सोमवार, 30 अगस्त 2010

पीपली लाइव - अनुभव की तंज़िया नज़र


जैसा मैंने अपनी १४ अगस्त२०१० की डायरी में लिखा है-
पीपली लाइव देखने के दौरान जितना मेरे साथ बैठे सहदर्शक हँस रहे थे मुझमे उतनी ही एक टीस रह-रहके उभर आती थी अब जब मैं पूरी फिल्म देख चुका हूँ और राजौरी गार्डेन के 'वेस्ट गेट माल' में मुस्कुराते जोड़ो को देख रहा हूँ तो भी मेरे जेहन में राकेश के लटके हुए/जले हुए हाथ की वो इमेज बार-बार उभर रही है और मुझे यकीन है कि फिल्म का दर्शक इस इमेज को इतनी जल्दी बिसराने वाला नहीं। चाहे मुन्नी कितनी ही बदनाम क्यों न हो । खैर मै जल्द से जल्द स्वतंत्रता दिवस पर सजाये गए उस माल से निकलना चाहता हूँ हालांकि मै अपने दोस्तों के साथ हँस-बोल रहा हूँ उनकी मस्ती में उनका साथ दे रहा हूँ शायद इसलिए की मेरे जन्मदिन पर उनकी ट्रीट में कोई कमी न रह जाये. पर मै परेशान हूँ कुछ उथल-पुथल सी मची है । महमूद और अनुषा रिज़्वी का निर्देशन कुछ इस तरह का है कि वो आपको आईना नहीं दिखाते बल्कि आपकी शक्लो- सूरत(बदसूरत) ही आपके सामने रख देते हैं अब आप हँसिये या तालियाँ बजाइये। सच से रूबरू कराना ही शायद उनके लेखन-निर्देशन की एक शैली है शायद व्यंग्य(satire) इसे ही कहते हैं।

अनुषा और महमूद फारूकी ने उस तंज़ नज़र को फिर से पैदा करने की कोशिश की है जिसे रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं खासकर 'हँसो हँसो जल्दी हँसो' में बयाँ किया है । मैं घर आकर रघुवीर सहाय संचयिता खोलता हूँ "...निर्धन जनता का शोषण है / कहकर आप हंसें । लोकतंत्र का अंतिम क्षण है / कहकर आप हंसें । ...कितने आप सुरक्षित होंगे / मै सोचने लगा । सहसा मुझे अकेला पाकर / फिर से आप हंसें। "(आपकी हँसी) और मूवीटाइम के हॉल न0-01 में बैठे दर्शकों के खिले चेहरे मेरे सामने हो लेते हैं.
"हँसो पर चुटकुलों से बचो / उनमे शब्द हैं / कही उनमे अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों । ********और ऐसे मौको पर हँसो / जो कि अनिवार्य हों / जैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मार / जहां कोई कुछ कर नहीं सकता / उस गरीब के सिवाय / और वह भी अक्सर हँसता है।"(हँसो हँसो जल्दी हँसो)


निश्चित ही सिर्फ नत्था इस फिल्म का mukhyaनायक नहीं है, राकेश एक दमदार किरदार है जो मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है,जिस तरह प्रेमचंद की एक कहानी 'ईदगाह' मे एकाएक 'चिमटा' नायक बन जाता है यहाँ नायक के सिलसिले में मुझे ऐसी ही गुंज़ाइश दिखती है.. खैर

दरअसल यह एक नाट्यनुमा फिल्म है मुझे शुरु से लेकर अंत तक लगता रहा कि यह एक नाटक है
और मैं अपने दिल को समझाता रहा कि नहीं यह तो फिल्म है फिर लगा ...(एक गहरी आह के साथ)नाटक ही तो है लोकतंत्र और उसके स्तंभों का, जो अपनी सारी कमज़ोरियों के बावजूद सबसे ताकतवर है यही कहते है ना हमलोग बहुधा...

1 टिप्पणी:

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

आइना है आइना हमारे आज का, सिनेमा.