मेरे घोचूँ मेरे भैया
क्या क्या लाऊँ
ता-था थैया
पोलीथीन पे बैन लगा है
जूट का बैग भी नहीं मिला है
मेरे घोचूँ मेरे भैया ।
कैसे लाऊँ ता-था थैया।।
बाज़ारों में भीड़ बड़ी है
सब्ज़ी लेकिन सड़ी पड़ी है
मेरे घोचूँ मेरे भैया।
कैसे खाऊँ ता-था थैया।।
त्योहारों में महँगाई है
या महँगाई में त्योहार
सीलींग के भी क्या कहने है
ठप्प पड़ गया अब व्यापार
भावनाओं की कद्र नहीं अब
अब प्रोफेशन है व्यवहार
मेरे घोचूँ मेरे भैया।
किसे सुनाऊँ ता-था थैया।।
लेकिन अब भी कुछ तो बचा है
जो अब तक बेचा नहीं गया है
ऐसा सब कहते है भैया
लेकिन मुझको नहीं पता है
कैसे इसका पता लगाऊँ
मेरे घोचूँ मेरे भैया
सब हैं मस्त
तो काहे का ता-था।
औ काहे की थैया।।
(यह बाल-कविता कुछ समय पहले लिखी गई थी आज जब काफी दिनों बाद अपनी डायरी खोली तो दिख गई सोचा आपके सामने रख दूँ , सो रख दी। ......... )
आपकी टिप्पणियों के इंतज़ार में..........
तुम्हारे बारे में क्या कहूं मै, मेरी तमन्नाओं का सिला है. नहीं मिला जो तो मुझको क्या है, मिलेगा तुमको ये आसरा है.
रविवार, 6 दिसम्बर 2009
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
-
▼
2009
(32)
-
►
November
(8)
- पर चूंकि प्रेम को मैं...(का अन्तिम अंश)
- पर चूँकि प्रेम को मै एक सम्भावना मानता हूँ,....
- यहाँ मकानों की बुलंदी आदमी की.....
- भाषा थोपी नही जाती, अपनाई जाती है क्या ये बताना पड़...
- दुनिया है एक बुढ़िया का यहाँ से वहाँ जाना.....
- समाजवादी बिरादरी की चिंता और बढ़ गई है..
- तुम दुनिया हो, जिसके कोई चेहरा नहीं होता...
- वाकई वो बहुत दुखद समय था...
-
►
November
(8)
2 टिप्पणियाँ:
बेहतरीन बाल कविता!!
अच्छी कविता है, आपकी डायरियों के और पृष्ठ कहाँ हैं उन्हें भी चिपकाइए
एक टिप्पणी भेजें