देखते हैं हम जहाँ तक वहाँ तक तुम हो ।
मंज़िलें हों या न हों पर रास्ता तुम हो ।।
जब भी कुछ ग़लत-सा हम काम करते हैं।
डर ये लगता है हमें ना साथ में तुम हो ।।
बस खुशी इस बात की है दोस्ती तो है ।
प्यार का इक़रार नही साथ तो तुम हो ।।
उसको कह सकता नही तुमसे ही कह दूँ मैं ।
तुम ही हो मेरे राज़ और हमराज़ भी तुम हो ।।
कुछ नही था झूठ जो मैंने कहा तुमसे ।
क्यो कहूँगा मैं मेरी हर साँस में तुम हो ।।
इसका ग़िला नही हमारे साथ नही तुम ।
बस ग़िला ये है किसी के साथ में तुम हो ।।
(ये ग़ज़लनुमा पंक्तियाँ उस दौरान लिखीं गयीं जब मैंने पहली बार ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत अहसास से अपना परिचय करावाया )
तुम्हारे बारे में क्या कहूं मै, मेरी तमन्नाओं का सिला है. नहीं मिला जो तो मुझको क्या है, मिलेगा तुमको ये आसरा है.
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शनिवार, 27 सितंबर 2008
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