मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

हुआ कुछ यूँ


हुआ कुछ यूँ कि मैंने जानकर ना जाना उसे
हुआ कुछ यूँ कि मैंने मानकर ना माना उसे
ऐसा कहा गया था

हूआ कुछ यूँ कि जानने के बाद
कुछ जानने कि इच्छा ना रही
हुआ कुछ यूँ कि मानूँ किसे
ये पता चल गया मुझे

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

कलयुग का असली चेहरा



१९८०-८१ में आई श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म कलयुग महाभारत के प्लॉट का इस्तेमाल करते हुए भी इससे स्वयं को अलगा लेती है। इसके चरित्र असल में महाभारत के चरित्र न होने पर उन चरित्रों सरीखे दीखते हैं। इस फिल्म का निर्माण शशि कपूर ने किया था जिसमे महाभारत की कथा का सहारा लेते हुए समकालीन संदर्भों में एक ही वंश के दो औद्योगिक घरानों के बीच की प्रतिस्पर्धा को दिखाने का प्रयास किया गया था यह प्रतिस्पर्धा कब एक युद्ध में परिणत हो जाती है इसका पता नहीं चलता। संभवत् निर्देशक को भी नहीं, यह फिल्म का एक असंतुलित पक्ष है। कैसे एक औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में शामिल लोग आँख के बदले आँख की मांग करने लगते हैं फिल्म में इसका प्रदर्शन है। गाँधी जी ने कहा था कि अगर आँख के बदले आँख की मांग की गई तो सारी दुनिया अंधी हो जाएगी। गाँधी इस बात को कहते हुए अपने युग के महायुद्धों-विश्वयुद्धों को ध्यान में रखे थे। कलयुग के चरित्र इसे अपनी स्मृति से विस्मृत  करने में ही संलग्न दिखते हैं।

हालाँकि कलयुग श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित एक ऐसी फिल्म है जिसमे महाभारत की कथा को अपनी पटकथा का आधार बनाया है लेकिन यह तब भी महाभारत की कथा न होकर उस कथा की कलयुगीन(समकालीन) दशा का चलचित्रांकन है एक अन्य संदर्भ में कलयुग महाभारत नामक महाकाव्य का संदर्भ बिंदु है। हाँ केवल संदर्भ-बिंदु , समकालीन संदर्भ-सापेक्षता में उसका मूल्याँकन नहीं। यही मेरे लिए इस फिल्म को ख़ास बनाता है। श्याम बेनेगल इस फिल्म में महाभारत की कथा का केवल आधुनिक संदर्भ-बिंदु खोजने की कोशिश करते हैं और उसे बखूबी रूप में अभिव्यक्त भी करते हैं लेकिन उसका मूल्याँकन वह दर्शक पर छोड़ते हैं। श्याम बेनेगल ने उस रिस्क को उठाते हैं जिसे बहुत सारे निर्देशक छूना नहीं चाहते। एक एपिक पर उसकी कथा को उठाकर भी न उठाना श्याम बेनेगल ने संभव किया है। रचनाकार के समक्ष इस तरह का जोखिम हमेशा रहता है। ऐसा जोख़िम स्वयं धर्मवीर भारती को अंधा-युग लिखते वक्त भी था

श्याम बेनेगल की कलयुग के संदर्भ में मुझे धर्मवीर भारती का अंधा-युग यदि याद आता है तो उसका कारण भी यही है। जैसा अंधा युग की भूमिका में धर्मवीर भारती लिखते हैं -  पर एक नशा होता है - अंधकार के गरजते महासागर को चुनौती को स्वीकार करने का, पर्वताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने को सारे खतरों में डालकर आस्था के, प्रकाश के, सत्य के, मर्यादा के कुछ कणों को बटोरकर, बचाकर, धरातल तक ले जाने का - इस नशे में इतनी गहरी वेदना और इतना तीखा सुख घुला मिला रहता है कि उसके आस्वादन के लिए मन बेबस हो उठता है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत और उससे पहले और स्वतंत्रता या विभाजन के दौरान का भारत बार-बार इस कलयुग को देखता रहा है। निश्चित ही यह युग आस्था की मृत्यु के पश्चात जन्मा था जिसके बीज द्वापर युग में ही डल गये थे। जब महाभारत संभव हुआ। बेनेगल धर्मवीर भारती की भाँति महाभारत की कथा की समकालीन संदर्भ-सापेक्षता का मूल्याँकन नहीं करते। इससे कई समीक्षकों के लिए यह फिल्म बेनेगल जैसे बड़े निर्देशक की एक कमज़ोर फिल्म मानी जा सकती है लेकिन कहीं न कहीं यह कमज़ोरी ही फिल्म की सबसे बड़ी खूबी मानी जानी चाहिए। महाभारत और अंधायुग कृष्ण केंद्रित कथा कहता है जबकि कलयुग की कथा करन (कर्ण) की केंद्रीयता की कथा है। कलयुग की आंतरिक अर्थसत्ता का मूल्याँकन तभी संभव है जब करन (कर्ण) की आधुनिक संदर्भवत्ता का मूल्याँकन दर्शक कर सके। संभवत् यहीं से श्याम बेनेगल दर्शक के लिए समीक्षा की राह बनाते हैं। मुझे ये उनके बहुत बाद की फिल्म ग़ुलाल (अनुराग कश्यप) की फिल्म में गाये पीयूष मिश्रा के गीतों में मिलती है इस फिल्म के एक दृश्य में रामधारी सिंह दिनकर की कविता का समकालीन संदर्भ मे गायन करते हैं। कहीं कहीं इस गीत में कलयुग का केद्रीय विचार छिपा है -
ये देख गगन मुझमे में लय है, ये देख पवन मुझमें लय है।
मुझमें लय है संसार सकल, मुझमे धरती आकाश सकल
ये देख महाभारत का रण, मुर्दों से भरी हुई भू है।
पहचान कहाँ इसमे तू है।
कलयुग महाभारत के चरित्रों को आज के संदर्भ में और समय की इस वर्तमानता में खोजने की कोशिश करती है। कुछ लोग कहेंगे कि यह महाभारतयुगीन चरित्रों का कलयुगीन रूपांतरण है पर ऐसा कहकर कहीं न कहीं हम इस फ़िल्म से हट जाते हैं। मैं कहूँगा यह फ़िल्म महाभारत के चरित्रों का कलयुगीन रूपांतरण ही नहीं बल्कि महाभारत की वर्तमान संदर्भसापेक्ष पैरोडी है और निश्चित ही जिसमें समकालीन समयबोध शामिल है।
मुझे फिर पीयूष मिश्रा याद आते हैं -
इस देश में जिस शख़्स को जो काम था सौंपा।
उस शख़्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी।।

कलयुग में जितने भी किरदार (शख़्स) हैं कहीं न कहीं वो अपने काम की कार्यविधियों का विरोध करते हैं कलयुग का मूल संकट और अंधा-युग का मूल संकट यहां आकर एक समान हो जाता है। अनास्था यहाँ भी हावी है विश्वास की डोर यहाँ भी टूटती है। महाभारत में जहाँ कर्ण और दुर्योधन का मैत्री विश्वास अंत तक कायम था कलयुग में धनराज के मन में करन के प्रति अविश्वास बढ़ता है। वह उसे दग़ाबाज़ मानता है और करन की मौत के बाद आत्महंता बनता है।

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

तुगलक : बुद्धिमान मूर्ख


ग्याहरवीं के प्रीबोर्ड की तैयारी कराते वक्त मेरे इतिहास के शिक्षक आर.के. शर्मा बार बार दोहराते तुगलक वंश वाले पाठ में से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है मुहम्मद बिन तुगलक को बुद्धिमान मूर्ख क्यों कहा जाता है? प्रश्न के जवाब में वे राजधानी परिवर्तन से लेकर चाँदी की जगह ताँबे के सिक्के चलवाने और पुनः राजधानी परिवर्तन आदि पॉइंट्स को सामने रखते। पर तुगलक(निर्देशक भानु भारती) को देखते वक्त इतिहास एक विषय के
 रूप में मेरे सामने रहने के बावजूद अपने व्यतिक्रम के रूप में भी मेरे सामने आया। यशपाल शर्मा जब जब तुगलक के भेष में राजनीति खेलते मुझे पिछला इतिहास पलटता दिखाई देता। मैं नहीं समझ पाता कि यह वही तुगलक है जिसका पाठ मेरे इतिहास की किताबों में मौजूद था और जिसका मुसलसल पाठ मैं उस वक्त किया करता था सिर्फ इतिहास अंक बटोरने के मकसद से। फिर खुद ही अपनी बात को काटता और मन में कहता कि यह इतिहास का तुगलक या तुगलक के इतिहास का नाट्य प्रदर्शन नहीं बल्कि तुगलक के समय और सल्तनतकालीन राजनीति का दर्शन है और निश्चित ही जिसमें समकालीनता का बोध है।
यशपाल शर्मा के काम की सबने तारीफ की है मुझे भी लगता है कि उन्होंने अपना रोल बखूबी निभाया है(आवाज़ की मैचिंग फिट न बैठने के बावजूद)। नाटक देखते वक्त मैं मुहम्मद तुगलक के चरित्र को मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश कर रहा था। साथ ही ये जानने की कोशिश कर रहा था कि उसे बुद्धिमान मूर्ख के विशेषण दिए जाने के पीछ कारण क्या थे हालाँकि सवाल पुराना था पर मेरे लिए इसका जवाब पुराना नहीं था। किस तरह से आपकी आधुनिकता समय की संदर्भवत्ता के बिना पुरानी पड़ जाती है इसकी मिसाल तुगलक का चरित्र और उसकी कारगुजारियाँ हैं।
गौर करें तो उसके फैसलों(राजधानी परिवर्तन और सिक्कों के रूप में बदलाव आदि) के पीछे तुगलक के तर्क सही थे राजधानी राज्य के केंद्र में होनी चाहिए दौलताबाद दिल्ली की अपेक्षा तत्कालीन राज्य के बीचोंबीच मौजूद थी, इसी तरह सिक्के का वजूद और महत्व राज्य की मोहर से जाना जाना चाहिए, जैसाकि आज होता है। इन मायनों में देखें तो तुगलक एक दूरदर्शी और बुद्धिमान शासक था। लेकिन फैसलों को जिस तर्ज़ पर लागू किया गया और बाकि चीज़ों को नज़रंदाज़ कर दिया गया सो उसका नतीजा तुगलक ने भुगता।
खैर नाटक पसंद आया। नाटक के अंदर भानु भारती तुगलक की इस दुविधा को दिखाने में सक्षम रहे हैं, मुझे लगता है कि यशपाल शर्मा को जो तारीफें मिल रहीं हैं उसमे भी उसी दुविधा का अहम रोल है जो शुरु से अंत तक यशपाल तुगलक के भेष में चस्पा किये रहते है और कहीं उसकी बनावट में फेर नहीं आता। तुगलक को जिस खुले मंच पर(फिरोजशाह कोटला के खंडहर, किला तो अब वह रह नहीं गया) खेलने का जोखिम उठाया गया है। वह सफल रहा है। भानु भारती, रमा यादव, मधुलिका नेगी, अम्बा सान्याल, कनु भारती, आर. के. धींगरा तालियों के हकदार हैं।
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रविवार, 21 अक्टूबर 2012

एकतरफा प्यार

एकतरफा प्यार
किसी बोद्ध भिक्षु की किताब के पन्नों से टकरा 
मर गया मच्छर
फूल की पंखुड़ी की तरह 
चिपका है पन्ने से
और अफसोस में
अभिशाप झेलता 
बोद्ध-भिक्षु 
तड़प तड़प के इस दिल से
आह निकाल 
समाधि ले 
कर्मविमुख 
हो रहा है
स्मृति से विस्मृत है उसकी
प्यार से पहले की अवस्था में
पढ़ा ये काव्यांश
चाहे कुछ हो
'जीवन नहीं मरा करता है'

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

क्या मैं आदमी हूँ

तुमने कहा कभी तो हँसा करो,
मेरे लिए ही सही

मैंने अपने आँसुओ को सुखा दिया।
और दाँत दिखाकर हँसने लगा।

तुमने कहा तुम गुस्सा बहुत करते हो।
चिल्लाते क्यों रहते हो हर वक्त।

मैंने पाया
मेरी दुम निकल आयी है।
और मेरी जीभ से लार टपक रही है।

तुमने कहा
इर्रिटेट होना अच्छी बात नहीं।

मैंने अपने दिल के सारे घावों को ढँक लिया
और सेल्समैन की तरह हर बात पर मुस्कराने लगा।


फिर एक दिन तुमने कहा।
तुम 'वो आदमी' नहीं जिससे मैंने प्यार किया था।

मैं सोचने लगा
क्या मैं 'आदमी' हूँ।