मलयज को शायद उन गिने-चुने लोगों में शुमार होने का गौरव प्राप्त होना चाहिए , जिन्होंने अपनी डायरी को अपनी निजी समस्याएँ ना बताकर उसे सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारो से जोड़ा ।
जिसे आज एक उपलब्धि माना जाना चाहिए । मलयज ने अपने डायरी लेखन की शुरुआत सोलह वर्ष(१९५७ ई.) की उम्र में की और इस सिलसिले को सन् १९८२ की अप्रैल तक(जब तक उनकी साँस चलती रही) जारी रखा। यह डायरी भी अधिकतर डायरियों की तरह नियमित नहीं है क्योंकि हम पहले ही कह चुके हैं कि यह निजी ना होकर सामाजिक और सांस्कृतिक अधिक है । जो काम मुक्तिबोध की , 'एक साहित्यिक की डायरी करती है'( यानि अपना पक्ष और विपक्ष रखने का और अपने समय के लेखकों से ये कहने का कि 'तय करो किस ओर हो तुम') बिलकुल वही काम तो मलयज की डायरी नहीं करती लेकिन हाँ कुछ-कुछ वैसा ही काम यह करती दिखती है यदि हम १९५७-१९८२ तक की डायरी को पढ़ जाए तो हम देखेंगे कि जिस आवाज़ को मुक्तिबोध एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण पुस्तक में बुलंद करते हैं लगभग उसी के समानांतर मलयज उसी आवाज़ को अपने समय की गोष्टियों( खासकर परिमल की) मे ज़ाहिर करते, उन पर अपना पक्ष-विपक्ष और अपने समकालीन अग्रजों से सहमति-असहमति को व्यक्त करतें दिखते हैं । मुक्तिबोध को अपने काम का पूरा हक़ मिला है(मरणोपरांत ही सही) , मिलना भी चाहिये । किन्तु क्या मलयज को ...............।खैर ,
साठ-सत्तर का दौर, ऐसा दौर था जब अधिकतर लेखक डायरियाँ लिखा करते थे। आज कितने लेखक लिखते है नही पता संभवत् उनके सामने ऑनलाइन मैगज़ीन और ब्ल़ॉग जैसे विकल्प है शायद इसलिये । खैर हमारा मक़सद किसी लेखक की उपेक्षितता पर स्यापा करना नहीं । हमारा सिर्फ ये कहना है कि कम से कम एक बार, सरसरी नजर से ही सही इस डायरी को पढ़ा जाए । आपको इसमें परिमल के ज़माने की बहस के मूल बिन्दुओं जैसे लघुमानव , लेखक और राज्य आदि पर एक अलग सोच मिलेगी जो हमारे समकालीनों में हमें कम दिखाई देती है । प्रस्तुत हैं मलयज की डायरी, भाग-१ से कुछ उद्धरण----- (१६ दिसंबर,१९५७) 'रचना की प्रक्रिया में यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि हम उस अनुभूति को उसकी तीख़ी सच्चाई के साथ उसे जीते हुए , उससे जूझते हुए , उससे आँखें मिलाते हुए उसे अभिव्यक्ति देते हैं या नहीं या उसकी स्वीकृति देते है या नहीं क्योंकि तब इसमे मन के और जीवन के तथा प्रकारांतर से समाज में अनेक गुह्य अग्यात स्तरों का उद्घाटन होता चलता है और निश्चय ही उसमें हमारा भी एक अंश होता है । उस अंश की श्रेष्टता और व्यापकता रचनाकार की भी श्रेष्टता और व्यापकता है ।'
(धर्मवीर) भारती ने कहा- 'कविता करते समय टी .एस.इलियट ,भामह ,आई.ए.रिचर्ड आदि हमारे काम नहीं आते -हम जो उन्हें पढ़ें , उनसे प्रभावित भी हों किन्तु कविता मुझे करनी है और इसमे यानि काव्य सृजन के स्तर पर-ये सब हमारे काम नही आते ।' मैं इससे सहमत नहीं हूँ - 'भारती का आशय मोटे तौर पर यह था कि काव्य सृजन के क्षण में बाह्य प्रभावों का कोई उपयोग नहीं ।' लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता । बाह्य या इलियट, भामह ,आई.ए.रिचर्डस आदि काव्य सृजन के क्षण में न सिर्फ सहायक होते है वरन् काव्यसृजन की धारा को मो़ड़ते भी हैं । (मलयज की डायरी भाग-१ पृष्ठ-३४८, संपा.नामवर सिंह )
(जारी)
तुम्हारे बारे में क्या कहूं मै, मेरी तमन्नाओं का सिला है. नहीं मिला जो तो मुझको क्या है, मिलेगा तुमको ये आसरा है.
शुक्रवार, 28 अगस्त 2009
भ्रूण की आवाज़
मैंने कब कहा
मुझे तुम प्यार करो ।
मैंने कब कहा
मेरा ध्यान रखो ।
बस
मुझे पेट में न मारा करो ।
(पुन:प्रकाशित )
मुझे तुम प्यार करो ।
मैंने कब कहा
मेरा ध्यान रखो ।
बस
मुझे पेट में न मारा करो ।
(पुन:प्रकाशित )
बहुत देर कर दी सनम कहते-कहते
जब मैंने कहा
मुझे तुमसे प्यार है
तुमने कुछ नही कहा
बस
तुम हँस दीं ।
जब मैंने कहा
मैं तुम्हें चाहता हूँ बेपनाह
तुमने कुछ नही कहा
बस,अपनी उँगलियाँ मेरे होंठो पे रख दीं ।
जब मैंने कहा
चलो आज फिल्म देखने चलते हैं
तुमने कुछ नही कहा
तुम मुस्कुराईं और क्लास लेने चलीं गईं ।
जब मैंने कहा
शाम मस्तानी है पार्क में चलें क्या ?
तुमने तब भी कुछ नही कहा
मेरा हाथ थामा और चल दीं ।
जब मैंने कहा
शादी करोगी मुझसे
तुमने कहा- पागल हो गए हो क्या ?
आज के बाद हम कभी नही मिलेंगे ।
(पुन:प्रकाशित )
मुझे तुमसे प्यार है
तुमने कुछ नही कहा
बस
तुम हँस दीं ।
जब मैंने कहा
मैं तुम्हें चाहता हूँ बेपनाह
तुमने कुछ नही कहा
बस,अपनी उँगलियाँ मेरे होंठो पे रख दीं ।
जब मैंने कहा
चलो आज फिल्म देखने चलते हैं
तुमने कुछ नही कहा
तुम मुस्कुराईं और क्लास लेने चलीं गईं ।
जब मैंने कहा
शाम मस्तानी है पार्क में चलें क्या ?
तुमने तब भी कुछ नही कहा
मेरा हाथ थामा और चल दीं ।
जब मैंने कहा
शादी करोगी मुझसे
तुमने कहा- पागल हो गए हो क्या ?
आज के बाद हम कभी नही मिलेंगे ।
(पुन:प्रकाशित )
बुधवार, 26 अगस्त 2009
बरसात की एक शाम
इस मौसम की सबसे जोरदार बरसात
अबके नहीं आई मुझे तुम्हारी याद ......क्यों?
क्या इसलिए
कि मै
अब तक
अपने घर के निचले तल से
पानी निकालने में व्यस्त था
या फिर अब तक
घर न लौटे भाई की
चिंता सता रही थी मुझे
या फिर इन सबसे अलग
मैंने पहली बार सोचा
कि मै तुम्हे क्यों याद करता हूँ
जबकि
प्यार की ग़लतफहमी भर है मुझे
अबके नहीं आई मुझे तुम्हारी याद ......क्यों?
क्या इसलिए
कि मै
अब तक
अपने घर के निचले तल से
पानी निकालने में व्यस्त था
या फिर अब तक
घर न लौटे भाई की
चिंता सता रही थी मुझे
या फिर इन सबसे अलग
मैंने पहली बार सोचा
कि मै तुम्हे क्यों याद करता हूँ
जबकि
प्यार की ग़लतफहमी भर है मुझे
गुरुवार, 20 अगस्त 2009
उसके मरते ही,,,,,
उसके मरते ही
अचानक ही
सब कुछ पीला हो गया
चेहरे का रंग.......
फैक्ट्री में रखा माल
घर में बनी दाल
घरवालों का हाल
और जो कुछ पीला ना हो सका
वह था
उसकी आँखों का रंग
जिनमें अब तक भी
इस दकियानूसी समाज के लिए क्रोध था
जिसका विरोध करने के कारण ही उसकी जान ली गई ।
अचानक ही
सब कुछ पीला हो गया
चेहरे का रंग.......
फैक्ट्री में रखा माल
घर में बनी दाल
घरवालों का हाल
और जो कुछ पीला ना हो सका
वह था
उसकी आँखों का रंग
जिनमें अब तक भी
इस दकियानूसी समाज के लिए क्रोध था
जिसका विरोध करने के कारण ही उसकी जान ली गई ।
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