हैं उससे कहते हैं लैफ्ट मुड़ जाओ राइट मुड़ जाओ। क्योंकि आप अंग्रेजी इस्तेमाल करते हुए भी हिंदी बोल रहे होते है और न ही ड्राइवर को लगता है कि उससे अंग्रेजी में बात की जा रही है।

मित्रों भाषा के निर्माण की जो प्रक्रिया है जिसमें बोली जाने वाली भाषा पहले बनती है और बाद में लिखी जाने वाली भाषा सामने आती है। दुर्भाग्य से हम लिखी जाने वाली भाषा को बोली जाने वाली भाषआ के ऊपर ज्यादा श्रेष्ठता दे देते हैं कि पूरा डाइग्लोसिस इनवायरमेंट पूरी भाषा में बन जाता है।
मित्रों यह बहुत ही भीषण किस्म का हिंदी का पूर्वाग्रह है इसका सीधा भले ही आलोचना से ताल्लुक न हो लेकिन हम सब दिन प्रतिदिन हिंदी समाज के बारे में चिंतन करते हुए इस समस्या के शिकार हैं।