गुरुवार, 13 अगस्त 2009

हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है

'ग़ुलज़ार' की कविता
हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है
बदलने वाला है मौसम ...................
नय आवाज़े कानों में लटकते देखकर कोयल ख़बर देती है
बारी आम की आई......... ।
कि बस अब मौसम-ऐ-गर्मा शुरु होगा
सभी पत्ते गिरा के ग़ुल मोहर जब नंगा हो जाता है गर्मी में
तो ज़र्द-ओ-सुर्ख़, सबज़े पर छपी , पोशाक की तैयारी करता है
पता चलता है कि बादल की आमद है।
पहाड़ों से पिघलती बर्फ बहती है धुलाने पैर 'पाईन' के
हवाएँ छाड़ के पत्ते उन्हें चमकाने लगती है
मगर जब रेंगने लगती है इंसानों की बस्ती
हरी पगडंडियों के पाँव जब बाहर निकलते हैं
समझ जाते हैं सारे पेड़ , अब कटने की बारी आ रही है
यही बस आख़िरी मौसम है जीने का इसे जी लो ।
( वागर्थ , अगस्त०९ , अंक १६९ से उद्धृत )

मुझे ये कविता बहुत अच्छी लगी । (क्यों लगी इसका ज़िक्र आगे की पोस्ट में करुँगा ) आप भी इसे पढ़ें और कैसी लगी अपनी प्रतिक्रिया दें ।

बुधवार, 12 अगस्त 2009

'प्यार' का मतलब

'प्यार' जैसे शब्द
'प्यार' जैसा शब्द
'प्यार' याकि शब्द
क्या प्यार सिर्फ़ शब्द भर है ?
शायद
आप कहें
नही
यकीनन____आप कहेंगे नही ।
लेकिन
प्यार एक शब्द ही तो है
क्योंकि शब्द ब्रह्म है ।
शब्द 'नाद' है
'नाद' बिन्दु वाला नहीं
आवाज़ वाला

हाँ !
प्यार शब्द है ---आवाज़ है ।

अब्राहम लिंकन की टोन में कहूं तो ---
दिल की , दिल द्वारा , दिल के लिए
विश्वास की ,विश्वास के लिए ,विश्वास के साथ

पुकार है ये

इसलिए ---
'प्यार' शब्द है मेरे लिए ।
(पुन: प्रकाशित )

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

कुछ छूट गया ..........

आज फिर तुम कैंटीन में दिखीं
मगर आज तुम्हारे चेहरे पर
वो लब्बोलुबाब न था
जो कभी रहा करता था
मैं भी वहीं था
उस वक़्त
किसी कोने से तुम्हें तक़ता
मेरी आँखें
तुम्हारी हथेली पर रखे
तुम्हारे चेहरे को देख रही थी
और तुम
अपने सामने की खाली कुर्सी को
मानो
तुम्हें किसी का इंतज़ार हो ..........
कोई आने वाला हो
तुम्हारा बेहद क़रीबी
पर
तुम इतनी ख़ामोश क्यों हो ?
तुम तो ऐसी ना थी
मैं तुम्हारे साथ बैठना चाहता हूँ
मुझसे कुछ बात करो ना .........प्लीज़
ना जाने कितने प्रश्न
कितनी इच्छाएँ
यक-ब-यक
कर डाली मैंने
मगर तुम
चुप बिल्कुल चुप
ख़ामोश
सामने की खाली कुर्सी को देखती
मन में ख़याल आया
याकि इच्छा हुई
या इस एक पल के लिए
मेरे जीवन का लक्ष्य
काश मैं वो कुर्सी होता ........................
.......................
.......................अरे
क्या हुआ
तुम जाने क्यों लगीं
और तुम्हारी आँखों में ये गीलापन
मैं खिड़की के काँच से
तुम्हारे बालों और दुपट्टे को लहरते देखता रहा देर तक
मानो वो भी
.........अनमने से
लहरने को मजबूर हों
मैं अभी भी वहीं बैठा हूँ
अकेला
तुम बिन
उस खाली कुर्सी को निहारता
जहाँ अभी भी तुम्हारी खामोशी
तुम्हारा इंतज़ार
ऊँघ रहा है
टेबल पर
अपनी कोहनी टिकाए
हथेली को ठोड़ी से लगाए ।

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

तुम्हें क्या लगा...

तुम्हे क्चा लगा
मैं तुम्हे भूल जाउँगा
नहीं
ये मेरे बस में नहीं
होता
तो कोशिश ज़रूर करता
लेकिन
तुम मुझे याद हो
मेरी सबसे फेवरेट किताब के
उस पन्ने की तरह
जिसे मैंने ही
याद रखने के लिये
किनारे से
थोड़ा सा
मोड़ा था
और मोड़ा भी ऐसा पुख्ता
कि
मैं
खुद भी
इसे दोबारा खोल नहीं पाया हूँ
अब तक
सच कहूँ
तो मैं ...............
तो मैं ...............
चलो छोड़ो
फिर कभी............ । ।

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

रंग दे बसंती से आगे ....

प्रसून जोशी के लिखे गीत खून चला.....खून चला ( रंग दे बसंती ) ने हमारे दिल में उस जज़्बे को दोबारा जगाया था जो शायद 'जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो कुर्बानी' के बाद कहीं खो सा गया था 'रंग दे बसंती' देखने के बाद हम ( मै ओर मेरे दोस्त ) काफी देर तक कुछ नही बोल पाए थे नौशाद तो जैसे ख़ामोश ही हो गया था उस दिन मुझे यक़ीन हुआ कि हम वाकई बहुत इमोशनल है । जिसे आज एक घटिया टर्म के रूप में यूज़ किया जा रहा है । रात को सोते वक़्त सपने में भी फ्लाइट लेफ्टिनेंट अजय राठौर की माँ और उसके दोस्त इंडिया गेट के सामने सत्ता के ठेकेदारो के हाथों दबाये जा रहे थे खून से लथपत लोगो का जुलूस दिखाई दिया था उस दिन सपने में । और कानो में 'बदन से लिपटकर ....खून चला खून चला ...' उनका यह गीत तब भी गूँज रहा था यह क्या था । क्या यह मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में की कसक थी जिसे वास्तविकता के बहुत करीब होने पर भी फैंटेसी कहा गया ? क्या हम इस गीत को किसी खेमे में बांधने की जुर्रत कर सकते हैं । उस वक़्त लगा कि प्रसून ही इस तरह के गीत लिख सकते है जिनमे उन्मुक्तता की उड़ान हो .। कुछ कर गुज़रने की चाहत हो । लेकिन जिस टोन में मस्सकली...मटककली लिखा गया है वह वाकई काबिलेगौर है । बेशक यह गाना किसी कबूतर पर बेस्ड हो पर इसमे उसी आज़ादी का संकेत हमें मिलता है । जो खून चला.... में हमें मिला था । दोनों गानों के गीतकार-संगीतकार सेम है । अंतर है तो सिर्फ इस बात का कि 'रंग दे बसंती' वाले गाने में जहाँ सुनने वाला अपने दिल में एक हूक का अनुभव करता है और तसल्ली से फिल्म के कंटेंट को समझते हुए गाने के बोलो पर और उसके पिक्चराइज़ेशन पर ध्यान देता है । वही मसकली...मटकली में झूमने का दिल करता है । उड़ियो ना डरियो ..कर मनमानी मनमा..नी म......नी । जी करता है डीजे पर यही गाना बजे और हम इस गाने के स्टैप्स को अपने पर आज़माये । इसी फिल्म में रेखा भारद्वाज का गाया एक विवादस्पद गीत भी है । जो बेसीकली एक फॉकसोंग है जिसे रहमान ने वैसा ही संगीत भी दिया है । चर्चा है कि यह रायपुर की जोशी बहनो ने लोकगीत के रूप में पहले-पहल गाया था । प्रसून जी ने इस गाने को इतनी महत्ता दिलाई और इसे पूरे देश में पॉपुलर बनाया इसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। पर क्या इस लोकगीत के रियल राइटर का नाम देने में कोई दिक्कत थी? क्या आपको या मेहरा जी को कोई डर सता रहा था । मै तो रंग दे बसंती देखने के बाद से ही आप दोनो का फैन हो गया हूँ इसलिये यह बर्दाश्त नहीं कर पाता कि आप लोगो पर कोई दूसरो का हक़ मारने का आरोप मढे़। या फ़िर आप पर अन्नू मलिक टाइप ठप्पा लगाए । और फिर जोशी बहनो ने कोई रॉयल्टी थोड़े ही मांगी है वे तो सिर्फ इतना चाहती हैं कि इस गीत के वास्तविक लेखकों का नाम भी आप लोग दे । क्या यह कोई नाजायज़ मांग है ।