गुरुवार, 9 जून 2016

आज की दलित अस्मिता का प्रश्न वास्तव में दलित पुरुषों की अस्मिता का प्रश्न है


साहित्य न केवल मन के भावों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है बल्कि दूसरे के भावों अनुभवों की अभिव्यकित का भी साधन है। साहित्य के माध्यम से ही हम एक स्थान पर बैठे बैठे दूसरे स्थान विशेष की संस्कृति, भाषा, रहन-सहन, खान-पान, संस्कार, आदि के विषय में जान सकते हैं। इस प्रकार साहित्य किसी भी प्रकार का दर्पण और धरोहर है। किसी व्यक्ति विशेष या जाति विशेष का उस पर कोई अधिकार नहीं। प्रायः तत्कालीन समय में उठने वाले ज्वलंत प्रश्न ही साहित्य में वाद-विवाद का प्रश्न बनते हैं। दलित साहित्य भी साहित्य में एक ज्वलंत प्रश्न बन कर  उभर रहा है। 
हिंदू समाज में चार वर्णों में विभाजित है। पहला सवर्ण पुरुष, दूसरा सवर्ण स्त्री, तीसरा दलित पुरुष, चौथा दलित स्त्री। इन चार स्तरों के आधार पर ही समाज में यहाँ तक कि साहित्य में भी इन चार स्तरों पर ही हमें इनका स्थान दिखलाई पड़ता है। समाज और साहित्य पर सबसे अधिक वर्चस्व सवर्ण पुरुषों का उसके पश्चात सवर्ण स्त्री का, तत्पश्यात दलित पुरुष और सबसे अंत में दलित स्त्री। हम देख सकते हैं कि दलित स्त्री का स्थान समाज और साहित्य में निम्न से निम्नतर है। और इस पुरुष प्रधान समाज में दलित पुरुष को सवर्ण स्त्री के पीछे रखा गया है। वास्तव में दलित स्त्रियों की स्थिति हमारे समाज में दलित पुरुषों से भी बेकार है। उन्हें समाज में दो-दो मार झेलनी होती है पहला स्त्री होने की और दूसरा दलित होने की। यहीं पर एक सवर्ण स्त्री एक दलित स्त्री से अलग हो जाती है इस जाति-भेद के कारण ही उनके बहुत से सरोकार अलग अलग दिखाई देते हैं। इन दोनों के अंतर  को एम. प्रभावती , प्रभा मुथल, सुशीला मूले, आशा थोरात, अरुणा लोखाड़े, कौशल्या           आदि
मतावलंबियाँ भी मानती हैं उनका कहना है कि "देश के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दलित और सवर्ण स्त्रियों को अल-अलग प्रकार की बाधाओं से ग़ुज़रना पड़ता है। दलित स्त्री समाज के आख़िरी हाशिए पर है। परिवार के भीतर दोनों के दमन शोषण में समानता हो सकती है लेकिन दलित स्त्री को कमज़ोर सामाजिक और आर्थिक स्थिति की वजह से भी दमित होना पड़ता है। सवर्ण औरतें भी दलित और ग़रीब होने की वजह से उसको प्रताणित करने के साथ-साथ उसका शोषण करतीं हैं। दूसरा सवर्ण स्त्री शिक्षा तथा अन्य सामाजिक क्षेत्रों में दलित स्त्री से बहुत आगे हैं।" (भारत में स्त्री असमानताःएक विमर्श- डॉ गोपा जोशी, पृष्ठ ०७)
स्त्री विमर्श को लेकर बहुत सारी बातें की जाती हैं। समय-समय पर गोष्ठियाँ-संगोष्ठियाँ , वर्कशॉप और न जाने क्या-क्या होता रहता है परंतु इन सभी कार्यक्रमों में केवल सवर्ण स्त्री को ही केंद्र में रखा जाता है। एक दलित अथवा आदिवासी स्त्री के अधिकारों उनकी यातनाओं और पीड़ाओ आदि के विषय में यहाँ भी कोई विशेष चर्चा होती दिखलाई नहीं पड़ती। सभी सिर्फ अपने-अपने अधिकारों की बात करते हैं। हमारे समाज(दलित समाज) में भी हम देखते हैं कि अधिकांश दलित पुरुष ही विभिन्न कार्यक्रमों में अधिक दिखाई देते हैं। दलित स्त्रियों की संख्या कुछ ही दिखलाई पड़ती है। स्वतंत्रता सभी को प्यारी है यह बात हमसे(दलितों) अधिक और कौन जान सकता है। इतने सालों की यातना झेलने के बाद आज भी हम अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहें हैं। पर दलित स्त्रियाँ वे तो दलित पुरुषों से भी पीछे हैं। आज की दलित अस्मिता का प्रश्न वास्तव में दलित पुरुषों की अस्मिता का प्रश्न है। आज कितनी दलित स्त्रियाँ ऐसी हैं जो वक्ता के रूप में विभिन्न कार्यक्रमों में दिखाई देती हैं। उन्हें तो अपने दलित पुरुषों से भी अपने अधिकार माँगने पड़ते हैं। दलित स्त्रियों के विषय में तुलनात्मक रूप में दलित पुरुषों द्वारा ही अधिक लिखा जा रहा है। फिर चाहे वह साहित्य की कोई भी विधा क्यों न हो। जब दलितों के विषय में दलित ही बेहतर ढंग से लिख सकतें हैं तो दलित स्त्रियों के विषय में दलित स्त्रियाँ क्यों नहीं, जबकि उन्हें तो समाज में रहकर दो-दो मारें झेलनी पड़ती हैं। दलित स्त्रियाँ अपने अनुभवों की  जितनी सहज अनुभूति कर सकती हैं उतनी अन्य व्यक्ति नहीं। क्योंकि कल्पनाएँ भी सीमारहित नहीं होतीं। यहां यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि दलित स्त्रियों को रोका किसने है? पर क्या दलित स्त्रियों को दलित पुरुषों की अपेक्षा वे सामाजिक-आर्थिक अधिकार दिए जाते हैं जो उनके आगे बढ़ने में सहायक हों। यहाँ तक कि उनके लिए एक ख़ाक़ा भी पहले से ही तैयार कर दिया जाता है।


वर्चुअल स्पेस : ज्ञान और खोज का नया प्लेटफॉर्म और मु्द्रित माध्यम


"बिल्कुल संभव है कि हमारे तर्क कमजोर हों क्योंकि इंटरनेट और वर्चुअल स्पेस की जमकर पैरवी करने के बावजूद भी हम कहीं न कहीं मुद्रित माध्यमों के साथ खुद को खड़ा पाते हैं।" -Tarun Gupta
मुद्रित माध्यम इंटरनेट से पहले भी कारगर रहे हैं और आज भी हैं। पुस्तकें पहले भी छपती और बिकती थीं और आज भी छपती और बिकती हैं बल्कि कहीं ज्यादा छपती और बिकती हैं। जिन पाठकों को पुस्तकें पढ़ने का शौक है वे इंटरनेट पर भी पढ़ते हैं और खरीदकर भी। फिर सवाल है कि आज के युग में खासकर इंटरनेट के युग में मुद्रित माध्यम के समक्ष चुनौती कौन सी है या हम कहें वे कौन से खतरें हैं जो मुद्रित माध्यमों के लिये इंटरनेट के आने के बाद पैदा हुए। मुझे लगता है यह थोड़ा समझ का फेर है लेकिन उसे समझने से पहले वर्तमान स्थिति पर थोड़ा ध्यान देना चाहिये। 
वर्तमान समय में (जिसे हम इंटरनेट का दौर कह रहे हैं) किताबों की बिक्री और प्रकाशन बढ़ा ही है। इसके लिये वे खबरें आधार स्वरूप ली जा सकती हैं जो पुस्तक मेला लगने के दौरान अखबारों में आती हैं। हालांकि प्रकाशकों का मर्ज कुछ और ही होता है।
बहरहाल एक समय था जब आपको अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिये पुस्तक और उसके प्रकाशन का सहारा लेना पड़ता था। एक समय था जब आपके पास खबरों को हासिल करने का जोखिम उठाने का साहस होने के बावजूद किसी प्रैस का मुँह ताकना पड़ता था। एक समय था जब एक कवि या शायर को अपने अशआर लोगों तक पहुँचाने के लिये प्रकाशक की चिरौरी करनी पड़ती थी। एक समय था जब लेखक अपनी पुस्तक की भूमिका में प्रकाशक का धन्यवाद देने के लिये बाध्य था। उसे भय था कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो प्रकाशक रूठ जाएगा संभवत् अगली पुस्तक के प्रकाशन के वक्त परेशान करे। एक समय था जब लेखक कुछ लिखता और छपवा न सकने के ग़म में स्वांतसुखाय हो उस रचना को एक डायरी की शक्ल दे दिया करता। यानि लेखक को अपनी बात पाठक तक पहुँचाने के लिये प्रकाशक की सहमति-असहमति से होकर गुजरना पड़ता था। लेखक की क्या मजाल जो वह प्रकाशक की सहमति के बिना पुस्तक में कोई विरोधी बात कर सके। हम यहाँ प्रकाशकों का सामान्यीकरण नहीं कर रहे लेकिन उस समय अधिकतर लेखक एक तरह के प्रकाशक वर्चस्व की परिधि से स्वयं को आजाद नहीं कर पाते थे। यानि इंटरनेट से पहले लेखक के विचारों की आजादी प्रकाशक की गुलामी के बिना संभव नहीं थी। कम से कम हिंदी जगत में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो जीवनभर अपनी कृतियों को प्रकाशित करवाने के लिये प्रकाशकों के चक्कर काटते रहे, पर अपना लिखा न छपवा सके। यह एक तरह का विरोधाभासी जगत है जहाँ हमें एक तरफ किताबों की शक्ल में छपीं दोयम दर्जे की पुस्तकों की भरमार मिलेगी साथ ही दूसरी तरफ अच्छी और पठनीय पुस्तकों के ‘आउट ऑफ प्रिंट’ होने की कसक भी मिलेगी, जिनके पाठक सालों से उनके प्रकाशन के इंतज़ार में है। हम कहेंगे विरोधाभासी होने के बावजूद यह मुद्रित माध्यमों का समानांतर संसार है। दोनों साथ-साथ चलते हैं। लेकिन जैसा मैंने कहा, यह एक समय था।
आज प्रकाशक के व्यवहार में अगर परिवर्तन न भी आया हो तो लेखक के पास इंटरनेट के रूप में एक प्लेटफॉर्म है जहाँ वह अपनी बात बेझिझक रख सकता है। जहाँ उसके शब्दों और विचारों पर सेंसर की तलवार नहीं लटकी होती। जहाँ वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सार्थक प्रयोग कर सकता है। जहाँ वह पॉपुलर हो सकता है इतना कि प्रकाशक खुद उसे छापने के लिये लालायित दिखें। पत्रिकाएं उससे कॉलम लिखवाने के लिये संपर्क साधे। वह एक वक्ता के रूप में व्याख्यान दे। यानि ‘खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।‘ आप कवि हैं कविता लिखते हैं, आपकी डायरी आपकी कविताओं से भरी पड़ी है। आप कथाकार हैं कहानियाँ लिखना आपको पसंद है। आप दुनिया जहान की खबर रखते हैं। आप एक पत्रकार बनना चाहते हैं। इंटरनेट से पहले आपको अपनी इच्छाओं को दूसरे के हिसाब से ढालना पड़ सकता था। लेकिन इंटरनेट के आने के बाद आप स्वयं सक्षम है कि आप अपना मनचाहा लिखें और उन पर आई टिप्पणियों का जवाब दें। मुद्रित माध्यमों में लेखक और पाठक के मध्य एक तरह का गैप विद्यमान था। वर्चुअल स्पेस ने यह गैप बिल्कुल खत्म कर दिया है। यहाँ लेखक पाठक से सीधे मुखातिब है। वर्तमान समय की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे हम सिर्फ मुद्रित माध्यमों की स्थिति और चुनौतियों के स्तर पर ही नहीं बल्कि इंटरनेट के संदर्भ में अभिव्यक्ति के नये उभरते प्लेटफॉर्म और खोज के नए उपक्रम के रूप में भी देख और समझ सकते हैं।
इंटरनेट के दौर में, आज ऐसे लेखकों की कमी नहीं है जिन्होंने अपने लेखन की शुरुआत ब्लॉग लिखने से की और लोगों द्वारा सराहे गये। ऐसे पत्रकार, कवि, आलोचकों, अध्यापकों की कमी नहीं जो मुद्रित माध्यम की अपेक्षा वर्चुअल स्पेस पर अपनी बात रखने को ज्यादा तरजीह देते हैं।
मोहल्लालाइव, मीडियाखबर.कॉम, हुंकार.कॉम, नईसड़क.कॉम, दीवान, द हूट, चुरमुरी.कॉम, भड़ास.कॉम, जानकीपुल.कॉम आदि ऐसे अनगिनत ब्लॉंग हैं जो निरंतर सक्रिय हैं लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं समझना चाहिये कि इनका उभार मुद्रित माध्यम के पतन के रूप में हमारे सामने आया है। हमें लगता है कि किताबों की खरीद की अपनी दुनिया है। हमें मुद्रित माध्यम को इंटरनेट के बरक्स रखकर अपनी बात नहीं करनी चाहिए। इंटरनेट अपने उपयोगकर्ता को खरीद से पहले की प्रक्रिया की बानगी व्यवहारगत रूप में समझाता है और उसके सामने खोज का एक अपार संसार खोल देता है ताकि पाठक यह तय कर सके कि उसे क्या खरीदना है और क्या नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि इंटरनेट इस तरह का विकल्प अपने उपयोगकर्ता को मुहैया कराता है।
मेरे कई मित्र हैं जिन्होंने ब्लॉगिंग को अपनी अभिव्यक्ति का औज़ार बनाया। उन्हीं में से एक हैं विनीत कुमार जो ‘मंडी में मीडिया’ जैसी पुस्तक के लेखक हैं। आज मैं सन् २०१३ में खड़ा होकर २००७ के विनीत को देखता हूँ जो रवि रतलामी के नुस्खों और तकनीकों से सीख ब्लॉग लिख रहे थे। तब महत्वपूर्ण यह नहीं था कि वे क्या लिख रहे थे। बल्कि महत्वपूर्ण यह था कि वे निरंतर लिख रहे थे। पहले गाहे-बगाहे और अब हुंकार.कॉम के द्वारा वो हमारे सामने एक मीडिया क्रिटिक के रूप में जाने जाते हैं। उनके जैसे उदाहरणों से वर्चुअल स्पेस की शक्ति का अहसास होता है ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर हमें ऐसा प्लेटफॉर्म देते हैं जहाँ हम खुलकर अपनी बात को अभिव्यक्त कर सकते हैं। अपने आपको स्थापित कर सकते हैं। वर्चुअल स्पेस आपसे वह शब्दावली छीन लेता है जिसमें आप कहें कि मैं लिखता तो बहुत हूँ पर मुझे कोई छापता नहीं इसलिए मुझे कोई पढ़ता नहीं। मुद्रण माध्यमों और इंटरनेट के मध्य की स्थिति ने अगर आज एक चुनौती का रूप धारण कर लिया है तो उसके कारणों के रूप में निम्नलिखित उदाहरण को लिया जा सकता है।
नीरा राडिया के केस पर लिखे सेवंती नैनन के एक लेख (बिग ब्रदर्स टू द रेस्क्यू) को जब ‘द हिंदू’ ने छापने से मना कर दिया। तब उन्होंने वह लेख ‘द हूट’ पर डाल दिया। अगर इंटरनेट न होता तो संभवत् इसकी प्रतिक्रिया एक खीझ, एक कसक के रूप में होती। ‘द हिंदू’ जैसा सम्मानित अखबार जब अपने ही कॉलम(मीडिया मैटर्स) लेखक को किसी लेख को छापने से मना कर सकता है। तब ऐसी स्थिति में आम लेखक और अन्य अखबारों के बारे में क्या कहा जाए।
इस तरह के कई उदाहरण सामने रखे जा सकते हैं जो मुद्रण माध्यम की तानाशाही और वर्चुअल स्पेस के जनतंत्र का समर्थन करते हैं।
वर्चुअल स्पेस की अन्य उपलब्धि यह भी है कि यह जहाँ एक ओर अभिव्यक्ति के लिये प्लेटफॉर्म प्रदान करता है वहीं ज्ञान का अपार संसार अपने उपयोगकर्ता के लिये खोल देता है। मुद्रित माध्यम इस तरह की सहूलियत अपने पाठकों को नहीं दे पाता। देता है तो कठिन परिश्रम और समय लेने के पश्चात। लेकिन वर्चुअल स्पेस पर यह सिर्फ कुछ शब्दों को टाइप करने और एक क्लिक पर आपके सामने उपलब्ध है। मान लीजिये आपको किसी लेखक या राजनेता के बारे में जिस किताब में भी लिखा गया हो, वह देखना है। ऐसे में मुद्रित माध्यम आपको कुछ दे पाये या न दे पाये वर्चुअल स्पेस पर आप गूगल बुक्स में जाकर उस लेखक या राजनेता का नाम टाइप कर दीजिये आपके सामने सैंकड़ों किताबें खुल जाएगी। और गूगल आपको सीधे किताब के उस पन्ने पर ले जाएगा। जहाँ उस लेखक या राजनेता का नाम आया है।
वर्चुअल स्पेस की इसी तरह की खूबी मुद्रित माध्यमों के लिये चुनौती बन गई है। लेकिन अब भी मुद्रित माध्यमों के पास अपार संभावनाएँ है। अभी भारत की अधिकतर आबादी इंटरनेट से महरूम है। आज इंटरनेट का उपयोगकर्ता पाँच सात पेज तो नेट पर पढ लेता है पर जहाँ पूरी किताब, ऩ़ॉवेल या कहानी पढने की बात आती है। वह प्रकाशित किताबों के पास जाता है। क्यों न वर्चुअल स्पेस को मुद्रित माध्यमों के विकास और प्रसार का माध्यम बनाया जाए। क्यों न हम उन उपायो को खोजें जिनसे किताबों को इंटरनेट के माध्यम से ज्यादा हाथों तक पहुँचाया जा सके। ऐसा क्यों होता कि जवाहरलाल नेहरू की किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ फ्लिपकार्ट.कॉम पर चालीस फीसदी की छूट के साथ घर तक पहुँच जाती है जबकि उसका अपना प्रकाशक ‘पैंग्विन’ उस पर दस फीसदी से ज्यादा की छूट नहीं दे पाता। बिल्कुल संभव है कि हमारे तर्क कमजोर हों क्योंकि इंटरनेट और वर्चुअल स्पेस की जमकर पैरवी करने के बावजूद भी हम कहीं न कहीं मुद्रित माध्यमों के साथ खुद को खड़ा पाते हैं।
(यह लेख लघु लेख करीब दो ढाई साल पहले लिखा गया था आज फेसबुक पर आपसे साझा कर रहा हूँ।)

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

पुरस्कृत लोगों से पुरस्कार का मूल्य बढ़ता है – नामवर सिंह

2015 का  देवीशंकर अवस्थी सम्मान युवा आलोचक वैभव सिंह को
इक्कीसवाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान युवा आलोचक वैभव सिंह को उनकी पुस्तक भारतीय उपन्यास और आधुनिकता के लिये प्रदान किया गया। यह समारोह प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी आलोचक देवीशंकर अवस्थी के जन्मदिवस 5 अप्रैल को साहित्य अकादमी के रवीन्द्र भवन में संपन्न हुआ। इस अवसर पर वैभव सिंह ने देवीशंकर अवस्थी की पुण्य स्मृति को नमन किया और उन्हें एक निष्पक्ष आलोचक बताते हुए अपने वक्तव्य में कहा कि आलोचना यदि निष्पक्ष नहीं है तो बहुत दूर तक नहीं जा सकती, अवस्थी जी ने इसी आलोचना का विकास किया। जैसाकि देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह की परंपरा रही है इस वर्ष भी देवीशंकर अवस्थी के प्रतिनिधि आलोचना लेखों में से चुनकर एक लेख नई पीढ़ी और उपन्या का वाचन युवा आलोचक संजीव कुमार द्वारा किया गया।
हिंदी के पाठक समुदाय को उदार और न्यायप्रिय बनाना भी आलोचना की ज़िम्मेदारी है।
देवीशंकर अवस्थी सम्मान समिति ने वर्ष 2015 का सम्मान उत्कृष्टता, प्रासंगिकता और विश्लेषण क्षमता के लिये श्री वैभव सिंह को उनकी पुस्तक भारतीय उपन्यास और आधुनिकता पर सर्वसम्मति से देने का निर्णय लिया है। ध्यातव्य है कि अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडेय, नंदकिशोर आचार्य, विजय कुमार, और कमलेश अवस्थी देवीशंकर सम्मान समिति के सदस्य हैं।
अशोक वाजपेयी ने देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार मंडल की ओर से वैभव सिंह की प्रशस्ति पढ़ते हुए कहा कि वैभव सिंह उन लोगों में से हैं जिन्होंने उपन्यास की आलोचना सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों रूपों में बहुत गंभीरता से की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने वायु सेना में थल अधिकारी के रूप में की लेकिन उपन्यास पर लिखने वाला मन सेना की नौकरी में कहाँ रमता। आलोचना के क्षेत्र में इतिहास और राष्ट्रवाद, भारतीय उपन्यास और आधुनिकता तथा शताब्दी का प्रतिपक्ष उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं। इसके अलावा उन्होंने मार्क्सवाद और साहित्यालोचन तथा भारतीयता की ओर के नाम से टैरी ईगल्टन और पवन कुमार वर्मा की पुस्तकों का अनुवाद भी किया है। वैभव सिंह का आलोचना कर्म कविता, कहानी, उपन्यास इतिहास, राष्ट्रवाद और आधुनिकता संबंधी वाद विवाद तथा बहसों तक फैला हुआ है। अपनी आलोचनादृष्टि को परिपक्व और धारदार बनाने में उन्होंने समाजविज्ञान का भरपूर सहारा लिया है। वे मानते हैं कि हिंदी के पाठक समुदाय को उदार और न्यायप्रिय बनाना भी आलोचना की ज़िम्मेदारी है। उनकी आलोचनापद्धति में जातीय स्मृतियों के साथ साथ तर्कसंगत और जनपक्षीय एवं आधुनिकता संबंधी आकांक्षाओं की भी अनुगूँजें सुनायी पड़ती हैं। उनकी पुस्तक भारतीय उपन्यास और आधुनिकता 19वीं सदी में उपन्यास के उद्भव और विकास से लेकर औपनिवेशिक आधुनिकता से भारतीय समाज के द्वंद्वात्मक संबंधों की खोजबीन, विश्लेषण और पड़ताल करती हैं। वे मानते हैं कि राष्ट्रवाद की अवधारणा के विकास की प्रक्रिया बहुआयामी रही है इसके अंतर्गत परंपरागत संस्कारों और औपनिवेशिक प्रभावों से टकराहट को भारतीय उपन्यासों में दर्ज किया गया है। वैभव सिंह अत्यंत साफगोई के साथ अपने तर्कों एवं तथ्यों के माध्यम से भारतीय उपन्यास के इतिहास को खंगालते हुए बताते हैं कि आधुनिकता का विकास एक लंबी परियोजना की तरह हमारे सामने उपस्थित है। आज टैगोर के गोरा की संवादधर्मी आधुनिकता हमारी पथप्रदर्शक हो सकती है। कवि अरुण कमल पर केंद्रित एक किताब के साथ साथ इन्होंने यशपाल के उपन्यास दिव्या की आलोचनाओं का एक संस्करण भी संपादित किया है। इसके अतिरिक्त अभय कुमार दुबे द्वारा संपादित ज्ञानकोष में इन्होंने विविध विषयों पर अपनी टिप्पणियाँ लिखी हैं। 
इस अवसर पर उपन्यास और समकाल विषय पर गोष्ठी भी आयोजित की गई। जिसमें पुरुषोत्तम अग्रवाल और मृदुला गर्ग ने भाग लिया जिसकी अध्यक्षता नामवर सिंह ने की और मंच संचालन रवींद्र त्रिपाठी ने किया।
दरअसल उपन्यास समाज की नहीं बल्कि सैल्फ या आत्म की चीज़ है। - वैभव सिंह
इस गोष्ठी के मूल विषय को विस्तार देते हुए आलोचना और उपन्यास का समकाल शीर्षक अपने वक्तव्य में वैभव सिंह ने कहा कि पूँजी और बाज़ार की लगातार बढ़ती पैठ ने आलोचना के लिये संकट खड़ा कर दिया है और इस संकट से लड़ने के लिये हम दिखावे के लोकतंत्र के भरोसे नहीं बैठ सकते। जिस साहित्य की आलोचना की हम बात कर रहे हैं वह सभ्यता और समाज की आलोचना के बिना संभव नहीं है बल्कि साहित्य की आलोचना तो दरअसल सभ्यता और समाज की आलोचना का ही विकास है।
आलोचना साहित्य की सबसे अनूठी विधा है और यह दावा कर सकती है कि वह सृजनात्मक होने के साथ साथ विचार, ज्ञान और प्रश्नाकुल बौद्धिकता की वाहक ही नहीं है बल्कि उनके विकास के लिये उत्तरदायी भी है। आलोचना समाज की उस इच्छा को व्यक्त करती है जिसमें समाज व सभ्यताएँ अपना सर्वश्रेष्ठ वैचारिक स्वरूप कल्पित करते हैं पर उस स्वरूप को हासिल करने की विधि को नहीं जानते अथवा उस को प्राप्त करने का साहस नहीं करते है। वैभव सिंह ने आलोचना के लिये समकाल की महत्ता निर्दिष्ट करते हुए कहने हुए टैगोर के हवाले से कहा कि आलोचना हमारी आँखों पर चढ़े बहुत सारे बासी, पुराने और जर्जर हो चुके नज़रियों से ही नहीं बल्कि नए परोसे गए छद्म पर चमकदार नज़रियों से हमें मुक्त करती है। और रोज़ ही नई आँखों से दुनिया को देखना सिखाती है।वर्तमान समकाल के सबसे क्रूर संकट को इंगित करते हुए वैभव सिंह ने कहा कि पूंजी और बाजार की लगातार निरंकुश होती कैद में आलोचना के लिये जगह घट रही है फिर आलोचना पर प्रायोजित चीज़ों का दबाव बढ़ रहा है और यह प्रायोजित और छद्म आलोचना को जन्म दे रहा है। सत्ता, पूंजी और धर्म का वर्चस्व किसी किस्म की असहमति या आलोचना को हतोत्साहित ही नहीं बल्कि दंडित करने के लिये पूरी चेष्टा कर रहा है। एक विराट निगरानी तंत्र पैदा किया जा रहा है जो हर तरह के लोकतंत्र पर भारी पड़ रहा है और नागरिक के जीवन पर राज्य की जासूसी लगातार तेज़ होती जा रही है।
उपन्यास के संदर्भ में उन्होंने सैल्फ की महत्ता प्रतिपादित करते हुए कहा कि सैल्फ खोजने और समझने की चीज़ है, उपन्यास पढ़कर ही हम आत्म या सैल्फ को खोज और विकसित कर पाते हैं। दरअसल उपन्यास समाज की नहीं बल्कि सैल्फ या आत्म की चीज़ है। आज के उपन्यास अन्य कलाओं से अपने को काट रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। जब उपन्यास का आगमन होता है तभी आधुनिकता आगमन भी होता है।
वैभव ने समकाल की मुश्किलों को तफ्सील से बताया और कहा कि मुश्किल यह है कि जब आप दुनिया को बदलने का स्वप्न देखते हैं तो कहा जाने लगता है कि अब ऐसे सपनों के लिये कोई जगह नहीं रह गई है और दुनिया को बदलने का कोई भी विचार वस्तुगत मानदंडों पर प्रासंगिक नहीं रह गया है। पिछली सदी के आखिरी दशक में फ्रांसिस फूकोयामा ने एंड ऑफ हिस्ट्री की सैद्धांतिकी प्रस्तुत कर दुनिया के बौद्धिकों में हलचल मचा दी थी पश्चित में यह हो सकता है लेकिन भारत जैसे महादेश में इतिहास का अंत स्वाभाविक रूप में नहीं हो रहा हो तो हिंसा कर, सत्ता के संसाधनों का उपयोग कर या फिर पोपगेंडा करके इतिहास का अंत करने की चेष्टाएँ की जा रही हैं। अपने विस्तृत और प्रभावशाली आलेख के अंत में उन्होंने कहा कि उपन्यास के समकाल पर बात करते हुए हम यह कह सकते हैं कि 21वीं सदी के उपन्यासों ने विषय शिल्प के स्तर पर नये प्रयोग तो किए हैं पर बीसवीं सदी के औपन्यासिक चेतना को त्यागा नहीं है और न ही कोई नाटकीय अलगाव पैदा करने का प्रयास किया है उसका कारण यह है कि भारतीय समाज में बहुत सारी समस्याएँ जस की तस बरकरार हैं जिनसे पिछली सदी के लेखक जूझते रहे हैं। यह अवश्य कहा जा सकता है कि बीसवीं सदी की कला चेतना से आज के उपन्यास दूर जा रहे हैं।




उपन्यास आधुनिकता का लक्षण है, उसका नियामक तत्त्व नहीं है। - पुरुषोत्तम अग्रवाल
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने उपन्यास के संदर्भ में कहा कि ग्रांड नैरेटिव का रिपलेसमेंट एक बेहतर ग्रांड नैरेटिव ही हो सकता है। उपन्यास आधुनिकता का लक्षण है, उसका नियामक तत्त्व नहीं है। हम जब समकाल की बात करते हैं तो मुझे बारंबार एरिक ह़ॉब्सबॉम की किताब का शीर्षक याद आता है ऐज ऑफ एक्सट्रीम। उनके लिये 19वीं सदी पहले महायुद्ध से 1992 में खत्म हो जाती हैं। इतिहास का अंत मानने वाले फूकोयामा अमेरिकन डेमोक्रेसी को वीटोक्रेसी कहते हैं। जो किसी के प्रति एकाउंटेबल नहीं है बस फंडिग एजेंसी के प्रति एकाउंटेबल हैं। जिस लिबरल डेमोक्रेसी के अंत को उसने इतिहास का अंत मान लिया था आज उसकी खुद की सोच भी बदल गयी। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने वर्तमान संदर्भसापेक्षता में टेलीविजन को आज के समकाल का सबसे बड़ा संकट ठहराते हुए कहा कि आज अगर समकाल का सबसे बड़ा संकट यदि कोई है तो सोशल मीडिया, टेलीविज़न आदि का विकास है आज हम अपने देश में देख रहे कि आप झूठे सच्चे वीडियों के जरिये किसी संस्थान किसी व्यक्ति को टारगेट कर सकते हैं। क्या इसमें टेलीविजन का पूरा स्वरूप ही जिम्मेदार नहीं है। उपन्यास में हिंसा की उपस्थिति और व्यक्तिकरण को दरशाते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में हिंसा की स्वाभाविकता उसका नॉर्मालाइजेशन आप देख सकते हैं। उपन्यास के जिस समकाल की हम बात कर रहे हैं यह हिंसा जितनी अधिक उपन्यास के जरिये व्यक्त होती है उतनी जल्दी कविता या कहानी में नहीं होती। हमारी पीढ़ी को यह ईमानदारी से पूछना चाहिये कि हममे से कितनों को नेल्ली याद है। इसलिये कि आपकी सामाजिक अंतरात्मा को नेल्ली याद नहीं है हमें सबको दिल्ली का 1984 याद है लेकिन 1983 में घटित नेल्ली हममें से किसी को याद नहीं है। उन्होंने भारत के इतिहास में सन 1983 और 1984 को राजसत्ता और उसकी निरंकुशता के महत्वपूर्ण वर्ष बताते हुए कहा कि सन 83-84 भारत के इतिहास का वो समय है जब राजसत्ता की एक निर्बाध निरंकुशता आपके सामने स्पष्ट होने लगती है। हम आज उस स्थिति में पहुँच गये हैं जहाँ हिंसा या क्रोध का सिनिकल इस्तेमाल करके राजनीति आगे बढ़ती है यह है समकाल। और इन सब स्थितियों से जो विधा टकराती है वह है उपन्यास। मृदुला गर्ग का उपन्यास वसु का कुटुम्ब, अखिलेश का निर्वासन, हृदेश जोशी का उपन्यास है लाल लकीर इन तीन उपन्यास को वर्तमान समकाल के महत्त्वपूर्ण उपन्यास बताते हुए लाल लकीर के हवाले से उन्होंने कहा कि अगर आप राजसत्ता की हिंसा का जवाब राजनीतिक हिंसा से देते है तो उससे लाभ राजसत्ता को ही होता है।
मैं नेम ऑफ द रोज़ मेँ एक चरित्र पुस्तकों और पुस्तकालयों की सुरक्षा के लिये लड़ रहा है। यह सालों पहले लिखा उपन्यास आज मझे बहुत ज्यादा प्रासंगिक मालूम होता है। हमारे समकाल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यहाँ कल्पना करने की छूट आपको नहीं दी जाती। टेलीविजन आपके 24 घंटे पीछे पड़ा है। अब टेलीविज़न आपको बंद करता है आप टेलीविज़न बंद नहीं करते दरअसल रिमोट किसी और के हाथ में है। ऐसे समय में आपके पास कल्पना करने का समय नहीं है और यदि समय है तो उसकी अनुमति नहीं है। मेरी समझ से आज के समकाल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या हम ऐसी कल्पना करने का भी समय और अवकाश बचा पाएंगे जिसमें स्वयं को सत्य का एकमात्र अधिकृत व्याख्याकार समझने वाला सदियों पहले रटे गए शब्दों को दोहराने वाले कुरूप कौए जैसा नज़र आए।
आज का समकाल विश्वविद्यालयों में है जहाँ सवाल पूछने की मनाही है - मृदुला गर्ग
मृदुला गर्ग ने कहा कि यह कैसा समकाल है जहाँ आप मान्यताओं पर प्रश्न नहीं कर सकते, रुढ़ियों पर प्रश्न नहीं कर सकते, राष्ट्र पर प्रश्न नहीं कर सकते, यह कैसी औपनिवेशिक मानसिकता है जहाँ प्रश्न पूछने पर पाबंदी है।
देवीशंकर अवस्थी को नमन करते हुए मृदुला जी ने डेराजिवो के कॉलेज के निष्कासन की वर्तमान प्रासंगिकता पर ध्यान दिलाया और कहा कि आज का समकाल विश्वविद्यालयों में है जहाँ सवाल पूछने की मनाही है। एक तरफ तो वंचित, प्रताड़ित लोग इस समाज में अपने कटुअनुभव उपन्यासों के माध्यम से बयां कर रहे हैं और जितना वो मुखर हो रहे है उतना ही उन लोगों को बरदाश्त नहीं हो रहा जो अब तक अपने को उच्च कोटि पर मानते आए हैं। आज हमारा जो समकाल है उसमें असहिष्णुता के समावेश से हम इंकार नहीं कर सकते। क्या हम अभी अचानक असहिष्णु हो गये या हमेशा से हममें और हमारी संस्कृति में असहिष्णुता रही है। हमारी सभ्यता और संस्कृति में सहिष्णुता और असहिष्णुता का बड़ा अजीब घालमेल रहा है एक तरफ तो हम उन लोगों के साथ बहुत सहिष्णु रहे जो हमारे देश में पनाह मांगने या आक्रमण करने के मकसद से आए और यहीं रच बस गए। वहीं हमारी ही संस्कृति के भीतर जो असहिष्णुता का मूल था जिसका एक अंग जातिवाद या जाति व्यवस्था था और आप जानते है कि जाति व्यवस्था नस्लवाद के सबसे घिनौने स्वरूपों में से एक है। यह योजनाबद्ध तरीके से सदियों से चला आ रहा है। एक दूसरे प्रकार की असहिष्णुता हमारे यहाँ तीसरे जेंडर को लेकर है। जिस समाज में ऐसी असहिष्णुता हो वह कैसे अपने असहिष्णु कह सकता है।
मृदुला जी ने भारतीय समकाल की दो महत्त्वपूर्ण घटनाओँ भारत पर चीन का आक्रमण और आपातकाल का संदर्भ देते हुए कहा कि 1962 तक हम सपने ही देखते रहे  लेकिन चीन के आक्रमण ने हमारे विश्व गुरू होने के भ्रम को तोड़ दिया लेकिन उसके बाद हमें यह भ्रम रहा कि हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। लेकिन आपातकाल के दौर ने हमारा वह भ्रम भी तोड़ दिया। और बाद में सत्ता के मुँह जो निरंकुशता का खून लग गया था वह कैसे छूटता। आज हमारी माँगे भी प्रायोजित हो चुकी हैं। हमने आरक्षण दिया पर शिक्षा नीति नहीं बनाई शिक्षा नहीं दी। अगर 90 प्रतिशत अंक लाकर भी आपको कॉलेज में दाखिला नहीं मिल पाता तो हम कैसी शिक्षा पद्धति का निर्माण कर रहे हैं। सरकारी कॉलेजों होंगे तो वहाँ प्रश्न पूछने पर मनाही होगी. ऐसे विश्वविद्यालयों का क्या खाक फायदा होगा। हम अभी औपनिवेशिक मानसिकता में जीते हैं  हम अब ब्रिटेन के उपनिवेश न होकर अंतर्राष्ट्रीय पूँजी के उपनिवेश हैं। 1984 में जब भोपाल गैस कांड हुआ तब आँकड़ों को तोड़ा मरोड़ा गया। जो यूनिअन कार्बाइड ने किया। आज तक उस पैस्टिसाइड का हमारी सरकार पता नहीं लगा पाई और पता था तो बता नहीं पाई इसलिये उस पैस्टिसाइड का इलाज नहीं हो सका। यह दरअसल हमारे समकाल का सबसे बड़ा संकट है।
पुरस्कृत लोगों से पुरस्कार का मूल्य बढ़ता है – नामवर सिंह
अपना अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए नामवर सिंह ने कहा कि वैभव के वक्तव्य ने बता दिया कि जिसे यह पुरस्कार दिया गया है वह इसके योग्य है, यह पुरस्कार की विश्वसनीयता को बढ़ाता है। दरअसल पुरस्कृत लोगों से पुरस्कार का मूल्य बढ़ता है, उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है।
इस अवसर पर सांसद डी.पी. त्रिपाठी और साहित्य समाज की जानी मानी हस्तियाँ के साथ साथ अवस्थी जी का पूरा परिवार मौजूद रहा। समारोह में आए सभी गणमान्य अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन अवस्थी जी के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री अनुराग अवस्थी ने किया।   
प्रस्तुति
तरुण
(तदर्थ प्रवक्ता)
शिवाजी कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय

मोबाइल - 9013458181

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

प्रतिमा के बारे में


प्रतिमा के बारे में आज जब मैं सोचता हूँ तो मुझे वही एम.ए वाली चुलबुली प्रतिमा अपने जेहन में दिखती है। एक लड़की जो मेरी खामियों को उपलब्धि और सीमाओं को मेरी सफलता मानती है। एक लड़की जिसे मेरे कपड़ों और चेहरे से ज्यादा मेरे विचार पसंद है। एक लड़की जिसे मुझमें वो सब पसंद है, जो खुद मुझे भी पसंद नहीं है।
हमें मिले अब 9 साल बीत चुके हैं। मैं शादी के बाद भी प्रतिमा से वही सवाल करता हूँ कि आखिर उसने मुझमें क्या देखा। और जवाब के लिये उसकी आँखों में झाँकने की कोशिश करता हूँ। वो पलकें झपका देती है मैं किसी और दिन के लिये यह सवाल बचा कर रख लेता हूँ।
मैं चाहता हूँ कि मैं सिर्फ प्यार की बात करुँ लेकिन इस भयावह जातिगत समय में आप अंतर्जातीय विवाह करने के बाद केवल प्यार की बात नहीं कर सकते। मसलन आपके सामने वो चुनौतियाँ खड़ी होंगी जिन्हें चुनौती के रूप में स्वीकार करने के लिये आपका दिल कभी नहीं चाहेगा। आपके घरवाले, दोस्त, पड़ौसी, बिरादरी वाले, आपके सामने गतिरोधक बन खड़े होंगे। उनके अजीब से तर्कों से आप झल्ला जाएंगे। आपको बात-बात पर इमोशनली ब्लैकमेल किया जाएगा। आप नहीं डिगेंगे, खूब आँसू बहेंगे। “समाज क्या कहेगा। तेरे ताऊजी तो जिंदा गाड़ देंगे तुझे जैसे धमकी भरे वाक्य धौंस के साथ सुनाए जाएंगे। आप सहते रहेंगे और कहते रहेंगे या तो उससे शादी करुँगा या किसी से नहीं।“ पर मैंने ऐसा कुछ नहीं किया मैंने अपने पिता के सामने प्रतिमा के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखा। पहला सवाल जिसकी मैं उम्मीद कर रहा था अपनी कास्ट की है न ?” पापा ने सवाल किया। नहीं, मैंने कहा। अग्रवालों में है?” नहीं, मैंने जवाब दिया। फिर क्या कोई पंजाबन या पहाड़ी तो नहीं, नहीं मैंने फिर से जवाब दिया और कहा कि मेरे साथ पढ़ती है यूनिवर्सिटी रैंक होल्डर है, यूटीए में भी मेरे साथ थी, मुझसे कहीं ज्यादा खूबसूरत है। परिवार पढा लिखा है। बहुत मेहनती है। बिल्कुल जैसी लड़की आप मेरे लिये ढ़ूँढ़ना चाहते हैं।
मैं उन्हें जाति के सवाल से हटाकर बाकी सारी बातों पर लाने की कोशिश करता रहा। पर उनकी सुईं वहीं अटकी रही। वो सब ठीक है बेटा पर एस. सी तो नहीं है न?” हाँ, पर इससे क्या फर्क पड़ता है, मैंने कहा. तुझे नहीं पड़ता पर तेरी बहनों की शादी पर इसका फर्क पड़ेगा। तेरे ताऊ क्या कहेंगे। बिरादरी तेरे साथ मेरा भी बायकाट कर देगी।
पापा मुझे आपने पाला, आपने पढाया। जब दर्द हुआ आपने मेरी आह सुनी। कोई ताऊ या बिरादरी वाला मेरा हाल जानने नहीं आया इसलिये मुझे आपकी राय जाननी है बाकी की राय से मुझे वाकई कोई फर्क नहीं पड़ता।
लेकिन मुझे स्वीकार करना चाहिए कि एक लड़का होने के नाते मेरा अपने पापा का सामना करते हुए ऐसे तर्क देना तब भी आसान था। और मुझे नहीं लगता की मैंने कोई बहुत बड़ी लड़ाई या संघर्ष अपने घर में किया हो। जितना हुआ उतने की उम्मीद मैं पहले ही करके चल रहा था। बहनें रूठीं, फिर मान गईँ, ताऊ रूठे, वो आज भी रूठे हुए हैं मैं भी उन्हें मनाना नहीं चाहता। ऐसे लोग रूठें ही रहें तो समाज की ज्यादा भलाई होगी।
मुझे लगता है कि हमारे समाज में जब एक दलित लड़की किसी गैर दलित लड़के से शादी करने के बारे में सोचती है या फैसला लेती है तब उसके शादी करने के बारे में सोचने से पहले एक दंभित समाज उसके सामने खड़ा होता है। जब प्रतिमा ने मेरे सामने अपने प्यार का इज़हार किया था उससे पहले एक और इज़हार एस. एम. एस के माध्यम से किया था वो मैसेज था तरुण मैं एस. सी हूँ। उस वक्त मुझे यह बहुत अजीब लगा था पर आज मैं प्रतिमा के उस संदेह को समझने की कोशिश करता हूँ। यह एक भयावहता है जिसे हमारे शहर ऊपरी तौर छिपाने की कोशिश करते हैं। गाँवों में यह भयावहता ज्यादा साफ तौर पर दिखती है। मैं जिस भयावहता की बात कर रहा हूँ वह प्रतिमा के सांदेशिक प्रश्न में मौजूद है। मेरी पहली और शायद अंतिम चुनौती भी प्रतिमा के सामने खुद को साबित करने की थी जिसे प्रतिमा के प्यार और विश्वास ने स्वतः खत्म कर दिया। आज मुझे समाज से कोई गिला नहीं, हालाँकि हम दोनों शादी के बाद उन अंतरालों को नहीं भर सके जो एक अंतर्जातीय विवाह के पश्चात पैदा होते हैं लेकिन कम से कम मुझे उन अंतरालों को भरने की कोशिश या चाह नहीं होती है।
मुझे आज भी इस बात का अफसोस है कि मैंने प्रतिमा को पहले पसंद क्यों नहीं किया। मैंने उसे प्रपोज़ क्यों नहीं किया। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ तुम मेरी साँसें हो, मैं फिर वहीं पंक्तियाँ कहूँगा jo शादी से पहले कही थी..
तुम्हारे पास रहता हूँ।
तो मैं कुछ खास रहता हूँ।।
नहीं तो बिन तुम्हारे मैं
बहुत उदास रहता हूँ।।
सुना है रोज़ रहता है
जमाने भर का डर तुमको
तुम्हारे साथ रहता हूँ,
तो मैं आज़ाद रहता हूँ।।



शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

नेहरू युग का स्वप्न और मलयज का मूल्याँकन



मलयज की साहित्य-यात्रा जिस रास्ते से होकर शुरू हुई वह रास्ता कई राहोंकी ओर निकल रहा था। एक राह से नई कविता के सिद्धांतकार जा रहे थे जो साहित्य की स्वायत्तता पर बल दे रहे थे(1) और जिनका मानना था कि रचनाकार किसी विचारधारा का पिछलग्गू नहीं है। उसी रास्ते से एक और राह निकल रही थी जो मुक्तिबोध सरीखे साहित्यकारों की राह थी जो लगातार कहते आ रहे थे कि रचनाकार की कोई भी सौंदर्य-रूचि अपने वर्ग से निरपेक्ष नहीं होती। मुक्तिबोध साहित्य में रचनाकार के आत्मसंघर्ष के हिमायती थे और अपने लेखों में बार-बार साहित्य की विभिन्न विधाओं मुख्यतः नयी कविता में आत्मसंघर्ष का पक्ष लेते हुए कह रहे थे कि आत्मसंघर्ष के द्वारा ही रचनाकार अपनी वर्गबद्ध सीमा से ऊपर उठकर एक व्यापक जनसमाज के यथार्थ से जुड़ सकता है।(2)  वे इस बात को भी उठा रहे थे कि नयी कविता मुख्यतः बौद्धिको द्वारा लिखी जा रही है और यही कारण है कि उसमें अभिव्यक्ति के लिए बहुत विशेष विषय ही चुने जाते हैं, सारा ज़ोर  कलात्मक अभिव्यक्ति और शब्द-रूप पर होकर रह गया है।
एक ओर वे लोग थे जो कलात्मक अभिव्यक्ति को भी अहम मान रहे थे तो दूसरी ओर वे लोग थे जिनके लिए विचारधारा अहम् थी। रचना व रचनाकार का आधार लेते हुए कहें तो मलयज का मानस अंधेरे में(मुक्तिबोध)  और असाध्य वीणा(अज्ञेय)  के तनाव के द्वंद्व से उत्पन्न मानस था। उनका कृतित्व अज्ञेय और मुक्तिबोध को छोड़ते-अपनाते ही नहीं बना था बल्कि इसमें नेहरू युग का वह मोहभंग भी था जिसने मलयज के मन में तत्कालीन युवा लेखन के संदर्भ में यह गहरे रूप में पैठा दिया था कि वर्तमान युवा लेखन सिर्फ निर्वासित नहीं है (जैसाकि अंधेरे मेंके नायक के संदर्भ में कहा जाता रहा है) बल्कि मलयज के समय का रचना चरित्र निर्वासन की दोहरी मार झेल रहा है। मलयज की आलोचना में प्रभाव कम है, स्वीकार-अस्वीकार अधिक । उनके लिए रचना की महत्ता उसकी विचारधारा नहीं बल्कि वे बेचैनियाँ रही हैं जिनके द्वन्द्व ने रचना की उत्पत्ति  में मुख्य भूमिका निभाई।
भारत की बागडोर जब नेहरू युग के हाथों में आई उस वक़्त मलयज इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र थे। उस दौरान इलाहाबाद साहित्य का गढ़ हुआ करता था। नयी कविता, ‘परिमलका गवाह इलाहाबाद। इलाहाबाद और परिमलने मलयज के साहित्यिक संस्कारों को गढ़ा। परिमलही वह जगह थी जहाँ से मलयज ने नयी कविता की रचना-प्रक्रिया उसकी सृजनशीलता का बौद्धिक विश्लेषण करने का प्रयास किया।
‘‘
हिंदुस्तान को बहुत हद तक बीते हुए ज़माने से नाता तोड़ना होगा और वर्तमान पर उसका जो आधिपत्य है, उसे रोकना होगा। इस गुज़रे ज़माने के बेजान बोझ से हमारी जिदगी दबी हुई हैं जो मुर्दा है और जिसने अपना काम पूरा कर लिया है, उसे जाना ही होता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुज़रे जमाने की चीज़ों से हम नाता तोड़ दें या उनको भूल जायें, जो ज़िंदगी देने वाली हैं और जिनकी अपनी अहमियत है हम उन आदर्शों को नहीं भूल सकते, जिन्होंने हमारी जाति को प्रेरित किया है। हिंदुस्तानी जनता के युगों से चले आने वाले सपनों को, पुराने लोगों के ज्ञान को, जिंदगी और प्रकृति में अपने पुरखों के प्रेम और उमंग को, उनकी मानसिक खोज और जिज्ञासा की भावना को उनके विचार की साहसिकता को, साहित्य, कला और संस्कृति में उनकी प्रतिभा को, सच्चाई खूबसूरती और आजादी के लिए उनकी मुहब्बत को, उनके बुनियादी मूल्य निर्धारण को... हम अपनी आँखों से ओझल नहीं कर सकते।’’(3)   नेहरू युग का स्वप्न उस तनाव के द्वन्द्व में मौजूद था जो एक ओर तो गुज़रे जमाने से नाता तोड़ना चाहता था पर साथ ही गुजरे जमाने की चीजों के प्रति अपना मोह नहीं छोंड़ पा रहा था। वे किसी भी शर्त पर उन राष्ट्रीय आदर्शों को बिसराने के पक्ष में नहीं थे जिन्होंने उनकी जातीयता को प्रेरित किया था। नेहरू एक तरह की निरपेक्षता में अपनी राजनीतिक व वैश्विक समझ की बुनियाद रख रहे थे।
भारत की स्वतंत्रता का उदय विभाजन की त्रासदी के साथ हुआ। यह आज़ादी हमें द्वितीय विश्वयुद्ध, स्वतंत्रता आंदोलन और विभाजन की असह्य पीड़ा में अपने लोगों की जान गँवाने के बाद अर्जित हुई। नेहरू इस अर्जित स्वतंत्रता का मूल्य जानते थे साथ ही भारतीयों की आज़ादी के जज़्बे को भी उनका बौद्धिक मानस समझ रहा था। स्वतंत्र भारत की बुनियाद वे रख चुके थे पर इसके तमाम सीमित साधनो से वाकिफ़ रहते हुए इसे विकसित करना साथ ही भारत के बुद्धिजीवियों और असंख्य आम लोगों को एक साथ लेकर चलना उनके लिए चुनौती था। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका ही नहीं बल्कि इसके बाद युद्ध  की मंडराती संभावना अथवा शीत युद्ध के खतरे को भी वे समझ रहे थे। नेहरू का स्वप्न इन खतरों से  नव-स्वतंत्र राष्ट्रों को बचाते हुए भारत को विश्व पटल पर पहचान दिलाना था।
विश्वयुद्ध के बाद विश्व दो गुटों में बँट गया था। अमेरिका और सोवियत संघ अपने-अपने विचारों क्रमशः पूँजीवाद और साम्यवाद द्वारा विश्व का नेतृत्व करना चाहते थे और उनके निशाने पर तीसरी दुनिया यानि नवस्वतंत्र देश थे। ऐसे समय में नेहरू न तो विचारधाराओं को पूरी तरह स्वीकार कर पा रहे थे और न ही अपने सीमित साधनों को देखते हुए इनका बहिष्कार कर पा रहे थे। यों नेहरू का मानस सोवियत संघ के साम्यवाद की ओर झुका हुआ था लेकिन तब भी तत्कालीन स्थितियों और घटनाओं को देखते हुए नेहरू इन दोनों गुटों से अलग रहते हुए अपनी पहचान वैश्विक पटल पर बनाने में सफल हुए। उनकी गुट-निरपेक्षता की नीति भारतीय विदेश नीति का जरूरी और अहम् फैसला रहा। जिससे न केवल भारत उन दो महाशक्तियों के पिछलग्गू बनने से बचा बल्कि उसने नवस्वतंत्र राष्ट्रों के सामने भी एक नयी राह खोली, साथ ही तीसरी दुनिया के देशों का नेतृत्व भी हासिल किया।
यह नेहरू युग का स्वप्न भर नहीं था बल्कि उनकी ज़रूरत भी थी। नेहरू युग का स्वप्न (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, निरस्त्रीकरण व शहरीकरण)  एक तरह के राजनीतिक व वैश्विक आशावाद से ग्रस्त था। चीन के आक्रमण से नेहरू का यह आशावादी स्वप्न भंग हो गया और साथ ही भारतीय राजनीति से उस आदमी का मोहभंग भी स्वाभाविक रूप से हुआ जिसके लिए नेहरू काम कर रहे थे। तत्कालीन युवा लेखन नेहरू के स्वप्न के समानांतर चल रहा था। नेहरू के स्वप्नभंग के साथ ही उस युवा लेखन को भी गहरा धक्का लगा। जो देश की राजनीति की ओर निश्चिंत सा हो गया था। दरअसल इसी मोहभंग ने आम आदमी को राजनीति में सक्रीय भागीदारी निभाने के लिए प्रेरित किया। नेहरू युग का स्वप्न उन सर्जनात्मक अपेक्षाओं को भारतीय मानस में जगाने के बाद उन्हें पूरा न कर पाने की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए एक अवसान, एक मोहभंग, एक निर्वासन के रूप में परिणत हुआ। इस स्वप्न भंग ने उन दोनों ध्रुवों को मिला दिया था जो अब तक एक ही राष्ट्र का हिस्सा रहते हुए अलग-अलग स्तर पर काम कर रहे थे। यह स्वप्न भंग उन युवा बौद्धिकों में निर्वासन की त्रासदी के रूप में ही नहीं उभरा था जो नेहरू के बौद्धिक मानस और वैश्विक राजनीतिक दर्शन को समझ रहे थे बल्कि इससे उन मजदूरों और किसानों के विश्वास को भी धक्का लगा था जो अब तक नेहरू के स्वप्न के साये में स्वयं को महफ़ूज़ मान रहे थे। इस स्थिति पर मलयज का कथन है- ‘‘नेहरू युग की राजनीति भारत की खोजके आधर पर आशावाद से ग्रस्त एक ऐसी राजनीति थी जिसके पैर यथार्थ पर कम स्वर्णिम मानव भविष्य के स्वप्न पर अधिक टिके थे। ऐसी आदर्शवादी राजनीति का अंत यदि मोहभंग में हो तो कोई आश्चर्य नहीं।’’(4)  स्वतंत्रता के समय पैदा हुई पीढ़ी 60-70 में जवान हुई एक तरह से नेहरू युग का अवसान और उस पीढ़ी का युवा काल साथ-साथ आया। इस पीढ़ी के बचपन को नेहरू युग ने वैज्ञानिक भविष्यवाद का स्वप्न दिया था लेकिन युवा मन में यह स्वप्न बिखर गया। नेहरू के अवसान के बाद जो युवा लेखन(साठ-सत्तर के दशक का लेखन) आया जिसमें मलयज का लेखन भी शामिल है वह किसी प्रकार के भविष्यवाद की उम्मीद लेकर आगे नहीं बढ़ा बल्कि उसने इस मोहभंग(स्वप्नभंग) से सीख लेते हुए अपने वर्तमान से संबद्ध लेखन पर बल दिया। इस युवा लेखन के कई स्वर हैं एक ओर विद्रोह और अराजकता का स्वर है तो दूसरी ओर कविता से अकविता की उड़ान। एक ओर नक्सलबाड़ी है तो दूसरी ओर वर्तमान स्थिति को अस्वीकार करते हुए आंदोलनधर्मी जनक्रांति का आह्वान। ये सभी स्वर नेहरू युग के स्वप्न भंग के बाद उठे स्वर हैं। मलयज ने नेहरू युग के इस लेखन को समझने-समझाने के लिए एक लेख (पिछले दशक के युवा लेखन के बारे में कुछ मूलभूत बातें) लिखा है। संभवत् यही कारण है कि साठ के दशक की पीढ़ी आदर्शवाद को अस्वीकार कर, अधिक यथार्थोन्मुख होती है। आदर्शों की मृगमरीचिका की अपेक्षा वह अपने यथार्थ का सामना कर रही थी निसंदेह इस यथार्थ ने उनके लेखन में आक्रोश, विद्रोह और कुण्ठा का स्वर भरा था लेकिन यह अपने भविष्य के किसी भी आदर्श में जीना नहीं चाहती थी। यह उस पीढ़ी का अपने यथार्थ और तात्कालिकता में जीवंत लेखन था। मलयज अपने समय की पीढ़ी के मन में उठे इस उद्वेलन को महसूस कर रहे थे। कहीं न कहीं वह स्वयं भी इसी तनाव से पीड़ित थे। विजय कुमार मलयजपर लिखे मोनोग्राफ में लिखते भी हैं- ‘‘ साठ के दशक में जिस प्रकार का विद्रोह और आक्रोश से भरा हुआ युवा लेखन आया, उसे मलयज विभिन्न स्तरों पर समझने विश्लेषित करने का  प्रयास करते हैंवे कहते हैं कि मोहभंग के बाद जो युवा लेखन उभरा है, वह भविष्यवाद से विरत लेखन है। यह सीधे-सीधे अपने वर्तमान से मुखातिब लेखन है और इसमें अपने अस्तित्व-बोध की एक तीक्ष्ण तात्कालिकता है।’’(5) यह सही है कि नेहरू युग के अवसान के साथ ही तात्कालिकता पर रचनाकार का बल अधिक हो गया और मोहभंग व निर्वासन की स्थिति ने उसे अपने अस्तित्वबोध के प्रति अधिक सावधान रहने के लिये बाध्य किया था लेकिन तब भी नेहरू युग की इन तमाम शंकाओं के बावजूद भी मलयज नेहरू के व्यक्तित्व, उनकी दृष्टि से प्रभावित थे। राजनीतिक और वैश्विक स्तर पर जो नीति नेहरू ने अपनाई थी। साहित्य स्तर पर वही नीति मलयज ने भी अपनाई। तय करो किस ओर हो तुमके नारों के बीच मलयज साहित्य में प्रचलित दो दृष्टियों, दो विचारधराओं, दो ध्रुवों से न केवल स्वयं को बचा रहे थे बल्कि इन दोनों से तटस्थ रहते हुए अपनी एक अलग और स्वतंत्र दृष्टि भी बना रहे थे। अगर अतिशयोक्ति न समझा जाए तो हम कहना चाहेंगे कि इसी दृष्टि के बल पर मलयज सत्तर के दशक के सर्वाधिक ईमानदार और तटस्थ आलोचक के रूप में आज तक स्मरणीय है। नेहरू की वैश्विक गुटनिरपेक्षता को साहित्य के स्तर पर मलयज ने अपनी युवा पीढ़ी को साहित्यालोचन की दो दृष्टियों से अलग (मार्क्सवादी और कलावादी) अपनी दृष्टि, भाषा-संस्कार, अपनी सोच को बनाया। नेहरू युग का युवालेखन जिसे मलयज दोहरे स्तर पर निर्वासित मानते हैं दरअसल अपने भीतरके रचनाकार को बचाये रखने में संघर्षरत लेखन था।  ‘‘इस दशक की ट्रेजेडी यह रही है कि इसमें व्यक्ति न तो लौटकर पूरी तरह भीतरकी ओर जा सकता है न अपने को पूरी तरह बाहर को ही संमर्पित कर सकता था। यह एक ऐसी सांसत थी जो नेहरू युग में नहीं थी।’’(6) मलयज नेहरू के बौद्धिक मानस से प्रेरित जरूर थे लेकिन उनके राजनैतिक दर्शन और राष्ट्र नेतृत्व की सीमाओं को भी समझ रहे थे। किसी भी राष्ट्र का साहित्य उस देश की राजनीति में परिवर्तन से जरूर प्रभावित होता है और ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि साहित्य, साहित्यकार की दृष्टि और उसकी सोच का प्रतिफल है। एक देश की राजनीतिक उथल-पुथल का अक़्स उसमें आना स्वाभाविक भी है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति और भारतीय साहित्य की धाराएँ समानांतरता की हदों से आगे बढ़ गयी थीं। नेहरू युग जिन दबाबों में घिरा हुआ था वहाँ आजादख़याली एक कूटनीतिक भूल भी हो सकती थी, सो नेहरू युग के अवसान के साथ ही युवा लेखन का स्वर भी कुछ अवरूद्ध हुआ, आक्रोश का जागना भी स्वाभाविक ही था। मलयज युवा लेखन की इस आक्रोशित मानसिकता से सहानुभूति रखते थे। उनके युग का लेखन अपने वर्तमान की वास्तविकता अधिक साफ तरह से देख पा रहा था। नेहरू युग के अवसान ने ही नयी कविता के बाद की कविता से वे प्रतीक और बिंब छीन लिए थे जिनके बिना नयी कविता’ ‘नयी न रह गयी । नेहरू युग के अवसान के साथ एक अनास्था, एक विक्षोभ न केवल राजनीति बल्कि साहित्य में शिथिलता ला रहा था जिसकी झलक सत्तर के दशक की कविताओं (अकविता) में भी देखी जा सकती है। मलयज का कवित्व उन बिंबो और प्रतीकों की दुनिया से दूर हटता हुआ सपाटबयानी की दुनिया की ओर बढ़ता हुआ कवित्व है। शायद इसी कारण से मलयज मुक्तिबोध और अज्ञेय के बिंब और प्रतीकों को पसंद करने के बावजूद अपनी युग-संबद्धता का मूल्य रघुवीर सहाय की सपाटबयानी को देना ज्यादा पसंद करते हैं। निश्चित रूप से मलयज नेहरू से प्रभावित थे नेहरू की दृष्टि और उनके युग ने उन्हें सिखाया था कि जिस प्रकार से वैश्विक राजनीति की दो दुनियाओं (पूंजीवाद और साम्यवाद)  से अलग भी तीसरी दुनिया (गुटनिरपेक्षता) की दुनिया हो सकती है उसी प्रकार साहित्यानुशीलन की दो दृष्टियों (प्रगतिवादी और कलावादी) से अलग भी एक तटस्थ दृष्टि हो सकती है। मलयज ने साहित्यालोचन के स्तर पर इस प्रभाव को ग्रहण भी किया था। वह पूर्वग्रहसे जुड़े रहने के बावजूद कलावादी नहीं बने(जैसाकि माना जाता रहा है) बिल्कुल इसी तरह मुक्तिबोध के प्रशंसक होने के बावजूद मार्क्सवाद का मुलम्मा उन पर नहीं चढ़ सका।  इसके बावजूद भी रोमारोलां की ज्याँ क्रिस्तोफ और इवान(वी. बोगोमोलोव)  जैसी रचनाएँ उनकी पसंदीदा रचनाएँ रहीं। एक अर्थ में वे कला के प्रशंसक होने के साथ-साथ स्वयं एक कलाकार थे दूसरे अर्थ में जनपक्षधरता के प्रबल समर्थक। रचना को उसकी आंतरिक सत्ता के उद्घाटन में समझने वाले पाठक और उसकी तर्कसंगतता और वैज्ञानिक दृष्टि में मूल्याँकन करने वाले निर्मम और निडर आलोचक। यह गुण उन्हें जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक दर्शन से मिला था जिनकी दृष्टि के आलोक में वे अपना और अपने समय के लेखन का मूल्याँकन करते हैं। अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद नेहरू उनके लिए सिर्फ एक राष्ट्रनेता नहीं थे बल्कि एक नज़रिया, एक दृष्टि भी थे जिस पर वे स्वयं को  और अपने युग को   आँक रहे थे। उनकी आलोचना इतनी निर्मम और तटस्थ थी कि जिसने अपने अग्रज साथियों (शमशेर बहादुर सिंह , श्रीराम वर्मा, श्रीकांत वर्मा, साही, निर्मल वर्मा, नामवर सिंह)  की सीमाओं का भी ईमानदारी से न केवल उल्लेख किया बल्कि समकालीन परिस्थितियों में उनका मूल्यांकन भी किया। 


  
संदर्भ-ग्रंथ सूचीः-
1. नयी कविताःस्वरूप और समस्याएँ –गुप्त, जगदीश भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन द्वितीय संस्करण1971
2. मुक्तिबोध रचनावली-5 (सं.) जैन, नेमिचंद्र राजकमल प्रकाशन नयी दिल्ली,पटना,इलाहाबाद प्रथम संस्करण 1986 द्वितीय आवृत्ति 2007
3.
हिंदुस्तान की कहानी - नेहरू; जवाहर लाल (संपादक)रामचंद्र टंडन, सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली, संस्करण 2009, पृष्ठ 591-592
4.  
कविता से साक्षात्कार-मलयज, संभावना प्रकाशन, हापुड़  1979 पृष्ठ 165
5.  
मलयज – कुमार, विजय साहित्य अकादमी संस्करण 2006 पृष्ठ 24
6.  
कविता से साक्षात्कार - मलयज, संभावना प्रकाशन हापुड़  1979, पृष्ठ 168

     







Dr. Tarun
 (Delhi University)

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