सोमवार, 9 अप्रैल 2018

2017 का देवीशंकर अवस्थी सम्मान युवा आलोचक अमिताभ राय को


2017 का देवीशंकर अवस्थी सम्मान युवा आलोचक अमिताभ राय को
2017 का देवीशंकर अवस्थी सम्मान युवा आलोचक श्री अमिताभ राय को उनकी पुस्तक सभ्यता की यात्राः अंधेरे मेंके लिए दिया गया। उन्हें यह सम्मान रवींद्र भवन, नई दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार में आयोजित एक समारोह में वरिष्ठ आलोचक श्री विश्वनाथ त्रिपाठी ने प्रदान किया। इस वर्ष की सम्मान समिति में अशोक वाजपेयी, राजेंद्र कुमार, नंदकिशोर आचार्य और कमलेश अवस्थी शामिल थे।  आलोचना के क्षेत्र में दिया जाने वाला यह प्रतिष्टित पुरस्कार हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक स्वर्गीय श्री देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कमलेश अवस्थी द्वारा वर्ष 1995 में स्थापित किया गया। यह सम्मान अवस्थी जी के जन्मदिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष 45 वर्ष तक की आयु के किसी युवा आलोचक को दिया जाता है। सम्मान के तहत साहित्यकार को प्रशस्तिपत्र, स्मृति चिह्न और ग्यारह हजार रुपये की राशि प्रदान की जाती है। अब तक यह सम्मान सर्वश्री मदन सोनी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, विजय कुमार, सुरेश शर्मा, शम्भुनाथ, वीरेंद्र यादव, अजय तिवारी, पंकज चतुर्वेदी, अरविंद त्रिपाठी, कृष्ण मोहन, अनिल त्रिपाठी, ज्योतिष जोशी, प्रणय कृष्ण, प्रमीला के. पी. संजीव कुमार, जितेंद्र श्रीवास्तव, प्रियम अंकित, विनोद तिवारी, जीतेंद्र गुप्ता, वैभव सिंह एवं पंकज पराशर को प्रदान किया जा चुका है।
परंपरानुसार देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह में किसी एक प्रासंगिक विषय पर व्याख्यान का आयोजन भी किया जाता है। इस बार का विषय था आलोचना और अंतःकरणइस विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित वक्ता थे राजेंद्र कुमार, नंदकिशोर आचार्य और अच्युतानंद मिश्र। समारोह की अध्यक्षता नंदकिशोर आचार्य ने की।
संजीव कुमार ने इस सम्मान समारोह का संचालन करते हुए देवीशंकर अवस्थी की पुस्तक नयी कहानी संदर्भ और प्रकृति  के हवाले से कहा कि अवस्थी जी की आलोचना में चीज़ो को एकांगी तरीके से देखने की दृष्टि नहीं मिलती वहाँ एक समेकित दृष्टि दिखाई देती है। अवस्थी जी इस सम्मान समारोह में इस रूप में हमारे बीच मौजूद हैं। यह 23वाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह है। एस सुखद क्षण यह भी है कि देवीशंकर अवस्थी की रचनावली रेखा अवस्थी और कमलेश अवस्थी के संपादन में वाणी प्रकाशन से  छप कर आ गई है।
अगर नयी कविता की तर्ज पर नयी आलोचना भी होती तो विवेक के रंग पुस्तक उसका मुखपत्र होती - विश्वनाथ त्रिपाठी
इस मौक़े पर विश्वनाथ त्रिपाठी ने देवीशंकर अवस्थी के साथ बिताये संस्मरणों को साझा करते हुए कहा कि यह सम्मान समारोह हिंदी साहित्य के इतिहास में धँस चुका है। हमने पत्नी के लिए जिन विशेषणों को सुना है उसमें एक शब्द अर्धांगिनी भी है भाभी कमलेश अवस्थी ने सत्यनिष्ठा और कर्मठता से इस शब्द को सार्थक किया है। इतनी कम उम्र में बाबू देवीशंकर अवस्थी जितना लिख गए यह किसी आश्चर्य से कम नहीं, और जिस तन्मयता से उनकी रचनाओं को सहेजा गया उन्हें सुरक्षित रखा गया इसके लिए  भाभी साधुवाद की हकदार हैं।
हिंदी साहित्य के सुधी पाठक जानते हैं कि हिंदी साहित्य में भूमिकाओं के रूप में महत्त्वपूर्ण साहित्य का सृजन हुआ है । विवेक के रंग सन् 1964 में प्रकाशित हुआ है इसका नाम ही बताता है कि अवस्थी जी ने कितना परिश्रम किया होगा। इसकी भूमिका को पढ़ने से ही मालूम हो जाता है कि उनकी अपने समकालीन साहित्य पर कितनी जबरदस्त पकड़ थी। अगर नई कहानी और नयी कविता की तर्ज पर नयी आलोचना भी होती तो विवेक के रंग नामक पुस्तक उसका मुखपत्र होती।
एक आलोचक की पहचान यह भी है कि वह अपने समय की अच्छी और खराब रचना को अलग करें। यह रेखांकित किया गया है कि रचना को आलोचना से अनुकूलित होना चाहिये । यह बहुत सुखद है कि पश्चिम की नयी समीक्षा का प्रभाव होने के बावजूद देवीशंकर अवस्थी की आलोचना पश्चिम की नयी समीक्षा के दबाव को अपने ऊपर नहीं चढ़ने देती। इस सब से लगता है कि वो एक बहुत बड़ी तैयारी कर रहे थे। मुझे लगता है कि देवीशंकर अवस्थी एक मैराथॉन रेस के लिए खुद को तैयार कर रहे थे और अगर आज वो जीवित होते तो आलोचना संसार में एक चमकता हुआ नाम होते।
विश्वनाथ त्रिपाठी ने मॉडल टाउन की स्मृतियों को याद करते हुए कहा कि जब वो मॉडल टाउन में रहते थे तब हमारा रोज ही मिलना होता था। मेरे मन में कभी कभी आता है कि मैं मॉडल टाउन की स्मृतियों के बारे में लिखूँ वो अच्छा बुरा हो तो हो, पर रोचक जरूर होगा।
आलोचक साहस और निर्भीकता को किसी भी कारण से कभी  न छोड़े – अशोक वाजपेयी
कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा कि अब कम ही लोग बचे हैं जो देवीशंकर अवस्थी से मिले हैं या जिन्हें उनके साथ का सौभाग्य मिला है। उन्होंने मज़ाकिया लहज़े में कहा कि तब मैं यहाँ नया नया आया था और सैंट स्टीफन कालेज का छात्र था। तो ऐसे समय में अवस्थी जी के इशारे पर या वो इशारा न भी करें तब भी उनके घर चला जाया करता था जहाँ एक निशांत गोष्ठी हुआ करती थी जिसका नियम था कि जो लोग उस गोष्ठी में हैं उसकी कोई प्रशंसा नहीं करेंगे और जैसे ही कोई व्यक्ति उस गोष्ठी से जाएगा उसकी निन्दा शुरु कर देंगे तो लोग वहाँ से जाने में संकोच करते थे।
उन दिनों मैंने एक समीक्षा लिखी थी रघुवीर सहाय पर तब मेरी उम्र उन्नीस बरस थी वह समीक्षा कृति में छपी थी  और तब हिंदी साहित्य में हमारा काहे का स्थान था उसी दौरान अवस्थी जी ने फोन किया और पूछा कि विवेक के रंग में तुम्हारी कौन सी समीक्षा शामिल करें तब मैंने रघुवीर सहाय वाली समीक्षा के लिए कह दिया तब उन्होंने बताया कि रघुवीर सहाय से भी उनकी बात हुई है रघुवीर सहाय ने भी कहा है कि अशोक वाली समीक्षा ले लीजिये। इस तरह विवेक के रंग में मैं उम्र में सबसे छोटे  समीक्षक के रूप में शामिल हुआ। बहरहाल  आलोचक का एक काम यह भी है कि वो साहस और निर्भीकता को किसी भी कारण से कभी  न छोड़े। चारू चंद्रलेख की जैसी समीक्षा उन्होंने की वह निर्भीकता और साहस का काम है क्योंकि यह समीक्षा उनके गुरू हजारीप्रसाद द्विवेदी  की पुस्तक की समीक्षा थी। हर बार की तरह उन्होंने यह बात पुनः दोहराई इतने सालों में भी कमलेश जी ने कभी भी ज्यूरी के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया ।
देवीशंकर अवस्थी ने अपनी आलोचना के सेतु परंपरा और समकालीनता से बनाए हैं - रेखा अवस्थी
इस मौके पर रेखा अवस्थी ने देवीशंकर अवस्थी रचनावली के संपादन के दौरान मिले अनुभव को साझा करते हुए कहा कि मैंने इस रचनावली की भूमिका की शुरुआत ही निराला की प्रसिद्ध पंक्ति क्या कहूँ आज जो नहीं कही से की है, हर बार यही लगता था कि क्या कहूँ आज जो नहीं कही।  इस रचनावली का प्रकाशन वास्तव में आप सबके सहयोग और भाभी श्रीमती कमलेश अवस्थी की तपस्या का फल है मैं तो केवल साधन मात्र हूँ भाभी ने कैसे एक एक चीज़ संभाल कर रखी, हमारे घर में  आज भी1957-58 के कागज़ और पैम्फ्लैट तक मौजूद हैं, ये सब भाभी(कमलेश अवस्थी) की मेहनत का प्रतिफल है।
हमारे बड़े भाई देवीशंकर अवस्थी ने हमें कैसे उस अभावग्रस्तता में संभाला होगा कबीर ने कहा था कबीर बादल प्रेम का हम पर बरसा आई, अंतर भीगी  आत्मा हरी भरी बनराई।  उनका संरक्षण अगर हमें न मिलता, उनकी मेहनत, उनके सरोकार हमने देखे उनका प्रेम और जीवन उनकी कर्मठता हमारे लिए प्रेरणा और शक्ति है। देवीशंकर अवस्थी रचनावली के प्रकाशन के दौरान मिले अनुभवों का साझा करते हुए रेखा अवस्थी ने बताया कि इस रचनावली में 2232 पृष्ठ हैं समस्या यह थी कि इस रचनावली को कैसे संपादित करें कैसे वर्गीकृत करें। मेरी कोशिश ये रही कि लेखन का ऐतिहासिक क्रम इस रचनावली में जरूर उभरे, इसलिए मैंने उनके द्वारा संपादित सभी किताबें विवेक के रंग आदि देखीं कि वे कैसे पुस्तकों का संपादन करते थे उनकी संपादकीय दृष्टि ने भी मेरी रचनावली के संपादन में मदद की। मैंने आलोचना के लेखों का विधागत और तिथिक्रम का ध्यान रखा मैंने ये भी ध्यान रखा कि उनकी आलोचना और लेखों का जो व्यावहारिक पक्ष है वह भी साथ साथ चलता रहे। इस सबमें मुझे अशोक वाजपेयी से बहुत मदद मिली। वो हमारे सलाहकार रहे।
इस रचनावली के सहयात्री बहुत सारे हैं। मैंने इस रचनावली में उपन्यास, आलोचना, कहानी, कविता, और नाटक नामक विधा के साथ ही उनके समीक्षा लेखों को साथ रखा। इस तरह एक खण्ड में पाँच उपखण्ड रखे हैं। इस अवसर पर श्रीमती रेखा अवस्थी ने सन 1954 में लिखी देवीशंकर अवस्थी की कविता लेना, देना,और जीना भी श्रौताओ के साथ साझा की।
जीवन की अशेष संभावनाएँ चुके नहीं
मन के विकार ये यूहीं मिटे नहीं
निर्धूम अग्नि से निस्पंद वायु से निस्तब्ध ताल से
निस्तब्ध स्थिति प्रज्ञ से हमको होना नहीं।
ये सही है कि पूर्व युगों से लेना है हमें
और आगे आने वाली पीढियों को बहुत कुछ देना है हमें
फिर भी हम भूलें क्यों
लेना है और देना है हमें जीवित वर्तमान से।
इस रचनावली में हमने देवीशंकर अवस्थी की संपादित पुस्तकों की भूमिकाएँ, समय समय पर लिखी टिप्पणियाँ और साथ ही कलयुग के अंकों को स्कैन करके इस रचनावली में प्रकाशित किया गया है। एक लेख जो प्रेमाभक्ति पर है वो अब तक छपा नहीं था। उसे हमने इस रचनावली में स्थान दिया है। अवस्थी जी के शोध प्रबंध की प्रासंगिकता आज के दौर में और अधिक बढ़ गई है जब स्त्री विमर्श और जेंडर की समझ के दायरे सिकुड़ते जा रहे हैं ऐसे समय में अवस्थी जी का शोध प्रबंध खासकर उसमें मधुरा भक्ति वाला लेख जरूर पढ़ा जाना चाहिए। इसलिए मुझे लगता है कि देवीशंकर अवस्थी ने अपनी आलोचना के सेतु परंपरा और समकालीनता से बनाए हैं इनके बीच से उन्होंने अपना रास्ता बनाया है।

पुरस्कृत आलोचना पुस्तक समाजशास्त्रीय और शैलीवैज्ञानिक दोनों प्रकार की आलोचना पद्धतियों के सहारे कविता के पाठ का द्वार खोलती है।- निर्णायक मंडल
हिंदी में किसी एक कविता पर पूरी पुस्तक लिखने का चलन प्रायः नहीं रहा है। इस दृष्टि से मुक्तिबोध की सबसे ज्यादा चर्चित कविता अंधेरे में पर इतने विस्तार और इतनी गंभीरता से पूरी पुस्तक लिखकर श्री अमिताभ राय ने हिंदी आलोचना में जो नई शुरुआत की है, आशा की जा सकती है कि प्रबुद्ध पाठकों का ध्यान वह अवश्य आकृष्ट करेगी। यह बात प्रो. राजेंद्र कुमार ने अमिताभ राय को सम्मान देते हुए उनकी प्रशस्ति में कही।
 23वां देवीशंकर अवस्थी सम्मान अमिताभ राय को प्रदान करते हुए उन्होंने आगे कहा कि यह पाठ-केंद्रित आलोचना का एक महत्त्वाकांक्षी प्रयास है। पाठ की निर्मिति कैसे होती है, पाठ को खोलने की प्रविधियाँ क्या क्या हो सकती हैं, इन प्रश्नों से जूझते हुए इस पुस्तक का लेखक अंधेरे में कविता के पाठ को इस तरह विश्लेषित करता है कि इस विश्लेषण के बहाने मानव सभ्यता की अब तक की यात्रा के विभिन्न पड़ावों को रेखांकित किया जा सके।
यह आलोचना पुस्तक समाजशास्त्रीय और शैलीवैज्ञानिक दोनों प्रकार की आलोचना पद्धतियों के सहारे कविता के पाठ का द्वार खोलती है। यहाँ तक कि लंबी कविता से पूर्ण विराम, अर्द्ध विराम और विस्मयबोधक चिह्न वगैरह भी कविता के पाठ को खुलने देने में  कितनी मदद करते हैं, इस संबंध में भी श्री अमिताभ राय ने अपने विश्लेषण में कई सार्थक संकेत किए हैं।
अस्तु, श्री अमिताभ राय को उनकी पुस्तक सभ्यता की यात्राः अंधेरे में पर वर्ष 2017 का देवीशंकर अवस्थी सम्मान सर्वसम्मति से दिया जा रहा है।
आलोचना का मुख्य कार्य ढ़ाँचे का निर्माण करना है- अमिताभ राय
अमिताभ राय ने अपने वक्तव्य में कहा कि मुझे ये बार बार महसूस होता है कि यह पुरस्कार मुझे इसलिए दिया गया कि मेरी पुस्तक का संबंध मुक्तिबोध से जुड़ा हुआ था मैं स्वयं को बहुत अव्यवस्थित इंसान मानते हूँ जबकि अपने इर्द गिर्द सभी लोगो को बेहद व्यवस्थित पाता हूँ।
इस अवसर पर आलोचना और अंतःकरण विषयक गोष्ठी भी आयोजित की गई इस विषय पर अमिताभ राय ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि इसे मैं विषय की तरह नहीं प्रश्न की तरह ले रहा हूँ। यह प्रश्न इसलिए उभरता है क्योंकि हम आज भी आलोचना को एकायामी रूप में एक शास्त्रीय विधा के रूप में या अकादमिक प्रणाली के रूप में देखते हैं।
वस्तुतः आलोचना इंसान का बिल्कुल बुनियादी गुण है बच्चे से लेकर वृद्ध तक में आलोचकीय प्रवृत्ति को देखा जा सकता है। जब हम आलोचना की बात कर रहे होते हैं तो अकसर रचना को छोड़ देते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि हर बड़ी और सार्थक कृति अपने युग की सबसे बड़ी आलोचना होती है। तब सवाल उठाना चाहिए कि आलोचना रचना है कि नहीं।  वास्तव में अकादमिक दुनिया  का जो सार्थक हिस्सा है, वह समाज के लघु वृहत वृत्तों से ही अपने लिए पोषक तत्त्व ग्रहण करता है न कि रचना से।
अमिताभ ने आलोचना का मुख्य कार्य ढ़ाँचे का निर्माण करना माना जो बहुत ठोस होता है जिसे अनुपम और विचित्र शब्दावली के माध्यम से नहीं दर्शाया जा सकता। यह ढ़ाँचा स्वायत्त न होकर समाज, और उसकी संस्कृति परंपरा की एक सघन संरचना है। इनमें से प्रत्येक की सिद्धि एक दूसरे के साथ ही है। उनका मानना है कि इस ढ़ाँचे के निर्मित हो जाने पर हम इसके अवयवों पर बात नहीं करते । इसी तरह हम रचना के पूरा हो जाने पर उसके निर्माण में सम्मिलित तत्त्वों की अलग अलग चर्चा नहीं करते।
अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने कहा कि रचनाकार के लिए नैतिकता और मानवीयता आवश्यक है वैसे ही आलोचक के लिए भी नैतिकता आवश्यक है। यह आवश्यक है क्योंकि हम जिस समाज में रहते हैं जिस परिवार में रहते है वह वास्तविक धरातल पर न्यूनाधिक सामन्ती ही है। एक सामाजिक के रूप में मानवीयता के पक्ष में खड़े होने के लिए हमें निरंतर अपने परिवार और समाज की सामंती जकड़नों को धकेलना पड़ता है। यह मानवीय आवश्यकता और नैतिकता हमें सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस देती है। अन्यथा सामंती जकड़नों में पूँजीवादी वीभत्स में और अपने निजी स्वार्थों के वशीभूत हम अक्सर जीबन में समझौते करते चलते हैं। 
एक ऐसी सर्विलांस व्यवस्था है जो हमारे भीतर प्रत्यारोपित हो गई है - अच्युतानंद मिश्र
उन्होंने वर्तमान संदर्भ सापेक्षता में अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि आज जब हम आलोचना और अंतःकरण की बात कर रहे हैं तब हमें यह देखना होगा कि आलोचना को साहित्य तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। समय को केवल एक ही धारा में देखते रहने के आदि होने के बजाय हमें यह भी समझना होगा कि इसके बीच में जो ब्रेक पॉइंट्स आते हैं वहाँ से इसे कैसे देखा जाए। आलोचना पर बात करते हुए उन्हें लगता है कि आलोचना की शुरुआत आधुनिकता के उदय के साथ होती है। इस तरह से देखें तो आलोचना का प्रस्थान बिंदु फ्रांसीसी क्रांति यानि 1789 के आस पास से परिलक्षित होता है। आचार्य शुक्ल ने भी कविता पर बात करते हुए काव्यशास्त्रीय चिंतन में काव्यचिंतन को लेकर जो तमाम तरह की बातें कही थीं शुक्ल जी उन सब पर बात करते हैं।
शुक्ल जी की खासियत है कि वे कविता को अंतर्आनुशासनिक तर्ज पर मसलन कविता को मनोविज्ञान आदि अन्य विषयों से संबद्ध करते हुए देखते हैं। यह आधुनिक आलोचना की एक प्रवृत्ति थी। अच्युतानंद ने आगे कहा कि आप देखें एडवर्ड सईद ने संगीत पर किताब लिखी, वाल्टर बैंजामिन का एक लेख है द वर्क ऑफ आर्ट इन द एज ऑफ मैकेनिकल रिप्रोडक्शन(यांत्रिक पुनर्उत्पादन के युग में कला का काम) जिसमें वे इस बात पर बल देते हैं कि कैमरे के आने के बाद रचनात्मकता कैसे प्रभावित हुई। आलोचना के संदर्भ में भी यह बात लागू होती है।
कांट के हवाले से उन्होंने कहा कि सामंतवाद और पूंजीवाद के बीच विभाजक रेखा समय का बोध है। समय का बोध होने से एक नए तरह के समाज का निर्माण होता है मुझे लगता है कि अट्ठारहवी शताब्दी के तमाम बिंदु (स्वतंत्रता, समानता आदि) आलोचना से संबद्ध है। जो कुछ भी तार्किक है वह मानवीय चिंतन के दायरे में आता है। मुझे लगता है कि यहाँ से आलोचना का त्रिकोण बनता है। जिसमें एक तरफ बाहरी दुनिया है, एक तरफ आंतरिक और दूसरी तरफ हमारा व्यक्तित्व है। मुक्तिबोध संभवतः हिंदी के पहले लेखक हैं जो इस त्रिकोण  की बुनियाद को अपने चिंतन में शामिल करते हैं।
 उन्होंने दोस्तोवस्की के उपन्यास के हवाले से कहा कि जैसे उनके एक उपन्यास के पात्र को यह महसूस होता कि कोई आँखें उसे घूर रहीं हैं वह पीछे मुड़कर देखता और किसी को नहीं पाता है। उसे लगता है ये आँखें उसकी पीठ पर चिपकी हुई हैं। अच्युतानंद आधुनिक कैमरे की इजाद को इस दृश्य से जोड़ते हैं और कहते हैं कि यह कैमरे की एक ऐसी सर्विलांस व्यवस्था है जो हमारे भीतर प्रत्यारोपित हो गई है  और यही प्रत्यारोपण हमारे पूरे अंतःकरण को बाँट देता है। जिसकी सबसे खतरनाक बात यह है कि हम खुद पर ही निगरानी रखने लगते हैं। इस सर्विलांस सिस्टम से हमारा अंतकरण समस्याग्रस्त हो गया है। दरअसल कैमरा सिर्फ आभासी है दरअसल हम स्वयं ही खुद को देख रहे हैं। कैमरे की निगाह से कोई नहीं देख रहा। अच्युतानंद इस चुनौती की ओर इशारा करते हैं कि आज हम आलोचना, आलोचनात्मक विवेक, अंतकरण और अंतकरण की आवाज़ को कैसे इन तमाम तरह की दिक्कतों के बावजूद सुरक्षित रख सकते हैं।
उन्होंने मार्क्स के हवाले से कहा कि कार्लमार्क्स ने एक बहुत सुंदर बात कही थी कि मनुष्य के पास जो शक्ति है वह है उसके हाथ और उसकी संवाद करने की ताकत। अगर हम इस संवाद को एक नई तरह से विकसित करें तो हम कुछ सकारात्मक कर सकते हैं।
आलोचना विवेक और संवेदना का योग है - राजेंद्र कुमार
अपने वक्तव्य से पहले प्रो. राजेंद्र कुमार ने बताया कि जब वे डीएवी कॉलेज में बीएस. सी कर रहे थे तब देवीशंकर अवस्थी वहाँ अध्यापक हो चुके थे उन्होंने अवस्थी जी की स्मृति को नमन किया और अमिताभ को बधाई देते हुए अपने वक्तव्य में कहा कि आलोचना और अंतःकरण नामक विषय में अंतःकरण शब्द उन्हें परेशान करता है, उन्होंने सवाल कि आखिर क्या अर्थ लिया जाए इसका। अगर इसका संबंध विवेक से माने जिसका अवस्थी जी कई जगह इस्तेमाल करते हैं। तब सवाल उठता है कि क्या विवेक और अंतःकरण एक ही चीज़ है। अपने वक्तव्य में वे इस बात को इंगित करते हैं कि आज विवेक एक तरह की चालाकी बन गया है अब लोगों द्वारा समय और अवसर को देखकर विवेक का सहारा लिया जाता है। अगर विवेक को चालाकी न माने तो अंतकरण शब्द विवेक का समानार्थी न होने के बावजूद भी इससे संबद्ध है। आलोचक को समझना चाहिए कि उसके विवेक के तकाज़ों की तरह ही उसके अंतःकरण के तकाज़े भी महत्त्वपूर्ण हैं।
आलोचना में आलोचक का विवेक और अंतकरण दोनों ध्वनित होने चाहिए हम सभी के भीतर एक आंतरिक संकाय मौजूद रहता है जो हमें गलत और सही का निर्णय लेने में मदद करता है। मिल्टन की एक बड़ी मशहूर स्पीच है जिसमें उन्होंने जितने भी प्रकार की स्वतंत्रताएँ हो सकती हैं उनमें सबसे बड़ी स्वतंत्रता की परिभाषा देते हुए तीन चीज़ो को प्रमुख माना है। जानना, कहना, और बहस करना। यानि जानने, कहने और बहस करने की स्वतंत्रता को मिल्टन सर्वोपरि मानता है। कविता के संदर्भ में भी यह बात कही जा सकती है और यह आलोचना के लिए भी उतनी ही जरूरी है। इसलिए जब भी हम अंतकरण के हवाले से आलोचना पर बात करें तो यह जरूरी हो जाता है कि अंतकरण की पहचान की जाए। इसके तीन पक्ष हो सकते हैं। पहला रचना के अंतकरण की पहचान, दूसरा उस रचना के रचयिता के अंतकरण की पहचान,  और तीसरा है आलोचना के अंतकरण की पहचान। इन तीन स्तरों पर विचार करना चाहिए  साही जी ने भी कहा है कि रचना के अंतकरण की पहचान के साथ अपनी संवेदनात्मक ग्रहणशीलता का मेल करना होता  है।
आज की आलोचना का यह दुर्भाग्य है कि आलोचना,  रचना हमें क्या सौंपना चाहती है इसका पता नहीं दे पा रही। आलोचक के आग्रह, उसकी प्रतिबद्धता, उसकी विचारधारा का पता देने में ही अधिकांश आलोचना खत्म हो जाती है, यह हमारे समय की विडंबना है। रचनाकार जो रचना में दे रहा है यह आवश्यक नहीं है कि जो रचनाकार की सीमा हो वही रचना की सीमा भी बन जाए। तुलसी के संदर्भ में भी यह देखा जा सकता है। तुलसी ने शंबूक वध का प्रकरण निकाल दिया जबकि वाल्मीकि रामायण मे ये है। संभवतः यह प्रकरण उनके अंतकरण की व्यापकता की वजह से नहीं आ सका हो। ताल्सटाय के हवाले से राजेंद्र कुमार ने कहा कि ये कोई जरूरी नहीं है कि रचनाकार का व्यक्तित्व जैसा है वैसी ही चींज़े उसकी रचना में भी आ जाए, ऐसा नहीं है।
आलोचना और आलोचक के अंतकरण के सवाल को उठाते हुए प्रो. राजेंद्र कुमार ने आगे कहा कि  इसके लिए दो बातें जान लेनी जरूरी हैं। पहला, आलोचना एक बौद्धिक कार्यवाही होने के बावजूद भी संवेदनहीन नहीं होती आलोचक का अपना अंतकरण इस संवेदना को बरकरार रखता है। अगर कोई उन्हें कहे कि आलोचना की परिभाषा कीजिए तो वे कहेंगे कि आलोचना विवेक और संवेदना का योग है और दूसरी बात यह कि आलोचना में बहुमत की अवधारणा जैसी कोई चीज़ नहीं होती। मलयज की डायरी के हवाले से राजेंद्र कुमार ने कहा कि आलोचना के प्रत्येक क्षण में मैं और अकेला होता जाता हूँ इससे मलयज आलोचना में स्वतंत्र विवेक के साथ आलोचनात्मक ईमानदारी को बनाए रख सके चाहे बहुमत कुछ कहता हो मलयज ने अपने अंतःकरण की सुनी। हमें सोचना होगा कि एक सार्थक आलोचना में अंतकरण की आवाज को कैसे बनाए रखा जाए।
साहित्य के अंतकरण से पहले आलोचना स्वयं के अंतकरण की पहचान करे - नंदकिशोर आचार्य
नंदकिशोर आचार्य ने अपना अध्यक्षीय वक्तव्य से पहले अमिताभ राय को बधाई दी और कहा कि देवीशंकर अवस्थी जी की स्मृति के बहाने आलोचना की प्रतिभाओं को खोजने का जो काम कमलेश अवस्थी और उनके परिवार ने किया इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि अंतकरण की पहचान करने के लिए ही साहित्य काम नहीं करता बल्कि साहित्य उसकी निर्मिति भी करता है। सवाल है कि आलोचना का काम क्या है उसका कार्य है साहित्य में रचना का मूल्याँकन और साहित्य के अंतकरण की पहचान करना । इससे पहले की वह साहित्य के अंतकरण की पहचान करे उसे स्वयं के अंतकरण की पहचान करनी चाहिए।
अंतःकरण को नैतिकता से संबद्ध मानते हुए नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि हमारी परंपरा में दो तरह की नैतिकता मानी गई है। एक सदाचार और दूसरी लोकाचार से संबंधित है। अहल्या और द्रौपदी का हवाला देते हुए उन्होंने शास्त्रगत नैतिकता और लोकगत नैतिकता की बात की। अन्ना कैरेनीना का उदाहरण देते हुए नंदकिशोऱ आचार्य ने कहा कि इस उपन्यास को पढ़ते हुए हमारी सारी सहानुभूति अन्ना के साथ जाती है कैरेनिन के साथ नहीं। पास्तरनाक भी डॉ. जियागो में इस शास्त्रगत नैतिकता के पक्ष में खड़े नहीं होते। यही नहीं जैनेन्द्र गाँधीवादी होने पर भी अपने अंतकरण से मृणाल के चरित्र का गठन करते हैं। जबकि यह पात्र गाँधीवाद के सिद्धांत के अनुकूल नहीं है। इसी तरह धनिया के चरित्र को देखें इसका गठन भी लेखक अपने अंतकरण से इन चरित्रों का निर्माण करता है।
लेखक किसी रणनीतिकार की तरह से अपनी नैतिकता तय नहीं करता इसलिए रचनाकार को भी इसका खयाल रखना चाहिए। प्रसंगवश नैतिकता कई बार विरुद्ध चली जाती है। मुक्तिबोध जैसा बड़ा लेखक भी रणनीतिगत नैतिकता का शिकार हो जाता है। स्टालिन के नरसंहार के प्रति मुक्तिबोध शांत रह जाते हैं। वहाँ उनका अंतकरण मूलभूत नैतिकता के विरुद्ध दिखाई देता है। महात्मा गांधी ने अपने अंतकरण  से कई बार ऐसे निर्णय लिए जिससे बहुत सारे लोग सहमत नहीं थे उन्होंने बहुत लोगों की आलोचना सही, पर अपने अंतकरण का भी खयाल रखा। आलोचना का मुख्य काम रचना को किसी एक नजरिये से या एकांगी रुप में देखने में नहीं बल्कि रचना को उसकी संश्लिष्टता में देखने का प्रयास करने में निहित है।
इस मौके पर अरुण माहेश्वरी ने रचनावली के प्रकाशन में रेखा अवस्थी, मुरली बाबू, और कमलेश जी को धन्यवाद दिया कि उन्होंने वाणी प्रकाशन में विश्वास जताया और उन्हें इसके प्रकाशन का बृहद काम सौंपा।
कार्यक्रम के आरंभ में इस वर्ष दिवंगत हुए साहित्यकारों को श्रद्धांजलि दी गई ।
                                                                                                                       
प्रस्तुति – तरुण गुप्ता

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

22वें देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह की विस्तृत रिपोर्ट



2016 का देवीशंकर अवस्थी सम्मान युवा आलोचक श्री पंकज पराशर को उनकी पुस्तक ‘कविता के प्रश्न और प्रतिमान’ के लिए दिया गया। उन्हें यह सम्मान रवींद्र भवन, नई दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार में आयोजित एक समारोह में वरिष्ठ आलोचक श्री विश्वनाथ त्रिपाठी ने प्रदान किया। इस वर्ष की सम्मान समिति में अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडेय, विजय कुमार, नंदकिशोर आचार्य और कमलेश अवस्थी शामिल थे।
आलोचना के क्षेत्र में दिया जाने वाला यह प्रतिष्टित पुरस्कार हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक स्वर्गीय श्री देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कमलेश अवस्थी द्वारा वर्ष 1995 में स्थापित किया गया। यह सम्मान अवस्थी जी के जन्मदिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष 45 वर्ष तक की आयु के किसी युवा आलोचक को दिया जाता है। सम्मान के तहत साहित्यकार को प्रशस्तिपत्र, स्मृति चिह्न और ग्यारह हजार रुपये की राशि प्रदान की जाती है। अब तक यह सम्मान सर्वश्री मदन सोनी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, विजय कुमार, सुरेश शर्मा, शम्भुनाथ, वीरेंद्र यादव, अजय तिवारी, पंकज चतुर्वेदी, अरविंद त्रिपाठी, कृष्ण मोहन, अनिल त्रिपाठी, ज्योतिष जोशी, प्रणय कृष्ण, प्रमीला के. पी. संजीव कुमार, जितेंद्र श्रीवास्तव, प्रियम अंकित, विनोद तिवारी, जीतेंद्र गुप्ता, एवं वैभव सिंह को प्रदान किया जा चुका है।
परंपरानुसार देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह में किसी एक प्रासंगिक विषय पर व्याख्यान का आयोजन भी किया जाता है। इस बार का विषय था ‘विश्वविद्यालय और हिंदी आलोचना’, इस विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित वक्ता थे आशुतोष कुमार, हेमलता महिश्वर, और गोपाल प्रधान। समारोह की अध्यक्षता विश्वनाथ त्रिपाठी ने की ।
हाशिये पर रहकर भी हिंदी आलोचना समकालीन सवालों से जूझ रही है – पंकज पराशर
22वें देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह का आगाज़ पंकज पराशर के वक्तव्य से हुआ। अपने वक्तव्य में श्री पंकज पराशर ने कहा कि विश्वविद्यालय ज्ञान सृजन के लिए होते हैं पर यह संभव नहीं है जब वे प्रश्नों के क्रीड़ा स्थल हों, जॉक देरिदा ने ठीक ही विश्वविद्यालय को किसी शर्त के बगैर प्रश्न करने का स्थल कहा है। प्रश्न करने की यह योग्यता विश्वविद्यालय को सत्तावान बनाती है सत्ताहीन भी। क्योंकि उनसे उठे प्रश्न सत्ता के केंद्रों के अहं को ठेस पहुँचाते हैं। और इस वजह से सत्ता के केंद्र कभी सच्चे विश्वविद्यालय के साथ नहीं होते, क्योंकि वे सत्ताधीशों को तंग करते हैं। अपने वक्तव्य में पंकज पराशर ने टेरी इगल्टन के लेख द स्लो डैथ ऑफ दि यूनिवर्सिटी के हवाले से कहा कि टेरी इगल्टन ने इस लेख में डैथ और मौत शब्द का प्रयोग व्यंजना में कम अभिधा में ज्यादा किया एक बात और मृत्यु का अर्थ केंद्रीयता का अभाव होना था और अक्सर ऐसे शीर्षक के बाद प्रश्नवाचक चिह्न लगाया जाता था पर स बार ऐसा नहीं है। यानी मौत का समाचार पक्का है। इसकी एफ आई आर किसी और ने नहीं , बल्कि प्रोफेसर इगल्टन ने कराते हुए इसे वैश्विक परिघटना माना उनके अनुसार विश्वविद्यालय की मौत के लिए जिम्मेदार कारकों में उच्च शिक्षा का कॉरपोरेटिकरण या वाणिज्यीकरण है। आज के प्रोफेसर मैनेजर रह गए हैं। और कुलपति मानो कर्त्ताधर्ता, जिसका मुख्य काम आर्थिक संसाधन जुटाना है न कि स्तरीय शिक्षा, शोध, ज्ञान का सृजन, संरक्षण, विस्तार या मूल्यों का संवर्धन।
विश्वविद्यालय के समसामयिक संदर्भों को उठाते हुए पंकज पराशर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से विश्वविद्यालय में जैसा माहौल बनाया गया है उसके बाद वाद-विवाद और संवाद की कितनी गुंजाइश बची है। राजसत्ता, अर्थसत्ता और मीडिया का विश्वविद्यालय को लेकर जो एजेंडा है। उसे हम आप देख ही रहे हैं। पूरा का पूरा भारतीय मीडिया इस एजेंडे की सैटिंग में उलझ गया है। मीडिया का मूल काम सवाल खड़े करना है लेकिन यह तब एजेंडे में रूपांतरित हो जाता है, जब आप सवाल के जरिये किसी एजेंडे को खड़ा करते है। किस तरह खबरों को प्रमोट किया जाता है और किस तरह खबरों से खेला जाता है।
रचना के भीतर सामाजिक सत्य की महत्ता को उद्घाटित करते हुए पंकज पराशर ने कहा की मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक और सामाजिक सत्य रचना के भीतर तभी मूल्यवान होते हैं, जब वे उसकी समग्रता एवं कलात्मकता की रक्षा करते हों। यह देखकर दिल को थोड़ा मिलता है कि मठों और गढ़ों के हाशिये पर रहकर भी समकालीन आलोचना इन सवालों से जूझते हुए लिखी जा रही है, जिसे खोटे सिक्कों के बीच पहचानने की ज़हमत तो आपको उठानी पड़ेगी।
हिंदी आलोचना विश्वविद्यालय से शुरु नहीं हुई है – विश्वनाथ त्रिपाठी
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में विश्वनाथ त्रिपाठी देवीशंकर अवस्थी की स्मृतियों के झरोखे से भावुक लहज़े में कहा कि मैं नहीं जानता कि अवस्थी जी को अशोक वाजपेयी से ज्यादा आत्मीयता थी या मुझसे। मुझे लगता है अशोक जी से उनकी आत्मीयता ज्यादा थी क्योंकि मैं जब भी अवस्थी जी के पास जाता था तो ये मुझे वहाँ पहले से ही बैठे मिलते थे वो इसलिए कि दोनों ही साहित्य के योजना विलासी थे। लेकिन मुझे एक दूसरी सुविधा प्राप्त थी जो अशोक जी को प्राप्त नहीं थी। वो ये कि हम दोनों ही मॉडल टाउन में रहवासी थे। मेरे लिए ये बड़ा भावुक मौका है मैं एकाएक 50-52 साल पहले की स्मृतियों में चला जाता हूँ। सब कुछ वास्तविक सा लगने लगता है लगता है कि अभी सब कुछ है। स्मृतियाँ मानों सामने खड़ी हो जाती हैं। यह अवसर साल में एक बार आता है और हम सब लोग स्मृति की गंगा में स्नान कर लेते हैं।
हम दोनों ही पंडित हजारी प्रसाद द्विवेद्वी के शिष्य थे मुझे लगता है अवस्थी जी का पंडित जी से बहुत गहरा संबंध था। क्योंकि जितना मैं जानता आचार्य द्विवेदी ऐसे गुरु थे जो अपना मनचाहा विषय सबको नहीं देते थे। आचार्य शुक्ल लोकमंगल के आचार्य हैं , आचार्य द्विवेदी प्रेमाभक्ति के आचार्य है। और रामविलास शर्मा औदात्य के आलोचक है। इसी से मुझे ये लगता है कि आचार्य द्विवेदी के मन में अवस्थी जी के लिए गहरा विश्वास और ममत्व रहा होगा तभी उन्होंने अवस्थी जी को यह शोध विषय दिया होगा।
अपने वक्तव्य में विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी आलोचना विश्वविद्यालय से शुरु नहीं हुई है, हिंदी में पहला आलोचना लेख या समीक्षा भारतेंदु की है। इसके अलावा हिंदी आलोचना पुनर्जागरण काल या नवजागरण काल के अखबारों, संपादकीय, पत्रिकाओं के लेखों आदि से मिलकर बनती है और स्वाधीनता आंदोलन का संघर्ष और ताप हमारे लेखकों और आलोचकों के लेखन में मौजूद है। विश्वविद्यालय और आलोचना पर अपनी बात को बड़े रोचक ढ़ंग से आगे बढ़ाते हुए डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि विश्वविद्यालयी आलोचना का जो योगदान है उस पर यदि आप सोचें तो बड़ी रोचक बातें सामने आती हैं। मिश्र बंधु विश्वविद्यालयी आलोचक थे और उनका हिंदी साहित्य में बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन उन्होंने जो हिंदी नवरत्नों की सूची बनाई थी। उस पर यदि गौर करें तो आप देखेंगे। उसमें जायसी नहीं थे, उसमें कबीर भी सातवें स्थान पर थे। इससे आप विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के योगदान की स्थिति जाँच सकते हैं। यदि आचार्य शुक्ल न होते तो जायसी अग्रिम पंक्ति के कवियों में न होते। अगर आचार्य द्विवेद्वी न होते तो कबीर कितनी देर बाद आते ये भी देखने की बात होती।
जब हम लोग यहाँ आए थे तो प्राध्यापकीय आलोचना पर प्रहार शुरू हो चुके थे उस समय सृजनात्मक साहित्य के अलंबरदार अज्ञेय थे। और ये स्मरण करना शिक्षाप्रद होगा कि साहित्य अकादमी ने उन्हें हिंदी साहित्य पर एक लेख लिखने के लिए कहा था। उसमें उन्होंने आधुनिक काल के तीन युगांतरकारी कवियों का उल्लेख किया था। वो तीन युगांतरकारी कवि थे। भारतेंदु, निराला और स्वयं अज्ञेय। ऐसी वैज्ञानिकता से हिंदी विभागों में हल्ला मच गया था। शुक्ल जी ने तो हिंदी साहित्य के इतिहास में कहीं अपना नाम तक नहीं छापा है। इसके बाद यह भी देखने लायक होगा कि आचार्य द्विवेद्वी ने यह लेख जस का तस छापा और नीचे एक फुटनोट में लिख दिया कि अज्ञेय, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन का ही नाम है।
लेकिन आलोचना में यह शिकायत पहले भी की जाती रही है जिनमें हरीश त्रिवेदी और शायद गायत्री स्पीवाक ने भी यह कहा है कि हमें ये देखना चाहिये कि हम किन मुद्दों को उठा रहे हैं क्या ये मुद्दे हमारी जातीयता या राष्ट्रीयता की मांग तक फिर आयातित होकर आए, हमें यह सोचना चाहिए कि सब का अंत, कविता का अंत, उपन्यास का अंत कर देना हल नहीं है। रामविलास जी अपनी किताब में शैक्सपीयर पर विचार करते हुए भरतमुनि तक जाते हैं मैंने जब उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने मुझे बताया कि इस काम को करने की प्रेरणा मुझे अमरनाथ झा ने दी थी और कहा था कि जब तुम इतने समृद्ध हो तो उन पर विचार करते हुए अपने विचारकों को उद्धरित क्यों नहीं कर सकते। कम से कम हमारे विचारों को क्षेमेन्द्र की औचित्यचर्चा तक तो जाना ही चाहिए।
विश्वनाथ त्रिपाठी अपने वकतव्य का समापन करते हुए तकनीक की महत्ता और संभावना पर आगे कहा कि तकनीक से उन्हें बड़ी उम्मीद है। तकनीक के भीतर जो ज्ञानराशि का संचय है मुझे बहुत आशा है कि वो व्यर्थ नहीं जाएगा।
विश्वविद्यालय के अस्तित्व के लिए आवश्यक है कि वहाँ वाद विवाद और संवाद बना रहे – आशुतोष कुमार
आशुतोष कुमार ने अपने वकतव्य का आरंभ विष्णु पुराण के एक श्लोक से किया ‘तत्कर्म यन्न बिंधाय सा विद्या या विमुक्तये’ ये श्लोक कहता है कि जो मुक्त करे वही विद्या है। लेकिन उसमें निहित है कि वो बंधन में भी डाल सकती है। यह श्लोक कहता है कि इस तरह से कर्म भी काम करता है। इस तरह के कर्म को श्लोक में शिल्प नैपुणम कहा गया है उसे आज कल हम लोग कौशल विकास कहते हैं। और दूसरी तरह की विद्या वो है जो रचनात्मक बनाती है, जो दुनिया में बदलाव लाने की सीख देती है और रचनाकार को भी बदलने का प्रयास करती है जाहिर है जो बदलेगा वो भी मुक्त करेगा। हालांकि विष्णु पुराण की इस बात को मैं हैबरमास के हवाले से भी कह सकता था। लेकिन लोग कह सकते हैं कि पश्चिम के लोग तो वही बातें करते हैं जो हमारे पुराणों में लिखी गई हैं। वो कह सकते हैं, कहें। मुझे उससे कोई आपत्ति नहीं है बशर्ते कि उन बातों पर ध्यान दिया जाए जो कही गई हैं आशुतोष कुमार ने विष्णु पुराण के बाद हैबरमास के हवाले से विद्या और कर्म की वर्तमान प्रासंगिकता और स्थिति पर कहा कि हैबरमास भी तीन तरह के कर्म बताते हैं जिनमें पहला है टैक्नीकल कर्म, दूसरा प्रैक्टिकल कर्म और तीसरा है इनएंटीसिपेटरी कर्म । हैबरमास पहले का ताल्लुक विज्ञान तकनीक से और दूसरे का समाज विज्ञान से स्थापित करते हैं। तीसरे कर्म को हम मुक्तिकारी विद्या कह सकते हैं। वो असल में दर्शन है जिसमें मार्क्सवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद के साथ साथ वे फ्रायड आदि के दर्शन को रखते हैं। इसके साथ साथ वे दो तरह के कर्म की बात और करते हैं। पहला है वर्क और दूसरा है इंटरैक्शन। वर्क में उपकरणों और तकनीक से काम लिया जाता है जिसे आप विज्ञान से जोड़ते हैं। और हिंदी में जिसे अंतःक्रिया कहते हैं। इस प्रक्रिया में संवाद मूलक विवेक को वे मुक्तिकारी विवेक मानते हैं। जिसमें वे एक संवाद मूलक विवेक या मुक्तिकारी विवेक तक पहुँचने की कोशिश करते है और उनका मानना है कि यही विवेक लोकतंत्र के खतरों का सामना कर सकता है। यह विवेक ही आधुनिकता के अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा कर सकता है। इसलिए वे विश्वविद्यालय को पब्लिक स्फेयर या जनक्षेत्र कहते हैं। ये विश्वविद्यालय के अस्तित्व के लिए आवश्यक है कि वहाँ वाद विवाद और संवाद बना रहे लेकिन अब ऐसा हो रहा कि वाद विवाद को वहाँ खतरा समझा जा रहा है। तो एक ऐसी प्रक्रिया चल रही है जहाँ हमारे सामने कौशल विकास या हार्ड वर्क को आगे बढाना है जो खासकर तकनीक और मैनेजमेंट पर बात करता है। इसलिये वे तकनीक और स्किल के सवाल के आगे मूल्यों पर बहस से बचना चाहते हैं। वे मूल्यों पर बात नहीं करना चाहते वे उन्हें मुक्तिकारी विद्या के केंद्र न मानकर केवल कौशल विकास के केंद्र बनाना चाहते हैं।
विद्या तभी होगी जब आलोचना का अधिकार होगा। बर्लिन विश्वविद्यालय की स्थापना के दौरान यह बहस चली की यूनिवर्सिटी किस तरह की होनी चाहिए और इस स्थापना की परिभाषा में विश्वविद्यालय की मठ जैसी नकारात्मक छवि को ध्यान में रखा गया था। वहाँ विश्वविद्यालय के लिए तीन बातें कही गई। एक, वहाँ टीचिंग और रिसर्च में एकता हो। दो, वहाँ अकादमिक स्वतंत्रता हो, और तीसरी विश्वविद्यालय के केंद्र में दर्शन विभाग हो।
विश्वविद्यालय में उपरोक्त तीन तरह की जो विशेषताएं बनाई गई उसके तहत ही विश्वविद्यालय में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई बावजूद इसके जब तक हम इस सिद्धांत का पालन करते हैं कि अकादमिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं होगा तब तक उनका अस्तित्व बना रहता है।
लेकिन अब यह मान लिया गया है कि स्वतंत्रता एक दुरुपयोग होने की चीज़ है। उसी के तहत सारे कौशलों का विकास कर विद्यार्थियों को मूल्यों पर बात करने से बचाकर कौशल विकास कर नौकरी लेने की ओर विश्वविद्यालय अग्रसर कर रहे हैं।
हिंदी आलोचना के संदर्भ में वाद विवाद और संवाद की प्रक्रिया साथ साथ चलती है शुक्ल जी की छायावादी कवियों से लगातार बहस होती है, निराला जैसे विद्रोही कवि रामचंद्र शुक्ल की मृत्यु पर अविस्मरणीय कविता लिखते हैं यानि वाद विवाद एक संवाद में तब्दील होता है।
मध्यकाल के इतिहास की केंद्रिय समस्या हम जब हिंदु और मुसलमानों का संघर्ष मान लेते हैं। तब एक यह एक इतिहासदृष्टि बन जाती है। ये इतिहासदृष्टि द्विवेद्वी जी और शुक्ल जी दोनों में दिखाई देती लेकिन विश्वविद्यालय से इतर मुक्तिबोध, जैसे लेखक इस इतिहासदृष्टि को पलटते हैं। और यह कितनी अच्छी बात है कि मुक्तिबोध जयशंकर प्रसाद के संदर्भ में नंददुलारे वाजपेयी की आलोचना करते हैं। इसी तरह से जब स्त्री विमर्श, दलित विमर्श आदि का साहित्य हमारे सामने आता है तो उसे शुरु में स्वीकार नहीं किया जाता लेकिन आज ये हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गया है। यह संवाद विश्वविद्यालय के लिए जरूरी है और आज का संकट यह है कि हम इस तरह की विरासत और संवाद के विवेक को भूले जा रहे हैं।
दलित और स्त्री साहित्य के सिद्धांत के साथ हम एक नए भारत की कल्पना कर सकते है – हेमलता महिश्वर
अगले वक्ता के रुप में हेमलता महिश्वर ने अपने वक्तव्य में सिमोन दी बाउवा के हवाले से कहा कि मैं सिमोन द बाउवा के पिता जार्ज बाउवा के संदर्भ से अपनी बात कहना चाहूँगी जब कहा जाता है कि मूल्य तिरोहित हो रहे हैं। तब ये प्रश्न भी उठता है कि लड़कियो की पूरी ऊर्जा को शांत करने में नहीं अनुशासन आदि मांगों पर खरा उतरने के लिए व्यर्थ होती जा रही है। शिक्षा कोरी आज्ञाकारिता कभी नहीं रही। ऐसे समय में जब हम हिंदी आलोचना और विश्वविद्यालय की बात करते हैं तब हमें कितनी छूट मिलती है और हम स्वयं को और अपने विद्यार्थियों को कितनी स्वतंत्रता दे पाते हैं।
हम जिस परिवेश में है और जिस तरह की आलोचना की बात कर रहे है क्या वो आलोचना संपूर्ण है इस बनाई हुई भाषा के दर्शन हम पर सीमित हैं हिंदी के पास अपना कोई दर्शन नहीं है। हो सकता है मेरी बातों से आपकी असहमति हो, और मैं रेखांकित करते हुए कहना चाहूँगी कि दलित साहित्य , आदिवासी साहित्य , स्त्री साहित्य को अगर हम देखें तो उसमें जिस मनुष्य की संकल्पना है यह साहित्य उस मनुष्य की उपस्थिति को दर्ज करने के लिए लगातार संवादरत है, प्रयत्नरत है। यह निश्चित हैं कि इन तमाम संकटों के बावजूद हम एक ऐसा समय देख सकते हैं जिसमें इस दलित और स्त्री के साहित्य के सिद्धांत के साथ हम एक नए भारत की कल्पना कर सकते है और यह छूट हम अपने छात्रों और विद्यार्थियों को दे रहे हैं । एक कविता के हवाले से अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए श्रीमती महिश्वर ने कहा कि
मनुष्य अंधेरा पीकर तर हुआ नहीं
कि उजाले अर्थहीन हो जाते हैं।
उनके हँसने पर गिद्ध उल्लसित होते हैं।
मगरमच्छ शर्मिंदा होते हैं उनके रोने पर ।
यह आलोचना हमने अपने यहाँ की है, चाहे राष्ट्र की जो स्थिति हो राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के बीच में चाहे हम फँस रहे हों। पर उस राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद को अलग करना होगा। वरना शायद हमारे लिए कोई समय बचेगा नहीं। और ये अच्छा ही है कि यह समय हमारे सामने है। जब हम इनसे भी बुरे समय में थे तब भी हमने यहाँ तक की यात्रा की तो निश्चित ही इस विपरीत परिस्थिति में भी हमारे पास बहुत कुछ है। निश्चित ही इसमें भी हम कुछ नया कर गुजरेंगे।
गोपाल प्रधान ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज विडंबना की बात यह है कि जिस समय विश्वविद्यालय की हत्या की कोशिश हो रही है उस समय हम विश्वविद्यालय और आलोचना की बात कर रहे हैं। ध्यान दें, मृत्यु नहीं हो रही है, हत्या हो रही है और विश्वविद्यालय की हत्या के साथ समाज में समूचे आलोचना के वातावरण की भी हत्या हो रही है। विश्वविद्यालय अपने नाम में ही पिछले दिनों की प्रभुत्वशाली विचारधारा का प्रतिरोध लिए हुए हैं। क्योंकि वह विश्वविद्यालय है इसलिए उसे राष्ट्रवाद में महदूद नहीं किया जा सकता। पिछले दिनों के विश्वविद्यालय विवाद के बीच हम सभी जानते हैं कि इसी दिल्ली में एक विश्वविद्यालय है साउथ एशियन यूनिवर्सिटी। यह पूरे दक्षिण एशिया का विश्वविद्यालय है पूरे दक्षिण एशिया के छात्र उसमें पढ़ते हैं। आप किस देश की वंदना उन सभी छात्रों से करवाएंगे। यानि विश्वविद्यालय अपने नाम के साथ ही प्रभुत्वशाली विचारधारा के प्रतिरोध की आवाज को लेकर चलते हैं। लेकिन विडंबना मैं इसलिए कह रहा था क्योंकि हम विश्वविद्यालयों की सीमा को भी पहचानते हैं।
आलोचना को भी एक हद तक आत्मपरीक्षण करने की आवश्यकता है- गोपाल प्रधान
अपने वक्तव्य में पंकज पराशर के वक्तव्य का संदर्भ इस्तेमाल करते हुए गोपाल प्रधान ने कहा कि इस बात से बड़ा मनोरंजक दृश्य उभरता कि शायद विश्वविद्यालय आधुनिककाल में पुराने किस्म के दास स्वामियों के केंद्र बन गए हैं । जो भौतिक श्रम से अलग पड़े हुए केवल मानसिक श्रम के केंद्र बन गए। इसलिए विश्वविद्यालय भी आलोचना से परे नहीं होते हैं। और यह भी विडंबना है कि जब विश्वविद्यालय की आलोचना करने का वक्त आया है तभी विश्वविद्यालय की हत्या भी हो रही है। इसलिए इसके समर्थन में इसके बचाव में हमें खड़ा होना पड़ रहा है। और समर्थन या बचाव करते हुए भी इस बात से आँखें नहीं मूँदी जानी चाहिए कि वास्तव में विश्वविद्यालय एक तरह से सामाजिक ढाँचे का पुनर्उत्पादन ही करते हैं। स्वयं विश्वविद्यालय एक संस्था के रूप में भी अगर आप देखें तो शिक्षण संस्थान में सबसे उच्च पद पर आसीन होते हैं। भारत देश की मुश्किल से तीन चार पर्सेंट आबादी ही उच्च शिक्षा तक पहुँचती है। और ये ध्यातव्य है कि स्वयं विश्वविद्यालयों के भीतर भी एक तरह की जाति व्यवस्था है। इन विश्वविद्यालयों के भीतर के अकादमिक जगत में एक और जाति व्यवस्था होती है जिसमें एक ओर प्रोफेसर बैठता है। स्थायी शिक्षक होते हैं, अस्थायी शिक्षक होते हैं और ठेके पर काम करने वाले शिक्षक भी होते हैं। ठेके पर अध्यापकी करवाने जैसी शर्मनाक कोशिशें भी इन्हीं विश्वविद्यालयों के भीतर होती है। यह प्रवृत्ति अभी नई है लेकिन धीरे धीरे ये तमाम विश्वविद्यालयों में फैलेगी उस अध्यापक की छात्रों के प्रति कोई निष्ठा नहीं हैं। इसके बाद जब आप आगे बढते हैं तो शिक्षणेतर कर्मचारियों के प्रति अध्यापकों का क्या रवैया है हमारे भीतर एक तरह का सामंती नजरिया कैसे विश्वविद्यालय और अध्यापक के भीतर पैठ जाता है। रचनाकारों को लगता है नई प्रवृतियों के प्रति विश्वविद्यालय जागरूक नहीं होते। विश्वविद्यालयों के अध्यापकीय वातावरण ने साहित्य और राजनीति को विरोधी बनाने की आम समझ बना दी है। समूची दुनिया में जो बड़े परिवर्तन हो रहे हैं उनके प्रति साहित्य और साथ ही आलोचना भी असंवेदनशील हैं हमें इससे भी इंकार नहीं करना चाहिए हम इस तरह के संकटों से साहित्य को मुक्त रखना चाहते हैं। यह भी विडंबना है। स्वयं आलोचना को भी एक हद तक आत्मपरीक्षण करने की आवश्यकता है, साथ ही मैं कहना चाहूँगा कि अस्मितामूलक विमर्श को भी अपने आत्मपरीक्षण की जरूरत है।
जैसाकि देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह की परंपरा रही है इस वर्ष भी देवीशंकर अवस्थी के प्रतिनिधि आलोचना लेखों में से चुनकर एक लेख ‘रचना और आलोचनाः अंतराल के प्रश्न पर पुनर्विचार’ का वाचन तरुण गुप्ता द्वारा किया गया।
इस अवसर पर सांसद डी.पी. त्रिपाठी, निर्मला जैन, अजीत कुमार, अभय मौर्य, विभा मौर्य, विनोद तिवारी, अल्पना मिश्र, और साहित्य समाज की जानी मानी हस्तियाँ के साथ साथ अवस्थी जी का पूरा परिवार मौजूद रहा। समारोह में आए सभी गणमान्य अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन अवस्थी जी के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री अनुराग अवस्थी ने किया।
प्रस्तुति – तरुण गुप्ता



शनिवार, 1 अप्रैल 2017

OUTCAST- आउटकास्ट की प्रस्तुति और बेहतर हो सकती थी

जाति का प्रश्न जितना जरूरी और मौजूँ है उतना ही विवादित भी। और फिर इस प्रश्न को एक नाटक की शक्ल देते हुए मंच पर प्रदर्शित करना किसी चुनौती से कम नहीं है। यह खूब जोखिमभरा काम है। यह बात खुशी देती है कि युवा निर्देशक इस जोखिम को उठाने को तैयार है। ऐसा ही एक जोखिम रणधीर ने अपने नाटक आउटकास्ट में उठाया है। यह नाटक शरणकुमार लिम्बाले की आत्मकथा अक्कारमाशी पर आधारित है। उन्नीसवें भारंगम की बहुत सारी प्रस्तुतियों से इतर इस प्रस्तुति के लिए दर्शकों का उत्साह एलटीजी सभागार के ठसाठस भरने से लगाया जा सकता था। लेकिन यह बात जानते हुए कि इस नाटक को मेटा अवार् के लिए चुना गया है बेहद खेद के साथ यह बात कह रहा हूँ।
एक बेहतरीन स्क्रिप्ट  और दर्शकों के उत्साहवर्धन के बावजूद रणधीर एक जानदार प्रस्तुति नहीं दे पाते हालाँकि 19वें भारंगम में जब अधिकतर प्रस्तुतियों की हालत बदतर हो तो यह प्रस्तुति खुशी का सबब बन सकती है। पर सच यही है कि प्रस्तुति कई स्तरों पर प्रभाव नहीं छोड़ पाती जहाँ वह प्रभाव छोड़ सकती थी वहाँ भी नहीं।
1.       एकाधिक मौके ऐसे आते हैं जब अभिनेता का उच्चारण और एक्सेंट गड़बड़ा जाता है। कई जगह अभिनेता र और ड़ में गड़बड़ कर गए हैं ऐसा संभवतः बिहार की पृष्ठभूमि के अभिनेता होने की वजह से रहा होगा। लेकिन यही तो चुनौती है कि अभिनेता स्किप्ट के स्थान एवं बोली व भाषा के साथ ही उसके लहज़े का खयाल रखे, और यहीं अभिनेता ऐसा नहीं कर पा रहा है तो निर्देशक का दायित्व है कि वह इसे दुरुस्त करवाए। अन्यथा प्रदर्शन में साधारणीकरण होने की जो बात की जाती रही है वह अवरोध में बदलेगी और एक दर्शक का अभिनीत चरित्र के साथ तारतम्य नहीं बैठ सकेगा।

2.       अक्कारमाशी यानि मेरा जन्मदाता कौन, मेरा पिता कौन के सवाल पर लिखी गई शरणकुमार लिंबाले की एक बेहतरीन आत्मकथा है। जो बाकि जातिगत भेदभाव, दलितों की स्थिति आदि सवालों को उठाते हुए लेखक के बुनियादी सवाल को केंद्र में रखकर लिखी गई है। लेकिन आउटकास्ट की प्रस्तुति में यह सवाल काफी बाद में उभरता है, हालांकि कई बार निर्देशक को यह छूट देनी चाहिए कि वह टैक्स्ट से थोड़ा हटकर अपनी तरह से प्रस्तुति दे, लेकिन यह दारोमदार फिर निर्देशक का ही है कि जो बदलाव वो टैक्स्ट से अपनी प्रस्तुति में कर रहा है उसे वह बुनियादी सवाल से न हटने दे।


3.       एक दर्शक होने के नाते मैं महसूस करता हूँ कि नाट्य प्रस्तुति में बुनियादी तौर पर प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता होनी चाहिए साथ ही यह प्रस्तुति नाटक की कथावस्तु सवालों को समकालीन संदर्भों में देखते हुए हो तो और बेहतर। रणधीर इस बात के लिए निश्चित ही प्रशंसा के हकदार हैं कि वे समकालीन संदर्भों का सहारा लेते हैं। और जिस तरह से वे अपने नाटक का शुभारंभ करते हैं वह उनके एक भावी बेहतर निर्देशक बनने की ओर संकेत करता हैं लेकिन नाटक अपने मध्य में भटकाव महसूस कराता है ऐसा मालूम होता है जैसे निर्देशक समझ न पा रहा हो कि वह कैसे इस नाटक को बांधे और खत्म करे, यह जानते हुए भी नाटक का अंत उसे कब और कैसे करना है।

4.       और हाँ, मैं अभी तक यह नहीं समझ पाया कि नाटक के प्रदर्शन में पानी और झाग का इतना बिखराव क्यों था क्या उसके बिना नाटक अधूरा जान पड़ता। या उसके बिना काम नहीं चल सकता था। या वह नाटक एवं स्क्रिप्ट की डिमांड था। इतना पानी वो भी मंच पर मैंने पहली बार बिखेरते हुए देखा, तालाब और पोखर के दृश्य को दर्शाने के लिए निर्देशक को कुछ और तकनीक का सहारा लेना चाहिए था या फिर सीन के प्रदर्शन के और विकल्पों पर विचार करना चाहिए था।


जब हम किसी कृति खासकर आत्मकथा और उसमें भी दलित आत्मकथा के मंचन के लिए स्क्रिप्ट तैयार करते हैं तो कितना कुछ सोचना पड़ता होगा, एक रचना को स्क्रिप्ट में तब्दील कर मंचित करने में जितना परिश्रम और जोखिम उठाना पड़ता है,  एक अस्मितामूलक रचना को स्क्रिप्ट में तब्दील कर मंचित करने में उससे चौगुना परिश्रम और जोखिम उठाना पड़ता होगा। मैं ऐसी सिर्फ संभावना जता सकता हूँ क्योंकि में सिर्फ मंच के इस तरफ एक दर्शक की भूमिका में हूँ। एक निर्देशक की भूमिका में नहीं। वो मंच के इस ओर भी है, और उस ओर भी, मंच के बीचोबीच भी मौजूद है और अभिनेता की डायलॉग डिलीवरी में भी। वह मंच पर केंद्रित प्रकाश में भी है और उसके सारे साउंड इफैक्ट में भी। कुल मिलाकर वह नरसिम्हा की भूमिका में है। ऐसी भूमिका निभाने वाला निर्देशक जब एक दलित आत्मकथा के मंचन करने का फैसला लेता होगा, तो बहुत कुछ पहले ही सोच लेता होगा, मसलन कई लोग विरोध करेंगे, या फिर कई लोग सिर्फ तालियाँ पीटेंगे। दरअसल कोई भी निर्देशक खालिस तालियों या खालिस प्रशंसा को नहीं ही सुनना  चाहता होगा। रणधीर भी ऐसा नहीं चाहते होंगे। एक दर्शक होने के नाते मैं महसूस कर रहा हूँ कि आउटकास्ट की प्रस्तुति और बेहतर हो सकती थी, निर्देशक में वो दमखम है, बस उसे थोड़ा निखारने की जरूरत है।


गुरुवार, 9 जून 2016

आज की दलित अस्मिता का प्रश्न वास्तव में दलित पुरुषों की अस्मिता का प्रश्न है


साहित्य न केवल मन के भावों को अभिव्यक्त करने का माध्यम है बल्कि दूसरे के भावों अनुभवों की अभिव्यकित का भी साधन है। साहित्य के माध्यम से ही हम एक स्थान पर बैठे बैठे दूसरे स्थान विशेष की संस्कृति, भाषा, रहन-सहन, खान-पान, संस्कार, आदि के विषय में जान सकते हैं। इस प्रकार साहित्य किसी भी प्रकार का दर्पण और धरोहर है। किसी व्यक्ति विशेष या जाति विशेष का उस पर कोई अधिकार नहीं। प्रायः तत्कालीन समय में उठने वाले ज्वलंत प्रश्न ही साहित्य में वाद-विवाद का प्रश्न बनते हैं। दलित साहित्य भी साहित्य में एक ज्वलंत प्रश्न बन कर  उभर रहा है। 
हिंदू समाज में चार वर्णों में विभाजित है। पहला सवर्ण पुरुष, दूसरा सवर्ण स्त्री, तीसरा दलित पुरुष, चौथा दलित स्त्री। इन चार स्तरों के आधार पर ही समाज में यहाँ तक कि साहित्य में भी इन चार स्तरों पर ही हमें इनका स्थान दिखलाई पड़ता है। समाज और साहित्य पर सबसे अधिक वर्चस्व सवर्ण पुरुषों का उसके पश्चात सवर्ण स्त्री का, तत्पश्यात दलित पुरुष और सबसे अंत में दलित स्त्री। हम देख सकते हैं कि दलित स्त्री का स्थान समाज और साहित्य में निम्न से निम्नतर है। और इस पुरुष प्रधान समाज में दलित पुरुष को सवर्ण स्त्री के पीछे रखा गया है। वास्तव में दलित स्त्रियों की स्थिति हमारे समाज में दलित पुरुषों से भी बेकार है। उन्हें समाज में दो-दो मार झेलनी होती है पहला स्त्री होने की और दूसरा दलित होने की। यहीं पर एक सवर्ण स्त्री एक दलित स्त्री से अलग हो जाती है इस जाति-भेद के कारण ही उनके बहुत से सरोकार अलग अलग दिखाई देते हैं। इन दोनों के अंतर  को एम. प्रभावती , प्रभा मुथल, सुशीला मूले, आशा थोरात, अरुणा लोखाड़े, कौशल्या           आदि
मतावलंबियाँ भी मानती हैं उनका कहना है कि "देश के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दलित और सवर्ण स्त्रियों को अल-अलग प्रकार की बाधाओं से ग़ुज़रना पड़ता है। दलित स्त्री समाज के आख़िरी हाशिए पर है। परिवार के भीतर दोनों के दमन शोषण में समानता हो सकती है लेकिन दलित स्त्री को कमज़ोर सामाजिक और आर्थिक स्थिति की वजह से भी दमित होना पड़ता है। सवर्ण औरतें भी दलित और ग़रीब होने की वजह से उसको प्रताणित करने के साथ-साथ उसका शोषण करतीं हैं। दूसरा सवर्ण स्त्री शिक्षा तथा अन्य सामाजिक क्षेत्रों में दलित स्त्री से बहुत आगे हैं।" (भारत में स्त्री असमानताःएक विमर्श- डॉ गोपा जोशी, पृष्ठ ०७)
स्त्री विमर्श को लेकर बहुत सारी बातें की जाती हैं। समय-समय पर गोष्ठियाँ-संगोष्ठियाँ , वर्कशॉप और न जाने क्या-क्या होता रहता है परंतु इन सभी कार्यक्रमों में केवल सवर्ण स्त्री को ही केंद्र में रखा जाता है। एक दलित अथवा आदिवासी स्त्री के अधिकारों उनकी यातनाओं और पीड़ाओ आदि के विषय में यहाँ भी कोई विशेष चर्चा होती दिखलाई नहीं पड़ती। सभी सिर्फ अपने-अपने अधिकारों की बात करते हैं। हमारे समाज(दलित समाज) में भी हम देखते हैं कि अधिकांश दलित पुरुष ही विभिन्न कार्यक्रमों में अधिक दिखाई देते हैं। दलित स्त्रियों की संख्या कुछ ही दिखलाई पड़ती है। स्वतंत्रता सभी को प्यारी है यह बात हमसे(दलितों) अधिक और कौन जान सकता है। इतने सालों की यातना झेलने के बाद आज भी हम अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहें हैं। पर दलित स्त्रियाँ वे तो दलित पुरुषों से भी पीछे हैं। आज की दलित अस्मिता का प्रश्न वास्तव में दलित पुरुषों की अस्मिता का प्रश्न है। आज कितनी दलित स्त्रियाँ ऐसी हैं जो वक्ता के रूप में विभिन्न कार्यक्रमों में दिखाई देती हैं। उन्हें तो अपने दलित पुरुषों से भी अपने अधिकार माँगने पड़ते हैं। दलित स्त्रियों के विषय में तुलनात्मक रूप में दलित पुरुषों द्वारा ही अधिक लिखा जा रहा है। फिर चाहे वह साहित्य की कोई भी विधा क्यों न हो। जब दलितों के विषय में दलित ही बेहतर ढंग से लिख सकतें हैं तो दलित स्त्रियों के विषय में दलित स्त्रियाँ क्यों नहीं, जबकि उन्हें तो समाज में रहकर दो-दो मारें झेलनी पड़ती हैं। दलित स्त्रियाँ अपने अनुभवों की  जितनी सहज अनुभूति कर सकती हैं उतनी अन्य व्यक्ति नहीं। क्योंकि कल्पनाएँ भी सीमारहित नहीं होतीं। यहां यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि दलित स्त्रियों को रोका किसने है? पर क्या दलित स्त्रियों को दलित पुरुषों की अपेक्षा वे सामाजिक-आर्थिक अधिकार दिए जाते हैं जो उनके आगे बढ़ने में सहायक हों। यहाँ तक कि उनके लिए एक ख़ाक़ा भी पहले से ही तैयार कर दिया जाता है।


वर्चुअल स्पेस : ज्ञान और खोज का नया प्लेटफॉर्म और मु्द्रित माध्यम


"बिल्कुल संभव है कि हमारे तर्क कमजोर हों क्योंकि इंटरनेट और वर्चुअल स्पेस की जमकर पैरवी करने के बावजूद भी हम कहीं न कहीं मुद्रित माध्यमों के साथ खुद को खड़ा पाते हैं।" -Tarun Gupta
मुद्रित माध्यम इंटरनेट से पहले भी कारगर रहे हैं और आज भी हैं। पुस्तकें पहले भी छपती और बिकती थीं और आज भी छपती और बिकती हैं बल्कि कहीं ज्यादा छपती और बिकती हैं। जिन पाठकों को पुस्तकें पढ़ने का शौक है वे इंटरनेट पर भी पढ़ते हैं और खरीदकर भी। फिर सवाल है कि आज के युग में खासकर इंटरनेट के युग में मुद्रित माध्यम के समक्ष चुनौती कौन सी है या हम कहें वे कौन से खतरें हैं जो मुद्रित माध्यमों के लिये इंटरनेट के आने के बाद पैदा हुए। मुझे लगता है यह थोड़ा समझ का फेर है लेकिन उसे समझने से पहले वर्तमान स्थिति पर थोड़ा ध्यान देना चाहिये। 
वर्तमान समय में (जिसे हम इंटरनेट का दौर कह रहे हैं) किताबों की बिक्री और प्रकाशन बढ़ा ही है। इसके लिये वे खबरें आधार स्वरूप ली जा सकती हैं जो पुस्तक मेला लगने के दौरान अखबारों में आती हैं। हालांकि प्रकाशकों का मर्ज कुछ और ही होता है।
बहरहाल एक समय था जब आपको अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिये पुस्तक और उसके प्रकाशन का सहारा लेना पड़ता था। एक समय था जब आपके पास खबरों को हासिल करने का जोखिम उठाने का साहस होने के बावजूद किसी प्रैस का मुँह ताकना पड़ता था। एक समय था जब एक कवि या शायर को अपने अशआर लोगों तक पहुँचाने के लिये प्रकाशक की चिरौरी करनी पड़ती थी। एक समय था जब लेखक अपनी पुस्तक की भूमिका में प्रकाशक का धन्यवाद देने के लिये बाध्य था। उसे भय था कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो प्रकाशक रूठ जाएगा संभवत् अगली पुस्तक के प्रकाशन के वक्त परेशान करे। एक समय था जब लेखक कुछ लिखता और छपवा न सकने के ग़म में स्वांतसुखाय हो उस रचना को एक डायरी की शक्ल दे दिया करता। यानि लेखक को अपनी बात पाठक तक पहुँचाने के लिये प्रकाशक की सहमति-असहमति से होकर गुजरना पड़ता था। लेखक की क्या मजाल जो वह प्रकाशक की सहमति के बिना पुस्तक में कोई विरोधी बात कर सके। हम यहाँ प्रकाशकों का सामान्यीकरण नहीं कर रहे लेकिन उस समय अधिकतर लेखक एक तरह के प्रकाशक वर्चस्व की परिधि से स्वयं को आजाद नहीं कर पाते थे। यानि इंटरनेट से पहले लेखक के विचारों की आजादी प्रकाशक की गुलामी के बिना संभव नहीं थी। कम से कम हिंदी जगत में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो जीवनभर अपनी कृतियों को प्रकाशित करवाने के लिये प्रकाशकों के चक्कर काटते रहे, पर अपना लिखा न छपवा सके। यह एक तरह का विरोधाभासी जगत है जहाँ हमें एक तरफ किताबों की शक्ल में छपीं दोयम दर्जे की पुस्तकों की भरमार मिलेगी साथ ही दूसरी तरफ अच्छी और पठनीय पुस्तकों के ‘आउट ऑफ प्रिंट’ होने की कसक भी मिलेगी, जिनके पाठक सालों से उनके प्रकाशन के इंतज़ार में है। हम कहेंगे विरोधाभासी होने के बावजूद यह मुद्रित माध्यमों का समानांतर संसार है। दोनों साथ-साथ चलते हैं। लेकिन जैसा मैंने कहा, यह एक समय था।
आज प्रकाशक के व्यवहार में अगर परिवर्तन न भी आया हो तो लेखक के पास इंटरनेट के रूप में एक प्लेटफॉर्म है जहाँ वह अपनी बात बेझिझक रख सकता है। जहाँ उसके शब्दों और विचारों पर सेंसर की तलवार नहीं लटकी होती। जहाँ वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सार्थक प्रयोग कर सकता है। जहाँ वह पॉपुलर हो सकता है इतना कि प्रकाशक खुद उसे छापने के लिये लालायित दिखें। पत्रिकाएं उससे कॉलम लिखवाने के लिये संपर्क साधे। वह एक वक्ता के रूप में व्याख्यान दे। यानि ‘खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।‘ आप कवि हैं कविता लिखते हैं, आपकी डायरी आपकी कविताओं से भरी पड़ी है। आप कथाकार हैं कहानियाँ लिखना आपको पसंद है। आप दुनिया जहान की खबर रखते हैं। आप एक पत्रकार बनना चाहते हैं। इंटरनेट से पहले आपको अपनी इच्छाओं को दूसरे के हिसाब से ढालना पड़ सकता था। लेकिन इंटरनेट के आने के बाद आप स्वयं सक्षम है कि आप अपना मनचाहा लिखें और उन पर आई टिप्पणियों का जवाब दें। मुद्रित माध्यमों में लेखक और पाठक के मध्य एक तरह का गैप विद्यमान था। वर्चुअल स्पेस ने यह गैप बिल्कुल खत्म कर दिया है। यहाँ लेखक पाठक से सीधे मुखातिब है। वर्तमान समय की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे हम सिर्फ मुद्रित माध्यमों की स्थिति और चुनौतियों के स्तर पर ही नहीं बल्कि इंटरनेट के संदर्भ में अभिव्यक्ति के नये उभरते प्लेटफॉर्म और खोज के नए उपक्रम के रूप में भी देख और समझ सकते हैं।
इंटरनेट के दौर में, आज ऐसे लेखकों की कमी नहीं है जिन्होंने अपने लेखन की शुरुआत ब्लॉग लिखने से की और लोगों द्वारा सराहे गये। ऐसे पत्रकार, कवि, आलोचकों, अध्यापकों की कमी नहीं जो मुद्रित माध्यम की अपेक्षा वर्चुअल स्पेस पर अपनी बात रखने को ज्यादा तरजीह देते हैं।
मोहल्लालाइव, मीडियाखबर.कॉम, हुंकार.कॉम, नईसड़क.कॉम, दीवान, द हूट, चुरमुरी.कॉम, भड़ास.कॉम, जानकीपुल.कॉम आदि ऐसे अनगिनत ब्लॉंग हैं जो निरंतर सक्रिय हैं लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं समझना चाहिये कि इनका उभार मुद्रित माध्यम के पतन के रूप में हमारे सामने आया है। हमें लगता है कि किताबों की खरीद की अपनी दुनिया है। हमें मुद्रित माध्यम को इंटरनेट के बरक्स रखकर अपनी बात नहीं करनी चाहिए। इंटरनेट अपने उपयोगकर्ता को खरीद से पहले की प्रक्रिया की बानगी व्यवहारगत रूप में समझाता है और उसके सामने खोज का एक अपार संसार खोल देता है ताकि पाठक यह तय कर सके कि उसे क्या खरीदना है और क्या नहीं। इसमें कोई शक नहीं कि इंटरनेट इस तरह का विकल्प अपने उपयोगकर्ता को मुहैया कराता है।
मेरे कई मित्र हैं जिन्होंने ब्लॉगिंग को अपनी अभिव्यक्ति का औज़ार बनाया। उन्हीं में से एक हैं विनीत कुमार जो ‘मंडी में मीडिया’ जैसी पुस्तक के लेखक हैं। आज मैं सन् २०१३ में खड़ा होकर २००७ के विनीत को देखता हूँ जो रवि रतलामी के नुस्खों और तकनीकों से सीख ब्लॉग लिख रहे थे। तब महत्वपूर्ण यह नहीं था कि वे क्या लिख रहे थे। बल्कि महत्वपूर्ण यह था कि वे निरंतर लिख रहे थे। पहले गाहे-बगाहे और अब हुंकार.कॉम के द्वारा वो हमारे सामने एक मीडिया क्रिटिक के रूप में जाने जाते हैं। उनके जैसे उदाहरणों से वर्चुअल स्पेस की शक्ति का अहसास होता है ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर हमें ऐसा प्लेटफॉर्म देते हैं जहाँ हम खुलकर अपनी बात को अभिव्यक्त कर सकते हैं। अपने आपको स्थापित कर सकते हैं। वर्चुअल स्पेस आपसे वह शब्दावली छीन लेता है जिसमें आप कहें कि मैं लिखता तो बहुत हूँ पर मुझे कोई छापता नहीं इसलिए मुझे कोई पढ़ता नहीं। मुद्रण माध्यमों और इंटरनेट के मध्य की स्थिति ने अगर आज एक चुनौती का रूप धारण कर लिया है तो उसके कारणों के रूप में निम्नलिखित उदाहरण को लिया जा सकता है।
नीरा राडिया के केस पर लिखे सेवंती नैनन के एक लेख (बिग ब्रदर्स टू द रेस्क्यू) को जब ‘द हिंदू’ ने छापने से मना कर दिया। तब उन्होंने वह लेख ‘द हूट’ पर डाल दिया। अगर इंटरनेट न होता तो संभवत् इसकी प्रतिक्रिया एक खीझ, एक कसक के रूप में होती। ‘द हिंदू’ जैसा सम्मानित अखबार जब अपने ही कॉलम(मीडिया मैटर्स) लेखक को किसी लेख को छापने से मना कर सकता है। तब ऐसी स्थिति में आम लेखक और अन्य अखबारों के बारे में क्या कहा जाए।
इस तरह के कई उदाहरण सामने रखे जा सकते हैं जो मुद्रण माध्यम की तानाशाही और वर्चुअल स्पेस के जनतंत्र का समर्थन करते हैं।
वर्चुअल स्पेस की अन्य उपलब्धि यह भी है कि यह जहाँ एक ओर अभिव्यक्ति के लिये प्लेटफॉर्म प्रदान करता है वहीं ज्ञान का अपार संसार अपने उपयोगकर्ता के लिये खोल देता है। मुद्रित माध्यम इस तरह की सहूलियत अपने पाठकों को नहीं दे पाता। देता है तो कठिन परिश्रम और समय लेने के पश्चात। लेकिन वर्चुअल स्पेस पर यह सिर्फ कुछ शब्दों को टाइप करने और एक क्लिक पर आपके सामने उपलब्ध है। मान लीजिये आपको किसी लेखक या राजनेता के बारे में जिस किताब में भी लिखा गया हो, वह देखना है। ऐसे में मुद्रित माध्यम आपको कुछ दे पाये या न दे पाये वर्चुअल स्पेस पर आप गूगल बुक्स में जाकर उस लेखक या राजनेता का नाम टाइप कर दीजिये आपके सामने सैंकड़ों किताबें खुल जाएगी। और गूगल आपको सीधे किताब के उस पन्ने पर ले जाएगा। जहाँ उस लेखक या राजनेता का नाम आया है।
वर्चुअल स्पेस की इसी तरह की खूबी मुद्रित माध्यमों के लिये चुनौती बन गई है। लेकिन अब भी मुद्रित माध्यमों के पास अपार संभावनाएँ है। अभी भारत की अधिकतर आबादी इंटरनेट से महरूम है। आज इंटरनेट का उपयोगकर्ता पाँच सात पेज तो नेट पर पढ लेता है पर जहाँ पूरी किताब, ऩ़ॉवेल या कहानी पढने की बात आती है। वह प्रकाशित किताबों के पास जाता है। क्यों न वर्चुअल स्पेस को मुद्रित माध्यमों के विकास और प्रसार का माध्यम बनाया जाए। क्यों न हम उन उपायो को खोजें जिनसे किताबों को इंटरनेट के माध्यम से ज्यादा हाथों तक पहुँचाया जा सके। ऐसा क्यों होता कि जवाहरलाल नेहरू की किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ फ्लिपकार्ट.कॉम पर चालीस फीसदी की छूट के साथ घर तक पहुँच जाती है जबकि उसका अपना प्रकाशक ‘पैंग्विन’ उस पर दस फीसदी से ज्यादा की छूट नहीं दे पाता। बिल्कुल संभव है कि हमारे तर्क कमजोर हों क्योंकि इंटरनेट और वर्चुअल स्पेस की जमकर पैरवी करने के बावजूद भी हम कहीं न कहीं मुद्रित माध्यमों के साथ खुद को खड़ा पाते हैं।
(यह लेख लघु लेख करीब दो ढाई साल पहले लिखा गया था आज फेसबुक पर आपसे साझा कर रहा हूँ।)