शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2008

अभियान ( शेष भाग )

भारत में धर्म एक खतरनाक चीज़ है । इसलिए अधिकतर वो लोग जो इसके खिलाफ बोलना चाहते है कुछ नही बोल पाते । भारत में त्यौहार आस्था का विषय है और आस्था व धर्म दोनों ही मुझे खतरनाक मालूम होते हैं क्योंकि कम से कम भारत में तो इनके नाम पर कुछ भी कराया जा सकता है । गुजरात के दंगे , कंधमाल , ८४ की दिल्ली कुछ भी भूलने लायक नही है ये सव भूलने के विरुद्ध है । आस्था , जिसे बचपन में मैंने विश्वास के अर्थों में ग्रहण किया था आज मुझे देश के पर्यावरण के लिए खतरा मालूम होती है । चाहे गणेश उत्सव हो , दुर्गा पूजा या आंध्रा में होने वाली मूर्ती पूजा , सभी का संबंध विसर्जन से है । यह विसर्जन नदियों को विसर्जित करता है इस बात से हम लोग वाकिफ हैं । कल विजयदशमी थी उससे पहले नवराञों मे माँ दुर्गा की पूजा हुई , घरों में धार्मिक सामग्री ( सूखे फूल , मूर्तियां , सिंथेटिक रंग की कीचड़ ) इकट्ठी हुई । आज से नदियों में इन्हें प्रवाहित करने का सिलसिला शुरू होगा । कल का दिन बुराई पर भलाई (अच्छाई ) की जीत के रूप में याद किया जाता है । यह रावण की हार और राम की जीत का दिन है । लेकिन प्रदूषण के रावण से इस संग्राम में पर्यावरण के राम हर बार क्यों हार जाते हैं ? दो टूक में कल के हिन्दुस्तान ने यह सवाल उठाया था । अपनी पिछली पोस्ट में मैंने आपसे कुछ सुझाव मांगे थे और अपनी अगली पोस्ट में अपने सुझाव देने का वादा किया था सुझावों की यह मांग इसलिए की गई थी क्योंकि मैं ब्लॉग के सामाजिक सरोकारो में विश्वास रखता हूँ मुझे उम्मीद थी कि हमारे ब्लॉगर्स इस अभियान में शरीक़ होंगे मगर...............खैर छोड़िये , बात यमुना की चल रही थी यमुना को हमारी परंपरा में माँ का दर्जा दिया गया है और यह परंपरा वही है जो नवदुर्गा में हमारा विश्वास बनाए हुए है । तो फिर एक पूजनीय सामग्री को हम दूसरी माँ को प्रदूषित करने का कारण कैसे बना सकते हैं । पर सवाल उठता है कि अगर प्रवाहित(विसर्जित) ना करें तो क्या करें , क्योंकि कहीं और हम इन्हें फेंक या डाल नही सकते । यह करोड़ो आस्थाओ और उनके विश्वास का सवाल है । हम उनकी भावनाओं से नही खेल सकते।
इसके लिए पहला सुझाव कृञिम जलाशयों के रूप में हमारे सामने उभरता है । हमने वज़ीराबाद पर यमुना नदी के किनारे स्नान घर के ऱूप मे सूर यमुना घाट का निर्माण करवाया है । क्या हम इसी की तर्ज़ पर यमुना के ही जल का अलग से एक कुंड नही बना सकते , जहाँ यह सब सामग्री विसर्जित की जा सके । जिसका बाद में पुनर्चक्रण कर लिया जाए इससे लोगों की आस्था भी बनी रहेगी और यमुना प्रदूषित भी नहीं होगी । ३ साल पहले मुम्बई की मेयर ने गणेश उत्सव के दौरान यही तरक़ीब इस्तेमाल की जो काफी सफल रही।
दूसरा सुझाव यह है कि सरकार हर निगम ,ब्लॉक , क्षेञ , में उत्सवों के दौरान पंडाल या सामग्री गृह बनायें । जहाँ यह सभी सामग्री रखी जा सके जिसका बाद में सरकार खाद , भराव आदि के रूप में या जैसा भी पर्यावरण के अनुकूल हो इसका प्रयोग करे ।
सुझाव और भी हैं जैसे कि मूर्तियों के निर्माण में प्लास्टर ऑफ पैरिस की जगह चिकनी मिट्टी का उपयोग , सिंथेटिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक रंगों का प्रयोग आदि । उपरोक्त सुझावों को अपनाकर हम न केवल नदियों को प्रदूषित होने से बचा पाएंगे बल्कि अपनी आस्था के सवाल को भी सार्थक जवाब दे पाएंगे । यह सुझाव सिर्फ यमुना की रक्षा के लिए ही नही बल्कि हर उस जल-कुंड , जलाशय , आदि जलस्रोतो के हित में होंगे जो हमारी आस्था का शिकार बन प्रदूषित होते हैं ।

3 टिप्‍पणियां:

जितेन्द़ भगत ने कहा…

तबीयत खराब थी भाई वर्ना आपके इस अभि‍यान में मैं जरुर शामि‍ल होता। आज आपकी पि‍छली पोस्‍ट भी पढ़ी। मुझे बेहद खुशी हुई कि‍ पर्यावरण को लेकर आपकी चिंता सच्‍ची है। आपका सुझाव वाकई दमदार है। कभी न कभी अमल भी होगा, ऐसी उम्‍मीद करनी चाहि‍ए।

मुन्ना पांडेय(कुणाल) ने कहा…

बढ़िया और गंभीर सुझाव हैं तरुण जी
आप कदम उठाये हम आपके साथ हैं .कभी कभी दर्द का हद से गुज़र जाना भी दवा बन जाता है ..पर यमुना के लिए ये दर्द तो पता नहीं कब...?..हाँ ..पोस्ट में अशुद्धियाँ बहुत हैं उन्हें सुधार लो ..
स्नेह
मुसाफिर

tarun ने कहा…

मुन्ना तुम्हारे सुझाव पर आगे से ध्यान दूँगा ।