मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

तुगलक : बुद्धिमान मूर्ख


ग्याहरवीं के प्रीबोर्ड की तैयारी कराते वक्त मेरे इतिहास के शिक्षक आर.के. शर्मा बार बार दोहराते तुगलक वंश वाले पाठ में से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है मुहम्मद बिन तुगलक को बुद्धिमान मूर्ख क्यों कहा जाता है? प्रश्न के जवाब में वे राजधानी परिवर्तन से लेकर चाँदी की जगह ताँबे के सिक्के चलवाने और पुनः राजधानी परिवर्तन आदि पॉइंट्स को सामने रखते। पर तुगलक(निर्देशक भानु भारती) को देखते वक्त इतिहास एक विषय के
 रूप में मेरे सामने रहने के बावजूद अपने व्यतिक्रम के रूप में भी मेरे सामने आया। यशपाल शर्मा जब जब तुगलक के भेष में राजनीति खेलते मुझे पिछला इतिहास पलटता दिखाई देता। मैं नहीं समझ पाता कि यह वही तुगलक है जिसका पाठ मेरे इतिहास की किताबों में मौजूद था और जिसका मुसलसल पाठ मैं उस वक्त किया करता था सिर्फ इतिहास अंक बटोरने के मकसद से। फिर खुद ही अपनी बात को काटता और मन में कहता कि यह इतिहास का तुगलक या तुगलक के इतिहास का नाट्य प्रदर्शन नहीं बल्कि तुगलक के समय और सल्तनतकालीन राजनीति का दर्शन है और निश्चित ही जिसमें समकालीनता का बोध है।
यशपाल शर्मा के काम की सबने तारीफ की है मुझे भी लगता है कि उन्होंने अपना रोल बखूबी निभाया है(आवाज़ की मैचिंग फिट न बैठने के बावजूद)। नाटक देखते वक्त मैं मुहम्मद तुगलक के चरित्र को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश कर रहा था। साथ ही ये जानने की कोशिश कर रहा था कि उसे बुद्धिमान मूर्ख के विशेषण दिए जाने के पीछ कारण क्या थे हालाँकि सवाल पुराना था पर मेरे लिए इसका जवाब पुराना नहीं था। किस तरह से आपकी आधुनिकता समय की संदर्भवत्ता के बिना पुरानी पड़ जाती है इसकी मिसाल तुगलक का चरित्र और उसकी कारगुजारियाँ हैं।
गौर करें तो उसके फैसलों(राजधानी परिवर्तन और सिक्कों के रूप में बदलाव आदि) के पीछे तुगलक के तर्क सही थे राजधानी राज्य के केंद्र में होनी चाहिए दौलताबाद दिल्ली की अपेक्षा तत्कालीन राज्य के बीचोंबीच मौजूद थी, इसी तरह सिक्के का वजूद और महत्व राज्य की मोहर से जाना जाना चाहिए, जैसाकि आज होता है। इन मायनों में देखें तो तुगलक एक दूरदर्शी और बुद्धिमान शासक था। लेकिन फैसलों को जिस तर्ज़ पर लागू किया गया और बाकि चीज़ों को नज़रंदाज़ कर दिया गया सो उसका नतीजा तुगलक ने भुगता।
खैर नाटक पसंद आया। नाटक के अंदर भानु भारती तुगलक की इस दुविधा को दिखाने में सक्षम रहे हैं, मुझे लगता है कि यशपाल शर्मा को जो तारीफें मिल रहीं हैं उसमे भी उसी दुविधा का अहम रोल है जो शुरु से अंत तक यशपाल तुगलक के भेष में चस्पा किये रहते है और कहीं उसकी बनावट में फेर नहीं आता। तुगलक को जिस खुले मंच पर(फिरोजशाह कोटला के खंडहर, किला तो अब वह रह नहीं गया) खेलने का जोखिम उठाया गया है। वह सफल रहा है। भानु भारती, रमा यादव, मधुलिका नेगी, अम्बा सान्याल, कनु भारती, आर. के. धींगरा तालियों के हकदार हैं।
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रविवार, 21 अक्टूबर 2012

एकतरफा प्यार

एकतरफा प्यार
किसी बोद्ध भिक्षु की किताब के पन्नों से टकरा 
मर गया मच्छर
फूल की पंखुड़ी की तरह 
चिपका है पन्ने से
और अफसोस में
अभिशाप झेलता 
बोद्ध-भिक्षु 
तड़प तड़प के इस दिल से
आह निकाल 
समाधि ले 
कर्मविमुख 
हो रहा है
स्मृति से विस्मृत है उसकी
प्यार से पहले की अवस्था में
पढ़ा ये काव्यांश
चाहे कुछ हो
'जीवन नहीं मरा करता है'

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

क्या मैं आदमी हूँ

तुमने कहा कभी तो हँसा करो,
मेरे लिए ही सही

मैंने अपने आँसुओ को सुखा दिया।
और दाँत दिखाकर हँसने लगा।

तुमने कहा तुम गुस्सा बहुत करते हो।
चिल्लाते क्यों रहते हो हर वक्त।

मैंने पाया
मेरी दुम निकल आयी है।
और मेरी जीभ से लार टपक रही है।

तुमने कहा
इर्रिटेट होना अच्छी बात नहीं।

मैंने अपने दिल के सारे घावों को ढँक लिया
और सेल्समैन की तरह हर बात पर मुस्कराने लगा।


फिर एक दिन तुमने कहा।
तुम 'वो आदमी' नहीं जिससे मैंने प्यार किया था।

मैं सोचने लगा
क्या मैं 'आदमी' हूँ।

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

एड हॉक इंटरव्यू

कमरे में घुसते ही एक अजीब सा सन्नाटा था। सामने बैठी मैडमें जिनके हाथ में एक एक पर्चा था आपस में खुसुरफुसुर में मगन थी। वह सकुचाती हुई भीतर घुसी। उसने सिर और आँखें नमस्ते के अंदाज़ में झुका दीं। 
एड हॉक पैनल में नाम है तुम्हारा ? (उनमें से एक ने पूछा)
जी मैम। (उसने सहम कर जवाब दिया) 

हाँ तो तुम्हारा पीएच.डी का काम किस विधा पर है।
मैम नैमिचंद्र जैन की रंग समीक्षा पर।

अच्छा तो बताओ भक्तिकाल के केंद्र में क्या है? (अब की बार कोने में बैठी उम्रदराज़ मैडम ने पर्चे पर नज़रे गड़ाते हुए पूछा)।
मैम भक्ति।
ओह।(मुँह बिचकाते हुए बराबर वाली मैडम ने यह भाव व्यक्त किया)

विपर्य किसे कहते है कहानी और उपन्यास में क्या अंतर है? (दूसरे कोने में बैठी मैडम ने तुरंत अगला सवाल दागा)
वह अपने बी.ए और एम.ए. के दिनों की स्मृतियों मे खो गई।

अगला सवाल पूछने के लिए दोनों किनारों की मैडमों ने बिल्कुल मध्य में बैठी मैडम की ओर देखा जो अपने मोबाइल पर नंबरों को रगड़ने में मगन थी।
ओह अच्छा ये बताओ भक्ति के ...( ये पूछ चुके है उनके बराबर में बैठी एक अन्य मैडम ने बीच में टोकते हुए कहा।)
ओह सॉरी हाँ तो आख्यानात्मक कविता और प्रगी...परगीता ...ये क्या लिखा है फोटोकॉपी वाले ने सही से प्रिंट नहीं किया।( प्रगीतात्मक। , एक अन्य मैडम ने कानों मे कहा) हाँ प्रगीतात्मक कविता किसे कहते है? (मैडम ने पर्चे को अजीब तरह से आँखों के करीब लाकर पूछा)
सॉरी मैम मुझे तो ये अवधारणा ही समझ नही आई। कविता तो कविता होती है उसे आख्यानात्मक और प्रगीतात्मक जैसे बोझिल शब्दों से जोड़ने की जरूरत ही क्या है?

ओह तो तुम क्लास में क्रांति करना चाहती हो। स्लैबस के खिलाफ बच्चों को खड़ा करना चाहती हो।
नहीं मैम मै तो। बस

नहीं नहीं बोलो
बाकि मैडमों ने ध्वनि मत में उस मैडम का साथ दिया।

अच्छा बताओं विरुद्धो का सामंजस्य किसकी रचना है?
उसे लगा कि उसका गला कोई दबा रहा है उसे उस कमरे में अजीब सी घुटन महसूस हुई। कमरे के सन्नाटे उसके कानों में चीखने लगे। उसने कानों पर दोनो हथेलियाँ कस लीं और उठने का प्रयास किया पर उसने पाया कि उसके नीचे पैर ही नहीं हैं।

रविवार, 1 जुलाई 2012

फिर उसकी कहानी कौन कहेगा?

उस दिन कुछ भी ऐसा नहीं था जो उसे लगा हो कि दिवाली आने वाली है वो बस अपने गुरु कुशवाहा जी द्वारा क्लास में कहे गये वाक्यों को याद रखे था। कि इस देश का संविधान हर एक को अपनी बात रखने की, पसंद-नापसंद की इजाज़त देता है। वह बहुत प्रेरित हुआ था उस दिन, उसने अपनी किताब का चैप्टर मौलिक अधिकार पूरा पढ़ डाला था उस दिन।
उन बाज़ारों में जहाँ लोग लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ और हीरो-हिरोइन के पोस्टरों को खोजते फिर रहे थे वह हर पोस्टर और तस्वीरों की दुकान पर जाता पर उसे उसका हीरो नहीं मिलता। फिर थोड़ी दूर किनारे पर उसे वो पोस्टर दिखाई दिया जिसकी उसे तलाश थी।
उसके पड़ोसी जिन्हें वो चाचा कहता था उसका इंतज़ार कर रहे थे कि कब वो लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ लाए। वो लौटा एक हाथ में लक्ष्मी-गणेश और दूसरे हाथ में अपने हीरो का पोस्टर लिए। उसने चाचा के हाथ में मूर्तियाँ पकड़ाईं और घर की तरफ मुड़ा ही था कि चाचा ने टोका अरे, रुक. ये क्या लाया है हमें भी तो दिखा।
चाचा वो कुशवाहा जी बहुत तारीफ करते हैं इनकी, कहते हैं कि इन जैसे लोग शताब्दियों में पैदा होते हैं पर दिखा तो चाचा ने कहते हुए उसके हाथ से पोस्टर झपट लिया। रबड़ उतारी और देखा। देखा क्या देखते ही आग बबूला हो गये। ये क्या , तेरी बुद्धि क्या घास चरने गयी है। भाईसाहब देखेंगे तो चिल्लाएंगे। बनियों-बामनों के घर में इसकी तस्वीर नहीं लगाते।
पर कुशवाहा जी तो...(उसने सहमी आवाज में कहा) गोली मार अपने कुशवाहा जी को..ये मास्टर तुम्हें कैसी शिक्षा दे रहा है। जानता नहीं कि ये शैडूलो का भगवान है। घर में इसे लगाया तो क्या सोचेंगे बिरादरी वाले। चाचा पर मोहन भी तो शाहरुख खान और सलमान खान की तस्वीरें लाया है लगाने को। तो क्या आप मुसलमान हो गये।.. पर वो उसके पसंदीदा हीरों हैं।.. ला दे इधर चर्ररर् फर्रररर. ..
चाचा पर ..पर फाड़ा क्यों? कुशवाहा जी कहते हैं कि इनकी वजह से ही देश के बहुत बड़े तबके को उसके अधिकार मिलें हैं हमारे देश का संविधान इन्होंने ही लिखा है। तेरे कुशवाहा कि खबर मैं लूँगा ये क्या सब सिखाये जा रहा हमारे बालको को.. चाचा मैं बच्चा नहीं हूँ अब. पर आपने फाड़ा क्यो।,,फाड़ा क्यों..? उसने खूद को अकेला पाया। और उस दिन के बाद ये अकेलापन दिन-ब-दिन बढ़ता गया।
तब वो ग्याहरवीं क्लास में था उसका दिल भर आया था उस दिन। तब वह सोच रहा था कि ये कैसी बिरादरी है जो एक मनुष्य को उसके कर्मों के कारण नहीं बल्कि जाति से पहचानती है। उसी क्लास में आर.के.शर्मा (इतिहास के अध्यापक) ने उसे बताया था कि रामायण महाभारत काल में जाति विभाजन कर्म आधारित था उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा था कि जैसे परशुराम ब्राह्मण होते हुए धनुष उठाने के कारण क्षत्रिय बने और वाल्मीकि दलित होने के बावजूद अपने कर्म के आधार पर ही ब्राह्मण।
वो तब भी कन्फ्यूज़ था ये सब क्या है? ये बातें पुरानी थी पर आज इतने सालों बाद अपने दलित दोस्तों के बीच उसे फिर वहीं अकेलापन झेलना पड़ा जो उसे पहले बिरादरी के नाम पर झेलना पड़ा था। एक अंतर्ऱाष्ट्रीय दलित सम्मेलन में घोषणा की गई कि दलितों पर लिखने का हक़ दलितों को ही है। उस उद्घोषणा में उसे उसके चाचा की बानगी दिखी उसे लगा फिर उसकी कहानी कौन कहेगा।