सोमवार, 3 नवंबर 2008

जज़्बात

नहीं नहीं , नहीं-नहीं यहाँ कोई नहीं है
खुशबू फूलों में नहीं , रंगे-मेहफ़िल भी नहीं है ।

क्या हुआ वक़्त जो ठहरा हुआ-सा लगता है
पास में सब हैं मगर, साथ में कोई नहीं है ।

क्या करे इश्क़-ए-मजमूँ जो समझ में ना आया (प्यार का मतलब)
क्यों ना कह दूँ कि मुझे इसका तो इरफ़ा नहीं है । (जानकारी)

और बच जाऊँ अब ये कहके मैं उनकी नज़र से
कि किसी और से है प्यार, पर तुमसे...........

4 टिप्‍पणियां:

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बढ़िया

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बहुत ख़ूब...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

वाह वाह भाई..क्या बात है...बेहतरीन.
नीरज

Udan Tashtari ने कहा…

वाह!!