दिल्ली के स्कूलों में स्लेबस रिवाइस्ड हुए अभी लगभग दो-तीन साल ही बीते होंगे , संभवत् सुनामी के बाद । जब दिल्ली के स्कूलों को लगभग बीस बरस के उस स्लेबस को छोड़ना पड़ा था जिसने ना जाने कितने आई.ए.एस , पी.सी.एस,डायरेक्टर,आदि पैदा किये थे । यहाँ तक की आज भी एन.सी .ई.आर.टी की किताबों की धूम हैं किसी भी सब्जेक्ट से सिविल की तैयारी शुरू करने वाला कोई भी परिक्षार्थी आज भी इन किताबों को अपना प्रारंभिक चरणबिंदु मानता है । ऐसा नही कि आज जो किताबें सिलेबस में लगाईं गयीं है वो नाकाफी हों या समकालीन न हो । उन्हें रिवाइस्ड करने का अहम् फैसला लेने के मुख्य कारण संभवत् काफी लंबे समय से नये संस्करण का न आना , भाषिक अशुध्दियाँ , और पिछले बीस सालों में ग्लोबल वार्मिंग या कहें प्राकृतिक आपदा के बढ़ते खतरों ,एवं राजनीति ,अर्थव्यवस्था में बदलाव , व कहीं ना कहीं दिल्ली में आगामी वर्षो में होने वाले खेल रहे होंगे । आज का भारत ८०-९० के दशक का भारत नही था उसकी परिस्थितियाँ ,ज़रुरतें , मुश्किलें सब बदल रहीं थी । इसे बदलना था अपने आज के लिये , और चलना था अपने कल के लिये । इसलिये इसे बदलने की कोशिश की शुरुआत देश की राजधानी से हुई और इसे बदलने का पहला उपक्रम बना शिक्षा । जिसमें बदलाव लाये बिना बाकी चीज़ो को बदलना नामुमकिन था इसलिये इसे बदला गया । कम से कम दिल्ली की शिक्षा-पद्दति में सुधार लाने की अच्छी कोशिश की गई हालाँकि उचित तादात में किताबों के ना छपने और समय से उपलब्ध ना हो पाने के कारण शुरुआत में काफी मुश्किलात आई । लेकिन तब भी इन किताबो को पढ़ने के बाद ये आसानी से कहा जा सकता है कि यह समकालीनता को विभिन्न संदर्भों में समझने का बेहतर साधन साबित हुईं हैं जिसकी जरुरत हम अपनी पढाई के दौरान हमेशा महसूस करते रहे । मसलन हमारी किताबों में चाणक्य था उसकी नीति थी , अकबर था उसकी शासन व्यवस्था थी , मुहम्मद तुगलक की बुद्दिमान मूर्खता थी यहाँ तक की भारत का राष्ट्रीय आंदोलन था लेकिन इसके बाद था इतिहास का अंत । यानि इतिहास ५० के दशक तक आते-आते खत्म हो जाता था यही हालत राजनीति विग्यान और अर्थशास्ञ की भी थी । हम लोगों में उस समय इमरजेंसी , नई आर्थिक नीति , ५० के बाद के चुनाव और उन्हें संपन्न कराने में आने वाली दिक्कतें ,व समकालीन साहित्य आदि के बारे में पढ़ने के लिये ग़ज़ब का कौतुहल था । मैं ११वीं में फेल होकर ग्यारहवीं में आया था उस वक़्त तक लाईब्रेरी जैसी जगह से मेरा परिचय तक भी नही था । और स्कूल में जो लाईब्रेरी थी वह टीचर्स के अखबार पढने या गप्पे लड़ाने की जगह के रूप में प्रसिध्द हो चुकी थी हमारा भी एक दिन में एक बार लाईब्रेरी का पीरियड ज़रूर होता , जो हमारी क्लास के बच्चों के लिये दिन का सबसे मस्त पीरियड हुआ करता था क्योंकि ऐसे में उन्हें गप्प लड़ाने को मिलतीं । मेरे जैसे कुछ बच्चे जो रैक्स में बरसो से रखीं किताबो को पढने की इच्छा रखते थे उन्हें हमारे लाईब्रेरियन मि० जटाशंकर या तो धुत्कार देते या ज़्यादा ज़िद करने पर चंपक या फैशन की फटी पुरानी मैग्ज़ीन देकर परे हटने के लिये कहते । लेकिन रिवाइज़्ड किताबें बच्चों को जानकारी मनोरंजन के साथ दे रही है जबकी हमारी तत्कालीन किताबो में माञ जानकारी थी मनोरंजन से वे कोसों दूर थीं ।खैर आज की किताबों मे एक चीज़ जो मुझे सबसे बेहतर लगी वो थी आपदा प्रबंधन । बच्चो का उससे परिचय । इसकी जानकारी । हालाँकि इसका संदर्भ माञ सुनामी ही है । मेरे विचार में हमें इसके संदर्भो को बढाना चाहिये था १४ सितंबर को दिल्ली में हुए धमाके उससे पहले गुजरात और जयपुर । क्या हम इन्हें आपदा नही मानते । दिल्ली के धमाको का चश्मदीद एक बच्चा , एक कांस्टेबल के बम को डिफ्यूज़ करने की खबर(हिंदुस्तान दैनिक) और उसकी बहादुरी के फतवे ।इन सब खबरों को पढकर मुझे लगता है कि आतंकवाद से लड़ाई , बम डिफ्यूज़ करना (११-१२वीं कक्षा में) , संदिग्धता की खबर (१०वी क्लास तक) को भी आपदा प्रबंधन वाली किताबों में शामिल किया जाना चाहिये था।और अगर हम ऐसा नही कर सकते तो कम से कम दिल्ली पुलिस को अपने हर कैडर के अधिकारी,कर्मचारी के लिये इनसे बचने के लिए ट्रेनिंग को अनिवार्य कर देना चाहिये । ऐसा मैं कांस्टेबल वाली खबर के सिलसिले में कह रहा हूँ ।
तुम्हारे बारे में क्या कहूं मै, मेरी तमन्नाओं का सिला है. नहीं मिला जो तो मुझको क्या है, मिलेगा तुमको ये आसरा है.
गुरुवार, 18 सितंबर 2008
शनिवार, 13 सितंबर 2008
जब मैंने कहा
जब मैंने कहा /मुझे तुमसे प्यार है /तुमने कुछ नही कहा/
बस / तुम हँस दीं ।
जब मैंने कहा / मैं तुम्हें चाहता हूँ बेपनाह/
तुमने कुछ नही कहा बस अपनी उँगलियाँ मेरे होंठो पे रख दीं ।
जब मैंने कहा /चलो आज फिल्म देखने चलते हैं / तुमने कुछ नही कहा /
तुम मुस्कुराईं और क्लास लेने चलीं गईं ।
जब मैंने कहा / शाम मस्तानी है पार्क में चलें क्या ?तुमने कुछ नही कहा /
मेरा हाथ थामा और चल दीं ।
जब मैंने कहा / शादी करोगी मुझसे /
तुमने कहा- पागल हो गए हो क्या ?
आज के बाद हम कभी नही मिलेंगे ।
बस / तुम हँस दीं ।
जब मैंने कहा / मैं तुम्हें चाहता हूँ बेपनाह/
तुमने कुछ नही कहा बस अपनी उँगलियाँ मेरे होंठो पे रख दीं ।
जब मैंने कहा /चलो आज फिल्म देखने चलते हैं / तुमने कुछ नही कहा /
तुम मुस्कुराईं और क्लास लेने चलीं गईं ।
जब मैंने कहा / शाम मस्तानी है पार्क में चलें क्या ?तुमने कुछ नही कहा /
मेरा हाथ थामा और चल दीं ।
जब मैंने कहा / शादी करोगी मुझसे /
तुमने कहा- पागल हो गए हो क्या ?
आज के बाद हम कभी नही मिलेंगे ।
गुरुवार, 4 सितंबर 2008
कोसी का कहर और ........................
पिछले दिनों यमुना उफान पर थी अभी भी है पर उतनी नही , जितनी कोसी । कोसी ने तो उफान की भी हदें तोड़ दी हैं , न सिर्फ उफान की बल्कि किसान की , मज़दूर की , आवाम के विश्वास की हदों के साथ-साथ जडे़ तक उखाड़ दी हैं जिसकी खबर न सिर्फ प्रिंट मीडिया बल्कि और तरह के तथाकथित मीडिया भी दे रहे हैं जिनमें से एक तरह के मीडिया हैं हमारे ब्लॉगर्स । पिछले दिनों मनोज वाजपेयी ने शक्तिहीन अभिनेता और बाढ़ का दर्द शीर्षक से अपने ब्लॉग पर एक अभिनेता होने पर भी अपनी कोसी के बाढ़ पीड़ितो के लिए अब तक कुछ ना कर पाने के कारण अपनी शक्तिहीनता दिखाई थी । इस पोस्ट में उन्होंने कहा - बिहार में बाढ़ है लेकिन वो एक अभिनेता होने के बावजूद कुछ कर नही पा रहे । लेकिन साथ ही अपनी पोस्ट की एन्डिंग में उन्होंने करने का संकेत देते हुए लिखा कि वे इस सिलसिले में शेखर सुमन और प्रकाश झा से मिलने जा रहें हैं। इस वाक्य के साथ उनकी पोस्ट समाप्त हुई और शुरु हुई टिप्पणियाँ आनी ........ इन टिप्पणियों ने मेरा ध्यान खींचा कुछ को छोड़कर लगभग सब में बाढ़ का दर्द ग़ायब था जो चीज़ उपस्थित थी वो थी मनोज जी के अभिनेता होने के बावजूद अपनी जड़ो को याद रखने के लिए की गई उनकी प्रशंसा ।उन अधिकतर टिप्पणीकारों में शायद यह पूर्वाग्रह था कि अभिनय हमें अपनी जड़ो से काट देता है । क्या सचमुच जड़ो से कटकर हम अभिनय कर पाएंगे ? यह एक सवाल था जो मनोज जी की पोस्ट को पढ़कर नही , उसपर आई टिप्पणियों को पढ़कर मेरे दिमाग़ में आया ।आज सुबह जब विनीत जी का गाहे-बगाहे खोला तो वहाँ भी कोसी का क़हर बरपा हुआ था , सोच तो मैं भी रहा था कि यूनिवर्सीटी हॉस्टल और आपस की छोटी-छोटी बातों को अपने ब्लॉग का रॉ-मैटेरियल बनाने वाले विनीत जी ने अभी तक अपने ब्लॉग पर देश की इतनी बड़ी आपदा पर क्यों नही लिखा ? समझ नहीं आ रहा था कि वह अब तक जनसत्ता की छोटी-छोटी खामियाँ निकालने में ही क्यों व्यस्त हैं जबकि कोसी के क़हर के संदर्भ में वह ज़ी-न्यूज़ , आई.बी.एन.७ ,स्टार न्यूज़ की लंबी-चौड़ी खाइयाँ खोज सकते हैं । खैर जो भी है आज उनका ब्लॉग देखकर सुकून मिला , लगा उनकी पारखी नज़र देर से ही सही दुरुस्ती के साथ मीडिया के खिलाफ हल्ला बोल रही है ।
गुरुवार, 28 अगस्त 2008
मेरी दिल्ली मै ही सवारूँ
अब तक हम सुनते आए थे कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों की हालत बहुत बदतर है लेकिन ये खबर शायद आपके चेहरे पर कुछ देर के लिए खुशी ला पाए कि इन स्कूलों को अब हाइटैक करने की तर्ज़ पर इनमें कैमरे लगने शुरू हो गए है सरकार को लगता है कि स्कूलो में कैमरे लगाने ,ए. सी. ,और कम्प्यूटर प्रोवाइड कराने मा़ञ से वह स्कूलों को हाइ़टैक बना सकती है । चाहे वहाँ बुनियादी सुविधाओ का अभाव हो। खेलने के लिए समतल मैदान न हो , टॉयलेट की सफाई का उचित प्रबंध न हो,यहाँ तक की पीने के पानी की भी समूचित व्यवस्था न हो लेकिन कैमरे ज़रूरी हैं उनके बिना स्कूल में अनुशासन क़ायम करने में काफी मशक्कत जो करनी होगी । क्या दिल्ली के सरकारी स्कूलो में जहाँ स्कूल की बिल्डिंग तक काफी जर्जर हालत में हो ,ऐसे में कैमरो की व्यवस्था की ज़रूरत क्यों आन पड़ी होगी इसका जवाब सरकारी तंञ अच्छे से जानता है । क्या वह इसका खुलासा लोगों के सामने कर सकता है ?क्या इन स्कूलो को हाइटैक बनाने से पहले हमें एक स्कूल की बुनियादी सुविधाओ का ख्याल नही रखना चाहिए ?क्या इस तरह की चीज़ों पर पैसा खर्च करने से बेहतर ये न होगा कि हम पहले इन स्कूलो की वास्तविक स्थिति को जाने - समझे और फिर कोई फैसला लें ताकि बाद में हमें अपने ही फैसले पर पछताना न पड़े ?जिन स्कूलो के प्ले ग्राउंड में पैसे की किल्लत का हवाला देते हुए घास तक नही लगाई जा सकी है ,जहाँ के टॉयलेट गंदगी की मार झेल रहे है वहाँ कैमरे लगवाना बेमानी क्या जान पड़ता है ?मैं जहाँ रहता हूँ(नन्द नगरी) वो एरिया दिल्ली में कोई खास इज़्ज़त से नही देखा जाता । अब ये बताने की ज़रूरत तो बिल्कुल नहीं, कि यह जमना पार में पड़ता है । हमारे यहाँ पढाई की हालत बेहद खस्ता है ।यहाँ पढने वाले बच्चों में से अधिकतर स्कूल के पास ही के सिनेमा हॉल (गगन सिनेमा)में तफरी करते हुए देखे जा सकते हैं । यहाँ तक कि इस स्कूल की पहचान भी गगन वाले स्कूल के नाम से की जाती है ।यहाँ पढने वाले किसी बच्चे से पूछकर देखिए कि वह कहाँ पढता है उसका जवाब सर्वोदय बाल विद्यालय,नन्द नगरी नही होगा बल्कि वह कहेगा गगन वाले स्कूल में । क्या यह आपका ध्यान आइडेंटिटि पोलिटिक्स की ओर नही खीचता जिसे बुद्घिजीवी आइडेंटिटि पॉलिटिक्स का नाम देते हैं । खैर क्लास रूम्स की हालत ये है कि दीवारों में गड्ढे हो चुके हैं,पंखो की मौजूदगी प्रिंसीपल के ऑफिस ,साइंस लैब,और लाइब्रेरी तक ही सीमित है क्लास रूम्स इनसे अब तक मेहरूम है ,बिजली का आलम ये है कि शाम ढलते-ढलते पूरी बिल्डिंग को अंधेरा अपने आगो़श में ले लेता है । लेकिन वहाँ कैमरे लग गए है जो बच्चों के लिए खेल की और आस-पास के पियक्कड़ो व स्मैकियों के लिए चुराने का और चोर बाज़ार में बिकने का ताज़ा माल साबित होंगे ऐसी मेरी आशंका है ।
रविवार, 10 अगस्त 2008
किस्सागोई के किंग
पिछले सन्डे को जे.एन .यू जाना हुआ । मैच जो था जे.एन.यू और डी.यू के बीच। मैच का रिजल्ट जो रहा हो लेकिन मज़ा खूब आया। ये और बात है कि फील्डिंग ने कुछ दिनों से पूरा शरीर तोड़ के रख दिया है। मांसपेशियों में अभी भी दर्द है । तब भी इन सबसे से अलग जो बात रही , वो थी किस्सागोई की ।
हम सब लोग मैच के तुंरत बाद एक ढाबे पर आए और उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ उसने हमें शाम ७ बजे तक बांधे रखा । साऊथ कैम्पस के लड़के अरविन्द ने जिससे मेरी मुलाक़ात शायद पहली बार ही हुई थी ने ऐसा समां बाँधा कि कम से कम उस समय तो मैच की सारी थकान उतर गई ।
उस बन्दे के वो किस्से (जिसमे कुछ नॉन- वेज भी थे) जिसकी सबसे दिलचस्प बात थी उसकी दास्तानगोई यानि उसके बयां करने का स्टाइल । जो इतना उम्दा था कि उन किस्स्सो को सुनने के दौरान मुझे यक-ब-यक सूरज का सातवाँ घोड़ा के माणिक मुल्ला की याद हो आई । हालांकि माणिक मुल्ला के किस्से और इन जनाब की मजाकिया किस्सागोई में भारी विषयांतर था लेकिन दोनों में एक कॉमन बात थी । दोनों में ज़बरदस्त कौतुहल था ,रोचकता थी और थी अपने सुनने वालो को बांधे रखने की क्षमता । यह इतनी ज़बरदस्त थी कि सब लड़को का ग्रुप उस बन्दे की बाते सुनता जाता और हँस-हँस कर लोट-पोट होता जाता ।
रोमेंटिक कविता के बारे में ये बात कही जा सकती है कि ----
" कविता यों ही बन जाती है बिना बताये
क्योंकि ह्रदय में तड़प रही है याद तुम्हारी । "
लेकिन जब किस्सों की बात आती है तो किस्सा यों ही नही बनता वह तो गढा जाता है वह एक माहौल चाहता है और एक माहौल बनाता है। यह बात कहते वक़्त नई कहानी का ख्याल हो आता है उसकी सबसे बड़ी खासियत भी यही थी कि वह एक माहौल की डिमांड करती थी । अरविन्द बाबू की किस्सागोई (जिसका मै कोई उद्धरण नही दे रहा हूँ ) माहौल बनाने के इन्ही संदर्भो में याद आती है । जो अपने सुनने वालो का सिर्फ़ मनोरंजन ही नही कर रही थी बल्कि इस बात का भी एहसास करा रही थी कि किस्से किस तरह से कथाओ से निकल कर चुटकुलों में आ गए है । इन साहब में बन्दों को बाँधने की ही क्षमता मात्र नही थी बल्कि ये झूट भी इस ढंग से कहने की कला रखते थे कि वह भी सच जान पड़ता था गाइड के नाम पर मेरा जो मजाक बनाया गया था वह अब लगभग सच सा हो गया है । खैर जो भी है उस बन्दे की इस किस्सागोई ने समय की बर्बादी की चिंता से हमें कोसो दूर रखा । मै तो उसका मुरीद बन गया हूँ ऐसे बन्दे अपने आस पास रहे तो रिश्तो की चुभन का और जिंदगी की घुटन का एहसास कम से कम कुछ पल के लिए तो हमसे दूर रहता है ।
हम सब लोग मैच के तुंरत बाद एक ढाबे पर आए और उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ उसने हमें शाम ७ बजे तक बांधे रखा । साऊथ कैम्पस के लड़के अरविन्द ने जिससे मेरी मुलाक़ात शायद पहली बार ही हुई थी ने ऐसा समां बाँधा कि कम से कम उस समय तो मैच की सारी थकान उतर गई ।
उस बन्दे के वो किस्से (जिसमे कुछ नॉन- वेज भी थे) जिसकी सबसे दिलचस्प बात थी उसकी दास्तानगोई यानि उसके बयां करने का स्टाइल । जो इतना उम्दा था कि उन किस्स्सो को सुनने के दौरान मुझे यक-ब-यक सूरज का सातवाँ घोड़ा के माणिक मुल्ला की याद हो आई । हालांकि माणिक मुल्ला के किस्से और इन जनाब की मजाकिया किस्सागोई में भारी विषयांतर था लेकिन दोनों में एक कॉमन बात थी । दोनों में ज़बरदस्त कौतुहल था ,रोचकता थी और थी अपने सुनने वालो को बांधे रखने की क्षमता । यह इतनी ज़बरदस्त थी कि सब लड़को का ग्रुप उस बन्दे की बाते सुनता जाता और हँस-हँस कर लोट-पोट होता जाता ।
रोमेंटिक कविता के बारे में ये बात कही जा सकती है कि ----
" कविता यों ही बन जाती है बिना बताये
क्योंकि ह्रदय में तड़प रही है याद तुम्हारी । "
लेकिन जब किस्सों की बात आती है तो किस्सा यों ही नही बनता वह तो गढा जाता है वह एक माहौल चाहता है और एक माहौल बनाता है। यह बात कहते वक़्त नई कहानी का ख्याल हो आता है उसकी सबसे बड़ी खासियत भी यही थी कि वह एक माहौल की डिमांड करती थी । अरविन्द बाबू की किस्सागोई (जिसका मै कोई उद्धरण नही दे रहा हूँ ) माहौल बनाने के इन्ही संदर्भो में याद आती है । जो अपने सुनने वालो का सिर्फ़ मनोरंजन ही नही कर रही थी बल्कि इस बात का भी एहसास करा रही थी कि किस्से किस तरह से कथाओ से निकल कर चुटकुलों में आ गए है । इन साहब में बन्दों को बाँधने की ही क्षमता मात्र नही थी बल्कि ये झूट भी इस ढंग से कहने की कला रखते थे कि वह भी सच जान पड़ता था गाइड के नाम पर मेरा जो मजाक बनाया गया था वह अब लगभग सच सा हो गया है । खैर जो भी है उस बन्दे की इस किस्सागोई ने समय की बर्बादी की चिंता से हमें कोसो दूर रखा । मै तो उसका मुरीद बन गया हूँ ऐसे बन्दे अपने आस पास रहे तो रिश्तो की चुभन का और जिंदगी की घुटन का एहसास कम से कम कुछ पल के लिए तो हमसे दूर रहता है ।
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