सोमवार, 27 जून 2011

गंगोत्री से गोमुख तक


बार बार सोच रहा हूँ ऐसा क्या था उस जगह पर जिसने मुझे और दिनों से अलग एक आध्यात्मिक अहसास से भर दिया था मैं क्यों ईशआवास आश्रम में स्वामी राघवेंद्रानंद द्वारा गाये गये भजनों को बार बार दोहरा रहा था मन की तरंगें बाँध लो...बस हो गया भजन । ऐसा क्या था कबीर के इस भजन में जो स्वामी जी के कंठ में मधुरता भर गयी थी। क्यों मैं वापस दिल्ली में आकर जब उनके द्वारा रिकॉर्ड यह भजन अपने लैपटॉप पर सुनता हूँ तो उस आनंद से महरूम रह जाता हूँ जो माँ गंगा के किनारे स्थित ईशआवास आश्रम में मुझे मिल रहा था। ऐसा क्या था जो दिल्ली में यहाँ मेरे घर में नहीं हैं। क्या इसीलिए उत्तराखंड को देवभूमि कहते हैं लेकिन नैनिताल भी तो उत्तराखंड में ही है वहाँ मुझमें ऐसा अहसास नहीं पनपा था। फिर गंगोत्री में ऐसा क्या था कि आज २५ जून(लौटने के १०-११ दिनों बाद भी) मैं उस आ्ध्यात्मिक अहसास से मुक्त नहीं हो सका हूँ। ऐसा क्या था वहाँ ..गंगोत्री से गोमुख के ट्रैक पर जब मेरे एक दोस्त ने रास्ते में हल्का होने(लघुशंका) की इच्छा जताई तो मेरे मुँह से अक्समात निकला यार प्लीज़ यहाँ नहीं ये पवित्र क्षेत्र है। कहाँ गये मेरे सारे तर्क जो मैं अपने पिता को फूलमाला, आदि धार्मिक सामग्री को यमुना में प्रवाहित करने के विरोध में दिया करता था। क्या था उस जगह पर ऐसा जो मैंने अपने मित्र को लघुशंका जैसी अनिवार्य प्राकृतिक अवस्था को नजरंदाज करने तक के लिए कह दिया। मैंनें बार बार इस बात का वैज्ञानिक आधार जानने समझने की सोची पर दिल्ली में हम जिस आस्था को दकियानूसी कहकर टाल देते हैं गंगोत्री में जाना और भगीरथी में नहाना उस आस्था को प्रणाम करना था जो हमारे पूर्वजों और हमारी परंपरा में व हमारी रगों में लहू बनकर निरंतर प्रवाहमान हैं।

मैं अपने परिवार(खानदान) का पहला व्यक्ति हूँ जिसने गंगोत्री ही नहीं गोमुख को अपनी आँखों को देखने सौभाग्य दिया है। मेरे पिता की अब तक की सारी ज़िन्दगी हमारी परवरिश अच्छे से हो जाए इसी उधेड़बुन में बीत गयी। घूमने के नाम पर वो अपने रिहाइश स्थल से मोरी गेट तक का सफर पहले पैदल और बाद में ए-वन साईकिल पर पूरा किया करते थे। मेरी माँ घूमने के नाम पर या तो वैष्णो देवी गयीं होंगी या फिर हर बुधवार को ४० किलो वज़न का बोरा अपने सिर पे लादे २१२ रूट नंबर की बस से करोलबाग जाया करती थी उसके बाद इस लोक से किसी दूसरे लोक में चली गयीं। मेरे दादा ने गंगोत्री के गोते सतलुज में लगाये करीब ५० बरस पहले जब वे फिरोजपुर छावनी के पास एक बड़े मोहल्ले के बहुत छोटे से मकान में रहा करते थे। उन्होंने तीर्थ के नाम पर अपनी ता-ज़िन्दगी दो जून की रोटी की जुगत भिड़ाने में लगा दी। एक मैं हूँ जो उस स्थान से लौटा हूँ जहाँ पर भारत के विकासपुरुषों में अग्रणी महाराज भगीरथ ने साढ़े पाँच हजार साल तक एक पैर पर खड़े होकर गंगा को धरती पर लाने के लिए तपस्या की।
पूरें टूर की उन सब विसंगतियों जिनसे में त्रस्त हो चुका था और तीन दिन के भीतर ही दिल्ली भाग आना चाहता था अगर कोई चीज़ मुझे वहाँ बरकरार रखने की जद्दोजहज में लगी हुई थी तो उनमें गंगा(भगीरथी) नदी की तेज तरार आवाज़ में बहता पानी(जल), गोमुख जाने का उत्साह और राघवेंद्र जी महाराज की आवाज में गाया गया वो गीत जिसमें वे कहते हैं ..... हिम्मत ना हारिये, प्रभु ना बिसारिये... हँसते मुस्कुराते हुए जिंदगी गुज़ारिये...।

2 टिप्‍पणियां:

kalhansdharmendra.blogspot.com ने कहा…

यात्रा की बैचेनी लेख में भी है और यह उस देवभूमि का ही कमाल है...

amitesh ने कहा…

मैं तो उस गंगोत्री को देख रहा हूं जहां से गंगा निकलती है...पत्थर और पहाड़ को काटते हुए उसे समतल मैदान में पहूंचा देती है विशाल जनता को आप्लावित करने के लिये...मर्मस्पर्शी...